NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मंदी के समय निजीकरण का ख़याल डरावना: प्रणब सेन
सेन कोई अकेले नहीं हैं जो सरकार द्वारा निजीकरण के फैसले से नाराज़ हैं। जबकि देश के कई अन्य बड़े अर्थशस्त्री ने भी सरकार द्वारा सरकारी कंपनियों और परिसंपत्ति को बेचने की आलोचना की है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
18 Feb 2021
निजीकरण

नई दिल्ली: भारत के सांख्यिकी विभाग के पूर्व प्रमुख प्रणब सेन ने बुधवार को कहा कि मंदी के दौर में केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (सीपीएसई) के निजीकरण का विचार एक ‘डरावना विचार है।’

उन्होंने कहा कि यह इसलिए गलत समय है क्योंकि इससे मौजूदा जरूरतों को पूरा करने की वित्तीय क्षेत्र की क्षमता और कम हो जाती है।

उद्योग मंडल पीएचडी द्वारा आयोजित एक चर्चा में सेन ने यह भी कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2021-22 के अपने बजट भाषण में रोजगार शब्द का उल्लेख एक बार भी नहीं किया।

उन्होंने कहा कि निजीकरण के लिए सबसे अच्छा समय वह है जब अर्थव्यवस्था तेजी पर हो, ‘‘मंदी में निजीकरण का ख्याल डरावना है।’’

गौरतलब है कि सरकार ने बजट में अगले वित्त वर्ष के दौरान विनिनवेश और निजीकरण से 1.75 लाख करोड़ रुपए के संसाधन जुटाने का लक्ष्य रखा है ।

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में अगले वित्त वर्ष में सरकारी क्षेत्र के दो बैंकों और एक साधारण बीमा कंपनी को बेचने की भी घोषणा की है। पर बजट भाषण में उनके नाम नहीं बताए गए हैं।

सेन ने कहा, ‘‘कहने का मतलब यह है कि जो समय चुना गया है वह गलत है क्योंकि इससे वित्तीय क्षेत्र की वैध वास्तविक जरूरत को पूरा करने की क्षमता और घट जाएगी।

सेन कोई अकेले नहीं हैं जो सरकार द्वारा निजीकरण के फैसले से नाराज़ हैं।  जबकि देश के कई अन्य बड़े अर्थशस्त्री ने भी  सरकार द्वारा सरकारी कंपनियों और परिसंपत्ति को बेचने की आलोचना की है।

अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा लिखते हैं कि जब प्राइवेट सेक्टर बुरी हालत से गुजरता है तब भी करदाताओं का पैसा ही डूबता है। साल 2014 के बाद अब तक तकरीबन 8 लाख करोड रुपए का डूबा हुआ कर्जा बैंक अकाउंट से हटाया जा चुका है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का अनुमान है कि आने वाले समय में यह दोगुना हो सकता है। बहुत सारे आर्थिक विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि बैंकों का बहुत अधिक कर्जा डूबा है। बैंक सही आंकड़े नहीं दे रहे हैं। इस बार के बजट में इन सब पर पर्दा डालने के लिए बैड बैंक बनाने का एलान भी किया जा चुका है।

देवेंद्र शर्मा इस पूरी प्रक्रिया को एक लाइन में लिखते हैं कि "वी हेव सोसिलिज्म फॉर कॉरपोरेट एंड कैपटिलजम फॉर फार्मर” मतलब कि हमारी सरकार ने कारपोरेट घराने के लिए समाजवाद और किसानों के लिए पूंजीवाद अपनाया हुआ है।

प्रोफेसर प्रभात पटनायक तो यह साफ तर्क देते हैं कि जब पूंजी बैंक से ही लेनी है तो सरकार बैंक से पूंजी लेकर कंपनी क्यों न चलाएं। ऐसी स्थिति में अगर पैसा डूबता भी है तो सरकार की संप्रभुता की वजह से जनता को पैसा मिलने की पूरी संभावना रहती है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो सब प्राइवेट करने के लिए सरकार इसलिए उतारू नहीं है कि इससे वह हो पाएगा जो होना चाहिए। बल्कि इसलिए उतारू है ताकि पैसा कमाने वालों के पास पैसा कमाने का बड़ा जरिया हो और सरकार को चुनाव लड़ने और जीतने के लिए बड़ा पैसा मिल सके।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ )

Economic Recession
privatization
Pranab Sen
Nirmala Sitharaman
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक


बाकी खबरें

  • Victims of Tripura
    मसीहुज़्ज़मा अंसारी
    त्रिपुरा हिंसा के पीड़ितों ने आगज़नी में हुए नुकसान के लिए मिले मुआवज़े को बताया अपर्याप्त
    25 Jan 2022
    प्रशासन ने पहले तो किसी भी हिंसा से इंकार कर दिया था, लेकिन ग्राउंड से ख़बरें आने के बाद त्रिपुरा सरकार ने पीड़ितों को मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। हालांकि, घटना के तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने के…
  • genocide
    अजय सिंह
    मुसलमानों के जनसंहार का ख़तरा और भारत गणराज्य
    25 Jan 2022
    देश में मुसलमानों के जनसंहार या क़त्ल-ए-आम का ख़तरा वाक़ई गंभीर है, और इसे लेकर देश-विदेश में चेतावनियां दी जाने लगी हैं। इन चेतावनियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  • Custodial Deaths
    सत्यम् तिवारी
    यूपी: पुलिस हिरासत में कथित पिटाई से एक आदिवासी की मौत, सरकारी अपराध पर लगाम कब?
    25 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार दावा करती है कि उसने गुंडाराज ख़त्म कर दिया है, मगर पुलिसिया दमन को देख कर लगता है कि अब गुंडाराज 'सरकारी' हो गया है।
  • nurse
    भाषा
    दिल्ली में अनुग्रह राशि नहीं मिलने पर सरकारी अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने विरोध जताया
    25 Jan 2022
    दिल्ली नर्स संघ के महासचिव लालाधर रामचंदानी ने कहा, ‘‘लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल, जीटीबी हस्पताल और डीडीयू समेत दिल्ली सरकार के अन्य अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग…
  • student
    भाषा
    विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में, नयी हकीकत को स्वीकार करना होगा: रिपोर्ट
    25 Jan 2022
    रिपोर्ट के अनुसार महामारी के कारण उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों में विश्वविद्यालयों के सामने अनेक विषय आ रहे हैं और ऐसे में विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License