NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
न्याय के बिना शांति मुमकिन नहीं : राजीव धवन
पहली बार किसी सार्वजनिक मंच से बोलते हुए अयोध्या मामले में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि उनकी राय में पुनर्विचार याचिका संवैधानिक अधिकार है और इस फ़ैसले से जुड़े लोगों को यह ज़ाहिर करने का हक़ है कि उन्हें क्यों लगता है कि यह फ़ैसला ग़लत है।
अजय कुमार
30 Nov 2019
rajiv dhavan

बाबरी मस्जिद विवादित ढांचा मामले में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से लड़ रहे मशहूर वकील राजीव धवन ने संविधान दिवस के अवसर पर सहमत संगठन द्वारा आयोजित 'द कंस्टीटूशन 2019' विषय पर अपनी बात रखी। अपनी बात रखते समय इन्होंने पहली बार किसी सार्वजनिक मंच पर अयोध्या पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर भी अपनी बात रखी। हम अयोध्या मामले से जुड़ी उनकी बातों का बिना अर्थ बदले हिंदी तर्जुमा पेश कर रहे हैं :

भारत का बहुसंख्यक एक बहुत ही कुरूप क़िस्म के बहुसंख्यकवाद में तब्दील हो चुका है। लोकतंत्र की ध्वनि बंद कर दी गयी है। जैसे ही एमनेस्टी इंडिया ने बाबरी मस्जिद के बारे में कुछ कहना शुरू किया वैसे ही एफ़सीआरए की टुकड़ी उनके पीछे पड़ गयी। इस दौर में अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों की आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है। इनके लड़ने के इरादे को दबाने की कोशिश की जा रही है।

मेरे(राजीव धवन)  साथ बाबरी मस्जिद मामले में क्या हुआ? मैं आपको ज़रूर बताऊंगा। श्रीमान जिलानी और मैं इस केस में एक साथ लड़ रहे थे। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ एक छोटा सा एफ़आईआर था। क्योंकि उनके उपर एफ़आईआर था इसलिए सुनवाई के दौरान यह एक ऐसे व्यक्ति थे जिनपर योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा दबाव डाला गया। यह कहा गया कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को बदला जाए। जिसका मतलब यह है कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से लड़ रहे वकील ज़फ़रयाब जिलानी को बदला जाए।

सच में कहा जाए तो श्रीमान जिलानी ही इस मामले के सुपरस्टार हैं। मेरी तो इस केस में बहुत कम भूमिका है। जिलानी इस मामले में कोर्ट के अंदर और बाहर शुरू से लड़ते आ रहे हैं। कभी-कभी तो मैं ज़फ़रयाब जिलानी से मज़ाक़िया अंदाज़ में कहता था कि आप ही तो सुप्रीम लीडर हैं आपकी बात से मैं कैसे असहमत हो सकता हूँ?

सरकार द्वारा वकील बदलवाने का दबाव असफल रहा। लेकिन सरकार ने झुकाने की कोशिश तो की ही थी। मैंने कहा कि इस पर फ़ैसला करना कोर्ट पर छोड़ देते हैं कि हम इस मामले के वकील बने रहेंगे या नहीं। वो हमारे इरादे को तोड़ना चाह रहे थे। ज़रा सोचकर देखिये तो आप समझेंगे कि अगर इरादा टूट गया तो सबकुछ टूट जाता है। मैंने उन वकीलों से बात की है जिनके इरादे तोड़ दिए जाते हैं। मैंने वो आँसू देखे हैं, जिसे चालीस साल से बहाया नहीं गया है।

हम एक इंटरप्रेटेड दुनिया में रहते हैं। जहां पर अर्थों को हमारे द्वारा निर्धारित नहीं किया जाता है बल्कि उनके द्वारा निर्धारित किया जाता है जो सत्ता में मौजूद हैं। मैं मुस्लिम पक्ष का प्रवक्ता नहीं हूँ। लेकिन जहाँ तक मेरी बात है तो मेरे दिमाग में एक विचार है, मुझे लगता है कि बाबरी मस्जिद के पत्थर मुस्लिमों से जुड़े हैं। ज़मीन तो उन्होंने( सुप्रीम कोर्ट) दूसरों को दे दी लेकिन बाबरी मस्जिद के पत्थर मुस्लिमों के हैं। उन पत्थरों को ले लीजिये और उससे एक ऐसा महान स्मारक बनाइये, जो इस दौर में हुई नाइंसाफ़ियों का प्रतीक बन जाए। अख़लाक़ की भीड़ द्वारा की गयी हत्या जैसी नाइंसाफ़ियां।  

प्रभावी तौर पर यह फ़ैसला मस्जिद को बर्बाद करने का है। यह परमादेश मस्जिद को बर्बाद करने का है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? इसका कारण है कि आप एक बार मान लीजिये कि साल 1992 में मस्जिद को नहीं गिराया जाता।  वह अब भी वहां बची रहती। सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के अनुसार साल 1992 के लिए भी इस ज़मीन का मालिकाना हक़ हिन्दू पक्ष की तरफ़ जाता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को उचित तौर पर पढ़ा जाए तो सुप्रीम कोर्ट कह रही है कि इस स्मारक को ढाह दीजिये और इस ज़मीन को छोड़कर चले जाइए। इस आदेश के बारे में यह एक ऐसी बात है जिसे हमें समझना चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की तरफ़ देखिये। संभावनाओं के संतुलन को देखिये। उन्होंने कहा कि 1528  से 1857 के दौर के लिए आपके पास ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि आप वहां प्रार्थना करते थे। मेरी राय में  एक वक़्फ़ हमेशा वक़्फ़ होता है। हो सकता है कि सदियों तक वहाँ नमाज़ न पढ़ी जाए तो वह वक़्फ़ जैसा न लगे। लेकिन तथ्य है कि 1528 से वहाँ मुग़ल शासन करते आ रहे थे, उसके बाद नवाबों ने वहाँ शासन किया तो दुनिया में कहीं भी यह संभावना क्यों कि जाए कि उस दौर में एक मस्जिद थी जहां नमाज़ नहीं पढ़ी जाती थी। जबकि उस दौर में मुस्लिमों की हुकूमत थी। यह पूरी तरह से हास्यास्पद है।

हिन्दुओं को उस पूरे स्थल पर जाने की छूट थी। कम से कम मजिस्द के बाहरी अहाते तक तक तो उनकी पहुँच थी ही। यह कैसे मुमकीन है। ठीक है, मस्जिद के भीतर जाने के लिए जहाँ मुस्लिम जाया करते थे तो मस्जिद के बाहरी अहाते से होकर ही जाना पड़ेगा। इसलिए विकल्प बहुत आसान है। वहां एक मस्जिद थी जो दीवारों से घिरी हुई थी, जिसके मालिक मुस्लिम थे।  

साल 1885 का फ़ैसला कहता है जहां तक हिन्दू अधिकारों की बात है वे वहां मंदिर नहीं बना सकते हैं। इसलिए हिन्दुओं के पास बाहरी अहाते में केवल पूजा-पाठ करने का अधिकार निर्देश बचा। लेकिन इस बार के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने इसे पलट दिया।

राजीव धवन पुनर्विचार याचिका पर अपनी राय रखते हुए है कि क्यों मैं चाहता हूँ कि एक पुनर्विचार याचिका दाख़िल की जाए, जो संविधान के अंतर्गत मेरा अधिकार होता है। हो सकता है कि बहुत सारे लोग सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या पर आए फ़ैसले के समर्थन में हो और बहुत सारे लोग इस फ़ैसले के समर्थन में न हो।

लेकिन पुनर्विचार याचिका एक ऐसा रास्ता जिसके ज़रिये जो लोग इस मामले में कोर्ट के सामने प्रस्तुत हो रहे थे, वो लोग कोर्ट के सामने इस फ़ैसले से जुड़ी परेशानी को पेश कर सकें। केवल यही एक अधिकृत रास्ता है जिसके ज़रिये मुस्लिम समुदाय मीडिया को नहीं बल्कि कोर्ट को कह सकता है कि इस फ़ैसले में यह ग़लती है।

जैसे कि मैं पहले ही बता चूका हूँ कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड पर दबाव डाला जा रहा है। और दबाव की वजह से अगर सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड पुनर्विचार याचिका नहीं दाख़िल करने जा रहा है तो ठीक है कोई बात नहीं, वो न करे। लेकिन दूसरे लोग पुनर्विचार याचिका दाख़िल करने की योजना बना रहे हैं। आख़िरकार ये दूसरे लोग पुनर्विचार याचिका दाख़िल करने क्यों जा रहे हैं? मुझे लगता है कि ये लोग सोचते हैं कि भारत के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि इस फ़ैसले से जुड़े लोग किन वजहों से कह रहे हैं कि यह फ़ैसला ग़लत है। यह एक तरह का अधिकृत स्टेटमेंट होगा जो किसी न्यूज़पेपर में नहीं छपा होगा या किसी टेलीविज़न में नहीं दिख रहा होगा। यह रिकॉर्ड में दर्ज किया हुआ एक अधिकृत स्टेटमेंट होगा। और मैं इसकी बिलकुल परवाह नहीं करता कि वे याचिका स्वीकार करेंगे या नहीं। फिर भी फुसफुसाहट है कि वह याचिका सुनेंगे।

लेकिन सवाल यह है कि लोग क्यों नहीं चाहते कि पुनर्विचार याचिका दाख़िल न की जाए तो जवाब है शांति तो क्या बिना न्याय के शांति संभव है? क्या आप कभी भी न्याय के बिना शांति स्वीकार कर सकते हैं। तो यह बिलकुल संभव नहीं है।

Rajiv Dhavan
Sunni Waqf Board
Ayodhya Case
Ayodhya Dispute
Constitutional right
Majoritarian Democracy
Indian democracy
hindu-muslim
Religion Politics
Babri Masjid-Ram Mandir
Supreme Court

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल


बाकी खबरें

  • Antony Blinken
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस को अमेरिकी जवाब देने में ब्लिंकन देरी कर रहे हैं
    21 Jan 2022
    रूस की सुरक्षा गारंटी देने की मांगों पर औपचारिक प्रतिक्रिया देने की समय सीमा नजदीक आने के साथ ही अमेरिकी कूटनीति तेज हो गई है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के क़रीब साढ़े तीन लाख नए मामले सामने आए
    21 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के साढ़े तीन लाख के क़रीब यानी 3,47,254 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 5.23 फ़ीसदी यानी 20 लाख 18 हज़ार 825 हो गयी है।
  • jute mill
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    बंगाल : जूट मिल बंद होने से क़रीब एक लाख मज़दूर होंगे प्रभावित
    21 Jan 2022
    नौ प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री पीयूष गोयल और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हस्तक्षेप की मांग की है।
  • online education
    सतीश भारतीय
    ऑनलाइन शिक्षा में विभिन्न समस्याओं से जूझते विद्यार्थियों का बयान
    21 Jan 2022
    मध्यप्रदेश के विद्यार्थियों और शिक्षकों की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट ज्ञात हो रहा है कि इस वक्त ऑनलाइन शिक्षा एक औपचारिकता के रूप में विद्यमान है। सरकार ने धरातलीय हकीकत जाने बगैर ऑनलाइन शिक्षा कोरोना…
  • Ukraine
    न्यूज़क्लिक टीम
    पड़ताल दुनिया भर कीः यमन का ड्रोन हमला हो या यूक्रेन पर तनाव, कब्ज़ा और लालच है असल मकसद
    20 Jan 2022
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबु धाबी पर किये ड्रोन हमले की असल कहानी पर प्रकाश डाला न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License