NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
महंगाई मार गई...: चावल, आटा, दाल, सरसों के तेल से लेकर सर्फ़ साबुन सब महंगा
सरकारी महंगाई के आंकड़ों के साथ किराना दुकान के महंगाई आकड़ें देखिये तो पता चलेगा कि महंगाई की मार से आम जनता कितनी बेहाल होगी ?
अजय कुमार
27 Mar 2022
inflation

महंगाई का अंदाजा केवल सरकारी आंकड़ें रख देने भर से नहीं लगता। सरकारी भाषा में कहा जाए तो खुदरा महंगाई दर फरवरी महीने में बढ़कर 6.7 फीसदी पर पहुंच गई है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के मुताबिक महंगाई आठ महीने के सबसे उच्चतम स्तर पर है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित 6% की महंगाई की सहनशील सीमा से ऊपर चला गया है। लेकिन इन सभी तकनीकी बातों से यह पता नहीं चलता कि आम जनता पर महंगाई का क्या असर पड़ रहा है?

इसीलिए सबसे पहले इन तकनीकी बात को थोड़ा तोड़कर समझते हैं कि यह बात भी समझ में आए कि इस आंकड़ें का हमारे और आपके जैसे आम लोगों के लिए क्या मतलब है?

खुदरा महंगाई दर उन सामानों और सेवाओं की कीमत के आधार पर निकाली जाती है जिसे ग्राहक सीधे खरीदता है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार कुछ सामानों और सेवाओं के समूह के कीमतों का लगातार आकलन कर खुदरा महंगाई दर निकालती है। सरकार ने इसके लिए फार्मूला फिक्स किया है। जिसके अंतर्गत तकरीबन 45% भार भोजन और पेय पदार्थों को दिया है और करीबन 28 फ़ीसदी भार सेवाओं को दिया है। यानी खुदरा महंगाई दर का आकलन करने के लिए सरकार जिस समूह की कीमतों पर निगरानी रखती है उस समूह में 45% हिस्सा खाद्य पदार्थों का है, 28 फ़ीसदी हिस्सा सेवाओं का है। यह दोनों मिल कर के बड़ा हिस्सा बनाते हैं। बाकी हिस्से में कपड़ा जूता चप्पल घर इंधन बिजली जैसे कई तरह के सामानों की कीमतें आती है।।

अब यहां समझने वाली बात यह है कि भारत के सभी लोगों के जीवन में खाद्य पदार्थों पर अपनी आमदनी का केवल 45% हिस्सा खर्च नहीं किया जाता है। साथ में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं पर अपनी आय का केवल 28% हिस्सा नहीं खर्च किया जाता है। जो सबसे अधिक अमीर हैं जिनकी आमदनी करोड़ों में है, वे अपनी कुल आमदनी का जितना खाद्य पदार्थों पर खर्च करते हैं वह उनके कुल आमदनी का रत्ती बराबर हिस्सा होता है।

पीरियोडिक लेबर फोर्स के 2018 -19 के आंकड़ें बताते हैं कि 10 प्रतिशत से कम लोग केवल संगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनकी औसत आमदनी 26 हजार के आसपास है। भारत की प्रति व्यक्ति प्रति माह औसत आमदनी महज 16000 है। वह भी तब जब भारत घनघोर आर्थिक असमानता वाला देश है। केवल 1 प्रतिशत अमीरों के पास देश की कुल आमदनी का 22 फीसदी हिस्सा है और 50 प्रतिशत गरीब आबादी के पास केवल 13 प्रतिशत। मतलब भारत की बहुत बड़ी आबादी के घर में खाद्य पदार्थों पर कुल आय का 45% से अधिक हिस्सा खर्च होता है। इनके घर में बच्चों के पढ़ाई लिखाई और दवाई के इलाज पर 28% से अधिक हिस्सा खर्च होता है। तकरीबन 80 से 90% हिस्सा दो वक्त की रोटी और अपने बच्चे की सरकारी स्कूल में पढ़ाई पर ही खर्च हो जाता होगा। मतलब यह है कि महंगाई के आंकड़ें तोड़कर समझने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि महंगाई की मार आम जनता पर जबरदस्त पड़ती रहती है लेकिन सरकारी आंकड़ों में नहीं दिखती।  

तो बिना सरकारी आंकड़ें देखा जाए तो आम लोगों पर पड़ने वाली वाली महंगाई की मार को थोड़ा साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। दैनिक भास्कर की  भोपाल के किराने के दूकान से बातचीत कर लिखी गयी रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो महीने में भोपाल में खाने वाले तेल के दाम 30 से 40 रु. प्रति लीटर तक बढ़ गए हैं। अगर एक साल पहले की कीमत से तुलना करें तो खाद्य तेलों के दाम 71% तक बढ़ चुके हैं। दो साल में मासिक किराना बजट 44.97% बढ़ गया है। मार्च 2020 की क़ीमतों से मार्च 2022 की कीमतों की तुलना करें तो सरसों के तेल की कीमत 120 रुपये प्रति लीटर थी वह बढ़कर 200 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गयी है। चावल 44 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 64 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है। चना दाल 54 रुपये प्रति किलो से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। नमक 18 रुपये प्रति किलों से 24 रूपये प्रति किलों पर पहुंच गया है।  

बीते छह महीने की राशन की पर्ची देखेंगे तो आपको खुद दिखेगा कि सर्फ, साबुन तेल रिफाइंड, बिस्कुट, नमकीन, मैगी, मंजन, दूध, ब्रेड सब कुछ महंगा हो गया है। आगे आने वाले दिनों में भी इन सबके दाम बढ़ेंगे। साबुन सर्फ़ मंजन शैम्पू बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कम्पनी की पिछले छह महीने की कीमतें बताती हैं कि कीमतें बढ़ी हैं और आगे भी बढ़ेंगी। हिन्दुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड की कीमतों की चिट्ठा बताता है कि कम्पनी ने सर्फ़ साबुन के दाम 2 से 17 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। बाकी कई उत्पादों की कीमत में 25 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।  

महंगाई का यह बीहड़ आलम तब है जब बेरोजगारी का आलम भयंकर है। इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक भारत में 15 साल से ज्यादा उम्र की काम करने लायक कुल आबादी तकरीबन 94 करोड़ है।  इस आबादी में केवल 37.5 प्रतिशत यानी केवल 52 करोड़ लोग किसी न किसी रोजगार में लगे हुए हुए है। जिसमें अधिकतर रोजगार करने वाले महीने में 15 हजार रुपये महीने से भी कम कमाते हैं। ऐसे में आप खुद सोच सकते है कि महंगाई का असर उस जनता के लिए कितना खतरनाक होता होगा जिससे मिलकर हमारा हिंदुस्तान बनता है, जो मीडिया की चमचमाती और नेताओं के झूठे में भाषण में कहीं भी नहीं दिखता।  

Inflation
Food Inflation
Rising inflation
poverty
Hunger Crisis
unemployment
Modi government
Narendra modi

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • Syrian refugees
    सोनाली कोल्हटकर
    क्यों हम सभी शरणार्थियों को यूक्रेनी शरणार्थियों की तरह नहीं मानते?
    07 Mar 2022
    अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, सीरिया, सोमालिया, यमन और दूसरी जगह के शरणार्थियों के साथ यूरोप में नस्लीय भेदभाव और दुर्व्यवहार किया जाता रहा है। यूक्रेन का शरणार्थी संकट पश्चिम का दोहरा रवैया प्रदर्शित कर रहा…
  • air pollution
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हवा में ज़हर घोल रहे लखनऊ के दस हॉटस्पॉट, रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तैयार किया एक्शन प्लान
    07 Mar 2022
    वायु गुणवत्ता सूचकांक की बात करें तो उत्तर प्रदेश के ज्यादातर शहर अब भी प्रदूषण के मामले में शीर्ष स्थान पर हैं। इन शहरों में लखनऊ, कानपुर और गाजियाबाद जैसे बड़े शहर प्रमुख हैं।
  • Chaudhary Charan Singh University
    महेश कुमार
    मेरठ: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के भर्ती विज्ञापन में आरक्षण का नहीं कोई ज़िक्र, राज्यपाल ने किया जवाब तलब
    07 Mar 2022
    मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में सेल्फ फाइनेंस कोर्स के लिए सहायक शिक्षक और सहआचार्य के 72 पदों पर भर्ती के लिए एक विज्ञापन निकाला था। लेकिन विज्ञापित की गई इन भर्तियों में दलितों, पिछड़ों और…
  • shimla
    टिकेंदर सिंह पंवार
    गैर-स्टार्टर स्मार्ट सिटी में शहरों में शिमला कोई अपवाद नहीं है
    07 Mar 2022
    स्मार्ट सिटी परियोजनाएं एक बड़ी विफलता हैं, और यहां तक कि अब सरकार भी इसे महसूस करने लगी है। इसीलिए कभी खूब जोर-शोर से शुरू की गई इस योजना का नए केंद्रीय बजट में शायद ही कोई उल्लेख किया गया है।
  • Nishads
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव: आजीविका के संकट के बीच, निषाद इस बार किस पार्टी पर भरोसा जताएंगे?
    07 Mar 2022
    निषाद समुदाय का कहना है कि उनके लोगों को अब मछली पकड़ने और रेत खनन के ठेके नहीं दिए जा रहे हैं, जिसके चलते उनकी पारंपरिक आजीविका के लिए एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License