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राजनीति
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सऊदी-ईरान संबंध सुधरने में अभी लगेगा समय
ईरान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता सईद खातिबजादेह के मुताबिक बातचीत द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मसलों पर हुई।
एम.के. भद्रकुमार
13 May 2021
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी (बाएं) का 11 मई 2021 को जेद्दाह में स्वागत करते सऊदी क्रॉउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (दाएं)।
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी (बाएं) का 11 मई 2021 को जेद्दाह में स्वागत करते सऊदी क्रॉउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (दाएं)।

सऊदी अरब और ईरान के बीच पिछले महीने कायम हुए गोपनीय संपर्क ने अपनी गति पकड़ ली है। कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी का मंगलवार रात (11 मई) जेद्दाह का गुपचुप दौरा करना और जिस तरह से सऊदी क्रॉउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी कर उनके प्रति आदर भाव जताया, उसने सबका ध्यान खाड़ी क्षेत्र में बदल रही हवा की तरफ मोड़ दिया है। हालांकि शेख तमीम भोर होने के पहले ही दोहा लौट गए लेकिन उनका यह दौरा प्रयोजन के लिहाज से काफी अर्थपूर्ण था। 

अमीर के साथ उनके उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी थे और सऊदी राजकुमारों की पूरी मंडली भी वहां जमी थी। इस गुफ्तगू में गृह मंत्री एवं कैबिनेट सदस्य प्रिंस तुर्की बिन मोहम्मद बिन फहद, उप रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान, विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान, कैबिनेट के सदस्य और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुसाद बिन मोहम्मद अल-ऐबन समेत सरकार के अनेक आला अफसर भी शरीक थे।

बीते सप्ताह,  अल जजीरा को दिए एक इंटरव्यू में कतर के विदेश मंत्री ने कहा था, “हम ईरान और खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब के साथ अच्छे संबंध को लेकर की जाने वाली किसी भी बातचीत और इसकी कोशिशों तथा एक  नेक ख्याल का स्वागत करते हैं। हम ऐसे किसी भी प्रयासों का समर्थन करते हैं और भरोसा करते हैं कि ऐसी बातचीत इस क्षेत्र की स्थिरता की तरफ ले जाने वाला एक रचनात्मक कदम है।”

इससे पहले जनवरी में ब्लूमबर्ग टीवी को दिए गए एक इंटरव्यू में कतर के विदेश मंत्री ज्यादा बेबाक थे। वह 6 सदस्यीय खाड़ी सहयोग परिषद् (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल/जीसीसी)  और ईरानी नेताओं के बीच एक शिखर सम्मेलन होने की उम्मीद जता रहे थे।

उन्होंने कहा था,“ मैं सोचता हूं कि अन्य जीसीसी देशों की भी ऐसी इच्छा है... ईरान की तरफ से भी ऐसी ही ख्वाहिश जताई गई है। उसने जीसीसी देशों के साथ अपने ताल्लुकात रखने की मंशा का कई मौकों पर इजहार किया है।”

इसके बाद से ही ईरान और सऊद अरब के विदेश मंत्रियों ने मार्च महीने के अंत में क्रमिक रूप से दोहा का दौरा किया था।  तेहरान ने समावेशी संवाद के विचार को बढ़ावा दिया है। इस पृष्ठभूमि में,  ईरान ने सोमवार को सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि की कि  वह सऊदी अरब  से बातचीत कर रहा है। 

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सईद खातिबजादेह  ने कहा कि बातचीत द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर हुई है।  उन्होंने  कहा,“दोनों देश और ये क्षेत्र तनाव को घटाने लिए उत्सुक हैं और एक कायदे की समझदारी तक पहुंचने की उम्मीद करते हैं, जो वातावरण को बदलने में मददगार होगी। 

महत्वपूर्ण है कि यह खास क्षेत्रीय पहल है। इस क्षेत्र के प्रभारी अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री जॉय हूड ने सोमवार को वाशिंगटन के एक थिंक टैंक ब्रुकिंग  इंस्टिट्यूशन में स्वीकार किया कि “स्थितियों को बेकाबू होने से बचाने के लिए एक खुली बातचीत का होना बेहद महत्वपूर्ण है” और वाशिंगटन  ने

सऊदी-ईरान के बीच बातचीत का समर्थन किया है, “(किंतु) हमारा उनसे इस बारे में कोई लेना-देना नहीं है।”

बिल्कुल यही स्वर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन के आज से 10 दिन पहले के एक वक्तव्य में सुनाई दिये, जब उन्होंने एफटी से कहा था, “अगर वे बातचीत कर रहे हैं तो मैं समझता हूं कि सामान्य रूप से यह अच्छी बात है। आमतौर पर किसी भी विकल्प के बनिस्बत बातचीत अच्छी होती है। क्या  इससे कोई नतीजा निकलता है? यह बिल्कुल अलहदा सवाल है। लेकिन बातचीत करना, तनाव को कम करने का प्रयास करना करना, यह देखने की कोशिश करना कि क्या हमारे पास और भी कोई विकल्प है, इन देशों का ऐसी चीजों पर एक्शन लेना, जो वे अब तक करते आ रहे हैं पर जिन्हें आप पसंद नहीं करते-तो बातचीत करना अच्छा है,वह सकारात्मक है।”

ब्लिंकेन के लहजे में नाखुशी और खीज मालूम देती थी। उनके लफ्ज़ों में यह हकीकत झलक रही थी कि अमेरिका इस परिदृश्य में एक निराश दर्शक भर है, जब खाड़ी क्षेत्र की दो ताकतें पास आ रही हैं। उनमें से एक देश तो वाशिंगटन का लगभग 80 सालों से मुवक्किल रहा है और जबकि दूसरा विगत 40 वर्षों से कट्टर दुश्मन रहा है। ब्लिंकेन पश्चिम एशिया में अमेरिका के छीजते प्रभावों को जाहिर कर देते हैं जबकि व्हाइट हाउस लगातार कहता है कि ‘अमेरिका की वापसी’ हुई है।

सऊदी अरब और ईरान के बीच अपने संबंधों को सामान्य बनाने की मुहिम की प्रेरणा दरअसल दोनों पक्षों को अमेरिकी इरादों के प्रति गहरे अविश्वास से मिली है। अमेरिका और सऊदी अरब का गठबंधन अब समाप्त हो रहा है और रियाद का अमेरिका के सुरक्षा प्रदाता होने पर अब भरोसा नहीं रहा। इसी तरह, तेहरान के लिए आज का क्षेत्रीय वातावरण अपने प्रति विश्वास को फिर से आगे बढ़ाने का है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के मसले बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के बजाय क्षेत्रीय देश ही बेहतर तरीके से निष्पादन कर सकते हैं।

खाड़ी के देशों में परस्पर जारी घमासान का फायदा अपने हथियार बेचने और स्थानीय सरकारों पर अपना तगड़ा प्रभुत्व बनाए रखने की अमेरिका की दशकों पुरानी नीति में एक व्यवधान उत्पन्न हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति जोए बाइडेन का ईरान के साथ तालमेल बिठाने पर जोर देने की कवायद ने रियाद और खाड़ी के अन्य अरब देशों की सरकारों को सावधान कर दिया है।  कहा गया है कि,  यह अवश्य ही समझा जाना चाहिए कि खाड़ी देशों की सरकारें विद्रोह से काफी दूर हैं। पेट्रो डॉलर पश्चिमी बैंकिंग प्रणाली को लगातार रिझाता रहा है और धनाढ्य शेखों का पश्चिमी देशों में निजी और अन्य रूपों में अकूत परिसंपत्तियां हैं। यद्यपि वे ईरान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का पर्याप्त आधार देखते हैं, वैसे ही जैसा कि समकालीन अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ संबंध सामान्य रखने के मामले में होता है। 

इसके अलावा, सऊदियों को यह भरोसा है कि ईरान के साथ बातचीत रियाद की तालमेल की क्षमता बढ़ा सकती है और अमेरिका के साथ मोलतोल के लिए एक स्पेस दे सकती है। इससे भी बढ़ कर सऊदी खुद को इतिहास के सही पक्ष में खड़ा होते देखना पसंद करेगा क्योंकि अमेरिका-ईरान के बीच संबंध को फिर से सामान्य बनाने के प्रयास ने क्षेत्र में संघर्ष के ‘हाटस्पॉट’-यमन, इराक, सीरिया और लेबनान-को अपने-अपने तनावों के हल के लिए प्रेरित कर दिया है। 

बहरहाल, क्षेत्रीय राजनीति में कूटनीति का दखल एक ताजा दृश्य है। इस तरह कि तुर्की के विदेश मंत्री महमूद कावुसोग्लुग तीन दिनों के दौरे पर सोमवार को रियाद पहुंचे। यह जमाल खशोगी की 2018 में हत्या के बाद तुर्की का पहला उच्चस्तरीय आधिकारिक रियाद दौरा है। 

ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ  का इस हफ्ते संयुक्त अरब अमीरात का दौरा ‘लगभग तय’ है, जो विगत 5 वर्षों में अपनी तरह का यह पहला दौरा होगा। इसी तरह, सऊदी अरब के खुफिया ब्यूरो के चीफ ने पिछले हफ्ते सीरिया के अपने समकक्ष के साथ दमिश्क में मुलाकात की थी।  यह घटना भी क्षेत्र में तापमान को कम करने की दिशा में एक बड़ा  कदम है। 

संक्षेप में कहा जाए तो सऊदी अरब वाशिंगटन की क्षेत्रीय रणनीति के साथ सद्भावना दिखाने या उसमें सहयोगी होने के बजाय अपना रास्ता खुद तैयार कर रहा है। तेहरान के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाने की इच्छा  जाहिर करने का श्रेय अवश्य ही सऊदी क्रॉउन प्रिंस को दिया जाना चाहिए।  अल अरबिया टीवी चैनल को हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में प्रिंस मोहम्मद ने कहा, “आखिरकार, ईरान हमारा एक पड़ोसी देश है। हम जो कहते हैं, वह ईरान के साथ एक अच्छा और खास तरह के संबंध बनाने की बात है। हम नहीं चाहते कि ईरान के साथ कोई दिक्कत हो। इसके विपरीत, हम चाहते हैं कि वह समृद्ध हो और तरक्की करे। जैसे कि हम सऊदियों के हित ईरान में हैं, उसी तरह ईरानियों के हित भी सऊदी अरब में हैं, जो हमें इस क्षेत्र में और पूरी दुनिया में समृद्धि और प्रगति की तरफ ले जाएगा।” 

तेहरान समझ नहीं पा रहा है कि यह केवल परिस्थितियों के मेल से पैदा हुआ एक रणनीतिक बदलाव है। इसमें अमेरिका सऊदी रिश्तों में बढ़ती तकरार, यमन के युद्ध से नाक बचाकर सऊदी अरब को निकलने में रियाद को ईरान की सख्त जरूरत, अमेरिका का जेसीपीओए की तरफ वापसी और ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने, इत्यादि परिस्थितिय़ों का योगदान है या रियाद वास्तव में ईरान के साथ अपने सामरिक हितों में सह-अस्तित्व को लेकर प्रतिबद्ध है। यह  तथ्य है कि खाड़ी की अरब सरकारों के विपरीत ईरान एक इस्लामिक गणतंत्र है,  जिसकी स्थापना क्रांतिकारी सिद्धांतों के आधार पर की गई थी और वह एक अपरिवर्तनीय वास्तविकता है। 

सऊदी अरब और ईरान के संबंध के फिर से सामान्य होने में समय लगेगा। इसमें कुछ कमजोर कड़ियां भी है, जो मौके पर चटक कर उभर आती हैं। क्षेत्रीय संतुलन मौलिक रूप से ईरान के पक्ष में झुका हुआ है क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था में उसका एकीकरण बढ़ रहा है। वहीं, वह एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरा है, जो क्षेत्रीय देशों से अधिकतम समझौते की मांग करेगा, विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से। इसी बीच, अब्राहम समझौते से सनसनाहट गायब हो गई है।

सब बातों पर विचार करते हुए यही लगता है कि पश्चिम एशिया से अमेरिका के दखल में कोई कतर-ब्योंत नहीं हो सकती। वाशिंगटन को डर है कि उसका यह कदम केवल चीन के लिए नए अवसरों का द्वार खोल दे सकता है; और रूस को अपने क्षेत्रीय रुख को और संघटित करने का मौका दे सकता है। ब्लिंकेन की टिप्पणी बताती है कि अमेरिका नहीं मानता कि सऊदी-ईरान संबंध में कोई सुधार हुआ है। अभी ये तो शुरुआती दिन हैं और अमेरिका  खाड़ी की सुरक्षा में नए विरोधाभासों को पैदा कर फिर से केंद्र में लौट सकता है। सऊदी उत्तराधिकार में बदलाव इसका एक बिंदु हो सकता है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति जोए बाइडेन का सऊदी प्रिंस के प्रति दुराव जानी हुई बात है। 

बाइडेन प्रशासन ने  इजराइल के फिलिस्तीनियों पर आक्रमण और उनके अल-अक्स मस्जिद को दूषित करने का जिस तरह का खुला समर्थन किया है, वह इसका स्पष्ट संकेत है कि वाशिंगटन की मानसिकता में कुछ भी अधिक नहीं बदला है। अमेरिकी अभिजात वर्गों के साथ इजराइल का दबदबा बरकरार है और वह यह सुनिश्चित करेगा कि अमेरिका खाड़ी में अपना प्रभुत्व बनाये रखे, इसके लिए चाहे जो करना पड़े।

बात यह है, पश्चिम एशिया का मायने केवल हथियारों का निर्यात, पेट्रो डॉलर और आतंकवाद नहीं है बल्कि यह वह महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो एशियाई शताब्दी को विभाजित करता है। यह चीन के बेल्ट एंड रोड के लिए एक क्षेत्रीय केंद्र है। यही वह जगह है, जहां वैश्विक मुद्रा डॉलर के प्रभुत्व को गंभीर चुनौती दी जा सकती है। और निश्चित ही, चीन के सकल आयातित क्रूड आयल का अनुमानत: आधा 2019 में मध्य-पूर्व देशों से ही हुआ था।

सौजन्य : इंडियन पंचलाइन 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

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