NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
विधानसभा चुनाव
समाज
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
पंजाब विधानसभा चुनाव: प्रचार का नया हथियार बना सोशल मीडिया, अख़बार हुए पीछे
चुनाव आयोग के नये निर्देशों में पांच राज्यों- पंजाब, यू.पी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में रोड शो, पद यात्रा, वाहन रैलियों और चुनावी जलूसों पर पाबंदियां 11 फरवरी तक बढ़ा दी गई हैं। जिसके चलते सोशल मीडिया पर प्रचार का महत्त्व बढ़ गया है।
शिव इंदर सिंह
02 Feb 2022
Punjab
पंजाब चुनाव में प्रचार के लिए क्रिएटिव वीडियोज का किया जा रहा है इस्तेमाल

भारतीय चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में प्रचार पर लगाई पाबंदियों के चलते पंजाब में चुनाव प्रचार के तरीके पिछली बार की अपेक्षा काफी बदल गए हैं। अब वर्चुअल प्रचार बड़े दिलचस्प ढंग से चल रहा है। राज्य के ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए यह चुनावी दृश्य काफी हैरानीजनक है। चुनाव आयोग ने 31 जनवरी तक रोड शो, पदयात्रा, वाहन रैलियों और बड़ी जन सभाओं पर पाबंदी लगाई थी। खुली सभा में 500 से ज्यादा व्यक्ति या किसी जगह की क्षमता के 50 फीसदी से ज्यादा लोगों के शामिल होने पर पाबंदी थी। घर-घर प्रचार में 10 व्यक्तियों से ज़्यादा शामिल नहीं हो सकते थे। 31 जनवरी को चुनाव आयोग के नए निर्देशों में कुछ छूट दी गई है लेकिन पाबंदियों को 11 फरवरी तक बढ़ा दिया गया है।

नये निर्देशों में पांच राज्यों- पंजाब, यू.पी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में रोड शो, पद यात्रा, वाहन रैलियों और चुनावी जलूसों पर पाबंदियां 11 फरवरी तक बढ़ा दी गई हैं, इसके साथ ही घर-घर प्रचार करने वालों की गिनती 10 से बढ़ा कर 20 कर दी गई है, चुनावी सभाओं में अब 500 की जगह 1000 लोग शामिल हो सकते हैं। इनडोर बैठकों में शामिल होने वाले लोगों की गिनती भी 300 से बढा कर 500 कर दी गई है।

ऐसे हालातों में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों ने सोशल मीडिया को अपने प्रचार का अड्डा बना लिया है। अब चुनावी लड़ाई में बड़ी-बड़ी जन -सभा की जगह फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप ने ले ली है। अब सोशल मीडिया के जरिये उम्मीदवार न सिर्फ अपना प्रचार ही करता है बल्कि अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी के विरुद्ध चुनावी युद्ध का आह्वान भी इसी मंच से करता है। सोशल मीडिया पर अब दिलचस्प टैगलाइन, सियासी विरोधियों को निशाना बनाते मीम्स दिखाई देते हैं। वीडियो क्लिप्स के जरिए भी चुनावी प्रचार में जान फूंकने की कोशिश की जा रही है। अब जो उम्मीदवार टेक्नोलॉजी में पीछे है वह प्रचार में भी पीछे रह गया है।

CHANNI
पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी चुनाव प्रचार करते हुए 

पुरानी चुनाव मुहिमों का तजुर्बा रखने वाले एक अधिकारी का कहना है, “पंजाब में उम्मीदवार आम तौर पर चुनाव से लगभग एक साल पहले अपने वोटरों के फोन नंबर इकठ्ठे कर उनसे सम्पर्क करते थे। यह काम इस बार उनके लिए वरदान साबित हो रहा है क्योंकि अब उम्मीदवार व्हाट्सऐप के जरिए अपने वोटरों को अपने चुनावी सन्देश भेजते हैं” पंजाब के रिटायर्ड जन-सम्पर्क अधिकारी और पंजाब चुनावों को नजदीक से देखने वाले उजागर सिंह बताते हैं “चुनाव आयोग की पाबंदियों के कारण शुरू हुए डिजीटल प्रचार का एक फ़ायदा यह है कि उम्मीदवारों का खर्चा कम होगा। प्रचार के समय जो शराब बाँटने का चलन होता था वह भी कुछ रुका है। खासकर वह शराब खर्च जो उम्मीदवार अपनी प्रचार करने वाली टीम पर खर्च करते थे। मुझे लगता है इस से चुनावी भ्रष्टाचार भी रुकेगा। आज जब नेता किसी बड़ी रैली की जगह वोट मांगने के लिए घर-घर जाते हैं तो यह उनकी जनता के प्रति जवाबदेही को कुछ हद तक तय करेगा। इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि इससे कुछ लोगों का नुकसान भी होगा जैसे कि रैलियों में टेन्ट, कुर्सियों आदि का प्रबंधन करने वाले, लाऊड स्पीकर लेकर रिक्शा पर प्रचार करने वाले मजदूर| ऐसे गरीब लोगों को चुनावी मौसम में कमाई का कुछ साधन मिलता था।” 

राज्य में हो रहे इन चुनावों में अख़बारों की अहमियत कम होती नजर आ रही है। पहले चुनाव नज़दीक आते ही अखबार (ख़ासकर पंजाबी अखबार) अपने स्थानीय पन्ने बढ़ा देते थे। इन पन्नों में राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवारों के इश्तिहार, इश्तहारनुमा खबरें और उनके प्रोपेगंडा से भरे होते थे। मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि यह अख़बारों की कमाई का सीजन होता है, हर बड़ी पार्टी के उम्मीदवार की कवरेज के लिए अख़बारों द्वारा एक स्ट्रिंगर लगाया जाता है जो अखबार को `कमाई` कर के भी देता है और खुद भी `कमाता है`। इस चुनाव में यह रुझान काफी कम नजर आ रहा है।  एक तो कोरोना काल में अख़बारों ने अपने स्थानीय पन्ने पहले ही कम कर दिए या कुछ ने बिल्कुल बंद कर दिए, दूसरा अब उम्मीदवारों ने अपने प्रचार का पूरा जोर डिजीटल माध्यमों पर लगा दिया है और अख़बारों को खुद ही अहमियत देनी कम कर दी है। अब राजनैतिक पार्टियों और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों ने अपनी सोशल मीडिया टीमें बना ली हैं और बहुत कम दरों पर नौजवानों को अपने ऑनलाइन प्रचार पर लगाया हुआ है।

एक स्थानीय अखबार से जुड़े स्ट्रिंगर ने नाम न छपने की शर्त पर हमें बताया, “अब उम्मीदवारों की रूचि अख़बारों में अपने इश्तिहार या प्रैस नोट छपवाने की पहले जितनी नहीं रही क्योंकि यह काम उनके लिए महंगा पड़ता था। अब उन्होंने बहुत कम रेट पर लडके-लड़कियाँ  भर्ती कर अपनी सोशल मीडिया टीम बना ली है। आजकल प्रमुख अख़बारों से जुड़े वे पत्रकार भी मायूस हैं जो इस चुनावी सीजन में लाखों रूपये कमाते थे या जो उम्मीदवारों के चुनावी रणनीतिकार बने फिरते थे। अखबार चुनाव के मौसम में इस बार भी हमें इश्तिहार लाने को कहते हैं पर जब हम चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के पास जाते हैं तो वे रूखी-सी भाषा में कह देते हैं, ‘देख लेंगे, अब हमारा काम सोशल मीडिया से सस्ते में हो जाता है।”  

पंजाब के 22 किसान संगठनों द्वारा चुनाव लड़ने के लिए गठित किये गये संयुक्त समाज मोर्चा के मंजीत सिंह का कहना है, “हम चुनाव में नये हैं, लोगों से जुड़ना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है पर सोशल मीडिया खासकर व्हाट्सऐप और फेसबुक हमारे जैसे छोटे और नये संगठन के प्रचार के लिए अच्छा माध्यम साबित हो रहा है।” 

जिला बरनाला के पढ़े-लिखे नौजवान नवकिरण सिंह का कहना है, “बेशक चुनाव आयोग की पाबंदियों से काफी कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है लेकिन अंदरखाने अभी भी चुनाव प्रचार चुनाव आयोग के नियम तोड़ कर हो रहा है। गावों में अक्सर ही आयोग द्वारा तय की गयी गिनती से ज्यादा लोग इकठ्ठा हो जाते हैं। घर-घर प्रचार के समय भी नियमों की धज्जियां उड़ती हैं। गावों में कई जगह जब उम्मीदवारों को लड्डुओं और सिक्कों से तोला जाता है तो काफी संख्या में लोग जमा होते हैं।” 

ये भी पढ़ें: चुनाव विशेष: पंजाब की नज़र से पंजाब को समझने की कोशिश

punjab
punjab ISSUE
Punjab politics
AAP
BJP
Congress
akali dal

Related Stories

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

भगवंत मान ने पंजाब के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक

यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता

पंजाब : कांग्रेस की हार और ‘आप’ की जीत के मायने

यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !

उत्तराखंड में भाजपा को पूर्ण बहुमत के बीच कुछ ज़रूरी सवाल

गोवा में फिर से भाजपा सरकार


बाकी खबरें

  • अनिंदा डे
    मैक्रों की जीत ‘जोशीली’ नहीं रही, क्योंकि धुर-दक्षिणपंथियों ने की थी मज़बूत मोर्चाबंदी
    28 Apr 2022
    मरीन ले पेन को 2017 के चुनावों में मिले मतों में तीन मिलियन मत और जुड़ गए हैं, जो  दर्शाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद धुर-दक्षिणपंथी फिर से सत्ता के कितने क़रीब आ गए थे।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली : नौकरी से निकाले गए कोरोना योद्धाओं ने किया प्रदर्शन, सरकार से कहा अपने बरसाये फूल वापस ले और उनकी नौकरी वापस दे
    28 Apr 2022
    महामारी के भयंकर प्रकोप के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी कर 100 दिन की 'कोविड ड्यूटी' पूरा करने वाले कर्मचारियों को 'पक्की नौकरी' की बात कही थी। आज के प्रदर्शन में मौजूद सभी कर्मचारियों…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में आज 3 हज़ार से भी ज्यादा नए मामले सामने आए 
    28 Apr 2022
    देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 3,303 नए मामले सामने आए हैं | देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 0.04 फ़ीसदी यानी 16 हज़ार 980 हो गयी है।
  • aaj hi baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    न्यायिक हस्तक्षेप से रुड़की में धर्म संसद रद्द और जिग्नेश मेवानी पर केस दर केस
    28 Apr 2022
    न्यायपालिका संविधान और लोकतंत्र के पक्ष में जरूरी हस्तक्षेप करे तो लोकतंत्र पर मंडराते गंभीर खतरों से देश और उसके संविधान को बचाना कठिन नही है. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कथित धर्म-संसदो के…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान
    28 Apr 2022
    आजकल भारत की राजनीति में तीन ही विषय महत्वपूर्ण हैं, या कहें कि महत्वपूर्ण बना दिए गए हैं- जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र। रात-दिन इन्हीं की चर्चा है, प्राइम टाइम बहस है। इन तीनों पर ही मुकुल सरल ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License