NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
लॉकडाउन से पहले ही दंगा निगल गया था एशिया के सबसे बड़े होज़री बाज़ार को
दिल्ली के दंगों के आर्थिक पहलू पर अभी तक विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है, जिसकी सख़्त ज़रूरत है।
अफ़ज़ल इमाम
20 Jul 2020
दिल्ली का गांधी नगर मार्केट
दिल्ली का गांधी नगर मार्केट। फोटो साभार : indianexpress

‘आत्मनिर्भर भारत’ व ‘वोकल फॉर लोकल और फिर ग्लोबल’ जैसे नारों के बावजूद पूर्वी दिल्ली स्थित सीलमपुर में एशिया का सबसे बड़ा थोक रेडीमेड होज़री बाज़ार गांधी नगर दम तोड़ रहा है। यहाँ की करीब 20 फीसदी दुकानें बंद हो चुकी हैं, क्योंकि दुकानदारों को इतनी भी कमाई नहीं हो रही है जिससे वे किराया तक दे सकें। इतना ही नहीं इस बाज़ार से जुड़े हज़ारों काऱखानें भी बंद पड़े हैं। जाफ़राबाद में जून-जुलाई से ही जैकेट बनाने का काम शुरू हो जाता था, लेकिन वर्तमान में वहां कोई गतिविधि नहीं नज़र आ रही है। होज़री की दुकानों व काऱखानों से जुड़े हज़ारों कारीगर, हेल्पर और मज़दूर अपने गावों को पलायन कर गए हैं।

कुछ लोग कारोबार की बर्बादी की वजह कोरोना महामारी व 23 मार्च से घोषित किए लॉकडाउन को मानते हैं, लेकिन कई दुकानदारों और काऱखाने वालों का कहना है कि इसकी शुरूआत तो इसके ठीक एक माह पहले जाफ़राबाद के दंगों के समय से ही हो गई थी। हिंसा उन्हीं इलाकों में ज़्यादा हुई, जहाँ होज़री के कारख़ाने थे। कारीगर अपनी जान बचाने के लिए पलायन करने को मजबूर हुए और दूसरे शहरों के व्यापारियों व ग्राहकों ने भी यहां आना बंद कर दिया।

वैसे देश में होने वाले अधिकांश दंगों के बारे में अब तक के अध्ययन व अनुभव भी यही बताते हैं कि इनके पीछे का एक प्रमुख कारण आर्थिक भी होता है। यदि सन् 1989 में भागलपुर का दंगा नहीं हुआ होता तो वहाँ कपड़े का कारोबार तबाह नहीं होता। इसी तरह दंगों ने ही अलीगढ़ के ताले, सहारनपुर व मुरादाबाद के पीतल और बर्तन उद्योगों की कमर तोड़ दी।

वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने बढ़ते कृषि संकट और सिकुड़ते संसाधनों के चलते हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच बढ़ी प्रतिद्वंदिता की ओर इशारा किया था, हालांकि दिल्ली के दंगों के आर्थिक पहलू पर उन्होंने अभी तक इस तरह ध्यान नहीं दिया है। सन् 1984 के बाद पहली बार देश की राजधानी में इस तरह की हिंसा हुई, जिसने दर्जनों ज़िंदगियाँ छीन लीं और हज़ारों मेहनतकशों की रोज़ी पर ताले लगा दिए। यदि सरकारी आंकड़ों को ही देखा जाए तो 52 जानें गईं, 526 घायल हुए, 371 दुकानें और 142 घर जले। धार्मिक स्थलों को भी नुकसान पहुंचाया गया।

ध्यान रहे कि यह वही गांधी नगर मार्केट है, जिसे वर्ष 2016 में अमरीकी सरकार के ट्रेड रिप्रजेंटेटिव ने ‘नटोरियस मार्केट’ की सूची में शामिल किया था। इस पर आरोप है कि यहाँ अमेरिकन जीन्स व जैकेट आदि की नकल बेची जाती है। गांधी नगर मार्केट और इससे जुड़े कारख़ानें लंबे अर्से से अमरीकी एजेंसियों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं।

गांधीनगर के एक दुकानदार मनोज गुप्ता ने बताया कि यह एशिय़ा की सबसे बड़ी थोक होज़री मंडी मानी जाती है, लेकिन यहाँ से जुड़े आधे से अधिक लोगों के हाथों से काम जा चुका है। दुकानदारों की स्थिति यह है कि वे कर्मचारियों व हेल्परों को वेतन देना तो दूर दुकान का किराया भी नहीं दे पा रहे हैं। यहाँ बहुत सारे ऐसे लोग भी बेरोज़गार हुए हैं, जो 15-20 वर्षों से इन दुकानों पर नौकरी कर रहे थे। मार्केट में 12 हजार से अधिक छोटी-बड़ी दुकानें हैं, जिनमें करीब 20 फीसदी बंद हो गईं हैं। यहाँ के कई बड़े दुकानदार गुजरात से कपड़ा मंगवा कर अपने कारखानों में माल तैयार करवाते हैं। साथ ही जाफ़राबाद, जनता कालोनी, करदमपुरी, सीलमपुर, वेलकम और टैंक रोड (करोल बाग) आदि इलाकों में चलने वाले कारखानों से भी माल आता है, लेकिन इन दिनों काम बिल्कुल ठप्प पड़ा है।

मार्केट में बाहर के व्यापारियों का आना तो दंगों से ही बंद हो गया था और अब तो दिल्ली के भी दुकानदार नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कारोबार की स्थिति तो लॉकडाउन लगने के पहले से ही डावांडोल थी। फिर अऩलॉक-1 की घोषणा के बाद थोड़ी उम्मीद जागी थी, लेकिन दिल्ली में कोरोना को लेकर जिस तरह की खबरें टीवी पर दिखाई जा रही हैं, उससे बाहर के व्यापारी यहाँ आने से डर रहे हैं। मनोज का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि रक्षाबंधन पर कुछ बिक्री हो सकती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर दीपावली ही एक आसरा बचता है। एक अन्य दुकानदार ने भी बताया कि पिछले 4-5 माह से कारोबार बिल्कुल ठंडा पड़ा हुआ है। डिमांड नहीं होने और अनिश्चिचता के कारण दुकानदार नया माल का आर्डर देने से बच रहे हैं।

उधर जनता कालोनी में जीन्स की पैंट, कुर्ती, लोवर और कैप्री आदि का कारखाना चलाने वाले गयासउद्दीन ने बताया कि उनके यहां करीब 11 कारीगर और हेल्पर काम करते थे, लेकिन जब दंगा हुआ तो सभी अपने गांवों को वापस हो गए। मौजूदा समय में उनके पास न तो दुकादारों का आर्डर है और न ही कारीगर बचे हैं। जब हालात सामान्य थे तो सारा खर्च काटने के बाद उन्हें प्रतिमाह तकरीबन 35 से 40 हजार रुपये बच जाते थे। नोटबंदी के समय भी उन्हें भारी संकट का सामना करना पड़ा था, लेकिन अब की स्थिति तो भयावह है। उन्होंने बताया कि जाफ़राबाद व आसपास के मुहल्लों में करीब एक हजार छोटे-बड़े कारखानें हैं, जो बंद पड़े हैं।

गयासउद्दीन के मुताबिक बहुत से कारखाने वाले गांधी नगर के अलावा अन्य शहरों के व्यापारियों को भी माल सप्लाई करते थे, पर अब कहीं से भी मांग नहीं आ रही है। इसी तरह जाफ़राबाद के एक कारख़ाने वाले ने बताया कि वे मुख्य रूप से जीन्स और जैकेट का काम करते हैं। हर साल जून से ही जैकेट तैयार करने का काम शुरू हो जाता था, लेकिन इस बार सन्नाटा है। न तो कहीं से आर्डर आ रहा है और न ही उनके पास कारीगर बचे हैं। ठीक ऐसी ही स्थिति अऩ्य कारख़ाने वालों की भी है। बड़े दुकानदार माल बनवाने का आर्डर देने से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं है कि अगले 2-3 माह में बाज़ार के हालात सामान्य हो जाएंगे। उधर सीलमपुर में जींस व बच्चो के कपड़ों के अलावा कढ़ाई आदि का काम होता था, लेकिन वहां भी काऱखाने बंद पड़े हैं। फरवरी में यह मुहल्ला भी दंगों की चपेट में आया था।

उल्लेखनीय है कि होज़री का यह समूचा कारोबार विशुद्ध स्वदेशी है। बड़े दुकानदार और कारख़ाने वाले भारतीय कंपनियों से ही कपड़े खरीदते हैं और कारीगर उसे अपने हुनर से आकर्षक डिज़ाइनों वाले परिधानों में तब्दील करते हैं। इनके माल की खपत भी घरेलू मार्केट में ही होती है। इन कारखानों में जीन्स, शर्ट, टीशर्ट, कैप्री, ट्रैक सूट, कुर्ती, ब्लाउज़ व बच्चों के कपड़े समेत कई आइटम्स तैयार किए जाते हैं।

जीन्स व जैकेट जैसी महंगी चीज़ें तो सिर्फ 300 रुपये से 1,500 रुपये, जबकि बच्चों के कपड़े 150 से 200 रुपये तक में तैयार किए जाते हैं। इन्हें देश के सभी वर्गों के लोग खऱीदते हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी मात्र 5 माह के भीतर यह कारोबार बर्बादी की कगार पर आ कर खड़ा हो गया है। दंगे और लॉकडाउन ने इस कारोबार से जुड़े हज़ारों कारीगरों व मज़दूरों की रोज़ी-रोटी निगल ली है। सरकार के स्तर बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जी रही हैं और टीवी पर आत्मनिर्भर भारत अभियान का प्रचार भी धुआंधार चल रहा है, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Gandhi Nagar Market
Delhi riots
Lockdown
Coronavirus
economic crises
poverty
Aatmnirbhar Bharat
Vocal For Local
modi sarkar

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के घटते मामलों के बीच बढ़ रहा ओमिक्रॉन के सब स्ट्रेन BA.4, BA.5 का ख़तरा 

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

भारत में असमानता की स्थिति लोगों को अधिक संवेदनशील और ग़रीब बनाती है : रिपोर्ट

कार्टून क्लिक: पर उपदेस कुसल बहुतेरे...

कोरोना अपडेट: देश में फिर से हो रही कोरोना के मामले बढ़ोतरी 

ज्ञानवापी, ताज, क़ुतुब पर बहस? महंगाई-बेरोज़गारी से क्यों भटकाया जा रहा ?


बाकी खबरें

  • privatization
    अजय कुमार
    प्राइवेटाइजेशन की नीति से भारत को फ़ायदा या नुक़सान? चीन ने कैसे पछाड़ा अमेरिका को!
    26 Sep 2021
    फॉर्चून मैगजीन ने दुनिया की 500 सबसे बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों की लिस्ट दी है। इस लिस्ट के मुताबिक चीन की बड़ी कंपनियों ने अमेरिका की कई कंपनियों को अधिग्रहित कर लिया है। 500 कंपनियों की इस लिस्ट में …
  • Kamla Bhasin
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    हवाओं सी बन रही हैं लड़कियां… उन्हें मंज़ूर नहीं बेवजह रोका जाना
    26 Sep 2021
    इतवार की कविता: अंतर्राष्ट्रीय बेटी दिवस...कमला भसीन और उमड़ती लड़कियां।
  • Hafte ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    जनगणना-विवाद, बेहाल असम और पीएम मोदी का यूएस दौरा
    25 Sep 2021
    हफ़्ते की तीन बड़ी खबरों की व्याख्या सहित चर्चा: 1. सन् 2011 से पहले कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने संसद और संसद के बाहर वादा किया था कि 2011 की जनगणना में SC/ST की तरह OBC की भी गणना कराई…
  • germany election polls
    उपेंद्र स्वामी
    दुनियाभर की: संसदीय चुनावों में वामपंथी धड़े की जीत की संभावना से जर्मनी के धनकुबेर परेशान
    25 Sep 2021
    जर्मनी के ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 16 साल बाद चांसलर एंजेला मर्केल अपने पद से हट रही हैं।
  • CAA
    असद रिज़वी
    CAA विरोधी आंंदोलन: कोर्ट का योगी सरकार को झटका, प्रदर्शनकारियों की ज़मानत रद्द करने से किया इंकार
    25 Sep 2021
    यूपी सरकार ने ज़िला अदालत में अर्ज़ी देकर कहा था कि तीन प्रदर्शनकारियों (कांग्रेस नेता सदफ़ जाफ़र, रंगकर्मी दीपक मिश्रा “कबीर” और अधिवक्ता मोहम्मद शोएब ) द्वारा ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन किया गया…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License