NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
बरखा रानी, ज़रा जम के बरसों
बाढ़ में दौरों का सुख ही इतना बड़ा है कि हर कोई बस यही कहते रहना चाहता है "बरखा रानी, जरा जम के बरसो"। यह हवाई दौरे पर दिखाई देने वाले दृश्यों का ही सुख है कि पिछले सत्तर सालों से आज तक बाढ़ को कंट्रोल करने के लिए ठोस कुछ नहीं किया गया।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
26 Jul 2020
बाढ़
image courtesy : The Indian Express

बारिश का मौसम शुरू हो गया है। सावन तो आधे से अधिक बीत भी चुका है। वैसे भी सावन तो रिमझिम बरसात का मौसम माना जाता है। झूलों का, त्योहारों का, घेवर का मौसम। असली बारिश तो भादों में होती है जब बारिश की झड़ी ही लग जाती है। हफ्ते हफ्ते मौसम नहीं खुलता है।

tirchi nazar_3.png

पर लगता है कि ये सावन भादों भी हम हिन्दी कॉउ बैल्ट वालों ने अपने अनुसार बना लिये हैं। अभी सावन शुरू ही हुआ था कि असम में भादों की बारिश भी शुरू हो गई। वहाँ बाढ़ आ गई है। ब्रह्मपुत्र उफान मार रही है। बिहार में भी बाढ़ शुरू हो गई हैं। वैसे सावन भादों ही क्या, हम, कॉउ बैल्ट वालों ने तो इस देश की सारी बातें ही अपने हिसाब से बना रखी हैं। क्या खाना है, क्या पहनना है, भाषा कौन सी बोलनी है, सब निर्णय गौ क्षेत्र ही लेता है। लुँगी डाँस नेशनल डाँस बन सकता है पर लुँगी पहनना, ना बाबा ना। क्या बात कर रहे हो। दिमाग खराब है क्या।

पर बात तो हम बरसात की कर रहे थे। सावन में रिमझिम बारिश होती है। मानते हैं, रिमझिम बारिश बड़ी रोमांटिक होती है। कवियों ने, साहित्यकारों ने उस पर पृष्ठ पर पृष्ठ भर डाले हैं। पर शहर की भागदौड़ में अब रोमांटिक चीजों की जगह बची ही नहीं है। अब दिल्ली को ही देखो, जरा सी बारिश हुई नहीं कि सड़कों पर पानी भर जाता है, जाम लग जाता है। मिंटो ब्रिज के नीचे की सड़क पर भरे पानी में डूबती डीटीसी की बस का अखबार में छपा फोटो ही बताता है कि दिल्ली में बारिश हुई है। जब तक मिंटो ब्रिज का फोटो न छपे, माना जाता है कि दिल्ली में बारिश हुई ही नहीं है। यह फोटो हर साल छपता है, बिना नागा। मजाल है कि दिल्ली में किसी की भी सरकार ने मिंटो ब्रिज के नीचे की सडक़ का ड्रेनेज सिस्टम ठीक करवाया हो। दिल्ली वालों के लिए बारिश के मौसम का रोमांस और रोमांच यही, मिंटो ब्रिज का फोटो है।

वैसे बारिश का रोमांस गरीबों के लिए है भी नहीं। वे बेचारे तो बारिश के समय खाली बरतन एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रखते रहते हैं। और जब वे भर जायें तो उन्हें बाहर उलीच आते हैं। एक बरतन उलीच कर आते हैं तो दूसरे का नम्बर आ जाता है। उन्हें इतनी फुरसत कहाँ कि देखें बाहर मौसम कितना सुहाना है। लेकिन इससे यह न समझें कि अमीरों की बारिश में रोमांस भरा हुआ है। यह ठीक है कि वे अपने बंगले के बरामदे से या पेंटहाउस की बालकनी से मौसम सुहाना देख सकते हैं लेकिन जब वे भी सडक़ पर निकलते हैं तो नानी याद आ जाती है। अगर ऐसा न होता तो मुकेश अंबानी को मुंबई में अपनी बहुमंजिला इमारत के ऊपर हैलीपैड न बनवाना पड़ता। वह भी बारिश में मुम्बई की पानी भरी सड़कों पर अपनी बहूमूल्य कारों में ही निकलता। तो देश की आम जनता, अमीर हो या गरीब, दिल्ली में रहती हो या मुम्बई में, बारिश से परेशान ही रहती है। विशेष रूप से तब जब वह जम कर बरस रही हो।

पर ऐसा नहीं है कि बरखा रानी के जम कर बरसने से सभी परेशान हों। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो चाहते हैं कि बारिश हो और जम कर हो। ऐसी हो जैसी कभी न हुई हो। सारे रिकॉर्ड तोड़ कर हो। बल्कि हर वर्ष पिछले वर्ष का रिकॉर्ड तोड़े। नदी-नाले उफन उफन जायें, उफान पर आ जायें। सब जगह बाढ़ आ जाये। सारा संसार जलमग्न हो जाये। कौन हैं वे लोग। वे लोग हैं बड़े सरकारी अफसर और राजनेता। मंत्री और ऊँचे ऊँचे संतरी।

कहते हैं कि पहले किसान लोग बाढ़ का इंतजार किया करते थे। उसके साथ उपजाऊ मिट्टी जो आती थी। ठीक है कुछ नुकसान करती थी पर साथ ही कुछ लाभ भी दे जाती थी। पर अब बाढ़ आना किसी को भी पसंद नहीं आता है सिवाय उनके जिन्हें इससे लाभ होता है। बस वही लोग गाते हैं "बरखा रानी, जरा जम के बरसो"। जब तक बाढ़ न आ जाये तब तक बरसो। कौन हैं ये लोग।

ये लोग वे लोग हैं जो बाढ़ पीड़ित लोगों तक राहत सामग्री पहुँचाते हैं। वैसे तो राहत सामग्री पहुँचाने में लूट का जो "सुख" है, वह राहत सामग्री कहीं भी पहुँचाओ, कैसे भी पहुँचाओ, मिल ही जाता है। राहत सामग्री अकाल के समय सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाई जाती है तो कमाई वहाँ भी कर ली जाती है। इस वर्ष राहत सामग्री कोरोना के कारण मजदूरों, बेरोजगारों को भी पहुचाई गई तो कमाने वालों ने वहाँ भी हाथ मार लिया। दंगों में मारे गए, विस्थापित हुए लोगों को राहत सामग्री पहुँचा कर लोग अपने लिये भी राहत कमा लेते हैं। पर जो अतिरिक्त सुख बाढ़ग्रस्त इलाके में राहत सामग्री पहुँचाने में है वह कहीं नहीं है। 

बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में जो राहत सामग्री पहुँचाने में जो अतिरिक्त और विशेष सुख है वह है हैलीकॉप्टर से, हवाई जहाज से, बाढ़ के विहंगम दृश्य देखने का। उस सुख से बड़े से बड़ा अधिकारी, मंत्री, या फिर कहें सबसे बड़ा मंत्री तक भी वंचित नहीं रहना चाहता है। सूखे में दौरा सडक़ मार्ग से होता है पर बाढ़ में दौरा हवाई मार्ग से ही हो सकता है। वैसे छोटे अफसरों को नाव का दौरा ही नसीब होता है पर वह भी जीप दौरे से अधिक आनंददायी है। बाढ़ में दौरों का सुख ही इतना बड़ा है कि हर कोई बस यही कहते रहना चाहता है "बरखा रानी, जरा जम के बरसो"।

इन हवाई दौरों पर दिखता है दूर दूर तक फैला पानी और बीच बीच में मकानों की छतों पर दिखाई देते बाढ़ से पीड़ित लोग। बुजुर्ग, जवान, महिलाएं और बच्चे। आशा के साथ हेलीकॉप्टर की ओर देखते हुए। खाना, पानी और दवाईयों की आस लगाये हुए। राहत कर्मी जो कुछ फैंकते हैं उसमें से थोड़ा छतों पर गिरता है और बहुत सारा पानी में गिर जाता है। पानी में कितना गिराना है और छतों पर कितना, यह गिराने वाले ने वाले ने कितना बचाना है, इस पर निर्भर करता है। 

यह हवाई दौरे पर दिखाई देने वाले दृश्यों का ही सुख है कि पिछले सत्तर सालों से आज तक बाढ़ को कंट्रोल करने के लिए ठोस कुछ नहीं किया गया। जो कुछ भी किया गया तरल ही किया गया और उससे बस बाढ़ बढ़ी ही है। पिछले सत्तर साल में लगभग सभी दल, केंद्र में और राज्यों में, कभी न कभी सत्ता में रह चुके हैं पर सभी बारिश के मौसम में यही चाहते हैं "बरखा रानी, जरा जम के बरसो"। और है बाढ़, तुम आती रहना और कमवाती रहना। हर साल, बार बार, लगातार।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

Satire
Political satire
tirchi nazar
floods
Heavy rain and storm
Bihar
Assam

Related Stories

बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका

समाज में सौहार्द की नई अलख जगा रही है इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...

तिरछी नज़र: ...चुनाव आला रे

चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू


बाकी खबरें

  • Ukraine
    स्टुअर्ट ब्राउन
    यूक्रेन: एक परमाणु संपन्न राज्य में युद्ध के खतरे
    03 Mar 2022
    यूक्रेन के ऊपर रूस के आक्रमण से परमाणु युद्ध का खतरा वास्तविक बन गया है। लेकिन क्या होगा यदि देश के 15 परमाणु उर्जा रिएक्टरों में से एक भी यदि गोलीबारी की चपेट में आ जाए?
  • banaras
    विजय विनीत
    यूपी का रणः मोदी के खिलाफ बगावत पर उतरे बनारस के अधिवक्ता, किसानों ने भी खोल दिया मोर्चा
    03 Mar 2022
    बनारस में ऐन चुनाव के वक्त पर मोदी के खिलाफ आंदोलन खड़ा होना भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसके तात्कालिक और दीर्घकालिक नतीजे देखने को मिल सकते हैं। तात्कालिक तो यह कि भाजपा के खिलाफ मतदान को बल…
  • Varanasi District
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : बनारस की मशहूर और अनोखी पीतल पिचकारी का कारोबार पड़ रहा है फीका
    03 Mar 2022
    बढ़ती लागत और कारीगरों की घटती संख्या के कारण पिचकारी बनाने की पारंपरिक कला मर रही है, जिसके चलते यह छोटा उद्योग ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष रहा है।
  • migrants
    एपी
    एक सप्ताह में 10 लाख लोगों ने किया यूक्रेन से पलायन: संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी
    03 Mar 2022
    संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के आंकड़ों के अनुसार, पलायन करने वाले लोगों की संख्या यूक्रेन की आबादी के दो प्रतिशत से अधिक है। विश्व बैंक के अनुसार 2020 के अंत में यूक्रेन की आबादी…
  • medical student
    एम.ओबैद
    सीटों की कमी और मोटी फीस के कारण मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं छात्र !
    03 Mar 2022
    विशेषज्ञों की मानें तो विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए जाने की दो मुख्य वजहें हैं। पहली वजह है यहां के सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में सीटों की संख्या में कमी और दूसरी वजह है प्राइवेट कॉलेजों…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License