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Squid Game : पूंजीवाद का क्रूर खेल
कुछ लोगों के पास इतना ज़्यादा है कि वे बोर होकर एक विद्रूप रचते हैं। दूसरे वो आम लोग हैं जो अपनी ज़िंदगी जीने के लिए क़र्ज़ के जाल में फंस गए हैं और उससे बाहर निकलने के लिए पूंजीवाद के हाथ के खिलौने और हथियार और फिर हत्यारा तक बनने को भी मजबूर हैं।
मुकुल सरल
10 Oct 2021
Squid Game

पूंजीवाद के क्रूर खेल को आसान भाषा में देखना और समझना हो तो स्क्विड गेम #SquidGame देखिए। नेटफ्लिक्स पर आई कोरियन भाषा की ये वेब सीरीज़ हिंदी और अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है। मैंने एक पूरी रात जागकर इसे देखा। 9 एपिसोड की क्या शानदार सीरीज़ है, क्या कहानी रची है, देखते ही बनता है। बच्चों के खेल के बहाने बड़ों के दिमाग़ की धज्जियां उड़ाती कहानी।

वास्तव में इस कहानी का आधार है हमारा यह पूंजीवाद जिसके शैदाई इसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निर्णय लेना का अधिकार, बराबरी के अवसर और न जाने किन-किन नामों से नवाज़ते हैं। लेकिन हक़ीक़त में जिसमें पैसा ही सबकुछ है, सर्वोपरी है। पैसे के लिए जिसमें कोई अपना नहीं। कोई सगा नहीं। सब दुश्मन हैं। एक दूसरे की जान के दुश्मन।

मैं आपको सिलसिलेवार इसकी कहानी नहीं सुनाउंगा। क्या हुआ, कैसे हुआ, कैसे घटा नहीं बताउंगा। किरदारों पर भी अलग-अलग बात नहीं करुंगा। और क्लाइमेक्स के बारे में तो कोई स्पॉइलर (Spoiler) नहीं दूंगा। कुल मिलाकर मैं आपकी वेब सीरीज़ देखने की इच्छा को बर्बाद नहीं करुंगा, रंग में भंग नहीं डालूंगा। बल्कि मैं सिर्फ़ इशारों में बात करुंगा, कुछ सुराग लेकर उनका विश्लेषण करुंगा और वो भी उस बड़े खेल के बारे में जो हमारे ईर्द-गिर्द देश-दुनिया, हमारी ज़िंदगी के मैदान या मोर्चे पर रात-दिन चल रहा है, खेला जा रहा है।

इस खेल में कुछ कारिंदे यानी कर्मचारी हैं कुछ खिलाड़ी लेकिन सब मोहरे हैं। पूंजीवाद की शतरंज के मोहरे। जी हां, यहां लकड़ी के घोड़े नहीं, जीते-जागते घाड़े हैं और वो घोड़े हैं आम इंसान। हम और आप। जिनपर पूरा दांव है, जिनका सबकुछ दांव पर है।

इस सीरीज़ में एक विद्रूप रचा गया है। जी हां, अंग्रेज़ी में Squid का भी यही अर्थ मिलता है। एक अर्थ मिलता है मछली फंसाने का चारा, चारा लगाकर मछली मारना। बिल्कुल यही है यह खेल, Squid Game.

कुछ लोगों के पास इतना ज़्यादा है कि वे बोर होकर एक विद्रूप रचते हैं। दूसरे वो आम लोग हैं जो अपनी ज़िंदगी जीने के लिए क़र्ज़ के जाल में फंस गए हैं और उससे बाहर निकलने के लिए फिर पूंजीवाद के हाथ के खिलौने और हथियार और फिर हत्यारा बनने को भी मजबूर हैं। जी हां हत्यारा। जिसमें भाई, भाई को मार देता है, दोस्त, दोस्त को, पति-पत्नी को। हालांकि पहले वे क़र्ज़ के अलावा ऐसे ही किसी अपने के लिए इस खेल में शामिल होते हैं।

इस खेल में बच्चे, बूढ़े, महिला किसी की कोई क़ीमत नहीं।

जी हां, जीते जी कोई क़ीमत नहीं, मरने के बाद क़ीमत है तो सिर्फ़ मुआवज़ा। जो जीतने वाले को भी मिल सकता है।

यह ऐसा रहस्य नहीं है जो बाद में जाकर आपके सामने खुलेगा और आप कहेंगे कि मैंने आपकी कहानी बर्बाद कर दी। बल्कि यह कहानी पहले ही एपिसोड से आपके सामने आ जाएगी।

पहले ख़्वाहिश को मेरी पंख लगाए उसने

और फिर क़ैद तिजोरी में ज़िंदगी कर ली

लगता है जैसे अपने भारत की ही कहानी है। अपनी ही कहानी है। बस जातिवाद और सांप्रदायिकता का ज़हर नहीं है। अगर होता तो यह कहानी और ख़ूंखार (फ्रंट मैन के मास्टर और उसके वीआईपी, जो हमेशा मुखौटों (जानवरों के मुखौटों) के पीछे रहते हैं, के लिए और भी मज़ेदार) हो जाती। हां, एक किरदार के माध्यम से धर्म का पाखंड बखूबी दिखाया गया है। महिला-पुरुष का भेद भी खुलकर रखा गया है। उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया का भेद है तो साझा दर्द भी है। एक पाकिस्तानी किरदार भी है।

कुल मिलाकर यह कहानी बताती है कि कैसे मामूली इच्छाओं या सामान्य जीवन जीने की ख़्वाहिश या मजबूरी भी शोषण का आधार बनती जा रही है। जहां मध्य वर्ग से लेकर किसान तक क़र्ज़ के जाल में फंसता जा रहा है। जहां किसी जीवन की कोई क़ीमत नहीं। जहां हरेक को एक दूसरे से लड़ने और मरने के लिए छोड़ दिया गया है और मरने के बाद है सिर्फ़ कुछ पैसा, एक मुआवज़े का ऐलान।

अगर आप अपने जुर्म को छिपा ले गए...नहीं, नहीं, कोई वैसा छिपाव नहीं है, सबको पता है किसने किसे मारा है, यानी खुला खेल फर्रुख़ाबादी है...सॉरी नए शब्दों में लखीमपुरबादी है। मतलब सिर्फ़ यह है कि आप खेल में बने रहे तो वो मुआवज़ा भी आपका, यानी आपके इनाम की रकम हर मौत, हर हत्या के साथ बढ़ती जाती है। जैसे अपने यहां आपको सिर्फ़ पैसा ही नहीं, टिकट और मंत्रीपद भी मिल सकता है।

आप अच्छे खिलाड़ी यानी हत्यारे नहीं हुए, रोने लगे, अफ़सोस करने लगे, खेल छोड़ने लगे तो फिर आपके हिस्से में कुछ नहीं आएगा। इनाम की रकम मजबूरी में आपसे पहले या आपके द्वारा मारे गए लोगों के परिवारों में भी बांट दी जाएगी ताकि खेल का नियम बना रहे, ताकि इंसाफ़ का भ्रम होता रहे। ताकि ज़िल्ले इलाही की जय-जयकार होती रहे।

किसी भी अपराध चाहे वो बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो, चाहे गुजरात नरसंहार या फिर मुज़फ़्फ़रनगर दंगे। निर्भया बलात्कार और हत्याकांड हो, चाहे हाथरस बलात्कार और हत्याकांड। चाहे उन्नाव हो या फिर लखीमपुर। चाहे अख़लाक़ की मॉब लिंचिंग हो या इंस्पेक्टर सुबोध की। असम के मोइनुल हक़ हों या फिर गोरखपुर में मारे गए कानपुर के मनीष गुप्ता। किसी भी कांड, किसी भी नाइंसाफ़ी, किसी भी हादसे को सामने रख कर देख लीजिए। हर मौत सिर्फ़ एक नंबर है, जिसमें सिर्फ़ कुछ मुआवज़ा देकर मामला रफा-दफा किया जा सकता है।

और यह मौतें सिर्फ़ अपराध या हादसा ही नहीं, सत्ता के लिए एक मौका भी है, जिसमें वह आपको भूखा रखकर भी लड़वाने लगी है, मरवाने लगी है और बाद में  कुछ मदद करके पोस्टर-बैनर भी लगवाने लगी है। चुनाव में भुनाने लगी है।

यहां‘आपदा भी अवसर’ है, जिसमें वह कोविड की मौतों को भुलाकर मुफ़्त वैक्सीन का गुणगान करने लगती है। जिसमें ऑक्सीजन और अस्पतालों में बेड की कमी के बावजूद,‘थैंक्यू...जी’के पोस्टर लगाए जाने लगते हैं।

वे बार-बार आपको आभास दिलाते हैं कि वे ही सही हैं। आपके साथ हैं। आपके भले के बारे में सोचते हैं।

जैसे चार श्रम कोड या फिर तीन कृषि क़ानूनों को ही ले लीजिए, जिसमें बार-बार यह दोहराया जा रहा है कि यह क़ानून तो किसानों के भले के लिए लाए गए हैं। लेकिन किसान जान रहे हैं कि यह मौत के फंदे या जाल के सिवा कुछ नहीं। यह उनके लिए नहीं बल्कि सरकार के दोस्त पूंजीपतियों के लिए लाए गए हैं।

लेकिन वादे और दावे हमेशा बड़े-बड़े अच्छे शब्दों में पेश किए जाते हैं। वाकई इस व्यवस्था में अच्छे-अच्छे शब्द सिर्फ़ एक छल ही तो हैं।

जैसे उदारीकरण

जैसे आर्थिक सुधार

जैसे सबका साथ

जैसे सबका विकास

जैसे सबका विश्वास

जैसे सबका प्रयास

 

आज़ादी औ’इंसाफ़, तरक़्क़ी, बराबरी

हैं लफ़्ज़ वही आज भी मतलब बदल गए 

 

बदला नहीं है आज भी हुक्काम का चलन

बस नाम के ही रहनुमा औ’ रब बदल गए

 

कुल मिलाकर यह नाटक, सीरियल या वेब सीरीज़ बच्चों के खेल और बड़ों की चालाकियां और क्रूरता के जरिये पूंजी और बाज़ार के खेल को परत-दर-परत हमारे सामने खोलती चली जाती है।

व्यापक अर्थों में जहां सत्ता की पीठ पर पूंजीपति का हाथ होता है, जहां सत्ताधीश, सरमायेदार के सामने हाथ बांधकर खड़ा होता है।

जिसमें आपकी वास्तविक आज़ादी, आपकी मानवीय संवेदनाएं, सामूहिकता और सामाजिकता छीनकर आपको एक रोबोट में बदल दिया जाता है। एक गला काट प्रतियोगिता में झोंककर आपको अपनों के साथ खुद अपना दुश्मन बना दिया जाता है। आपके लिए रिश्ते-नाते, प्यार-मोहब्बत, यारी-दोस्ती और इंसानियत की क़ीमत सिर्फ़ तब तक होती है जब तक आपका फ़ायदा हो। या फिर नुकसान न हो रहा हो। अगर आपको अपने या दूसरे में चुनना हो तो फिर आप खुद को ही चुनते हैं दूसरे की जान लेने की क़ीमत पर भी। कुल मिलाकर आप उन्हीं के जैसे हो जाते हैं, जो आपके शोषण और बर्बादी का कारण होते हैं।

लेकिन हर कहानी की तरह यह सीरीज़ भी बीच-बीच में कुछ गुंजाइशें छोड़ती है, उम्मीद जगाती है, कि अभी सबकुछ ख़त्म नहीं हुआ है। यह सबकुछ काफ़ी अलग ढंग से कहा गया है। इसलिए देखना तो बनता है। हां कमज़ोर दिल वाले या ख़ून-ख़राबे से घबराने वाले इसे न देखें तो अच्छा है, लेकिन इस “Squid Game” को समझना उनके लिए भी ज़रूरी है।

कितने तारों का ख़ून करता है

सबको दिखता है चमकता सूरज

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Cruel game of capitalism

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