NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राजेंद्रनाथ लाहिड़ी : वो क्रांतिकारी जो अंग्रेज़ और सांप्रदायिकता दोनों से बराबर लड़ा
भगत सिंह ने लिखा है कि काकोरी के वीरों में लाहिड़ी सबसे ज्यादा प्रगतिशील विचारों के थे। उन्होंने तो अपने सबसे छोटे भाई का नाम भी 'राजेंदर' रखा।
प्रबल अग्रवाल, अनु पंचाल
29 Jun 2021
राजेंद्रनाथ लाहिड़ी

राजेंद्र लाहिड़ी मशहूर क्रांतिकारी पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (1923 -1928) के बनारस इंचार्ज थे। उन्होंने बीएचयू, काशी विद्यापीठ, संस्कृत विद्यालय आदि के छात्रों को अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन चलाने के लिए संगठित किया। उनके रंगरूटों में चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त, रामकृष्ण खत्री जैसों के नाम शुमार हैं। अंग्रेजों के खिलाफ हथियार खरीदने के लिए सरकारी खजाना लूटने का वह साहसिक काम जो 'काकोरी कांड' के नाम से इतिहास प्रसिद्ध हुआ उसे अंजाम देने वाले 10 नौजवानों में से लाहिड़ी भी एक थे। इसी कांड के अन्तर्गत वे गिरफ्तार हुए और 17 दिसंबर, 1927 को गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिए गए। 1901 में जन्मे लाहिड़ी की आज, 29 जून को 120 वी जयंती है। 

लेकिन लाहिड़ी का इतिहास सिर्फ इतना नहीं है। भगत सिंह ने लिखा है कि काकोरी के वीरों में लाहिड़ी सबसे ज्यादा प्रगतिशील विचारों के थे। उन्होंने तो अपने सबसे छोटे भाई का नाम भी 'राजेंदर' रखा। क्या थी लाहिड़ी और उनके साथियों की सोच जिसने भगत सिंह को इतना प्रभावित किया? 

एचआरए की क्रांतिकारी विचारधारा

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नींव डाली थी वरिष्ठ क्रांतिकारी शचिंद्रनाथ सान्याल ने जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के आरोप में कालापानी की सजा काट कर लौटे थे। लेकिन सावरकर की तरह उन्होंने साम्राज्यवाद के सामने घुटने नहीं टेके बल्कि आते ही पुन: क्रांतिकारियों को संगठित करने में लग गए। इस कार्य में उनके सहयोगी बने राम प्रसाद बिस्मिल, शचींद्रनाथ बख्शी, योगेंद्रचंद्र चटर्जी, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी आदि। क्रांतिकारियों के इस दल ने 31 जनवरी, 1925 को अपना घोषणापत्र जारी किया जिसमें लिखा था- 

"हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें आदमी द्वारा आदमी का शोषण असंभव हो जाए"।

एचआरए का लक्ष्य था सशस्त्र क्रांति द्वारा अंग्रेजों को मार भगाना और फेडरेटेड रिपब्लिक ऑफ इंडिया की स्थापना करना। अपने इस उद्देश्य में उन्हें सबसे बड़ा शत्रु दिखाई देती थी - सांप्रदायिकता !

1920 के दशक का सांप्रदायिक माहौल

आज से ठीक 100 साल पहले सांप्रदायिक राजनीति का फासीवादीकरण हुआ। हालांकि आर्य समाज ने अपनी कट्टर हिंदुत्व की राजनीति 1897 से ही शुरू कर दी थी और 1905 में मुस्लिम लीग की स्थापना हो चुकी थी लेकिन हिंदू महासभा और आरएसएस जैसे फासीवादी संगठन बीस के दशक में उभरे। इनकी गतिविधियों ने स्वतंत्रता संग्राम में फूट डाल दी और इस तरह के आपसी मतभेद लाहिड़ी जैसे संवेदनशील युवाओं के हृदय पर गहरा आघात करने लगे। उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ने की ठान ली।

भगत सिंह के प्रसिद्ध लेख "मैं नास्तिक क्यों हूं" के प्रकाशित होने से कई वर्ष पहले लाहिड़ी और उनके साथियों ने नास्तिकता पर वाद-विवाद चलाया। हालांकि दल के नेता बिस्मिल और सान्याल धार्मिक प्रवृत्ति के थे लेकिन लाहिड़ी, मन्मथनाथ गुप्त, राजकुमार सिन्हा और केशव चक्रवर्ती जैसे युवा साथियों ने धर्म के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इसमें उन्हें सहयोग मिला योगेंद्रचंद्र चटर्जी का (जिन्होंने बाद में वाममोर्चा की एक घटक आरएसपी की स्थापना की)। जिन केशव चक्रवर्ती को आज संघ परिवार के लेखक केशव बलिराम हेडगेवार बता कर अपमानित करने से नहीं थकते उन्हीं केशव चक्रवर्ती के साथ मिलकर  लाहिड़ी ने अपना जनेऊ  काट दिया और ब्राह्मण होते हुए भी बीफ और पोर्क का सेवन शुरू कर दिया। इन घटनाओं का हवाला मन्मथनाथ गुप्त और योगेशचंद्र चटर्जी ने अपने संस्मरणों में दिया है और यह सब उन्हीं राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में चलने वाले दल के अंदर हो रहा था जिन्हें दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी सिद्ध करने पर तुले रहते हैं! 

लाहिड़ी जैसे क्रांतिकारियों का सपना

धर्म और अंधविश्वास की जकड़न से बाहर निकालकर लाहिड़ी ने 1923 - 1924 में बीएचयू के छात्रों को सेंट्रल हेल्थ यूनियन के अंतर्गत संगठित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय में कई स्टडी सर्कल भी चलाएं जिसमें समाजवाद और मार्क्सवाद जैसी क्रांतिकारी विचारधाराओं का अध्ययन किया गया। यह लाहिड़ी की संगठन-क्षमता का ही कमाल था कि बनारस का एक भी युवक काकोरी केस में मुखबिर नहीं बना। पार्टी के एक-एक कैडर के साथ लाहिड़ी के आत्मीय संबंध थे। लाहिड़ी गाते भी बहुत अच्छा थे। बिस्मिल, अशफाक और राजकुमार सिन्हा की तरह ही वे भी संगीत में पारंगत थे। रविंद्रनाथ टैगोर और काजी नज़रुल इस्लाम की कविताएं उन्हें बेहद प्रिय थी:

मैं महाविद्रोही अक्लांत

उस दिन होऊंगा शांत

जब उत्पीड़ितों का क्रंदन शोक

आकाश वायु में नहीं गूंजेगा

जब अत्याचारी का खड्ग

निरीह के रक्त से नहीं रंजेगा

मैं विद्रोही रणक्लांत

मैं उस दिन होऊंगा शांत

पर तब तक

मैं विद्रोही दृढ बन

भगवान के वक्ष को भी

लातों से देता रहूंगा दस्तक

तब तक

मैं विद्रोही वीर

पी कर जगत का विष

बन कर विजय ध्वजा

विश्व रणभूमि के बीचो-बीच

खड़ा रहूंगा अकेला

चिर उन्नत शीश

मैं विद्रोही वीर

आज लाहिड़ी की 120वीं जयंती है। शायद बनारस में उन्हें कहीं भी याद नहीं किया जा रहा होगा। लेकिन काशी नगरी में क्रांति का जो बीज लाहिड़ी और उनके साथियों ने बोया था वह पूरी तरह फलीभूत हुआ 1960 के दशक में जब वाराणसी रुस्तम सैटिन जैसे कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के नेतृत्व में वाम राजनीति का गढ़ बना। आज फिर क्यों फासीवादी ताकते वहाँ पैर जमा रही है, यह सोचने का विषय है। हालांकि लाहिड़ी और उनके कई साथी जेल के बाहर नास्तिक हो गए थे लेकिन जेल के अंदर सान्याल जैसे पुराने नेताओं के प्रभाव में वे पुनः आस्तिक हो गए लेकिन अंत तक उन्होंने धर्मनिर्पेक्षता और जनवाद के सिद्धांत को नहीं छोड़ा। लाहिड़ी ने मृत्यु से पहले अपने आखिरी पत्र में लिखा - "अगर यह सत्य है कि कुछ घटनाएं इतिहास की धारा मोड़ देती है, तो मुझे यकीन है कि हमारे बलिदान व्यर्थ नहीं जाएंगे!"  

(लेखक प्रबल सरन अग्रवाल, जेएनयू के शोधार्थी हैं और अनु पंचाल डीयू की शोधार्थी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

Rajendra Lahiri
revolutionary
Rajendra Nath Lahiri
Kakori conspiracy
Hindustan Republican Association
Communalism

Related Stories

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

पूजा स्थल कानून होने के बावजूद भी ज्ञानवापी विवाद कैसे?

'उपासना स्थल क़ानून 1991' के प्रावधान

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’


बाकी खबरें

  • Nishads
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव: आजीविका के संकट के बीच, निषाद इस बार किस पार्टी पर भरोसा जताएंगे?
    07 Mar 2022
    निषाद समुदाय का कहना है कि उनके लोगों को अब मछली पकड़ने और रेत खनन के ठेके नहीं दिए जा रहे हैं, जिसके चलते उनकी पारंपरिक आजीविका के लिए एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।
  • Nitish Kumar
    शशि शेखर
    मणिपुर के बहाने: आख़िर नीतीश कुमार की पॉलिटिक्स क्या है...
    07 Mar 2022
    यूपी के संभावित परिणाम और मणिपुर में गठबंधन तोड़ कर चुनावी मैदान में हुई लड़ाई को एक साथ मिला दे तो बहुत हद तक इस बात के संकेत मिलते है कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपने निर्णय से लोगों को चौंका सकते हैं।
  • Sonbhadra District
    तारिक अनवर
    यूपी चुनाव: सोनभद्र के गांवों में घातक मलेरिया से 40 से ज़्यादा लोगों की मौत, मगर यहां के चुनाव में स्वास्थ्य सेवा कोई मुद्दा नहीं
    07 Mar 2022
    हाल ही में हुई इन मौतों और बेबसी की यह गाथा भी सरकार की अंतरात्मा को नहीं झकझोर पा रही है।
  • Russia Ukraine war
    एपी/भाषा
    रूस-यूक्रेन अपडेट: जेलेंस्की ने कहा रूस पर लगे प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, पुतिन बोले रूस की मांगें पूरी होने तक मिलट्री ऑपरेशन जारी रहेगा
    07 Mar 2022
    एक तरफ रूस पर कड़े होते प्रतिबंधों के बीच नेटफ्लिक्स और अमेरिकन एक्सप्रेस ने रूस-बेलारूस में अपनी सेवाएं निलंबित कीं। दूसरी तरफ यूरोपीय संघ (ईयू) के नेता चार्ल्स मिशेल ने कहा कि यूक्रेन के हवाई…
  • International Women's Day
    नाइश हसन
    जंग और महिला दिवस : कुछ और कंफ़र्ट वुमेन सुनाएंगी अपनी दास्तान...
    07 Mar 2022
    जब भी जंग लड़ी जाती है हमेशा दो जंगें एक साथ लड़ी जाती है, एक किसी मुल्क की सरहद पर और दूसरी औरत की छाती पर। दोनो ही जंगें अपने गहरे निशान छोड़ जाती हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License