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महंगाई मार गई...: चावल, आटा, दाल, सरसों के तेल से लेकर सर्फ़ साबुन सब महंगा
सरकारी महंगाई के आंकड़ों के साथ किराना दुकान के महंगाई आकड़ें देखिये तो पता चलेगा कि महंगाई की मार से आम जनता कितनी बेहाल होगी ?
अजय कुमार
27 Mar 2022
inflation

महंगाई का अंदाजा केवल सरकारी आंकड़ें रख देने भर से नहीं लगता। सरकारी भाषा में कहा जाए तो खुदरा महंगाई दर फरवरी महीने में बढ़कर 6.7 फीसदी पर पहुंच गई है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के मुताबिक महंगाई आठ महीने के सबसे उच्चतम स्तर पर है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित 6% की महंगाई की सहनशील सीमा से ऊपर चला गया है। लेकिन इन सभी तकनीकी बातों से यह पता नहीं चलता कि आम जनता पर महंगाई का क्या असर पड़ रहा है?

इसीलिए सबसे पहले इन तकनीकी बात को थोड़ा तोड़कर समझते हैं कि यह बात भी समझ में आए कि इस आंकड़ें का हमारे और आपके जैसे आम लोगों के लिए क्या मतलब है?

खुदरा महंगाई दर उन सामानों और सेवाओं की कीमत के आधार पर निकाली जाती है जिसे ग्राहक सीधे खरीदता है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार कुछ सामानों और सेवाओं के समूह के कीमतों का लगातार आकलन कर खुदरा महंगाई दर निकालती है। सरकार ने इसके लिए फार्मूला फिक्स किया है। जिसके अंतर्गत तकरीबन 45% भार भोजन और पेय पदार्थों को दिया है और करीबन 28 फ़ीसदी भार सेवाओं को दिया है। यानी खुदरा महंगाई दर का आकलन करने के लिए सरकार जिस समूह की कीमतों पर निगरानी रखती है उस समूह में 45% हिस्सा खाद्य पदार्थों का है, 28 फ़ीसदी हिस्सा सेवाओं का है। यह दोनों मिल कर के बड़ा हिस्सा बनाते हैं। बाकी हिस्से में कपड़ा जूता चप्पल घर इंधन बिजली जैसे कई तरह के सामानों की कीमतें आती है।।

अब यहां समझने वाली बात यह है कि भारत के सभी लोगों के जीवन में खाद्य पदार्थों पर अपनी आमदनी का केवल 45% हिस्सा खर्च नहीं किया जाता है। साथ में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं पर अपनी आय का केवल 28% हिस्सा नहीं खर्च किया जाता है। जो सबसे अधिक अमीर हैं जिनकी आमदनी करोड़ों में है, वे अपनी कुल आमदनी का जितना खाद्य पदार्थों पर खर्च करते हैं वह उनके कुल आमदनी का रत्ती बराबर हिस्सा होता है।

पीरियोडिक लेबर फोर्स के 2018 -19 के आंकड़ें बताते हैं कि 10 प्रतिशत से कम लोग केवल संगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनकी औसत आमदनी 26 हजार के आसपास है। भारत की प्रति व्यक्ति प्रति माह औसत आमदनी महज 16000 है। वह भी तब जब भारत घनघोर आर्थिक असमानता वाला देश है। केवल 1 प्रतिशत अमीरों के पास देश की कुल आमदनी का 22 फीसदी हिस्सा है और 50 प्रतिशत गरीब आबादी के पास केवल 13 प्रतिशत। मतलब भारत की बहुत बड़ी आबादी के घर में खाद्य पदार्थों पर कुल आय का 45% से अधिक हिस्सा खर्च होता है। इनके घर में बच्चों के पढ़ाई लिखाई और दवाई के इलाज पर 28% से अधिक हिस्सा खर्च होता है। तकरीबन 80 से 90% हिस्सा दो वक्त की रोटी और अपने बच्चे की सरकारी स्कूल में पढ़ाई पर ही खर्च हो जाता होगा। मतलब यह है कि महंगाई के आंकड़ें तोड़कर समझने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि महंगाई की मार आम जनता पर जबरदस्त पड़ती रहती है लेकिन सरकारी आंकड़ों में नहीं दिखती।  

तो बिना सरकारी आंकड़ें देखा जाए तो आम लोगों पर पड़ने वाली वाली महंगाई की मार को थोड़ा साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। दैनिक भास्कर की  भोपाल के किराने के दूकान से बातचीत कर लिखी गयी रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो महीने में भोपाल में खाने वाले तेल के दाम 30 से 40 रु. प्रति लीटर तक बढ़ गए हैं। अगर एक साल पहले की कीमत से तुलना करें तो खाद्य तेलों के दाम 71% तक बढ़ चुके हैं। दो साल में मासिक किराना बजट 44.97% बढ़ गया है। मार्च 2020 की क़ीमतों से मार्च 2022 की कीमतों की तुलना करें तो सरसों के तेल की कीमत 120 रुपये प्रति लीटर थी वह बढ़कर 200 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गयी है। चावल 44 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 64 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है। चना दाल 54 रुपये प्रति किलो से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। नमक 18 रुपये प्रति किलों से 24 रूपये प्रति किलों पर पहुंच गया है।  

बीते छह महीने की राशन की पर्ची देखेंगे तो आपको खुद दिखेगा कि सर्फ, साबुन तेल रिफाइंड, बिस्कुट, नमकीन, मैगी, मंजन, दूध, ब्रेड सब कुछ महंगा हो गया है। आगे आने वाले दिनों में भी इन सबके दाम बढ़ेंगे। साबुन सर्फ़ मंजन शैम्पू बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कम्पनी की पिछले छह महीने की कीमतें बताती हैं कि कीमतें बढ़ी हैं और आगे भी बढ़ेंगी। हिन्दुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड की कीमतों की चिट्ठा बताता है कि कम्पनी ने सर्फ़ साबुन के दाम 2 से 17 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। बाकी कई उत्पादों की कीमत में 25 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।  

महंगाई का यह बीहड़ आलम तब है जब बेरोजगारी का आलम भयंकर है। इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक भारत में 15 साल से ज्यादा उम्र की काम करने लायक कुल आबादी तकरीबन 94 करोड़ है।  इस आबादी में केवल 37.5 प्रतिशत यानी केवल 52 करोड़ लोग किसी न किसी रोजगार में लगे हुए हुए है। जिसमें अधिकतर रोजगार करने वाले महीने में 15 हजार रुपये महीने से भी कम कमाते हैं। ऐसे में आप खुद सोच सकते है कि महंगाई का असर उस जनता के लिए कितना खतरनाक होता होगा जिससे मिलकर हमारा हिंदुस्तान बनता है, जो मीडिया की चमचमाती और नेताओं के झूठे में भाषण में कहीं भी नहीं दिखता।  

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