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‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही पहुँच के बाहर हैं।
शंभूनाथ शुक्ल
19 Oct 2021
Pulses
Image courtesy : India Today

प्रकृति ने फिर से अपना ग़ुस्सा दिखाना शुरू कर दिया है। अभी चार दिन पहले जिस दिन मौसम विज्ञान विभाग ने भविष्यवाणी की थी कि दक्षिण पश्चिम मानसून लौट चला है, उसी दिन केरल में बाढ़ ने तबाही मचा दी। कई लोग मारे गए और बहुत से लोग बेघर हो गए। दशहरे के अगले रोज़ दिल्ली में मानसून सक्रिय हो गया और जुलाई-अगस्त की याद दिला दी। शहर वालों को भले ही लगे कि क्वार की बारिश से जलाने वाली धूप से राहत मिली किंतु यह बारिश ख़रीफ़ की फसल को चौपट कर गई। अलबत्ता थोड़ा प्रदूषण ज़रूर कम हुआ है। इस बेमौसम बारिश का अर्थ है कि प्रकृति कुपित है। और अब यह भले ही प्रदूषण को दूर करे किंतु यह बरसात मलेरिया की सौग़ात भी दे जाएगी। यूँ भी दिल्ली और उसके आसपास सौ किमी तक डेंगू फैल रहा है, ऐसे में यह बारिश और क़हर ढाएगी।

इस बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही पहुँच के बाहर हैं। पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस की क़ीमतें रोज़ बढ़ जाती हैं। किंतु सरकार वोटरों को भी कार सेवक समझे है और प्रकृति को भी। उसे लगता है कि कुछ उबाल मारेगा फिर ठंडा पड़ जाएगा। यह भ्रम है। जिस तरह से महंगाई का ग्राफ़ बढ़ रहा है उसमें लोगों का जीना मुहाल हो रहा है। यह मौसम दालों का होता है। इसी मौसम में ख़रीफ़ की फसल कटती है। ख़ासकर मटर, उड़द, मूँग और मसूर की दाल। लेकिन बारिश ने उनको भारी नुक़सान पहुँचाया है। और दाल में प्रोटीन होता है, जो मौसमी बीमारियों को रोकता है।

दाल और सब्ज़ियाँ तथा तेल तीनों चीज़ें मनुष्य के शरीर को पोषण देती हैं। एक जमाने में मांसाहारी लोग दाल को कोई खास तवज्जो नहीं दिया करते थे क्योंकि उनके पास प्रोटीन का विकल्प मांस है ही। यही कारण है कि कनाडा जहां पर विश्व में सबसे अधिक दलहन पैदा होता है वहां पर भी दाल की क्वालिटी सुधारने के कोई प्रयास नहीं हुए। और वहां पर दाल की पैदावार खूब होने के बावजूद कोई भी देश कनाडा से दालें मंगाता नहीं है। भारत जहां पर दालें बहुत खाई जाती हैं वहां पर दाल की कमी के चलते और अरहर की कीमतें बढ़ने के कारण अचानक दालों पर लोगों का ध्यान गया, तब कनाडा से भी दाल मंगवाने के बारे में एक दफे सोचा गया था। पर पता चला कि अरहर का घरेलू भाव कनाडा द्वारा आयातित दाल से कम है। दाल भारतीय जनमानस में इतनी गहरी पैठ बना चुकी है कि दाल के खिलाफ लोग कुछ भी सुनने को राजी नहीं।

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हम पुश्तों से सुनते आए हैं कि शाकाहारी लोगों के लिए दाल एकमात्र प्रोटीन का विकल्प है। इसलिए दालों की मांग में जरा भी कमी नहीं आई। यह जरूर हो गया कि अरहर की बजाय लोग मसूर, उड़द और चने की दाल भी खाने लगे। हालांकि सच यह है कि चने की दाल नियमित तौर पर नहीं खाई जा सकती क्योंकि इसमें प्रोटीन के अलावा कुछ घातक तत्त्व भी होते हैं जिनके अनवरत सेवन से शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने लगता है। इससे शरीर में हड्डी के रोग बढ़ जाते हैं। मगर और कोई चारा नहीं था। कुछ सस्ती अरहर दाल बाजार में आईं जरूर लेकिन उनमें खेसारी की दाल मिली हुई थी। मालूम हो कि 1974 में जब खेसारी की दाल के नियमित सेवन से मध्यप्रदेश और मौजूदा छत्तीसगढ़ के असंख्य लोग विकलांग पैदा होने लगे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसकी खरीद व बिक्री पर रोक लगा दी थी। लेकिन अचानक कुछ लोग खेसारी दाल के पक्ष में आ गए और खेसारी मिली अरहर बाजार में आई पर वह उपभोक्ता को स्वीकार नहीं हुई।

दिल्ली में खारी बावली के दाल व्यापारी बताते हैं कि पिछले कुछ महीनों में चने की दाल की खपत दूनी हुई है। यह चौंकाने वाली सूचना है। आमतौर पर चने की दाल खाने की बजाय कचौड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल की जाया करती थी। और कभी-कभार उसका इस्तेमाल अगर दाल के विकल्प के रूप में होता भी तो खड़े चने की दाल खाई जाती थी और उसमें उड़द मिलाए जाते। आमतौर पर उत्तर भारत में चने की दाल खाने की परंपरा नहीं रही है इसलिए यह खबर चौंकाती है। मगर सत्य है और इसकी वजह है कि अब लोगों की जुबान पर जिस तरह से पीली दाल खाने का चस्का लगा है तथा पीली दाल के नाम पर बिकने वाली सारी दालें मध्यमवर्ग की पहुंच से दूर हो गई हैं।उसमें अकेला विकल्प चने की दाल का ही बचता है जो अपेक्षाकृत सस्ती है। यही कारण है कि जिन परिवारों में कभी-कभार चने की दाल बना करती थी वहां अब रोज़ाना ही दाल के नाम पर चने की दाल बनती है। दरअसल पिछले सवा साल में पहले अरहर की और फिर उड़द व मूंग की कीमतें जिस तरह से बढ़ीं उससे दालें आम जन की पहुंच से बाहर हो गईं। और नतीजन वह सब दाल के विकल्प के तौर पर बिकने लगा जो पहले आमतौर पर अपने सुपाच्य नहीं होने की वजह से हमारी रोज की फूड हैबिट में नहीं था।

अरहर तो अब रोज-रोज की बजाय कभी-कभार की दाल बनकर रह गई है। नतीजन लोगों ने उड़द की दाल का विकल्प चुना, पर उड़द की दाल गंगा जमना के मानसूनी इलाकों में रोज खाना आसान नहीं है। मैदानी इलाकों में आमतौर पर लोग दोपहर को खाना खाने के बाद सोते हैं और अपनी परंपरागत आदत के मुताबिक थोड़ा आरामतलब भी होते हैं। ऐसे लोगों को अरहर की दाल मुफीद होती है। अरहर कम मेहनत करने वालों को भी पच जाती है और उनके शरीर के अंदर की प्रोटीन को भी यह दाली पूरी करती है। यही कारण है कि अचानक अरहर की दाल अब उन लोगों की भी पहली पसंद बन गई है जो पहले उड़द या मसूर की दाल पसंद किया करते थे। महानगरों में जिस तरह की जिंदगी हो गई है उसमें शारीरिक मेहनत कम है पर मानसिक श्रम और तनाव कहीं ज्यादा। अत: उन्हें ऐसी दाल चाहिए जिसके पचने में ज्यादा वक्त नहीं लगे इसलिए आज दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के हर होटल व ढाबों में अरहर की दाल मिल ही जाती है। यहां तक कि गुजरात और महाराष्ट्र के होटलों में इसे पंजाबी दाल कहते हैं और पंजाबी अभी बीस साल पहले तक अरहर खाते ही नहीं थे। वहां पर खड़े चने और उड़द की दाल जिसे वो लोग मा-चने की दाल कहते थे, सर्वाधिक लोकप्रिय दाल थी। 

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पर अब अरहर की दाल वहां पर सर्वप्रिय दाल है। इसकी वजह यह भी है कि अरहर का बाजार बढ़ा है और उसने सहज ही पूरे देश के बाजार पर कब्जा कर लिया। अरहर को पकाना आसान है तथा उसका स्वाद भी बिना कोई मसाला मिलाए भी बहुत बढ़िया है। इसी वजह से अरहर का बाजार बढ़ता चला गया। अरहर ने दूसरी दालों के औषधीय गुणों को भी भुला दिया और केवल हींग के तड़के से बनने वाली मूंग की दाल को महज बीमारी तक सीमित कर दिया। जबकि पूर्व में मूंग की दाल को शाम के भोजन में अवश्य शरीक किया जाता रहा है। पर अब दालों की बढ़ती कीमतों ने शाम के भोजन में से दाल लगभग गायब कर दी है और दिन में चने की दाल को अपरिहार्य बना दिया है।

चने की दाल सुपाच्य नहीं है उसे पचने में वक्त तो लगता ही है साथ ही ऐसे लोग जो श्रम कम करते हैं और जिनका काम अधिकतर बैठे रहने का है उन्हें इस दाल से बचना चाहिए, पर एक मान्यता है कि रोज के भोजन में दाल अवश्य होनी चाहिए इसलिए इसका प्रचलन बढ़ा है। दाल के आढ़ती बताते हैं कि अरहर की मांग घटी है और अचानक चने की दाल की मांग तेजी से बढ़ी है। वे परिवार जो चने की दाल कभी-कभार किसी तीज त्योहार में ही खाते थे वे अब महीने में पांच-छह रोज चने की दाल खाते हैं और इतने ही दिन मसूर की। क्योंकि यही दोनों दालें अपेक्षाकृत सस्ती हैं। जबकि मसूर और चने की दाल दोनों ही वात प्रधान बताई गई हैं। इनके साथ चावल अनिवार्य रूप से खाया जाना चाहिए। पर सस्ती होने के कारण लोग ये दालें रोटी के साथ ही खा रहे हैं जो उचित नहीं है। और कभी भी कोई भयावह वात रोग फैल सकता है। मगर सरकार इस ओर से आँख मूंदे हैं। यह खतरनाक स्थिति है। इसलिए जरूरी है कि सरकार अपने पल्सेज रिसर्च इंस्टीट्यूट्स से चने व मसूर की दाल पर पड़ताल करवाए और पता करे कि ये दालें किस तरह के रोग फैला सकती हैं और इनसे बचने के लिए कौन-से उपाय आजमाए जा सकते हैं। भारत में मसाले हर तरह के रोग से लड़ने में सक्षम हैं, उनके अनुपात का ख्याल रखा जाना चाहिए। इसलिए चने व मसूर की दाल बनाते वक्त कौन-कौनसे मसाले किस अनुपात में मिलाए जाएं यह पता करना जरूरी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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