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रिज़र्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी: चोर दरवाजे से पूँजीपतियों की मदद
उच्च महँगाई दर की इस स्थिति में ब्याज दरें बढ़ाना इस कमिटी की ज़िम्मेदारी थी। दो महीने पहले दिसंबर में ही इस कमिटी को ब्याज दरें बढ़ा देनी चाहिये थीं, पर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उस पर पूँजीपति वर्ग द्वारा ऐसा न करने का जबर्दस्त दबाव था।
मुकेश असीम
07 Feb 2020
RBI

6 फरवरी को जब रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति कमिटी की बैठक हुई तो कानूनी बंदिश के कारण यह आधिकारिक रूप से रिजर्व बैंक की रेपो ब्याज दर नहीं घटा पाई। पर भारतीय पूँजीपति वर्ग को संतुष्ट करने के लिये इसने गैरकानूनी तौर पर चोर दरवाजे से ऐसे नियम बना दिये ताकि बैंक ब्याज दरें घटा दें। असल में संसद में पारित कानून के अनुसार रिजर्व बैंक की ज़िम्मेदारी है कि वह फुटकर महँगाई दर को 2-6% के बीच रखे। किंतु दिसंबर में यह दर 7.3% हो गई और रिजर्व बैंक के अपने अनुमान से इस पूरे साल यह औसत 6.5% बनी रहेगी। अतः रिजर्व बैंक अपनी ज़िम्मेदारी में असफल रहा है।

मौद्रिक सिद्धांत के अनुसार यह माना गया है कि ब्याज दरें कम करने से महँगाई बढ़ती है और ब्याज दरें ऊँची होने से महँगाई पर नियंत्रण किया जा सकता है। इसकी वजह है कम ब्याज दरों पर सस्ता कर्ज और नकदी उपलब्ध होने से औद्योगिक व व्यापारिक पूँजीपति आसानी से माल भंडारण और कालाबाजारी के द्वारा बाजार में आपूर्ति घटा कीमतें बढ़ा सकते हैं। ब्याज दर ऊँची होने व कर्ज मिलने में मुश्किल होने से उन्हें माल जल्दी निकालना होता है जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ती है और कीमतें गिरती हैं।

अतः उच्च महँगाई दर की इस स्थिति में ब्याज दरें बढ़ाना इस कमिटी की ज़िम्मेदारी थी। दो महीने पहले दिसंबर में ही इस कमिटी को ब्याज दरें बढ़ा देनी चाहिये थीं, पर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उस पर पूँजीपति वर्ग द्वारा ऐसा न करने का जबर्दस्त दबाव था। इसके पहले रिजर्व बैंक 5 बार में रेपो ब्याज दर में 1.35% कटौती कर चुका था। इस बार भी रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें स्थिर रखीं पर कई ऐसे फैसले किए जिनका अर्थ बैंकों को ब्याज दरें घटाने और पूँजीपतियों को सस्ते कर्ज देने के लिये कहना है।

इसमें पहला फैसला है बैंकों को 5.15% की ब्याज दर पर 3 साल के लिये 1 लाख करोड़ रुपए के सस्ते कर्ज की सुविधा देना। इससे बैंकों पर कर्ज देने के लिये ग्राहकों से डिपॉजिट जुटाने का दबाव कम हो जायेगा और वे डिपॉजिट पर ब्याज कम कर पायेंगे जिससे उनकी लागत कम हो जायेगी। दूसरे, अगर बैंक के पास जमाराशि फालतू हो तो पहले वह 5,15% पर रिजर्व बैंक के पास रख सकते थे किंतु अब 4.90% पर ही रख पायेंगे। इससे उनका मुनाफा कम होगा और उन पर इस अतिरिक्त धनराशि को रिजर्व बैंक से मिलने वाले 4.90% से अधिक पर आम बाजार दर से कुछ कम दर पर कर्ज देने का दबाव बनेगा। तीसरे मकान, कार, आदि के लिये कर्ज देने पर बैंकों को उतनी ही रकम उस कैश रिजर्व में से कम करने की सुविधा दी गई है जो उन्हें बिना किसी ब्याज के रिजर्व बैंक के पास रखना पड़ता है। इससे भी बैंक के लिये बेहतर होगा कि वह कुछ कम ब्याज पर बाजार में कर्ज दे ताकि उसे उतना पैसा बिना ब्याज के रिजर्व बैंक के पास न रखना पड़े।

दूसरी और बैंकों को सुविधा दी गई है कि वे कमर्शियल प्रॉपर्टी के लिए दिये गए कर्ज की वसूली न होने पर भी उन्हें एक साल तक एनपीए दिखाने से बच सकते हैं अर्थात बिना वसूली के भी उन पर फर्जी आमदनी दिखाते रह सकते हैं। यही काम वे लघु, मध्यम कारोबारियों को दिये गए कर्जों पर भी कर सकते हैं जहाँ उन्हें वसूली न होने पर इन्हें 1 साल के लिये छूट देने की सुविधा मिल गई है। खास तौर पर बहुत सारे मुद्रा योजना में कर्ज लेने वाले जो अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण समय पर नहीं कर्ज की किस्त नहीं चुका पा रहे उन्हें अब भुगतान में चूक नहीं माना जायेगा और बैंक किस्त को एक साल स्थगित कर कर्ज को एनपीए नहीं दिखायेगा। इससे भी बैंकों के एनपीए कम रहेंगे, बिना वसूली के भी आय और मुनाफा दिखता रहेगा तथा बैंक कम ब्याज पर कर्ज बाँटते रहेंगे क्योंकि समस्या कुछ पीछे टल गई है, जब आएगी तब देखा जायेगा!

यहाँ सोचना जरूरी है कि रिजर्व बैंक ने ऐसा क्यों किया? असल में जब भी कहीं आर्थिक संकट होता है पूंजीपति वर्ग की सबसे बड़ी माँग दो ही होती हैं। एक, ब्याज दर कम करना और दो, इस सस्ती ब्याज दर पर भारी मात्रा में नकदी उपलब्ध कराना। इसके पीछे तर्क है कि सस्ते ब्याज पर खूब कर्ज मिलने से व्यवसायी पूंजी निवेश बढ़ाएंगे, जिससे रोजगार सृजन होगा। फिर सस्ते ब्याज वाले कर्ज और जमा पर कम ब्याज मिलने से उपभोक्ता भी पैसा बैंक में रखने के बजाय उपभोग बढ़ाएंगे तथा कर्ज लेकर घर, कार, उपभोक्ता माल खरीदेंगे। इससे माँग का विस्तार होकर अर्थव्यवस्था में उछाल आयेगा। पर क्या वास्तव में ऐसा होता है?

वास्तविकता यह है कि जब तक बाजार में माँग न हो और उद्योग स्थापित उत्पादन क्षमता से भी नीचे काम कर रहे हों, तो वे सस्ता कर्ज लेकर भी पूंजी निवेश नहीं कर सकते। आज रिजर्व बैंक ने खुद बताया कि बाजार में माँग घटने के कारण उद्योग सितंबर के अंत में अपनी स्थापित उत्पादन क्षमता का मात्र 69% उत्पादन कर रहे थे। इस स्थिति में कोई उद्योग मालिक नया उद्योग लगाने में निवेश क्यों करेगा? उधर रोजगार सृजन व आय में वृद्धि होने की संभावना न होने पर उपभोक्ता भी नए ऋण लेने का जोखिम लेने के बजाय अपने उपभोग की मात्रा को कम करते हैं। घर, कार, टीवी, आदि सभी तरह के स्थायी व रोज़मर्रा के उपभोग की सामग्री की बिक्री में कमी की वजह यही है। इस स्थिति से बाहर निकलने का एक ही रास्ता होता है कि कुछ कमजोर पूंजीपति दिवालिया होकर बाजार से बाहर हो जायें ताकि उनके हिस्से का बाजार प्राप्त कर बाकी का कारोबार फिर चल सके।

तब फिर पूँजीपति ब्याज दरों को घटाने की माँग क्यों करते हैं? असल में पूँजीपति बैंक कर्ज पर ब्याज अपने मुनाफे में से ही चुकाता है। जब अर्थव्यवस्था में संकट से मुनाफा कम होने लगे तो उसे यह ब्याज चुकाना मुश्किल होता है और कर्ज एनपीए होने की आशंका हो जाती है। ब्याज दर कम होने से पूँजीपति की देनदारी घट जाती है और कुल ब्याज में से बैंक का ब्याज चुका का उसके पास बचा मुनाफा बढ़ जाता है। इसलिए पूँजीपति आर्थिक संकट में ब्याज दर घटाने की माँग करते हैं। बैंक बदले में अपने मुनाफे को बचाने के लिये जमा करने वालों के लिये ब्याज दर घटा देते हैं।

इसको ऐसे भी देख सकते हैं कि हमेशा तर्क दिया जाता है कि हाउस, कार, एजुकेशन लोन पर ब्याज दर कम कर आम लोगों को राहत देने के लिये ब्याज दर घटना चाहिये पर क्या वास्तव में ऐसा होता है? पिछले साल रिजर्व बैंक ने 5 बार में जो 1.35% ब्याज दर कम हुई उसे कर्ज की ब्याज दर पर क्या फर्क पड़ा? पता चला कि बैंकों द्वारा एक दूसरे को दिये कर्ज पर ब्याज दर 1.46% कम हुई, बड़ी कंपनियों द्वारा लिये गए कमर्शियल पेपर पर 1.90% गिरी, सरकार द्वारा लिये गए 5 साला बॉन्ड पर 0.73% तथा 10 साल के बॉन्ड पर 0.76% कम हुई, मध्यम काल कर्ज दर एमसीएलआर 0.55% गिरी, हाउस लोन पर 0.18% कम हुई तो कार लोन पर 0.87% और लघु उद्योगों के लिये 0.23% गिरी। कुल मिलाकर देखें तो नए कर्ज पर 0.69% और पुराने कर्जों पर 0.13% गिरी। स्पष्ट है कि ब्याज दर कम होने से आम व मध्य वर्गीय लोगों को नहीं बल्कि बड़े पूँजीपतियों और सरकार का ही लाभ हुआ। अतः ब्याज दर घटाने से आम लोगों को राहत मिलने का कोई संबंध नहीं है।

अतः ब्याज दर कम करना मुनाफे की गिरती दर के संकट का नतीजा है, इसका समाधान नहीं। न ब्याज दर कम करने से पहले कभी अर्थव्यवस्था के संकट का कोई समाधान हुआ है, न अब होगा। इसीलिए भारत में भी ब्याज दरों में लगातार कटौती के बाद भी वृद्धि दर गिरती ही जा रही है। हाँ इसका एक असर होगा कि बहुत से मध्यमवर्गीय लोग, खास तौर पर सेवानिवृत्त लोग, जो बचत पर मिलने वाले बैंक ब्याज को अपने जीवनयापन का आधार मान रहे थे उनके जीवन में संकट बहुत तेजी से बढ़ने वाला है क्योंकि पूंजीपति वर्ग अब इतना मुनाफा उत्पन्न नहीं कर पा रहा है कि उन्हें उसमें से एक हिस्सा दे सके

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