NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
व्यंग्य
भारत
राजनीति
बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!
छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है।
राजेंद्र शर्मा
26 Feb 2022
Gujarat
गुजरात में कुछ ‘भक्तों’ ने गोबर से कोविड का इलाज करने की कोशिश की। फाइल फोटो। साभार: एनडीटीवी

आवश्यकता, आविष्कार की जननी है, बचपन से सुनते-पढ़ते आए थे। स्कूल में निबंध भी लिखा था। पर छोटी बुद्धि, हमेशा ज्यादा जोर इसी पर रहा कि आवश्यकता नहीं हो, तो आविष्कार भी पैदा नहीं होगा। कभी बड़ा सोचा होता, तो कम से कम दिल से इसके लिए तैयार होते कि आवश्यकता, ऐसे-ऐसे आविष्कार भी पैदा कर सकती है! बस आवश्यकता बड़ी यानी जीवन-मरण टाइप की होनी चाहिए। जैसे मोदी जी की योगी जी को दोबारा यूपी की गद्दी पर बैठाने की आवश्यकता। शाह जी ने पहले ही बता दिया था, 2022 में योगी जी दोबारा लखनऊ की गद्दी पर चढ़ेंगे, तब 2024 में मोदी जी, उनकी गद्दी के हत्थे पर पांव रखकर, तिबारा दिल्ली की गद्दी पर सवारी करेंगे। बस क्या था, मोदी जी ने गोबर से सोना निकालने का फार्मूला निकालकर यूपी की पब्लिक के सामने धर दिया। पब्लिक तो खैर डबल-डबल खुश। रात-रात भर जागकर, छुट्टा मवेशियों से खेत बचाने की परेशानी खत्म और ऊपर से गोबर से सोना बनाने का अवसर भी। गो-माता, सांड-पिता, बछड़ा-बछड़ी भाई-बहन, भैंस-भैंसा, मौसा-मौसी आदि तो खैर परम प्रसन्न, पक्की पेंशन बंधने की उम्मीद में। सम्पूर्ण गोमाता परिवार खुश तो संघ परिवार भी खुश। और हां! नौजवान भी बहुतै खुश। बेकारी के दिन बीते से भैया, गोबर उद्योग आयो रे, मोदी जी पकौड़े के बाद नया रोजगार लायो रे!

हमें पता है कि जब कोई बड़ा आविष्कार होता है, तो उसके लिए श्रेय का दावा करने वालों की लाइनें लग जाती हैं। मोदी जी ने गोबर से सोना निकालने का फार्मूला दिया नहीं कि इधर-उधर से इसकी आवाजें आनी शुरू हो गयी हैं कि पहले हमने कहा था, पहले हमने कहा था। इसीलिए, तो आविष्कार करने वाले अक्सर तब तक अपना फार्मूला छुपा के रखते हैं, जब तक उस पर पेटेंट की मोहर नहीं लग जाती है। पर मोदी जी को किसी पेटेंट-वेटेंट की मोहर की क्या जरूरत? उनके सामने फेंकने की किस में हिम्मत है। शिवराज बाबू में भी नहीं, हालांकि वह गो-मंत्रिमंडल से लेकर, गोबर-गोमूत्र इंडस्ट्री तक, सब के रास्ते पर पहले ही कदम बढ़ा चुके थे। पर शिवराज बाबू का मामला तो मोदी जी के घर का ही मामला हुआ। हाथी के पांव में सब का पांव। इसके अलावा इतना तो शिवराज बाबू भी मानेंगे कि कहां देश और कहां फकत मध्य प्रदेश। फिर गोबर-गोमूत्र इंडस्ट्री में वो बात कहां, जो गोबर से सोना निकालने/ बनाने के आइडिया में है। कहां ज्यादा से ज्यादा प्रदेश स्तर का लोकल आइडिया और कहां विश्व गुरु स्तर का प्लान।

कहते हैं कि आविष्कार जितना बड़ा होता है, कहने-सुनने में उतना ही सरल लगता है। ‘गोबर से सोना’ के फार्मूले के बारे में यह पूरी तरह से सच है। पर है यह इतना बड़ा आविष्कार कि सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को ही उलट-पुलट कर सकता है और हमें विश्व गुरु तो विश्व गुरु, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बना सकता है। जरा सोचिए! हमारे यहां कितना गोबर-धन है। धन भी ऐसा-वैसा नहीं, एकदम प्राकृतिक। और प्राकृतिक होते हुए भी, दूसरी प्राकृतिक संपदाओं की तरह सीमित नहीं कि एक दिन खत्म हो जाने वाला हो। प्राकृतिक और फिर भी निरंतर सम्वर्द्धनशील। बस अक्षय ऊर्जा की तरह, अक्षय स्वर्ण वर्षा ही समझ लीजिए। देश की समृद्धि भी और जलवायु में सुधार भी। और सब कुछ निजी क्षेत्र में यानी उद्यमशीलता के लिए फलने-फूलने के लिए खुला मैदान। और इस सब की ब्यूटी यह कि यह सब हमारी परंपराओं और संस्कारों के अनुसार होगा। आखिर, गोबर-प्रेम हमारा संस्कार है। हम तो अनंतकाल से गोबर-धन की पूजा करते आए हैं।

और भैया रोजगार तो इतने कि पूछो ही मत। गाय-भैंस पालन से लेकर छुट्टा मवेशियों को गोद लेने तक में भारी रोजगार। गोबर संग्रह, भंडारण में रोजगार। उत्पादन की मशीनरी के निर्माण समेत गोबर उत्पाद निर्माण में रोजगार। घरेलू बाजार से लेकर विश्व बाजार तक में मार्केटिंग में डटकर व्यापार भी और जाहिर है कि रोजगार भी। इस सब के ऊपर से आत्मनिर्भरता भी। खाली-पीली आत्मनिर्भरता ही नहीं, बाकी सारी दुनिया के लिए भारत में उपले बनाने वाली, बाकी दुनिया को अपने ऊपर निर्भर बनाने वाली आत्मनिर्भरता। इससे भारत की आर्थिक ताकत कैसे दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ेगी, इसका अभी तो बस अनुमान ही लगाया जा सकता है। पांच ट्रिलियन डॉलर के मोदी जी के दावे की हंसी उड़ाने वाले कहां हैं? जब गोबर की कमाई का अंधड़ आएगा, पांच-दस ट्रिलियन का लक्ष्य तो कहीं नजर भी नहीं आएगा।

और सारी दुनिया के गोबर उत्पादों की सप्लाई के लिए भारत पर निर्भर हो जाने के रणनीतिक एडवांटेज को भी हम कैसे भूल सकते हैं। हमारा गोबर अगले जमाने का तेल होगा। गोबर उत्पादों की आपूर्ति घटाने-बढ़ाने के जरा से इशारे से, दुष्ट से दुष्ट देशों को भी हम ठीक रास्ते पर ला सकेंगे। पाकिस्तान, चीन, सब खुद ब खुद लाइन पर आ जाएंगे, बस हमारे जरा सी गोबर उत्पाद आपूर्ति टाइट करने की जरूरत होगी। इधर हमने आपूर्ति टाइट की, उधर दुष्ट सरकारों की अपनी जनता ने हालत टाइट की। उपलों की कमी से नाराज लोग सडक़ों पर उतर आएंगे। दंगे भडक़ उठेंगे दंगे। सरकारें पलट जाएंगी। आखिर, उपले को छोडक़र बाकी सारे ईंधन या तो खत्म हो चुके होंगे या जलवायु बचाने के लिए प्रतिबंधित कर दिए जाएंगे। जैसे कभी तेल को काला सोना कहा जाता था, अपना सीधा सा गोबर ही आगे हरा सोना कहलाएगा।

अब अगर हम इस अवसर से करते हैं प्यार, तो आपदा से कैसे करेंगे इंकार। आखिरकार, आपदा में से ही तो अवसर निकलते हैं। यूपी की पब्लिक ने अगर चुनाव में योगी जी के रास्ते, खुद मोदी जी की भी गद्दी के लिए आपदा पैदा नहीं कर दी होती, तो क्या मोदी ने गोबर से सोना निकालने के अवसर की खोज की होती। आपदा में अवसर खोजना ही तो मोदी युग का विकास धर्म है। देखा नहीं कैसे इस धर्म का पालन करते हुए, यूक्रेन से संकट से बचकर भागते छात्रों से विमानन कंपनियों ने दो गुने, तीन गुने किराए वसूल किए हैं। विमानन कंपनियां तो आपदा में अवसर तलाशने का अपना धर्म नहीं छोड़ेंगी, हां सरकार चाहे तो वह जरूर पब्लिक को आत्मनिर्भर छोड़ देने के अपने धर्म के पालन में कुछ रू-रियायत कर सकती है और एअर इंडिया को बेचने के बाद, अब सरकारी खजाने से निजी एअरइंडिया के मुंहमांगे किराए भर सकती है।

और हां! छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है। वैसे भी इंसानों की स्वतंत्रता से प्यार और सांडों की छुट्टा घूमने की आजादी से इंकार, यह तो न्याय नहीं ना हुआ जी।

(इस व्यंग्य आलेख के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक हैं।)

sarcasm
Satire
Political satire
Narendra modi
Gujarat

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

तिरछी नज़र: 2047 की बात है

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कटाक्ष: एक निशान, अलग-अलग विधान, फिर भी नया इंडिया महान!

तिरछी नज़र: हम सहनशील तो हैं, पर इतने भी नहीं


बाकी खबरें

  • coal energy
    नीलाबंरन ए
    नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली ख़रीद पर निर्भर तमिलनाडु ने कोयले की कमी का किया मुक़ाबला 
    22 Oct 2021
    तमिलनाडु राज्य की थर्मल पावर स्टेशनों पर निर्भरता कम है, लेकिन निजी विक्रेताओं से महंगी बिजली ख़रीदने के कारण टैंजेडको 1.07 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ में धस गई है।
  • Ashfaqulla Khan
    हर्षवर्धन
    विशेष: अशफ़ाक़उल्ला को याद करना उनके विचारों को भी याद करना है
    22 Oct 2021
    आज शहीद क्रांतिकारी अशफ़ाक़ का 121 जन्मदिन है। आइये, इस मौके पर हम उनकी वैचारिकी की थोड़ी चर्चा करते हैं। 
  • Adam Gondvi
    न्यूज़क्लिक टीम
    अदम गोंडवी : “धरती की सतह पर” खड़े होकर “समय से मुठभेड़” करने वाला शायर
    22 Oct 2021
    जनता के शायर अदम गोंडवी (22 अक्टूबर, 1947-18 दिसंबर, 2011) के जन्मदिन पर न्यूज़क्लिक विशेष। यह वीडियो पैकेज 2018 में तैयार किया गया था, जो आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि आज अदम की ही तरह पुरज़ोर आवाज़…
  • ग्लोरिया ला रीवा
    आँखों देखी रिपोर्ट : क्यूबा के वैज्ञानिकों, स्वास्थ्यकर्मियों ने कोविड के ख़िलाफ़ संघर्ष तेज़ किया
    21 Oct 2021
    ग्लोरिया ला रीवा क्यूबा में थीं। वहां उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों से क्यूबा के प्रभावी टीकाकरण कार्यक्रम और डेल्टा वेरिएंट से निपटने के तरीकों पर बात की।
  • रौनक छाबड़ा
    दिल्ली: न्यूनतम वेतन लागू करने और ठेका प्रथा को समाप्त करने की माँग के साथ मज़दूर संगठनों ने केजरीवाल सरकार को सौंपा हड़ताल का नोटिस
    21 Oct 2021
    25 नवंबर को एक दिवसीय हड़ताल का नोटिस देने के लिए गुरुवार को दिल्ली सचिवालय पर केंद्रीय मज़दूर संगठनों के नेतृत्व में सैंकड़ों श्रमिकों ने दिल्ली की एक रैली में हिस्सा लिया। हालाँकि उन्हें दिल्ली…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License