NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
सागर विश्वविद्यालय: राष्ट्रवाद की बलि चढ़ा एक और अकादमिक परिसर
हमारा एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में महज़ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की आपत्ति की वजह से शामिल नहीं हो पाया!
सत्यम श्रीवास्तव
01 Aug 2021
सागर विश्वविद्यालय

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर ने मानवशास्त्र (एंथ्रोपलोजी) विभाग और संयुक्त राज्य अमेरिका के मोंट्लेयर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हो रहे एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार से अपने कदम पीछे खींच लिए। 30 और 31 जुलाई को आयोजित हो रहे इस वेबिनार को शुरू होने से मात्र दो घंटे पहले सागर विश्वविद्यालय द्वारा रद्द किया गया। यानी विश्वविद्यालय इसमें शामिल नहीं हुआ। सागर विश्वविद्यालय के इस कदम ने दुनिया को यह बता दिया है कि यहाँ के बौद्धिक परिसर कितने असहाय हैं। और यह भी कि हिंदुस्तान के बौद्धिक परिसर न तो स्वायत्त ही हैं और न ही स्वतंत्र।

पूरे घटनाक्रम को समझें तो इस वेबिनार पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सागर जिला इकाई ने आपत्ति जताई और जिले के पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत में यह बताया कि इस वेबिनार में जो वक्ता शिरकत कर रहे हैं वो ‘देश विरोधी’ किस्म के हैं।

इन वक्ताओं में देश के मुखर वैज्ञानिक गौहर रज़ा और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद के नाम पर उन्हें सबसे ज़्यादा आपत्ति थी क्योंकि ये दो लोग हमेशा से समाज में सत्ता के संरक्षण में बढ़ रही सांप्रदायिकता के मुखर विरोधी रहे हैं और खुलकर अपनी आवाज़ उठाते हैं।

पुलिस अधीक्षक ने इसके बाद जो कार्यवाही की वह मध्य प्रदेश जैसे राज्य के लिए नयी नहीं है। ऐसी कार्यवाहियाँ कई दफा दोहराई गईं हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के आयोजन को रद्द करना पड़ा था क्योंकि इस आयोजन में जिन नाटकों का मंचन होना था वह शहर के बजरंग दल व अन्य दक्षिण पंथी संगठनों को रास नहीं आ रहे थे। इस मामले में उन संगठनों ने भी छतरपुर जिले के पुलिस अधीक्षक को इस बाबत शिकायत सह चेतवानी पत्र लिखा था।

सागर विश्वविद्यालय का मामला इस मामले में थोड़ा विशिष्ट है क्योंकि यह स्वयं में एक स्वायत्त संस्था है और केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त होने के नाते विशेष शक्तियों से संपन्न भी है। इसलिए इस बार पुलिस अधीक्षक ने छतरपुर की तरह आयोजकों को तलब तो नहीं किया लेकिन एक चिट्ठी विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखी जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जिला इकाई की आपत्तियों के बारे में बताया और कहा कि- देख लीजिये। अगर यह प्रस्तावित वेबिनार हुआ तो माहौल बिगड़ सकता है।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पत्र को बहुत गंभीरता से लिया। इतना गंभीरता से लिया कि यह पूछना उचित नहीं समझा कि अगर आपको माहौल बिगड़ने की आशंका है तो इसके लिए आपको तत्पर रहना है। आपको यह गारंटी देना है कि किसी भी प्रकार से अकादमिक आयोजन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होंने देंगे। माहौल न बिगड़ने देने के लिए पुलिस प्रशासन अब तक जिम्मेदार होती आयी है लेकिन इस नए निज़ाम में एक स्वायत्त बौद्धिक और अकादमिक परिसर कहे जाने वाले विश्वविद्यालय और उसके प्रशासन ने यह पूछने का साहस छद्म राष्ट्रवाद और उसके संगठनों के समक्ष रेहन पर रख दिया है।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस अधीक्षक के पत्र पर त्वरित संज्ञान लेते हुए एंथ्रोपोलोजी विभाग के विभागाध्यक्ष को आदेशित किया कि इस वेबिनार के लिए भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय से अनुमति मांगो। अगर अनुमति नहीं मिलती है तो इस आयोजन को रद्द करना होगा।

एंथ्रोपोलोजी विभाग के विभागाध्यक्ष ने 29 जुलाई को तत्काल एक पत्र भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय को लिखा और पूर्व-निर्धारित इस कार्यक्रम के लिए अनुमति मांगी। जैसा कि तय था कि जवाब नहीं मिलने पर यह आयोजन स्वत: रद्द माना जाएगा। ठीक वैसा ही हुआ। शिक्षा मंत्रालय की तरफ से कोई जवाब नहीं आया और अंतत: 30 जुलाई को वेबिनार के शुरू होने से ठीक दो घंटे पहले सागर विश्वविद्यालय ने इस आयोजन को अपनी तरफ से रद्द कर दिया। 

और इस तरह एक दक्षिण पंथी विद्यार्थी संगठन यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की आपत्ति पर पुलिस अधीक्षक के हस्तक्षेप और विश्वविद्यालय प्रशासन की त्वरित कार्यवाही से देश की संस्कृति और भाषायी मामलों में आने वाली उन बाधाओं पर जिनकी वजह से यह विमर्श वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राप्त नहीं कर पाता जैसे मौंजूं पर हुए इस अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में विश्वविद्यालय शामिल होते होते बच गया। हालांकि सागर विश्वविद्यालय के बगैर भी यह वेबिनार हुआ और इस वेबिनार में जिन कारणों का उल्लेख किया जाना था उनकी व्यावहारिक प्रस्तुति पूरी दुनिया ने देख ली।

संभव है कि आने वाले समय में एंथरोपलोजी विभाग के विभागाध्यक्ष पर दंड की कार्यवाही, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जिला इकाई के नेता का भारतीय जनता पार्टी में किसी ऊंचे ओहदे पर पहुंचना और पुलिस अधीक्षक को कोई ईनाम आदि की खबरें सुनाईं दें।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी बताया कि जिस काम को अंजाम देने के लिए कट्टरता और कठमुल्लापन के पर्याय बन चुकी तालिबानी विचारधारा को मानने वालों को अफगान और अपने प्रभाव के अन्य क्षेत्रों में कम से कम दो चार हत्याएं या दस- बीस राउंड की फायरिंग करने की ज़रूरत पड़ती ठीक वही काम हमारे प्यारे हिंदुस्तान में लोकतान्त्रिक संस्थाओं द्वारा महज़ एक संगठन की शिकायत पर अहिंसक तरीके से किया जा सकता है।

सागर विश्वविद्यालय का एक गौरवशाली इतिहास और परंपरा रही है। यहाँ बौद्धिक और अकादमिक कार्यों के लिए वह खुलापन और नैतिक साहस रहा है जिसकी वजह से पूरे देश में इसकी एक पहचान रही है। इस विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने के लिए स्थानीय छात्रों और समाज ने संघर्ष किया है। अब सवाल है कि क्या इस विश्वविद्यालय को केंद्रीय होने का दर्जा मिलने के बाद क्या हासिल हुआ?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटनाक्रम से क्या संदेश गया? तब जबकि यह अमेरिका के एक विश्वविद्यालय के साथ संयुक्त तत्वाधान में आयोजित हो रहा था? हाल ही में अमेरिका के विदेश मंत्री जो भारत के दौर पर आए थे, उनसे अमेरिका के पत्रकारों ने भारत के संदर्भ में विशेष रूप से यह कहने के लिए कहा था कि यहाँ नागरिक स्वतंत्रता को लेकर बरती जा रही संकीर्णताओं पर सरकार से बात करें।

इस पूरे मामले में प्रो. अपूर्वानंद और गौहर रज़ा के नामों को देखकर जिस तरह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रतिक्रिया दी वह अपेक्षित थी लेकिन एक पुलिस अधीक्षक द्वारा जिस तरह से इस मामले में अपनी प्रतिबद्धता इस संगठन के साथ दिखलाई और जिस अंदाज़ में विश्वविद्यालय प्रशासन को दबाव में लाया गया, वह इस मौजूदा आपातकाल की एक बानगी है। मध्य प्रदेश में जिस गति से तमाम लोकतान्त्रिक संस्थाओं का निर्बाध सांप्रदायीकरण हो रहा है वह न केवल चिंता का सबब है बल्कि आने वाले किसी गंभीर संकट की चेतावनी भी है।  

(लेखक क़रीब डेढ़ दशक से सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हैं। समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Sagar University
All India Student Council
Dr. Harisingh Gour University

Related Stories

झारखंड : अबकी बार कुलपति ‘आतंकवादी’ करार!, नागरिक समाज में रोष 


बाकी खबरें

  • संदीपन तालुकदार
    अर्जेंटीना: बिना इलाज के ठीक हुई एचआईवी पॉज़िटिव महिला
    24 Nov 2021
    शोध से पता चला है कि ऐसे कई मरीज़ हो सकते हैं, जो प्राकृतिक ढंग से इस वायरस से लड़ सकते हैं।
  • water body
    नीलाबंरन ए
    रामेश्वरम द्वीप पर जल-मृदा प्रदूषण की वजह झींगा के फार्म
    24 Nov 2021
    तमिलनाडु में भूजल, मिट्टी की उर्वरता और द्वीप का समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से बढ़ रहे झींगें के फार्मों से बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
  • ctu
    रौनक छाबड़ा
    दिल्ली में 25 नवंबर को श्रमिकों की हड़ताल, ट्रेड यूनियनों ने कहा - 6 लाख से अधिक श्रमिक होंगे हड़ताल में शामिल
    24 Nov 2021
    ट्रेड यूनियनों की प्रमुख मांगों में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन के रूप में 26,000 रुपये के साथ-साथ असंगठित मज़दूरों को 7,500 रुपये की मासिक नगद सहायता शामिल है।
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 9,283 नए मामले, 437 मरीज़ों की मौत
    24 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.32 फ़ीसदी यानी 1 लाख 11 हज़ार 481 हो गयी है।
  • military
    एन.डी.जयप्रकाश
    सैन्य-औद्योगिक जुगलबंदी ने किस तरह शांति और निरस्त्रीकरण को दरकिनार कर दिया: IV
    24 Nov 2021
    साल 1961 निशस्त्रीकरण की दिशा में ठोस प्रगति की चमकती उम्मीदों के साथ ख़त्म हुआ था, लेकिन साठ साल बाद भी इस उम्मीद को मौजूदा समय में भी बुरी तरह झटके लग रहे हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License