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किसानों व व्यापारियों को नहीं भा रहीं प्रधानमंत्री की पेंशन योजनाएं
देश के एक प्रतिशत किसानों ने भी इस योजना में रुचि नहीं दिखायी है। पीएमकेएमवाई की सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 3 नवंबर तक इस योजना के तहत महज 18 लाख 46 हजार किसानों ने अपना पंजीकरण कराया है।
सरोजिनी बिष्ट
04 Nov 2019
 PM kisan pension scheme
Image Courtesy: Telegraph Inida

जब बीते 12 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने झारखंड दौरे के दौरान एक भव्य कार्यक्रम के जरिये पूरे देश के छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पीएमकेएमवाई) का शुभारंभ किया था तो माना जा रहा था कि किसानों के पक्ष और हित में यह अब तक का सबसे क्रांतिकारी कदम साबित होगा। इस दौरान दावा किया गया कि देश के करोड़ों किसानों के लिए यह योजना बुढ़ापे का सहारा बनेगी। लेकिन अब तक के पंजीकरण के आंकड़े साफ बता रहे हैं कि किसानों का रुख इसकी ओर ठंडा ही है। देश के एक प्रतिशत किसानों ने भी इस योजना में रुचि नहीं दिखायी है।

पीएमकेएमवाई की सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 3 नवंबर तक इस योजना के तहत महज 18 लाख 46 हजार किसानों ने अपना पंजीकरण कराया है। किसानों की संख्या भी उन्हीं राज्यों से ज्यादा है जहां भाजपा की सरकारें हैं। हालांकि प्रधानमंत्री का गृह राज्य गुजरात यहां फिसड्डी साबित हुआ है। छत्तीसगढ़ के अलावा, अन्य पार्टियों द्वारा शासित राज्यों के किसान इस योजना को लेकर कतई उत्साह नहीं दिखा रहे। अगर हरियाणा और झारखंड जैसे तुलनात्मक रूप से छोटे राज्यों को छोड़ दें तो पंजीकरण का आंकड़ा बेहद निराशाजनक है।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल किसानों (जोतदारों) की संख्या लगभग 12 करोड़ है। इनमें सबसे ज्यादा दो करोड़ किसान उत्तर प्रदेश में हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी तक केवल 2 लाख 36 हजार किसानों ने मानधन योजना के लिए पंजीकरण कराया है। पंजीकरण के मामले में वह चौथे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश के 10 जिलों से पंजीकरण की संख्या एक हजार तक भी नहीं पहुंची है। पंजीकरण में सबसे आगे हरियाणा और दूसरे नंबर पर झारखंड है। हरियाणा में 24 लाख किसान हैं और अब तक वहां के 4 लाख से ज्यादा किसान पंजीकरण करा चुके हैं।

झारखंड में 38 लाख किसान हैं, जिनमें से 2 लाख 40 हजार किसानों ने पंजीकरण कराया है। तीसरे स्थान पर बिहार है, जहां के 72 लाख किसानों में से केवल 2 लाख 37 हजार किसानों ने पंजीकरण कराया है। छत्तीसगढ़ में लगभग दो लाख और ओड़िशा में 1 लाख 35 हजार किसान मानधन योजना के लिए पंजीकृत हो चुके हैं। बाकी देश के किसी राज्य में अब तक एक लाख पंजीकरण भी नहीं हुआ है। दिल्ली, पुडुचेरी, मिजोरम, लक्षद्वीप, सिक्किम, मेघालय ऐसे राज्य हैं, जहां अब तक 100 किसानों ने भी पंजीकरण नहीं कराया है।

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना एक अंशदान आधारित पेंशन योजना है। इसमें 18 से 40 साल तक के किसान शामिल हो सकते हैं, बशर्ते कि उनके पास दो हेक्टेयर से ज्यादा खेती की जमीन नहीं हो। इसके अलावा भी कुछ शर्तें हैं। पेंशन पाने के लिए न्यूनतम 55 रुपये और अधिकतम 200 रुपये तक मासिक अंशदान करना होगा, जो कि उम्र पर निर्भर है। 60 साल की उम्र होने पर योजना में शामिल किसान को 3000 रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलेगी। यह योजना किसानों को नहीं लुभा पा रही है तो इसके तीन मुख्य कारण माने जा रहे हैं। पहला कारण यह है कि कोई किसान अमूमन 30 की उम्र होने पर भविष्य के बारे में सोचना शुरू करता है। अगर 30 साल तक अंशदान करे तो उसे 60 साल का होने पर पेंशन मिलेगी। कई किसान कहते हैं कि आज से 30 साल बाद 3000 रुपये का भला क्या मोल होगा।

दूसरे मुख्य कारण को सटीक ढंग से चिह्नित किया है भारतीय किसान आंदोलन के संयोजक कुलदीप कुमार ने। अखबारों में छपे उनके बयान के मुताबिक, ज्यादातर खेती पुश्तैनी जमीन पर होती है। इस व्यवस्था में अधिकतर किसानों के नाम पर भूमि तब हो पाती है जब पिता का निधन हो जाये। यानी अधिकतर किसान भूमि रिकॉर्ड में तब जमीन के मालिक बन पाते हैं जब वे अधेड़ या बुजुर्ग हो चुके हैं। ऐसे में उनके लिए पेंशन योजना में शामिल हो पाना संभव नहीं हो पाता है। तीसरा मुख्य कारण यह है कि किसानों की कमर पहले से टूटी हुई है, वे भला अंशदान कहां से दें। भारतीय किसान यूनियन के एक नेता राकेश टिकैत का कहना है कि किसानों को अपनी उपज का पूरा दाम भी नहीं मिल पाता। ऐसे में वे नियमित रूप से किस्तों का भुगतान कहां से करें।

बीते 12 सितंबर को ही नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना के साथ देश के करोड़ों व्यापारियों और स्व-रोजगार करनेवालों के लिए भी राष्ट्रीय पेंशन योजना की शुरुआत की। इसे 'नेशनल पेंशन स्कीम फॉर ट्रेडर्स एंड सेल्फ-इम्प्लॉयड पर्सन्स' नाम दिया गया है। इस योजना से जुड़ने के लिए व्यापारियों की उम्र 18 से 40 साल के बीच और सालाना टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये से कम होना चाहिए। किसानों की तरह ये लोग भी हर महीने 55 से 200 रुपये का अंशदान करके 60 साल की उम्र होने पर 3000 रुपये महीने की पेंशन पा सकते हैं। लेकिन इस योजना की हालत और भी खराब है।

मानधन की सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल पेंशन स्कीम फॉर ट्रेडर्स एंड सेल्फ-इम्प्लॉयड पर्सन्स के तहत अब तक चार हजार से भी कम लोगों ने पंजीकरण कराया है। किसी भी राज्य में पंजीकरण की संख्या 500 तक भी नहीं पहुंच पायी है। हरियाणा सभी राज्यों के बीच अव्वल है जहां 483 पंजीकरण हुए हैं। इसेक बाद चंडीगढ़ में 391, उत्तर प्रदेश में 347, बिहार में 346, कर्नाटक में 342, झारखंड में 262 और महाराष्ट्र में 244 लोगों ने पंजीकरण कराया है। अन्य राज्यों में यह संख्या 200 के नीचे है। दमन व दीव, लक्षद्वीप, मिजोरम, सिक्किम, पुडुचेरी और दादरा एवं नगर हवेली में योजना का खाता तक नहीं खुला है। मेघालय, जम्मू एवं कश्मीर, नगालैंड, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में इस योजना के लिए आवेदकों की संख्या अभी दहाई के नीचे है।

इसमें दो राय नहीं कि जिस जोश और शोर के साथ इन पेंशन योजनाओं को शुरू किया गया था और करोड़ों लोगों को इससे फायदा पहुंचने का दावा किया गया था उसके विपरीत इन योजनाओं में रजिस्ट्रेशन का प्रतिशत देख यही कहा जा सकता है कि योजनाएं उस स्तर तक प्रभावित नहीं कर रही जितना दावा ठोका गया था।

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