NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
नज़रिया
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल
बात बोलेगी—ये चुनाव परिणाम यह संकेत साफ़ दे रहे हैं कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों तक राजनीतिक एजेंडा सेट करने में भाजपा के पास बढ़त है।
भाषा सिंह
10 Mar 2022
jandesh 2022

लोकतंत्र, जनादेश, धर्मतंत्र, नफरततंत्र, धनतंत्र, प्रचारतंत्र के बीच के अंतर को ये पांच विधानसभा के चुनाव परिणाम मिटाने वाले साबित हुए हैं। अवधारणा विकसित करना, उसे प्रचारित करना, उसे ही सच के तौर पर स्थापित करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का तमाम नियम कायदे-कानून को धता बताते हुए इस्तेमाल करना चुनावी लोकतंत्र का नया नॉर्मल हो गया है। यह बात समान तौर पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में नतीजों में देखी जा सकती है। भारतीय लोकतंत्र जिस नये गियर में 2014 के बाद से गया है, वह नया गियर तमाम जमीनी मुद्दों को हराने में कामयाब है और भारतीय वोटर, कम से कम उसका एक प्रभावशाली हिस्सा—इस नये गियर पर ही मुहर लगाने के मूड में है।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि उत्तर प्रदेश सहित बाकी राज्यों में जनता अपने मुद्दों पर वोकल-मुखर नहीं थी, बेहद मजबूती के साथ बात रख रही थी, लेकिन दिमाग में कहीं न कहीं हिंदू होने और मुसलमानों को सबक सिखाने वाला गाना भी बज रहा था। यह स्वर हर जगह सुनाई दिया—उत्तराखंड में जहां भाजपा कांग्रेस की आपसी कलह का फायदा उठा रही थी, लेकिन सुर हिंदू कार्ड का ही बजाया जा रहा था, गोवा जहां मंदिरों को वापस चमकाने और ईसाइयों को दबा कर रखना अंडरकरेंट में था, मणिपुर में धनबल और ड्रग्सबल के साथ बहुतायत हिंदू होने वाला कार्ड खूब खेला गया। पंजाब में यह कार्ड भाजपा नहीं आम आदमी पार्टी ने खेला—धर्मान्तरण कानून से लेकर तिरंगा यात्रा-पाक से खतरा आदि उसके एजेंडे में थे। हालांकि यहां लोगों में दोनों पार्टियों यानी कांग्रेस और अकाली से उकताहट हो चुकी थी और वे परिवर्तन चाहते थे। यह परिवर्तन या चेंज की अवधारणा -Perception आम आदमी पार्टी ने पंजाब में विकसित की, जो वोट खींच पाई। ये चुनाव परिणाम यह संकेत साफ दे रहे हैं कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों तक राजनीतिक एजेंडा सेट करने में भाजपा के पास बढ़त है। साथ ही साथ, जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और इन मुद्दों पर लड़ते हुए चुनावी जीत हासिल करना या जीत का भरोसा रखना-क्रमशः मुश्किल होता जाएगा। 

उत्तर प्रदेश

इन चुनावों में उत्तर प्रदेश का परिणाम भविष्य की राजनीति पर सबसे तीखा असर दिखाई देगा। उत्तर प्रदेश में 15 करोड़ लोगों को लाभार्थी में तब्दील करने वाला भाजपा का गेम प्लेन कारगर रहा इस पर विश्लेषण जरूर होना चाहिए। इसके साथ ही, जिस तरह से सांप्रदायिक कार्ड जिसे शुरू से लेकर आखिरी तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे जोर-शोर से बजाते रहे, उसने तमाम दूसरे मुद्दों को कैंसिल करके इस पर ही मतदाताओं को वोट डालने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया—यह भी ध्यान में रखना जरूरी है। उत्तर प्रदेश में आवारा पशु, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों का आक्रोश सबसे मुखर मुद्दे थे। इनके साथ ही साथ न्यू पेंशन स्कीम के ख़िलाफ सरकारी कर्मचारियों और उनके परिजनों का गुस्सा इस तरह से सिर चढ़कर बोल रहा था कि सरकारी टीचर से लेकर आला सरकारी अधिकारी तक कैमरे पर अपने नाम के साथ बोल रहे थे। इलाहाबाद में नौजवानों पर हुए लाठीचार्ज, सेना और पुलिस में भर्तियों के न निकलने पर भी बेरोजगार बोल रहे थे। ये सारे स्वर वोटों के परिणामों में दिखाई नहीं दिये। इसका क्या अर्थ लगाया जाए, इसे कैसे समझा जाए, क्या हिंदुत्वादी कार्ड-हिंदू खतरे में होने का जो दुष्प्रचार लंबे समय से भाजपा कर रही थी, वोट देते समय वही हावी रहा या अंत होते-होते उनका गुस्सा भाजपा ने मैनेज कर लिया—इन सब बिंदुओं की पड़ताल करनी ज़रूरी है।  

इस समय ये तर्क भी बहुत बड़े पैमाने पर गढ़ा जा रहा है कि भाजपा की जीत ने आंदोलनों खास तौर से किसान आंदोलन के खिलाफ दूसरे ढंग से हमला बोल दिया है। मिसाल के तौर पर, भाजपा समर्थक पत्रकार अब खुलकर जिस तरह से बोल रहे हैं कि पंजाब में कांग्रेस की हार और यूपी में भाजपा की जीत के बाद भी किसी को शक है क्या कि किसान आंदोलन देश का मुद्दा नहीं था बल्कि सिर्फ सिर्फ एजेंडाधारियों का प्रोपोगेंडा था। इन नतीजों ने ये भी तय कर दिया कि ऐसे मुद्दे सिर्फ सोशल मीडिया पर चलते हैं, चुनाव में नहीं।

पंजाब

इसी क्रम में पंजाब के परिणामों को देखा जा सकता है। यहां आम आदमी पार्टी की हवा बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी, जिसमें कांग्रेस की आपसी फूट ने निर्णायक आधार दे दिया। एक बात का जिक्र करना यहां ज़रूरी है कि पंजाब में देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में दलितों की आबादी सबसे अधिक है—33 फीसदी से भी अधिक। इसे लेकर कांग्रेस ने दलित मुख्यमंत्री को आगे रखकर दलितों वोटों पर दांव चला, जो उस पर उल्टा पड़ा। एक अंडर-करेंट एंटी दलित ध्रुवीकरण का भी पंजाब में हुआ, यह कहते हुए लोग मिले कि हम लड़ाका कौम है, कैसे इस समाज के नेता को ऊपर बैठा सकते। साथ ही किसान आंदोलन के समय, दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा मदद पहुंचाने और पैठ बनाने का भी काम किया गया, जिसका उसे फायदा हुआ। पिछले चुनाव में (2017) में आप पंजाब में सत्ता में आने से बाल-बाल ही चूक गई थी।

उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा

कांग्रेस अपनी आपसी फूट उत्तराखंड में भारी पड़ी। हरीश रावत औऱ बाकी कांग्रेसी धड़ों में संघर्ष उसकी नैया को ले डूबा। यहां आप ने भी कांग्रेस के वोट काटे और भाजपा का हिंदुत्व कार्ड खूब चला। मणिपुर में भाजपा ही रेस में थी। वहां के मतदाताओं को यह सिखा दिया गया है या यूं कहें कि संघीय ढांचे की धज्जियां उड़ाते हुए यह नया नॉर्मल कर दिया गया है कि जिस पार्टी की केंद्र में सरकार है, वही यहां रहेगी, तभी काम चलेगा। जनता दल यू यानी नीतीश की पार्टी ने भी बहुत कायदे से चुनाव लड़ा औऱ जिन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिला, उन्हें दिया। धनबल औऱ ड्रगबल सिर चढ़कर बोला मणिपुर के चुनाव में। वहीं गोवा में कांग्रेस के लिए जमीन अच्छी थी, लेकिन नेतृत्व और चुनावी मशीनरी बेहद लचर थी। इसमें कसर को पूरा कर दिया आप और तृषणूल कांग्रेस ने। इनके पास चुनाव की मशीनरी और धनबल खासा रहा औऱ कांग्रेस के दल-बदलू रवैये से नाराज मतदाताओं के लिए एक विकल्प के तौर पर उभरी। 

(भाषा सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Assembly Election 2022
UP CHUNAV 2022
punjab
goa
manipur
UTTARAKHAND
poll 2022
BJP
BJP-RSS
SAMAJWADI PARTY
Congress
BSP
aam aadmi party

Related Stories

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

हार के बाद सपा-बसपा में दिशाहीनता और कांग्रेस खोजे सहारा

भगवंत मान ने पंजाब के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक

यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान

यूपी के नए राजनीतिक परिदृश्य में बसपा की बहुजन राजनीति का हाशिये पर चले जाना

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता

पंजाब : कांग्रेस की हार और ‘आप’ की जीत के मायने

यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !


बाकी खबरें

  • Ukraine Russia
    पार्थ एस घोष
    यूक्रेन युद्ध: क्या हमारी सामूहिक चेतना लकवाग्रस्त हो चुकी है?
    14 Mar 2022
    राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न उस पवित्र गाय के समान हो गया है जिसमें हर सही-गलत को जायज ठहरा दिया जाता है। बड़ी शक्तियों के पास के छोटे राष्ट्रों को अवश्य ही इस बात को ध्यान में रखना होगा, क्योंकि बड़े…
  • Para Badminton International Competition
    भाषा
    मानसी और भगत चमके, भारत ने स्पेनिश पैरा बैडमिंटन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में 21 पदक जीते
    14 Mar 2022
    भारत ने हाल में स्पेनिश पैरा बैडमिंटन अंतरराष्ट्रीय (लेवल दो) प्रतियोगिता में 11 स्वर्ण, सात रजत और 16 कांस्य से कुल 34 पदक जीते थे।
  • भाषा
    बाफ्टा 2022: ‘द पावर ऑफ द डॉग’ बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म
    14 Mar 2022
    मंच पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार देने आए ‘द बैटमैन’ के अभिनेता एंडी सर्किस ने विजेता की घोषणा करने से पहले अफगानिस्तान और यूक्रेन के शरणार्थियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार के लिए सरकार पर निशाना…
  • उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: दक्षिण अमेरिका में वाम के भविष्य की दिशा भी तय करेंगे बोरिक
    14 Mar 2022
    बोरिक का सत्ता संभालना सितंबर 1973 की सैन्य बगावत के बाद से—यानी पिछले तकरीबन 48-49 सालों में—चिली की राजनीतिक धारा में आया सबसे बड़ा बदलाव है।
  • indian railway
    बी. सिवरामन
    भारतीय रेल के निजीकरण का तमाशा
    14 Mar 2022
    यह लेख रेलवे के निजीकरण की दिवालिया नीति और उनकी हठधर्मिता के बारे में है, हालांकि यह अपने पहले प्रयास में ही फ्लॉप-शो बन गया था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License