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तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
कथित रूप से 'जबरन धर्मांतरण' के बाद एक किशोरी की हालिया खुदकुशी और इसके ख़िलाफ़ दक्षिणपंथी संगठनों की प्रतिक्रिया ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून की मांग को फिर से केंद्र में ला दिया है।
श्रुति एमडी
27 Jan 2022
तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
छवि सौजन्य: द इंडियन एक्सप्रेस

चेन्नई:​ तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता 25 जनवरी की सुबह से वल्लुवर कोट्टम में अनशन पर बैठे हुए हैं। उनका आरोप है कि 9 जनवरी को तंजौर में आत्महत्या करने वाली 17 वर्षीय लड़की को ईसाई धर्म में जबरदस्ती परिवर्तित किया गया था। इससे मजबूर हो कर उसने खुदकुशी कर ली। 

कहा जाता है कि उस लड़की ने 9 जनवरी को कथित तौर पर जहर खा लिया और इसके10 दिन बाद 19 जनवरी को उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के एक दिन बाद, लड़की का 44 सेकंड का एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ जिसमें उसे अपने स्कूल पर जबरन धर्म परिवर्तन कराने और उसके के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए सुना जा सकता है। 

तब से भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने लावण्या नाम की उस लड़की के लिए न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि किशोरी ने जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने के कारण अपनी जान ले ली। 

24 जनवरी को, तमिलनाडु के स्कूल शिक्षा मंत्री अंबिल महेश पोय्यामोझी ने स्पष्ट रूप से कहा कि शिक्षा विभाग ने मामले की जांच कराई है। इसमें यह स्पष्ट हो गया है कि उस 17 वर्षीया छात्रा लावण्या की खुदकुशी की वजह "जबरन धर्मांतरण" नहीं है, जैसा कि भाजपा द्वारा आरोप लगाया जा रहा है।

तमिलनाडु की मौजूदा द्रमुक सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि लड़की की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ निष्पक्ष जांच कराई जा सकती है। पर भाजपा इसकी बजाए लावण्या के मामले को सीबीआई को सिपुर्द करने की मांग कर रही है। साथ ही वह राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून की मांग कर रहे हैं, जैसा कि भाजपा शासित कई राज्यों में पारित किया गया है। 

यद्यपि, तमिलनाडु में पहले से ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून था, जिसे निरस्त कर दिया गया था क्योंकि यह अल्पसंख्यकों और हाशिए के समुदायों के हितों के खिलाफ था। वर्ष 2002 में तात्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता (अब दिवंगत) के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआइएडीएमके) की सरकार के दौरान बल या प्रलोभन के माध्यम से कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन के विरुद्ध एक कानून बनाया था, लेकिन कड़े विरोध के बाद 2006 में इसे वापस ले लिया था। 

मीनाक्षीपुरम परिवर्तन

बहुत पहले 1981 में, तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम गाँव में, 180 दलित परिवारों ने हिंदू धर्म को त्याग कर इस्लाम धर्म अपना लिया था। अनुमान है कि राज्य के 1,100 अनुसूचित जाति के सदस्य इस्लाम में परिवर्तित हो गए थे। पूर्व-अछूत पल्लार समुदाय के शिक्षित युवाओं ने उनके इस धर्मांतरण की पहल की थी।

कुछ ही दिनों के भीतर, भाजपा के पूर्व नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ-परिवार के कई संगठनों सहित विभिन्न हिंदू संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के नेता मीनाक्षीपुरम पहुंचे और इन ग्रामवासियों को फिर से हिंदू धर्म अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। कुछ ने इन नेताओं द्वारा घर देने के वादे और अन्य लाभों का लाभ उठाने के लिए फिर से हिंदू धर्म में लौट आए। 

तमिलनाडु सरकार ने मीनाक्षीपुरम-धर्मांतरण प्रकरण की जांच के लिए न्यायमूर्ति वेणुगोपाल की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया। आयोग ने 1986 में सिफारिश की कि राज्य एक कानून पारित करे, जो जबरन धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाए। 

वेणुगोपाल आयोग की इस सिफारिश का विरोध करने वालों ने तर्क दिया कि मीनाक्षीपुरम में इस तरह के धर्मांतरण इसलिए होते हैं क्योंकि वहां सवर्ण हिंदुओं द्वारा दलितों को प्रताड़ित किया जाता रहा है, और इसलिए केवल प्रतिबंध लगाना इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। 

कई दशकों बाद किए गए अध्ययनों से पता चला है कि मीनाक्षीपुरम में धर्मान्तरित हुए लोगों की दूसरी पीढ़ी के लोग नए विश्वास में पले-बढ़े हैं, वे जाति उत्पीड़न के चंगुल से अपनी मुक्ति को महसूस करते हैं। यह एक सबक है कि धर्मांतरण ज्यादातर विरोध का एक रूप है और कभी-कभी यह समाधान भी होता है और इसलिए यह जरूरी नहीं कि धर्मांतरण के लिए लोगों को मजबूर ही किया जाए। 

धर्मांतरण विरोधी कानून 

इसके बहुत बाद में, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने 2002 में जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए तमिलनाडु निषेध अधिनियम विधानसभा में पारित कराया था। 

तब मुख्यमंत्री जयललिता ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह कानून किसी विशेष धर्म के उद्देश्य से नहीं है, यह सभी धर्मों पर लागू होता है और यह केवल जबरिया किए जाने वाले धर्मांतरण से निपटेगा। लेकिन अल्पसंख्यक समूहों के नेताओं ने कहा कि जयललिता संघ परिवार के इशारे पर खेल रही हैं और अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है। 

भाजपा और अन्नाद्रमुक को छोड़कर, तमिलनाडु के दलित समूह, ईसाई अल्पसंख्यक समूह और राजनीतिक दल धर्मांतरण निषेध कानून के सख्त खिलाफ थे। 

कानून पर तरह तरह की प्रतिक्रियाओं और उसके कड़े विरोध को देखते हुए, अन्नाद्रमुक सरकार ने कानून को निरस्त करने का फैसला किया और मई 2004 में एक अध्यादेश जारी किया गया। 2006 में राज्य में सत्तारूढ़ नई सरकार ने इस कानून को निरस्त कर दिया। 

हिंदू मुन्नानी गतिविधियां

तमिलनाडु विधानसभा द्वारा धर्मांतरण विरोधी कानून पारित करने के कुछ दिनों बाद, चेन्नई के मदिपक्कम में एक विवाद के परिणामस्वरूप एक चर्च को फूंक दिया गया, जो फूस की झोपड़ी में चल रहा था। उसके पादरी जॉन जेबराज को हिंदू मुन्नानी ने धमकाया भी।

हिंदू मुन्नानी ने चर्च पर एक हिंदू के जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाते हुए पुलिस में उसकी शिकायत दर्ज कराई। हालांकि, विचाराधीन व्यक्ति, अरोचकियादास धनशेखर, छह साल पहले ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए थे, और हिंदू मुन्नानी धनशेखर और उनके परिवार पर वापस हिंदू धर्म में परिवर्तित होने का दबाव बना रहे थे। 

हिंदू मुन्नानी संगठन के सदस्य उन लोगों को जबरदस्ती 'पुनः परिवर्तित' करना जारी रखते हैं, जो लोग हिंदू धर्म से दूर हो जाते हैं। संगठन का तर्क है कि लोगों का ब्रेनवॉश किया जाता है और फिर उन्हें इस्लाम और ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया जाता है। 

2015 में हिंदू मुन्नानी के सदस्यों ने दावा किया कि उन्होंने हाल के दिनों में 50 लोगों को उनकी घर वापसी कराई थी। हालांकि, तमिलनाडु पुलिस इसकी अलग कहानी कहती है। उसका कहना है कि पुलिस ने इस संगठन के सदस्यों को बलपूर्वक धर्मांतरण रोकते हुए पकड़ा था।

संगठन का दावा है कि वह राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून पारित होने तक इस तरह की गतिविधियां जारी रखेगा। 

हिंदू मुन्नानी ने एक ईसाई मिशनरी समूह का भी विरोध किया है, जो कन्याकुमारी में एक आवासीय घर को चर्च में बदलने की कोशिश कर रहा है। 

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