NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
आंदोलन
उत्पीड़न
नज़रिया
भारत
राजनीति
हाथरस बनाम बलरामपुर, यूपी बनाम राजस्थान की बहस कौन खड़ी कर रहा है!
इन लोगों को कोई कैसे समझाए कि यह बहस और ख़तरा हिन्दू-मुस्लिम और बीजेपी-कांग्रेस से बहुत आगे जा चुका है।
मुकुल सरल
13 Oct 2020
stop rape

हाथरस बनाम बलरामपुर, उत्तर प्रदेश बनाम राजस्थान की बहस कौन खड़ी कर रहा है? यह वही लोग हैं जो इससे पहले कठुआ बनाम सासाराम की बहस खड़ी कर रहे थे।

दरअसल ये न हाथरस के लिए न्याय चाहते हैं, न बलरामपुर के लिए। न कठुआ के लिए, न सासाराम के लिए। न यूपी के लिए, न राजस्थान के लिए...।

इन्हें बस किसी भी नाम पर मुद्दे को बदलना है, Divert करना है। अपराधियों को बचाना है, हिन्दू-मुसलमान को लड़ाना है। ये लोग बहुत शातिर और धूर्त हैं। एक तरह से ये बलात्कार और बलात्कारियों के समर्थक ही हैं।

हालांकि ऐसे लोगों को समझाना मुश्किल है, (सफ़ाई देने की तो बिल्कुल ज़रूरत नहीं) लेकिन इनके झूठ का पर्दाफ़ाश करना ज़रूरी है। इस बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूं। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि उन्नाव में पीड़िता कौन थी? दलित या ठाकुर, हिन्दू या मुसलमान? देश में शुरू हुए आंदोलन में “जस्टिस फॉर कठुआ” के साथ “जस्टिस फॉर उन्नाव” का भी नारा लगा और फिर इसमें सूरत भी जुड़ गया है। सोशल मीडिया पर तो सबके साथ “जस्टिस फॉर ऑल” का हैशटैग चला।  

उस समय जब एक सुबह मैंने फेसबुक पर ही ग्रेटर नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे पर गैंगरेप की खबर शेयर करते हुए लिखा कि:-

“उफ! क्या किया जाए?

...आप एक कठुआ, एक उन्नाव के लिए इंसाफ़ की मांग को लेकर जब तक सड़कों पर उतरते हैं तब तक एक और सूरत, एक और नोएडा, एक और दिल्ली हो जाता है।”

तब मेरे एक पत्रकार मित्र ने कहा कि मैंने सासाराम और असम का जिक्र नहीं किया। ऐसा नहीं कि ये पत्रकार महोदय मेरे लिखे की चिंता या समय की भयावता को नहीं समझ रहे होंगे बल्कि वे जानबूझकर इसमें हिन्दू-मुस्लिम और कांग्रेस-बीजेपी का तड़का लगाना चाहते थे। ताकि सही सवाल को बदला जा सके। बहस को गुमराह किया जा सके। इसी तरह एक अन्य पत्रकार साथी ने कठुआ बनाम सासाराम करते हुए एक तस्वीर पोस्ट की।

यही आज हो रहा है। मुद्दा को बदलने की कोशिश है। कभी हाथरस के बरअक्स बलरामपुर को खड़ा करके, कभी यूपी के बरअक्स राजस्थान को।

इन लोगों को कोई कैसे समझाए कि यह बहस और ख़तरा हिन्दू-मुस्लिम और बीजेपी-कांग्रेस से बहुत आगे जा चुका है।

जो लोग कह रहे हैं कि विरोध आंदोलन सलेक्टिव होते हैं, ये सब मोदी, योगी या बीजेपी को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है, उनसे पूछना चाहिए कि 2012 में निर्भया के आंदोलन के समय किसकी सरकार थी? बीजेपी की या कांग्रेस की? मोदी की या मनमोहन की?

क्या उस समय सरकार से जवाब नहीं मांगा गया था। उस समय का आंदोलन तो हाथरस से भी बड़ा था। राष्ट्रपति भवन तक को घेर लिया गया था उस समय।

क्या उस समय किसी ने जात-बिरादरी, या हिन्दू-मुसलमान के नाम पर सरकार या बलात्कारियों को बचाने का प्रयास किया था! क्या उस समय संसद में हंगामा नहीं हुआ था। क्या उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को शर्मिंदा नहीं होना पड़ा था।

उस समय तो पीड़िता को इलाज के लिए विशेष एअर एंबुलेंस से सिंगापुर तक भेजा गया था। साथ में डॉक्टरों की एक टीम और निर्भया के मां-बाप भी मौजूद थे। आज की तरह नहीं जैसे पहले अलीगढ़ और फिर दिल्ली के सफ़दरजंग भेजकर योगी शासन-प्रशासन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।

उस समय, लाश को रात के अंधेरे में चोरी छुपे हाथरस ले जाकर बिना परिवार की सहमति के जबरन जलाया नहीं गया था बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी निर्भया का पार्थिव शरीर सिंगापुर से आने पर एयरपोर्ट गए थे।

यही नहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आंदोलनकारियों के बीच जंतर-मंतर जाना पड़ा था जहां उन्हें आंदोलनकारियों ने खूब खरी-खोटी सुनाकर वापस कर दिया था। क्या उस समय किसी ने आरोपियों की जाति के नाम पर बचाव किया था। या हिन्दू-मुसलमान या कांग्रेस-बीजेपी का मुद्दा उठाया था। नहीं। बल्कि जस्टिस वर्मा कमेटी बैठाकर कानूनों का रिव्यू करके उन्हें कड़ा बनाया गया था।

भाजपाईयों और उनके समर्थकों को पता होना चाहिए कि 2014 में कांग्रेस की सरकार जाने और भाजपा की सरकार आने में 2012-13 के निर्भया कांड और उसके बाद उपजे देशव्यापी आंदोलन का भी बड़ा हाथ था। लेकिन किसी ने नहीं कहा कि उस आंदोलन का उद्देश्य कांग्रेस को नुकसान या भाजपा को फायदा पहुंचाने का था। या उसके पीछे कोई अंतर्राष्ट्रीय साज़िश थी। 

इसी तरह हिमाचल का गुड़िया कांड। 2017 में हुए गुड़िया के बलात्कार और हत्या के मामले ने वहां न केवल तत्कालीन कांग्रेस सरकार को हिला दिया बल्कि ये विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बना और कहा जाता है कि वीरभद्र सिंह की हार में एक बड़ा कारण ये मुद्दा भी रहा।

इतना ही नहीं जब-जब किसी राजनेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति ने बलात्कार या महिलाओं के संबंध में बेतुका बयान दिया तो क्या उनकी आलोचना और भर्त्सना नहीं हुई। बीजेपी नेताओं को ही नहीं, मुलायम सिंह, आज़म ख़ान यहां तक की प्रगतिशील कहे जाने वाले शरद यादव तक को नहीं बख़्शा गया। मी-टू आंदोलन शुरू होने पर कई प्रतिष्ठित और प्रगतिशील कहे जाने लोगों को भी क्या कम विरोध झेलना पड़ा है। 

और जहां तक देशव्यापी आंदोलन का सवाल है तो हमें यह भी जान लेना चाहिए कि हर जगह पहले स्थानीय तौर पर आंदोलन शुरू होता है फिर वो बाद में राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बनता है। 2018 में कठुआ में कई महीने पहले से आंदोलन चल रहा था। बाद में वह दिल्ली पहुंचा। उन्नाव की पीड़िता भी 2017 से इंसाफ के लिए लड़ रही थी और 2018 में यह मुद्दा बना।

कठुआ में अगर बलात्कारियों के पक्ष में हिन्दू एकता मंच का जुलूस न निकला होता और वकील पुलिस को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने से न रोकते तो शायद उसके लिए दिल्ली में लोग सड़कों पर नहीं उतरते। इसी तरह अगर उन्नाव की पीड़िता विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के ख़िलाफ़ कार्रवाई न होने पर मुख्यमंत्री आवास पर आत्महत्या का प्रयास न करती और उनके पिता की पुलिस हिरासत में मौत न होती तो ये मुद्दा भी राष्ट्रीय स्तर पर संज्ञान में न आया होता।

और हाथरस में भी मुद्दा इसलिए नहीं बना कि एक दलित लड़की से बलात्कार हुआ है, बल्कि इसलिए कि पहले उसके साथ गांव के दबंगों ने बर्बरता की और बाद में सिस्टम ने बर्बरता की। अगर शासन-प्रशासन उसकी मौत से पहले सुध ले लेता या मृत्यु के बाद बिना परिवार की सहमति के इस तरह रात के अंधेरे में गुपचुप जबरन लाश को न जलाया जाता तो क्या लोग संवेदित होते, उनमें गुस्सा फैलता, यह मामला मुद्दा बनता। नहीं...। आपने देखा कि 14 सितंबर को बलात्कार और हमला होने के बाद 29 सितंबर को मौत होने तक कहीं किसी मीडिया में इसकी चर्चा तक नहीं थी।

लेकिन इस मामले के मुद्दा बनने के बाद, सारे देश की मीडिया के हाथरस पहुंचने के बाद भी किस बेशर्मी से आरोपियों को बचाने की कोशिशें हो रही हैं, कैसे मीडिया को ही नई कहानियां थमा दी गईं हैं, किस तरह आरोपियों के पक्ष में जातीय पंचायतें हो रही हैं, कैसे भाजपा सांसद-विधायक उनके पक्ष में आ रहे हैं, कैसे पीड़ित परिवार पर दबाव बनाया जा रहा है, वो पूरा देश देख रहा है। क्या बलरामपुर में भी ऐसा हो रहा है! क्या वहां आरोपियों के पक्ष में कोई जुलूस, जलसा या पंचायत हुई है? और वैसे जानकारी के लिए बता दें कि बलरामपुर भी यूपी में ही है और इसके लिए भी योगी सरकार ही जवाबदेह है। न कि कोई और।

देश में लूट, हत्या, बलात्कार हर अपराध का विरोध किया जाना चाहिए लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि जहां भी जाति, धर्म या तिरंगे की आड़ में बलात्कारियों को बचाने की कोशिश की जाएगी, जहां भी सत्ताधारी या प्रभावशाली लोग अपराध में शामिल होंगे या अपराधियों को बचाने की कोशिश करेंगे उस मामले को अन्य सभी मामलों से ज़्यादा ज़ोर से, ज़्यादा मज़बूती से उठाए जाने की ज़रूरत है।

rape cases in india
Hathras Rape case
Balrampur rape case
UttarPradesh
Rajasthan
BJP
Congress
crimes against women
violence against women
exploitation of women
women safety
Women safety and security
hindu-muslim
Religion Politics
Stop Rape

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

चंदौली पहुंचे अखिलेश, बोले- निशा यादव का क़त्ल करने वाले ख़ाकी वालों पर कब चलेगा बुलडोज़र?

यूपी : महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा के विरोध में एकजुट हुए महिला संगठन

2023 विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तेज़ हुए सांप्रदायिक हमले, लाउडस्पीकर विवाद पर दिल्ली सरकार ने किए हाथ खड़े

प्रयागराज में फिर एक ही परिवार के पांच लोगों की नृशंस हत्या, दो साल की बच्ची को भी मौत के घाट उतारा

रुड़की से ग्राउंड रिपोर्ट : डाडा जलालपुर में अभी भी तनाव, कई मुस्लिम परिवारों ने किया पलायन

हिमाचल प्रदेश के ऊना में 'धर्म संसद', यति नरसिंहानंद सहित हरिद्वार धर्म संसद के मुख्य आरोपी शामिल 

प्रयागराज: घर में सोते समय माता-पिता के साथ तीन बेटियों की निर्मम हत्या!


बाकी खबरें

  • J&K
    अनीस ज़रगर
    परिसीमन आयोग के जम्मू क्षेत्र पर ताजा मसौदे पर बढ़ता विवाद
    11 Feb 2022
    जम्मू के सुचेतगढ़ और आरएस पुरा इलाकों में पहले ही विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जा चुके हैं, जहाँ दो विधानसभा क्षेत्रों का विलय प्रस्तावित किया गया है।
  • hijab vivad
    भाषा
    हिजाब विवाद: कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ शीर्ष अदालत में याचिका दायर
    11 Feb 2022
    एक छात्र द्वारा दायर याचिका में हिजाब मामले की सुनवाई कर रहे उच्च न्यायालय के निर्देश के साथ ही तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। अपील में दावा…
  • गोवा ग्राउंड रिपोर्ट: कोरोना लॉकडाउन से संकट में आए टैक्सी चालकों का मुद्दा चुनाव से ग़ायब
    मोहम्मद ताहिर
    गोवा ग्राउंड रिपोर्ट: कोरोना लॉकडाउन से संकट में आए टैक्सी चालकों का मुद्दा चुनाव से ग़ायब
    11 Feb 2022
    "सरकार से कुछ सब्सिडी की मांग की थी। सरकार की तरफ से पांच हज़ार रूपये देने का वादा भी किया गया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला।"
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 58,077 नए मामले, 657 मरीज़ों की मौत
    11 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.64 फ़ीसदी यानी 6 लाख 97 हज़ार 802 हो गयी है।
  • MNREGA
    दित्सा भट्टाचार्य
    विशेषज्ञों के हिसाब से मनरेगा के लिए बजट का आवंटन पर्याप्त नहीं
    11 Feb 2022
    पीपल्स एक्शन फ़ॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी (PAEG) के मुताबिक़ वित्तीय साल 2022-23 के बजट में नरेगा के लिए जो राशि आवंटित की गयी है, उससे प्रति परिवार महज़ 21 श्रमदिवस का काम ही सृजित किया जा सकता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License