NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लाल क़िला: इस राष्ट्रीय गौरव को तो सरकार पहले ही ठेके पर दे चुकी है!
हमें यह भी मालूम होना चाहिए कि 1980 में इसी लाल क़िले के प्रांगण में आरएसएस का एक विशाल कार्यक्रम हो चुका है। भाजपा ने भी 1988 में एक प्रदर्शन लाल क़िले के मैदान में उसी जगह पर किया था, जहां 26 जनवरी को किसान प्रदर्शनकारियों का एक समूह पहुंचा था।
अनिल जैन
30 Jan 2021
लाल क़िला
नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिए 2018 में लाल क़िला परिसर में राष्ट्र रक्षा महायज्ञ किया गया। फोटो साभार : गूगल

केंद्र सरकार के बनाए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसान आंदोलन में दिल्ली का ऐतिहासिक लाल क़िला भी चर्चा में आ गया है। कृषि सुधार के नाम पर बनाए गए तीनों कानूनों को अपने लिए 'डेथ वारंट’ मान रहे किसानों के ट्रैक्टर मार्च में 26 जनवरी को कुछ जगह उपद्रव होने की खबरों के बीच सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि कुछ लोगों ने लाल क़िले पर तिरंगे के बजाय दूसरा झंडा फहरा दिया।

इस घटना से मीडिया के उस बडे हिस्से की बांछें खिल गईं जो इस किसान आंदोलन को शुरू दिन से ही सरकार के सुर में सुर मिलाकर बदनाम करने में जुटा हुआ है। तमाम टेलीविजन चैनलों और कई अखबारों ने अपनी पारंपरिक अज्ञानता के सिलसिले को जारी रखते हुए इस घटना को तिरंगे का अपमान, देशद्रोह और उस झंडे को खालिस्तानी झंडा बताकर प्रचारित किया। इतना ही नहीं, यही बात सरकार ने संसद के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी कहलवा दी।

मीडिया के प्रचार से प्रभावित होकर सरकार और सत्तारूढ दल के समर्थकों ने भी सोशल मीडिया पर पता नहीं क्या-क्या लिखा। जो लोग मुगल शासकों के बनाए लाल क़िले के प्रति हिकारत का भाव रखते आए हैं, उनके लिए भी इस घटना से यह ऐतिहासिक धरोहर अचानक राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गई। कुल मिलाकर इस पूरे प्रचार अभियान का केंद्रीय सुर यही रहा कि आंदोलन कर रहे आंदोलनकारी किसान देशद्रोही हैं और उनके आंदोलन को अब सख्ती से दबा देना चाहिए।

हालांकि यह सही है कि लाल क़िले पर जो कुछ हुआ, वह नहीं होना चाहिए था। किसान संगठनों के आधिकारिक कार्यक्रम में भी ऐसा करना शामिल नहीं था। फिर भी उसमें देशद्रोह या तिरंगे के अपमान जैसा कुछ नहीं हुआ। पहली बात तो यह कि लाल क़िले पर नियमित लहराने वाले तिरंगे झंडे को किसी ने छुआ तक नहीं। उस तिरंगे के आगे जो एक पोल खाली रहता है और जिस पर सिर्फ 15 अगस्त के दिन ही तिरंगा फहराया जाता है, उस पर कुछ लोगों ने निशान साहिब (सिक्खों का धार्मिक झंडा) और किसान यूनियन का झंडा फहरा दिया था।

यह जाहिर होने में भी ज्यादा समय नहीं लगा कि यह झंडे फहराने वाले कोई और नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से जुडा पंजाबी फिल्म अभिनेता दीप सिद्धू और गैंगस्टर से नेता बना लक्खा सिदाना है। दीप सिद्धू की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और कई अन्य भाजपा नेताओं के साथ पुरानी तस्वीरें भी सार्वजनिक हो चुकी हैं। इसीलिए अभी तक दोनों की गिरफ्तारी नहीं हुई है और इसीलिए इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की साजिश भी माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन को पटरी से उतारने तथा उसे बदनाम करने के लिए सरकार की शह पर ही इन लोगों ने लाल क़िले पर यह नाटक रचा था।

हो सकता है कि ऐसा नहीं भी हुआ हो, तो भी सवाल है कि जिस लाल क़िले को सरकार तीन साल पहले ही एक औद्योगिक घराने को लीज पर दे चुकी है तो उसको लेकर 'राष्ट्रीय गौरव’ जैसी बातों का राग अलापने का क्या मतलब है? यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि 'देश नहीं बिकने दूंगा, देश नहीं झुकने दूंगा’ का राग आलापते हुए सत्ता में आए नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपनी 'एडॉप्ट ए हैरिटेज’ योजना के तहत 17वीं सदी में पांचवें मुगल बादशाह शाहजहां के बनाए लाल क़िले को तीन साल पहले यानी जनवरी 2018 में रख-रखाव के नाम पर 'डालमिया भारत समूह’ नामक उद्योग घराने को 25 करोड रुपये में सौंप दिया है। इसी उद्योग समूह ने लाल क़िले के साथ ही आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में स्थित गांदीकोटा क़िले को भी पांच साल के लिए सरकार से लीज पर लिया है।

हालांकि सरकार का दावा है कि लाल क़िला लीज पर नहीं दिया गया है, बल्कि डालमिया समूह ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के तहत इसे रख-रखाव के लिए गोद लिया है। लेकिन फिर भी सवाल उठता है कि जिस इमारत को आप देश की सबसे बडी ऐतिहासिक धरोहर, आजादी के संघर्ष का स्मारक, राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक आदि बता रहे हैं, उसका रख-रखाव खुद नहीं कर सकते हैं तो फिर उसके सम्मान की इतनी चिंता करने का क्या मतलब है?

देश के संविधान ने अपने अनुच्छेद 49 में देश के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के रख-रखाव का जिम्मा सरकार को सौंपा है। संविधान के इस नीति-निर्देशक सिद्धांत का पालन पहले की सभी सरकारें करती आ रही थीं लेकिन मौजूदा सरकार ने इस संवैधानिक निर्देश को नजरअंदाज करते हुए ऐतिहासिक महत्व की लगभग 100 विश्व प्रसिद्ध धरोहरों को निजी हाथों में यानी कारोबारी समूहों को सौंपने का फैसला किया है। इस सिलसिले में देश के स्वाधीनता संग्राम के दौरान कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा दिल्ली का लाल क़िला और दुनियाभर के आकर्षण का केंद्र ताज महल, विश्व प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर, हिमाचल प्रदेश का कांगडा फोर्ट, मुंबई की बौद्ध कान्हेरी गुफाएं आदि ऐतिहासिक धरोहरों को अलग-अलग उद्योग समूहों के हवाले कर दिया गया है।

सरकार की ओर से कहा गया है उसने इन सभी धरोहरों को कॉरपोरेट सोशल रिसपांसिबिलिटी के तहत निजी हाथों में सौंपा है। पूछा जा सकता है कि कॉरपोरेट सोशल रिसपांसिबिलिटी सिर्फ इन धरोहरों को लेकर ही क्यों? सरकार देश के कॉरपोरेट घरानों में सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध देश के उन असंख्य सरकारी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों के प्रति क्यों नहीं पैदा करती जिनकी बदहाली किसी से छिपी नहीं है? क्यों नहीं देश के तमाम बडे उद्योग समूह इन अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों के प्रति अपना सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के लिए आगे आते?

बहरहाल, लाल क़िले के संदर्भ में सवाल यह भी है कि क्या लाल क़िले पर तिरंगे के अलावा कोई अन्य झंडा फहराने को किसी कानून के तहत निषेध किया गया है? गौरतलब है कि लाल क़िला न तो कोई सरकारी और न ही संवैधानिक इमारत है। यह एक ऐतिहासिक धरोहर है, जहां स्वाधीनता दिवस पर तिरंगा फहराया जाता है और प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं।

मीडिया के भी जो लोग वहां 26 जनवरी को हुई घटना को देशद्रोह जैसा बड़ा अपराध बता रहे हैं, उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए कि लाल क़िला अब एक निजी कंपनी के हवाले है, जो पैसा कमाने के लिए वहां तमाम तरह की व्यावसायिक गतिविधियां चला रही है। उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए कि 1980 में इसी लाल क़िले के प्रांगण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक विशाल कार्यक्रम हो चुका है। भाजपा ने भी 1988 में एक प्रदर्शन लाल क़िले के मैदान में उसी जगह पर किया था, जहां 26 जनवरी को किसान प्रदर्शनकारियों का एक समूह पहुंचा था। मदनलाल खुराना की अगुवाई में हुए उस प्रदर्शन में शामिल लोगों पर उस समय की डीसीपी किरण बेदी ने जम कर लाठियां चलवाई थीं। उस समय भी वैसे ही हालात बन गए थे, जैसे इस बार 26 जनवरी को बने।

फाइल फोटो: साभार सोशल मीडिया

इसी लाल क़िले को लेकर भाजपा एक बार नहीं, कई बार चुनावों के दौरान देश भर में नारा लगा चुकी है, 'लाल क़िले पर कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान।’ 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान इसी लाल क़िले की प्रतिकृति वाले मंचों से नरेंद्र मोदी ने कई चुनावी रैलियों को संबोधित किया था। यही नहीं, नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिए 2018 में इसी लाल क़िले के प्रांगण में 'राष्ट्र रक्षा यज्ञ’ का आयोजन किया था। उसी लाल क़िले में हर साल रामलीला का आयोजन होता है। फिर अगर वहां निशान साहिब और किसान यूनियन का झंडा किसी ने लहरा दिया तो उसे एक नया रंग देकर इतनी हायतौबा मचाने का क्या मतलब है?

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Farm bills 2020
farmers protest
Red Fort
RSS
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • RELIGIOUS DEATH
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
    27 Jan 2022
    कथित रूप से 'जबरन धर्मांतरण' के बाद एक किशोरी की हालिया खुदकुशी और इसके ख़िलाफ़ दक्षिणपंथी संगठनों की प्रतिक्रिया ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून की मांग को फिर से केंद्र में ला दिया है।
  • cb
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बीजेपी-कांग्रेस दोनों को पता है कि विकल्प तो हम दो ही हैं’
    27 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में 2000, 2007 और 2017 में भाजपा सत्ता में आई। जबकि 2002 और 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनाई। भाजपा और कांग्रेस ही बारी-बारी से यहां शासन करते आ रहे…
  •  नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    27 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • सोनिया यादव
    यूपी: महिला वोटरों की ज़िंदगी कितनी बदली और इस बार उनके लिए नया क्या है?
    27 Jan 2022
    प्रदेश में महिलाओं का उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने का औसत भले ही कम रहा हो, लेकिन आधी आबादी चुनाव जिताने का पूरा मददा जरूर रखती है। और शायद यही वजह है कि चुनाव से पहले सभी पार्टियां उन्हें लुभाने…
  • यूपी चुनाव:  उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    27 Jan 2022
    यूपी में महिला उम्मीदवारों के लिए प्रियंका गांधी की तलाश लगातार जारी है, प्रियंका गांधी ने पहले उन्नाव रेप पीड़िता की मां पर दांव लगाया था, और अब वो सोनभद्र नरसंहार में अपने भाई को खो चुकी महिला को…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License