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जानवरों में पाए जाने वाले सार्स-जैसे वायरस हर साल 4,00,000 इंसानों को संक्रमित करते हैं
जानवरों से दूसरों में प्रविष्ठ होने की घटनाओं को देखते हुए कोरोनावायरस से संक्रमण का सबसे अधिक खतरा दक्षिणी चीन, विएतनाम, कम्बोडिया और जावा जैसे क्षेत्रों में है।
संदीपन तालुकदार
21 Sep 2021
SARS
चित्र साभार: विकिपीडिया

एक नए अध्ययन से पता चला है कि कोरोनावायरस के बारे में जितना सोचा गया था, उससे कहीं ज्यादा बार यह जानवरों से मनुष्यों में प्रविष्ठ कर गया है। हालांकि, सभी कोरोनावायरस उस प्रकार के प्रकोपों को सक्रिय नहीं करते हैं जो वैश्विक चिंता का कारण बन जाएं, जैसा कि कोविड-19 के मामले में और सार्स जैसे छोटे पैमाने पर 2003 में देखने को मिला था। प्रीप्रिंट सर्वर मेडआरएक्सआईवी में उपलब्ध अध्ययन का दावा है कि स्पिलओवर प्रभाव के चलते औसतन साल भर में 4,00,000 लोग सार्स जैसे कोरोनावायरसों से संक्रमित होते रहते हैं, लेकिन यह किसी प्रकार के पड़ताल योग्य या चिंताजनक प्रकोप को सक्रिय नहीं कर पाते हैं।

यदि अध्ययन के अनुमान सटीक हैं तो यह दर्शाता है कि विषाणुओं का जूनोटिक स्पिलओवर अभी भी वैज्ञानिक समाज के लिए काफी हद तक रहस्य बना हुआ है। पशुजन्य रोग एक ऐसी घटना है जहां पर एक रोगजनक (किसी भी संक्रामक घटक जैसे कि बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी इत्यादि) जानवरों से मनुष्यों में प्रविष्ठ कर जाता है।

अध्ययन की संख्या पर टिप्पणी करते हुए जो कि निश्चित तौर पर हमारी ओर से कोई चेतावनी नहीं है, कनाडा के सस्काचेवान विश्वविद्यालय की एक विषाणु-विज्ञानी एंजेला रासमुसेन जो कि इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थीं, उनका कहना था: “यह समूचे वैज्ञानिक समाज के लिए आंखें खोल देने वाला विषय है कि हम जूनोटिक स्पिलओवर की फ्रीक्वेंसी के बारे में बहुत अधिक नहीं जानते हैं। इसमें बदलाव की जरूरत है अन्यथा हम इसकी विकरालता को काफी कम हद तक आंक पाने में समर्थ रहेंगे।”

इस अध्ययन को संयुक्त रूप से इकोहेल्थ एलायन्स, अमेरिका और ड्यूक-एनयूएस मेडिकल स्कूल, सिंगापुर द्वारा किया गया था। इस अध्ययन के लेखकों ने उन स्थानों का विस्तृत खाका तैयार किया है जहां पर 23 प्रकार की चमगादड़ों की प्रजातियों में सार्स-जैसे कोरोनावायरसों के निहित होने के लिए जाना जाता है। इसमें चमगादड़ों के ठौर-ठिकानों के मानचित्र की तुलना मानव आवासों से की गई है ताकि कोरोनावायरस की मध्यस्थता करने वाले संक्रमणों के संभावित हॉटस्पॉट्स का पता लगाया जा सके। विश्लेषण से पता चला है कि जहां पर चमगादड़ से उत्पन्न होने वाले कोरोनावायरस इंसानों में प्रविष्ठ कर सकते हैं वहां पर 50 करोड़ से अधिक की संख्या में लोग निवास करते हैं। इन स्थानों में उत्तरी भारत, नेपाल, म्यांमार के साथ-साथ अधिकांश दक्षिण एशिया का क्षेत्र आता है। उन्होंने यह भी पाया है कि कोरोनावायरस के स्पिलओवर की घटनाओं से संक्रमण का सबसे अधिक खतरा दक्षिणी चीन, विएतनाम, कंबोडिया, जावा और इंडोनेशिया के कुछ द्वीपों में था।

शोधकर्ता हॉटस्पॉट्स मानचित्र बनाने के मामले में भी आगे बढ़े। कोविड-19 के उभार से पूर्व किये गये कुछ छोटे सर्वेक्षणों में इस बात का खुलासा हुआ था कि कुछ लोगों के शरीर में, विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया में सार्स से संबंधित कोरोनावायरसों से लड़ने के लिए आवश्यक एंटीबाडीज मौजूद थी। एंटीबाडीज एक प्रकार के प्रोटीन अणु होते हैं और ये तब उत्पन्न होते हैं जब एक रोगजनक किसी व्यक्ति को संक्रमित करता है। ये प्रोटीन अणु रोगजनकों से मुकाबला करने में मदद पहुंचाते हैं और उनमें से कुछ तो लंबे समय तक शरीर में सक्रिय बने रहते हैं। अगली दफा जब उसी प्रकार के रोगजनक शरीर पर हमला करते हैं तो शरीर में मौजूद एंटीबाडीज उनका आसानी से मुकाबला करने में सक्षम साबित होते हैं।

अध्ययन के लेखकों ने कोविड-पूर्व दौर के एंटीबाडी आंकड़ों को इन आंकड़ों के साथ जोड़ा जो यह दर्शाते हैं कि लोगों ने कितनी बार चमगादड़ों से आमना-सामना किया है, और कितनी देर तक एंटीबाडीज रक्त में सक्रिय बने रहते हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस क्षेत्र में हर साल वायरस की वजह से मनुष्यों में होने वाले करीब 4,00,000 संक्रमणों का पता नहीं चल पाता है।

अध्ययन के सह-लेखक और इकोहेल्थ एलायन्स के पीटर डास्जक का इस बारे में कहना था: “यह एक फैसलाकुन विश्लेषण है कि इस ग्रह पर अगले सार्स या कोविड-जैसे वायरस की उभरने की सबसे अधिक संभवना कहां पर है। उच्च-जोखिम में रहने वाले समुदायों में होने वाले व्यहारगत बदलावों और निगरानी प्रणाली को लक्षित करके शुरू में ही प्रकोपों का पता लगाने के लिए ये मानचित्र हमें स्पिलओवर की संभावनाओं को कम करने के प्रयासों में मार्गदर्शन करने के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

डास्ज़क चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलोजी प्रयोगशाला के वित्तपोषण में शामिल थे, यहां पर यह बताना उल्लेखनीय होगा कि यहां से सार्स-सीओवी-2 वायरस के निकल कर इंसानों को संक्रमित करने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, डास्जक ऐसी अटकलबाजियों के खिलाफ हमेशा मुखर रहे हैं और उन्होंने सार्स-सीओवी-2 के वुहान प्रयोगशाला से आने के बजाय जंगली जानवरों से आने की बात की है। डास्ज़क ने यह भी कहा है कि उनकी टीम के नवीनतम निष्कर्ष सार्स-सीओवी-2 की प्राकृतिक उत्पत्ति का पता लगाने के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकते हैं।

डास्ज़क का आगे कहना था: “लोगों की सोच के विपरीत चमगादड़ों के साथ इंसानों की मुलाक़ात होना काफी आम बात है। उन जगहों पर रहने का अर्थ ही है कि आप उनसे पूरी तरह से संपर्क में आते हैं। लोग गुफाओं में शरण लेते हैं, वे गुफाओं से गुआनो निकाल रहे हैं। वे चमगादड़ों का शिकार कर रहे हैं और खा रहे हैं। शोध इस बात को भी नहीं बताता है कि कुल कितने लोग वन्यजीवन के व्यापार से जुड़े हुए हैं और हो सकता है कि वे अप्रत्यक्ष तौर पर चमगादड़ वायरस से संक्रमित हो गये हों, जब चमगादड़ के वायरस द्वारा पहले से दूसरे जानवर को संक्रमित कर रखा हो।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का इस बारे में कहना है कि 4,00,000 इतनी बड़ी संख्या है कि इसकी पुष्टि कर पाना काफी मुश्किल काम है। उनका तर्क है कि मनुष्यों के लिए कोरोनावायरस के स्पिलोवर की वास्तविक तस्वीर को समझने के लिए विस्तृत जांच का होना निहायत आवश्यक है।

टोरंटो विश्वविद्यालय के एक महामारी विज्ञानी डेविड फिस्मैन ने कहा है: “मैं समझता हूं कि यदि सीरोप्रिवेलैंस का मार्ग बंद हो जाता है तो सभी बातें धराशायी हो जाती हैं। भारी संख्या में छिपे हुए संक्रमणों की बात सच नहीं लगती क्योंकि ऐसे में आप इसमें नियमित रूप से स्पिलओवर को मान्यता देने की अपेक्षा करेंगे, क्योंकि ऐसा रेबीज और निपाह वायरस के लिए भी होना चाहिए।

वहीँ दूसरी तरफ, कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि छिपे हुए संक्रमण उस स्थिति में एक वास्तविकता हो सकते हैं जहां पर उनका जीवन अल्पकालिक होता है और वे किसी भी महत्वपूर्ण प्रकोप को जन्म देने में कारगर नहीं हो पाते। इसके अलावा कई वायरस ऐसे भी हो सकते हैं जो मानव शरीर में जीवित बने रहने के लिए सही तरीके से अनुकूलित नहीं होते और इसलिए वे आगे के संचरण को बढ़ावा दे पाने में असमर्थ रहते हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

SARS-like Viruses in Animals Infect 4,00,00 Humans Every Year: Study

SARS-CoV-2
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Virus spillover from animals to humans
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