NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
स्वास्थ्य अधिकारों की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों का विश्लेषण
कोविड-19 कोरोनावायरस के बोझिल तनाव ने भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में व्याप्त अक्षमता को सामने लाने का काम किया है। लेखक ने नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार की सुरक्षा के लिए राज्य के कर्तव्यों और उसके पीछे के न्यायशास्त्र के बारे में जानकारी प्रस्तुत की है।
शिवकृत राय
04 Jul 2020
covid-19

कोविड-19 कोरोनावायरस के बोझिल तनाव ने भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में व्याप्त अक्षमता को सतह पर लाने का काम किया है। इस चुनौती से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहलकदमी लेकर सरकारी अस्पतालों में पीड़ित मरीजों के बारे में मीडिया में आ रही रिपोर्टों पर स्वतः संज्ञान लेने का फ़ैसला लिया है। इस सन्दर्भ में लेखक ने नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार की सुरक्षा के लिए राज्य के कर्तव्यों और उसके पीछे के न्यायशास्त्र के बारे में जानकारी प्रस्तुत की है।

                                                                              ———-

11 जून के दिन सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सभी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर हालात के बारे में स्वतः संज्ञान लेने का फैसला लिया। विशेषतौर पर इसकी ओर से दिल्ली सरकार द्वारा अपने निवासियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया न करा पाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया। कोर्ट ने उन खबरों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेने का फैसला किया जिसमें दर्शाया गया था कि किस प्रकार से दिल्ली सरकार द्वारा अस्पतालों में भर्ती कोविड-19 के मरीजों के स्वास्थ्य के अधिकारों की लगातार अनदेखी की जा रही थी। 

12 जून और 19 जून 2020 के अपने दो विस्तृत आदेशों में सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इस बात को दोहराया कि स्वास्थ्य के अधिकार को सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। न्यायालय ने कोविड-19 की टेस्टिंग में हाल के दिनों में आई कमी को भी चिह्नित किया और इस बारे में आवश्यक निर्देश दिए हैं कि राज्य को अपनी टेस्टिंग की संख्या में तेजी से इजाफा सुनिश्चित करने के उपायों को अपनाना चाहिये। कोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के भी आदेश दिए हैं और दिल्ली में अस्पतालों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक कमेटी का गठन भी कर दिया है।

कई रिपोर्टों में इस बात के संकेत मिल रहे थे कि निकट भविष्य में कोरोनावायरस के मामलों में नया उछाल देखने को मिल सकता है। इसे देखते हुए न्यायपालिका की इस पहल को सभी देशवासियों के स्वास्थ्य अधिकारों की सुरक्षा के अंतिम प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है। इसके साथ ही इसे उसकी विलम्बित प्रतिक्रिया से बचने के तौर पर भी देखा जा सकता है, जिसके लिए न्यायपालिका की हाल के दिनों में आलोचना भी देखी गई थी। हालात को देखते हुए कोर्ट को एक बेहद-जरूरी कार्यकर्ता वाले दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता पड़ी, जिसे कि उसकी ओर से बंधुआ मुक्ति मोर्चा केस, विशाखा निर्णय और राकेश चंद्र नारायण केस मामले जैसे फैसलों में भी समय-समय पर लेते देखा गया है। इसने सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों पर संवैधानिक बहसों में परिकल्पित मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं के न्यायशास्त्र के विकास का भी मौका दिया है। हालांकि अदालत ने इस मौके पर किसी एक्टिविस्ट की दृष्टि से काम लिया है, लेकिन यह अपने इतिहास में लिए गए कुछ ऐतिहासिक न्यायिक मिसालों से कुछ नसीहतें लेने चूका भी है।

राकेश चन्द्र नारायण बनाम बिहार राज्य केस की समीक्षा

स्वास्थ्य अधिकार के संबंध में न्यायशास्त्र में यदि दृष्टान्तों को तलाशें तो इसके लिए 1988 तक पीछे जा सकते हैं। राकेश चंद्र नारायण  वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराये जाने को सुनिश्चित करे। इसे उन पहले उदाहरणों में से एक कहा जा सकता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने न्यायोचित मौलिक अधिकारों के साथ राजकीय नीति के गैर-न्यायोचित निर्देशात्मक सिद्धांतों को विलीन कर दिया था। यह मामला रांची के एक मानसिक रोगी अस्पताल की शोचनीय स्थिति पर विचाराधीन था और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक लिखित पत्र याचिका के तौर पर इसे दायर किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने रांची के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को मामले की जांच के आदेश दे दिए थे। सीजेएम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के नतीजों ने अस्पताल में मामलों की खेदजनक स्थिति को उजागर करके रख दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि इतने विशालकाय संस्था को नहीं चला सकते, जब तक कि इसमें कोई प्रशासनिक बदलाव नहीं किया जाते हैं। इसके अलावा कोर्ट ने इस बात का भी उल्लेख किया था कि मानसिक अस्पताल की दशा में सुधार लाने के लिए जिस योजना को कोर्ट में पेश किया गया था, वह आधी-अधूरी थी। इसके साथ ही कोर्ट का मानना था कि इस योजना में मौजूदा व्यवस्था की खामियों को दुरुस्त करने की कोशिशें नहीं की गईं थीं। एक अभूतपूर्व कदम के तौर पर कोर्ट की ओर से एक प्रबंधन समिति का गठन कर दिया गया था और अस्पताल के कामकाज और प्रबंधन के बारे में दिशानिर्देश जारी कर दिए गए थे।

यहाँ पर भी सुप्रीम कोर्ट ने एक एक्टिविस्ट के बतौर काम करने की कोशिश की है। कोर्ट ने अपने 19.06.2020 के आदेश में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को एक कमेटी के गठन का निर्देश दिया था। यह कमेटी अस्पतालों के निरीक्षण का काम सम्भालेगी और समय-समय पर इनका औचक निरीक्षण भी करेगी। इस कमेटी में दिल्ली में मौजूद केंद्रीय सरकारी अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टर, अन्य जीएनसीटीडी अस्पतालों के डॉक्टर, एम्स के डॉक्टर और मंत्रालय के अधिकारियों को सदस्यों के तौर पर नियुक्त किया जाएगा।

इस प्रकार की कमेटियों के साथ एक समस्या यह रहती है कि आने वाली तारीखों पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की जाने वाली रिपोर्टों के पक्षपातपूर्ण होने की संभावना बनी रहती है, और शायद भरोसे के लायक भी नहीं रहती। ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्य को अपने कार्यों पर रिपोर्ट करने की शक्ति मिली हुई है। इसकी बजाय कोर्ट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को नियुक्ति करना चाहिए था। सीजेएम किसी भी मामले की जाँच के लिए कार्यकारी या विधायिका के प्रति जवाबदेह नहीं रहता। इस प्रकार के प्राधिकरण के होने से वे जमीनी हकीकत की विस्तृत और निष्पक्ष रिपोर्ट देने में सक्षम रहेंगे।

राज्य के साथ अविश्वास: एक स्वतंत्र जाँच की ज़रूरत

हाल के दिनों में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 25 मई के दिन कहा था कि दिल्ली में स्थिति "नियंत्रण में है" और राज्य सरकार "कोरोनोवायरस मरीजों की संख्या में संभावित उछाल के प्रति पूरी तरह से तैयार" है। लेकिन दिल्ली की जो मौजूदा स्थिति आज नजर आ रही है वह राज्य सरकार के दावों के ठीक उलट है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की गई प्रत्येक जानकारी को पहले गहन जाँच की प्रक्रिया के बीच से गुजरने देना चाहिए। इसको लेकर एक स्वतंत्र जाँच की भी आवश्यकता है क्योंकि पिछले दिनों राज्य सरकार और केंद्र सरकार के द्वारा गैर हकीकी बयानों के चलते हाल ही में एक अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

दिलचस्प बात यह है कि राकेश चंद्र नारायण के फैसले के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने अविश्वास के स्वर के साथ राज्य के मुख्य सचिव की रिपोर्ट का विश्लेषण किया था। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा था:

 “मुख्य सचिव के दौरे के दौरान अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी किसी भी सूरत में नहीं चाहेंगे कि वे अपने स्वयं की कमियों का बखान करें, ऐसा उनके खुद के हित में नहीं है। इसलिए यदि वे कुल मिलाकर स्थिति से संतुष्ट हैं, और यदि इस बात की तस्दीक करते हैं कि उनके दौरे के समय उन्हें एक भी मरीज ऐसा नहीं मिला जिसे अपर्याप्त भोजन या दवा दी जा रही हो, तो इसे स्थिति का सटीक मूल्यांकन नहीं कह सकते हैं।"

इसी तरह का अविश्वास सुप्रीम कोर्ट के दिनांक 19.06.2020 वाले आदेश में भी देखा जा सकता है। न्यायालय के विचार में:

“……… इस पूरे हलफनामे में, इस आम बयान के अलावा, कि सारे क़दमों को उठाया जा रहा है, लेकिन हलफनामे में ऐसा कोई मेकेनिज्म नजर नहीं आता जिसमें अस्पतालों के कामकाज की उचित देखरेख और उसमें सुधार के उपायों को लेकर कोई स्पष्ट संकेत मिलते हों। हलफनामे में कोर्ट को यह जताने की कोशिश की गई है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों का काम-काज पूरी तरह से दुरुस्त है, और दिल्ली सरकार की ओर से सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। ऐसे में जब सरकार अपने अस्पतालों और मरीजों की तीमारदारी में कोई कमी या गड़बड़ियों को जानने की कोशिश ही नहीं करती है, तो उससे उपचारात्मक क़दमों को लेने और सुधार लाने की गुंजाइश नहीं की जा सकती।”

इसलिए यह उचित होगा कि खंडपीठ इन तथ्यों पर अपनी नजर बनाए रखे, और कमेटी से निष्पक्ष रिपोर्ट और नवीनतम अपडेट ले।

विधि-निर्माण सम्बंधी शून्यता से उबरने की चुनौती

ऐसा लगता है कि दिल्ली में स्वास्थ्य के अधिकार की हिफाजत के लिए कोई राजकीय कानून नहीं है। ऐसी स्थिति में यह सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार के दायरे में है कि वह अधिकारों की परिधि को व्याख्यायित करे। यह राज्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के माध्यम से व्याख्यायित स्वास्थ्य के अधिकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या को समझने में मदद करेगा। स्वतः संज्ञान वाले मामले में अदालत दो पहलुओं से निपट रही थी। पहला आर्थिक पहलू है, जहाँ अदालत को कोविड--19 की टेस्टिंग में लागत के प्रश्न से दो चार होना पड़ा। दूसरा प्रशासनिक पहलू है जिसमें कोर्ट ने मरीजों की देखभाल, अस्पताल प्रबंधन और बुनियादी ढांचे के संबंध में दिशानिर्देशों के कार्यान्वयन में हुई विफलता का विश्लेषण किया।

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की विफलता को न सिर्फ बजटीय परिपेक्ष्य से समझने की कोशिश की है बल्कि प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी इसका मुआयना किया है। कोर्ट ने इस बात को भी सुनिश्चित किया है कि राज्य द्वारा गठित कमेटी, जिसमें डॉक्टर भी शामिल हैं को कोविड-19 प्रभावित मरीजों की देखभाल के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार हो। इस कमेटी को निर्देश जारी करने के अधिकार देकर कोर्ट ने एक नई प्रशासनिक ईकाई इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर बना डाली है ताकि मौजूदा व्यवस्था में जो कमियाँ रह जा रही हैं, उनको भरा जा सके।

हालाँकि इससे भी अधिक किया जा सकता है। दो आदेशों के अवलोकन (12 जून और 19 जून) से पता चलता है कि कुल मिलाकर अदालत ने हलफनामों के माध्यम से राज्य द्वारा पेश की गई सिफारिशों को सीधे तौर पर स्वीकार करने का ही काम किया है। आने वाले दिनों में न्यायपालिका को चाहिए कि वह इस तथ्य पर निगाह बनाए रखे कि राज्य द्वारा जो सिफारिशें पेश की गईं थीं, वे कारगर हैं या उन्हें आधे-अधूरे तौर पर लागू किया जा रहा है। इसके माध्यम से कोर्ट दिल्ली में कोविड-19 के मरीजों के स्वास्थ्य के अधिकार की गारंटी के व्यापक उल्लंघन से प्रभावी ढंग से निपटते हुए स्वास्थ्य के अधिकार की गारन्टी को सुनिश्चित कर सकती है। क्योंकि इसका अस्तित्व वैसे तो अतीत में कागजों पर बना हुआ था लेकिन वास्तविकता में यह आपने उद्येश्यों में विफल रही थी।

 (लेखक दिल्ली उच्च न्यायालय में विधि क्षेत्र में शोधकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

सौजन्य: द लीफलेट

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Analysing Supreme Court’s Attempt To Safeguard Right To Health

Supreme Court of India
public healthcare system
COVID-19
Corona Virus Pandemic
government hospitals

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी


बाकी खबरें

  • सोनिया यादव
    हरियाणा: आए दिन सामने आ रहे पेपर लीक घोटाले सरकार पर सवाल क्यों खड़े करते हैं?
    11 Aug 2021
    अगर परीक्षाओं की गोपनीयता पर करोड़ोें होने के बावजूद पेपर लीक हो जाता है तो ऐसे में सरकार पर सवाल उठता लाजमी है। विपक्ष का आरोप है कि अब तक हरियाणा में अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं से जुड़े 28 पेपर लीक हो…
  • मध्य प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ बढ़ता आशा कर्मियों का रोष
    न्यूज़क्लिक टीम
    मध्य प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ बढ़ता आशा कर्मियों का रोष
    11 Aug 2021
    मध्य प्रदेश में आशा कर्मियों ने अपनी मांगो को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। पेश है भोपाल से न्यूज़क्लिक की ग्राउंड रिपोर्ट।
  • climate
    अजय कुमार
    अगर अब भी नहीं जगे तो अगले 20 साल बाद जलवायु परिवर्तन से तबाही की संभावना : रिपोर्ट
    11 Aug 2021
    इस रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोतरी की वजह से खूब अधिक बारिश होगी। सूखे की संभावना भी बढ़ेगी। हीटवेव का दंश भी झेलना पड़ेगा। हिमखंड पिघलेंगे। चक्रवाती तूफानों में बढ़ोतरी होगी। समुद्र…
  • सवालों से डरती क्यों है भाजपा सरकार ?
    न्यूज़क्लिक टीम
    सवालों से डरती क्यों है भाजपा सरकार ?
    11 Aug 2021
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे में अभिसार शर्मा साथ ही सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की भी चर्चा कर रहे हैं जिसमे उसने कहा है के अब राज्य सरकारें सांसदों और विधायकों के आपराधिक मामले वापस नहीं ले सकते
  • rajya sabha
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    ओबीसी से जुड़े विधेयक का सभी दलों ने किया समर्थन, 50 फ़ीसद आरक्षण की सीमा हटाने की भी मांग  
    11 Aug 2021
    ओबीसी से जुड़ा संविधान (127वां संशोधन) विधेयक शून्य के मुकाबले 187 मतों से राज्यसभा में पारित, साथ ही संसद से मिली मंज़ूरी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License