NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
व्यंग्य
भारत
राजनीति
मुस्कुराहट वाला नफ़रती बोल, नफ़रती नहीं होता
कटाक्ष: जरा सोचिए, नये इंडिया को ऐेसे किसी भी कदम की कितनी ज़रूरत थी, जो देश में खुशी बढ़ाए, देश के खुशी सूचकांक को ऊपर उठाए। जब से विश्व खुशी सूचकांक में भारत खिसक कर 136वें नंबर पर पहुंचा है।
राजेंद्र शर्मा
28 Mar 2022
cartoon
कार्टून सतीश आचार्य के ट्विटर हैंडल से साभार 

मोदी जी के विरोधी बार-बार उनके  सामने हार जाते हैं--पता है क्यों? उनके विरोध में सकारात्मकता नहीं है। उनके पास तेल के दाम से लेकर ईवीएम के खेल तक, शिकायतें तो खूब हैं, पर किसी नये इंडिया का विजन ही नहीं है। विजन होता तो मोदी जी के विरोधी कम से कम एक आला अदालत के इस निहायत शालीन फैसले पर इतना शोर नहीं मचा रहे होते कि अगर मुस्कुराते हुए बोला जाए, तो किसी को नफरती बोल लगे भी तो उसे नफरती नहीं कहते! बेशक, हाई कोर्ट ने यह नहीं कहा कि मुस्कुराते हुए जो भी बोला जाए, उसे मोहब्बती बोल मानना कम्पल्सरी है।

आखिर, देश में डैमोक्रेसी है और सब को जैसे अपने मन के बोल बोलने का हक है, वैसे ही हरेक को यह मानने का हक है कि किसी बोल को मोहब्बती बोल माने या नहीं माने। बस, मुस्कुराहट वाले बोल को नफरती बोल मानने, कहने, बताने का, किसी को हक नहीं है। और ऐसे बोल को नफरती बनाकर किसी पर एफआईआर वगैरह कराने का तो किसी को दूर-दूर तक कोई हक नहीं है।

मुस्कुराते हुए जो भी बोला जाए, उसे सिर्फ बोल कहेंगे और सिर्फ बोलना तो कोई जुर्म नहीं हो सकता बल्कि वह तो भारत के हरेक नागरिक का मौलिक अधिकार है।

अगर विपक्ष वालों के पास विजन होता तब ना वे यह समझ पाते कि दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला कितना दूरंदेशी भरा है। यह सिर्फ किसी कपिल मिश्रा या अनुराग ठाकुर के छोड़ दिए जाने भर का फैसला नहीं है। ऐसे तो हर रोज सैकड़ों लोग आरोपों से छूट जाते हैं और अगर भगवा गमछे वाले हों और आरोप नफरती बोली से लेकर मर्डर से छोटी किसी करनी तक का हो, तब तो वे तो ज्यादातर छूट ही जाते हैं। पर यह तो कुछ और ही रास्ता दिखाने वाला फैसला है।

काश मोदी जी के विरोधी भी इस फैसले का वह पक्ष देख पाते, जो नागपुर की पढ़ाई का क-ख भी पढ़ा हुआ झट से देख लेगा। यह फैसला नफरत के साथ चाहे कुछ भी करे, पर देश में खुशी को जबर्दस्त बढ़ावा देने वाला फैसला है।

जरा सोचिए, नये इंडिया को ऐेसे किसी भी कदम की कितनी जरूरत थी, जो देश में खुशी बढ़ाए, देश के खुशी सूचकांक को ऊपर उठाए। जब से विश्व खुशी सूचकांक में भारत खिसक कर 136वें नंबर पर पहुंचा है और उससे भी बुरा यह कि पाकिस्तान तक हमसे आगे निकल गया है, तभी से मोदी जी रातों को जाग-जागकर इसके उपाय खोजने में जुटे हुए थे कि भारत का खुशी सूचकांक कैसे बढ़ाया जाए। सुना है कि इसी चक्कर में मोदी ने देश के लिए काम करने के अपने घंटे बाईस से भी बढ़ा दिए थे और बिना सोए लगातार काम करते रहने के अपने एक्सपेरीमेंट को और तेज कर दिया था। आखिर, मोदी जी की मेहनत रंग लायी और जज साहब को देश में खुशी बढ़ाने का रास्ता सूझा।

जरा सोचिए, नये इंडिया में नफरती बोल की शिकायतों का कितनी तेज रफ्तार से विकास हो रहा है। और अभी तो पार्टी शुरू हुई है। आगे-आगे देखिए, कितने फर्राटे से विकास होता है। और यह तो मोदी जी के विरोधी तक मानेंगे कि अदालत ने, नफरती बोल की शिकायतों के और भी फर्राटा भरने का रास्ता खोल दिया है। पर अदालत ने इस फर्राटे के साथ देश के खुशी सूचकांक की साइड कार को भी जोड़ दिया है। अब जो भी नफरती बोल बोलेगा, मुस्कुराते हुए बोलेगा। जितनी नफरती बोल की शिकायतें बढ़ेंगी, उतनी ही देश में मुस्कुराहटें बिखरेंगी। सोचने की बात है कि जब चारों ओर मुस्कुराहटें बिखरेंगी, तो क्या हमारे देश का खुशी सूचकांक नहीं बढ़ेगा? जरूर बढ़ेगा। वह दिन ज्यादा दूर नहीं, जब खुशी सूचकांक पर कम से कम पाकिस्तान को तो हम पछाड़ ही देंगे। हो सकता है कि इसके साथ ही हम नफरती बोल की शिकायतों में भी पाकिस्तान को पछाड़ दें। यानी एक के साथ एक और मैदान में पाकिस्तान को पछाडऩा फ्री! हां! नफरती बोल के मैदान में पाकिस्तान को पछाडऩे में किसी को अगर ज्यादा ही शर्म आए तो तकनीकी आधार पर हम इस मैदान में पाकिस्तान के लिए वाकओवर भी डिक्लेअर कर सकते हैं।

आखिरकार, हमारी आला अदालत का फैसला है कि मुस्कराहट वाला नफरती बोल, नफरती नहीं होता है! जब हमारे नफरती बोल नफरती ही नहीं रहे, तो नफरती बोल के कम्पटीशन में हम पाकिस्तान को या किसी को भी कैसे हरा सकते हैं! मोदी जी के नेतृत्व में और हाई कोर्ट के कृतित्व से, ईज ऑफ बीइंग खुश में भारत को लंबी छलांगें लगाकर ऊपर चढ़ने से अब कोई नहीं रोक सकता है। देसी विपक्ष भी नहीं।

और हां! अदालत के फैसले में एक और बात बहुत ही मार्के की है। अदालत ने कहा है कि जिन भगवाइयों पर नफरती बोल बोलने का इल्जाम था, उन्होंने जो भी बोला था, मुस्कुराहट के साथ तो बोला ही था, जो भी बोला था, चुनाव के सिलसिले में बोला था। एक तो मुस्कुराहट और ऊपर से चुनाव, यह तो खैर सोने में सुहागा ही हो गया!

यह ध्यान रखना जरूरी है कि जो भी बोला गया, चुनाव जीतने की मंशा से बोला गया। नफरती बोल बोलने की मंशा से नहीं। बोला कुछ भी गया हो असली चीज तो मंशा है। चुनाव के लिए लोग क्या-क्या बोलते हैं? क्या-क्या वादे करते हैं? कोई रोक-टोक नहीं है, सब को बोलने का पूरा अधिकार है। उस सब को सीरियसली नहीं नहीं लिया जा सकता है। नहीं लिया जाना चाहिए। चुनाव के बाद सब भूल जाते हैं। यही जनतंत्र है।

चुनाव के समय मुस्कुराते हुए कोई कुछ कहे, तब तो उसे कन्फर्म्ड मोहब्बत के बोल ही मानना चाहिए। कम से कम चुनाव के टैम के बोलों में नफरत खोजना डैमोक्रेसी की भावना के खिलाफ है। 2022 में यूपी में संदेश मिल गया है, 2024 में भारत की जनता ऐसे नफरत खोजकर दुनिया में देश की छवि खराब करने वालों को हर्गिज माफ नहीं करेगी!

और ये ‘‘गोली मारो सालों को’’ का इतना शोर मचाने का क्या मतलब है? जब किसी ने किसी को गोली मारी ही नहीं है, तो फिर कही-सुनी बातों का इतना बतंगड़ बनाने की क्या जरूरत है? वैसे भी सालों को गोली मारो के तो कितने ही अर्थ हो सकते हैं। जैसे मुहावरा, जिसका अर्थ होता है--भाड़ में जाने दो। या अपने सालों से नाराजगी का इजहार। ये सब तो प्यार में ही ज्यादा होता है, इसे नफरत से किस आधार पर जोड़ा जा रहा है। वैसे भी नफरत से ही सही, पर है तो यह भगवाइयों के प्यार का ही मामला।

(इस व्यंग्य आलेख के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक हैं।)

sarcasm
Satire
Political satire
UN International Day of Happiness
Indian Rank in Happiness Index
Narendra modi
Modi government

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

तिरछी नज़र: 2047 की बात है

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कटाक्ष: एक निशान, अलग-अलग विधान, फिर भी नया इंडिया महान!

तिरछी नज़र: हम सहनशील तो हैं, पर इतने भी नहीं


बाकी खबरें

  • Kashmir press club
    राज कुमार
    जम्मू-कश्मीर में मीडिया का गला घोंट रही सरकार : प्रेस काउंसिल
    15 Mar 2022
    ग़ौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने सितंबर 2021 में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को एक पत्र लिखा था और मांग की थी कि काउंसिल एक फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम भेजकर जम्मू-कश्मीर में…
  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: हेमंत सरकार ने आदिवासी समूहों की मानी मांग, केंद्र के ‘ड्रोन सर्वे’ कार्यक्रम पर लगाईं रोक
    15 Mar 2022
    ‘ड्रोन सर्वे’ और ‘ज़मीन की डिजिटल मैपिंग’ कार्यक्रम के खिलाफ आवाज़ उठा रहे सभी आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है।
  • अजय कुमार
    रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
    15 Mar 2022
    आर्थिक जानकारों का कहना है कि सरकार चाहे तो कच्चे तेल की वजह से बढ़े हुए ख़र्च का भार ख़ुद सहन कर सकती है।
  • रौनक छाबड़ा
    ईपीएफओ ब्याज दर 4-दशक के सबसे निचले स्तर पर, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आम हड़ताल से पहले खोला मोर्चा 
    15 Mar 2022
    ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने शनिवार को वित्त वर्ष 2021-22 के लिए अपनी मौजूदा ब्याज दर को 8.5% से घटाकर 8.1% करने की सिफारिश की है। 
  • सतीश भारतीय
    हरियाणा के बजट पर लोगों की प्रतिक्रिया 
    15 Mar 2022
    सरकार बजट को आंकड़ों की लफ़्फ़ाज़ी के साथ पेश तो कर देती है। मगर अधिकतर पढ़े लिखे और आम लोग बजट के बारे में ढंग से जानते नहीं है। क्योंकि उन्हें लगता है कि बजट का उन्हें सीधे तौर पर कोई वाजिब लाभ नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License