NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या हम बिहार के इन 16 ग़रीबों की ख़ुदकुशी पर भी बात करेंगे?  
लॉकडाउन की अवधि में गरीबी, बेरोज़गारी, आर्थिक संकट और दूसरे मानसिक दबाव की वजह से बिहार के 16 लोगों ने ख़ुदकुशी कर ली है। इनमें से ज्यादातर निम्न आय वर्ग के लोग थे। इन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस तरह के संकट से कैसे मुकाबला करें।
पुष्यमित्र
17 Jun 2020
क्या हम बिहार के इन 16 ग़रीबों की ख़ुदकुशी पर भी बात करेंगे?   

जिस रोज़ फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा ख़ुदकुशी किये जाने की दु:खद ख़बर आयी, उसी की बीती रात को बिहार की राजधानी पटना में एक ऑटो चालक ने भी ख़ुदकुशी कर ली। वह ढाई महीने लंबे चले लॉकडाउन में बेरोजगार और तंगहाल हो गया था। कोरोना और लॉकडाउन की वजह से उत्पन्न संकट में ख़ुदकुशी की यह इकलौती घटना नहीं है। इस दौरान बिहार के कम से कम 16 लोगों ने नाउम्मीद होकर जान दे दी है। यह सामान्य संख्या नहीं है। ऐसे में आज जब हम सुशांत सिंह की दुखद मृत्यु के बाद डिप्रेशन, बॉलीवुड में फैले नेपोटिज्म आदि मसलों पर लगातार बहस कर रहे हैं, जो ज़रूरी भी है। मगर इसके साथ ही क्या हमें इन 16 लोगों की मौत के कारणों को भी समझने की ज़रूरत नहीं है? क्या हमारी सरकारें इन मज़दूरों और ग़रीब लोगों के जीवन में बढ़ रही नाउम्मीदी पर विचार करेगी, इसका समाधान निकालने का प्रयास करेंगी?

यह अब सर्वविदित तथ्य है कि लगभग ढाई महीने चले लॉकडाउन ने देश के मज़दूरों और छोटे कामगार की कमर तोड़ दी है। उन्हें अब समझ नहीं आ रहा कि अपना जीवन फिर से कैसे शुरू करें। बिहार में लॉकडाउन के पहले चरण से ही ग़रीब कामगारों की ख़ुदकुशी का सिलसिला शुरू हो गया था। 10 अप्रैल, 2020 को लखीसराय के एक चाय दुकानदार ने ख़ुदकुशी कर ली, क्योंकि वह पिछले 14 दिनों से अपनी चाय की दुकान को खोल नहीं पाया था, जो उसकी आजीविका का इकलौता साधन था। वह तंगहाली में अपने परिवार को देख नहीं पाया।

ठीक एक हफ्ते बाद, 17 अप्रैल को एक दिहाड़ी मजदूर ने गुड़गांव में ख़ुदकुशी कर ली। वह दीवार पेंट करने का काम करता था। लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हो गया था। मोबाइल बेचकर उसने कुछ दिनों का राशन खरीदा, फिर वह नाउम्मीद होकर ख़ुदकुशी कर बैठा। 20 अप्रैल, 2020 को इसी तरह बिहार के डालमिया नगर में एक गोलगप्पा बेचने वाले ने फंदे पर झूलने की कोशिश की। हालांकि खुशकिस्मती से उसे बचा लिया गया और उसके सहृदय पड़ोसियों ने चंदा करके उसे 12 हजार रुपये दिये, ताकि वह तंगहाली का मुकाबला कर सके।

28 अप्रैल को पहली दफा बिहार में एक मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा व्यक्ति ने ख़ुदकुशी कर ली। दानापुर में रहने वाला वह व्यक्ति एक प्राइवेट कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर था। उसकी नौकरी छूट गयी थी। इस सदमे को वह झेल नहीं पाया। तीन मई, 2020 को वैशाली जिले के सराय के रहने वाले एक दंपति ने बेरोजगारी, आमदनी ठप होने और कर्ज बढ़ने की वजह से ख़ुदकुशी कर ली। उन्होंने एक ट्रक लोन लेकर खरीदा था, मगर लॉकडाउन की वजह से उनकी आमदनी बंद हो गयी थी। वे लोन चुका नहीं पा रहे थे।

हालांकि ख़ुदकुशी करने वालों में ज्यादातर लॉकडाउन की वजह से अचानक ग़रीब हुए लोग थे, मगर कई लोगों ने इस दौरान घर पहुंचने में नाउम्मीद होने की वजह से और कुछ लोगों ने बीमारी के भय से भी ख़ुदकुशी की। 11 मई को मुज़फ़्फ़रपुर के एक युवक ने मध्यप्रदेश के मंदसौर में इसलिए ख़ुदकुशी कर ली, क्योंकि वह चाह कर भी अपने घर नहीं लौट पा रहा था। इसी तरह 20 मई को बिहार के एक परिवार के चार लोगों ने ख़ुदकुशी कर ली, वे भी घर लौटना चाहते थे। राजधानी पटना में मेडिकल की तैयारी करने वाली एक छात्रा ने भी 17 मई को इसी वजह से ख़ुदकुशी कर ली, क्योंकि वह चाह कर भी घर नहीं जा पा रही थी।

20 मई, 2020 को वैशाली के एक क्वारंटीन सेंटर में एक व्यक्ति ने ख़ुदकुशी कर ली, उसे भय था कि उसे कोरोना हो गया है। मौत के बाद हुई उसकी जांच में उसका भय सही साबित हुआ। इसी तरह 25 मई को राजधानी पटना के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच के कोरोना आइसोलेशन वार्ड में एक मरीज ने ख़ुदकुशी कर ली। उसका कोरोना का सैंपल लिया गया था, तभी से वह परेशान था। उस वार्ड में उसकी काउंसिलिंग और निगरानी करने वाला भी कोई नहीं था। रोहतास में इसी दौरान एक प्रेमी युगल की ख़ुदकुशी की भी खबरें आयी हैं।

इस तरह लॉकडाउन की अवधि में गरीबी, बेरोज़गारी, आर्थिक संकट और दूसरे मानसिक दबाव की वजह से बिहार के 16 लोगों ने ख़ुदकुशी कर ली है। इनमें से ज्यादातर निम्न आय वर्ग के लोग थे। इन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस तरह के संकट से कैसे मुकाबला करें।

दुःखद तथ्य यह है कि आसन्न चुनाव की तैयारियों में जुटी बिहार की सरकार भी इन लोगों की समस्या को लेकर बहुत गंभीर नहीं है। शनिवार की रात ख़ुदकुशी करने वाले ऑटोचालक के घर जाकर डीएम रवि कुमार ने 25 किलो चावल पहुंचा दिया और मान लिया कि सरकार का फ़र्ज़ पूरा हो गया है।

लॉकडाउन में बेरोजगार हुए लाखों लोगों के लिए बिहार सरकार के पास एक ही योजना है, मनरेगा। मगर मनरेगा के तहत सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र में अकुशल मजदूरों को ही काम मिल सकता है। जो अर्ध कुशल या कुशल मजदूर हैं, छोटे पेशेवर या दुकानदार हैं। उन पर भी यह विपदा कम बड़ी नहीं है। प्राइवेट कंपनियों में हो रही छटनी से मध्यम वर्ग भी परेशानी में है। इन तमाम लोगों की बेरोजगारी का समाधान मनरेगा से नहीं हो सकता। मगर इनकी समस्या का समाधान तो दूर सरकार इन्हें मानसिक संबल देने के लिए भी कुछ नहीं कर रही।  

बिहार में भोजन का अधिकार अभियान से जुड़े रूपेश कहते हैं कि सरकार अभी समझ नहीं पा रही है, मगर यह संकट काफी बड़ा है। ज्यादातर छोटे कामगारों की पूंजी खत्म हो चुकी है, वे अब समझ नहीं पा रहे कि जिंदगी कहां से शुरू करें। उन्हें छोटी ही सही, मगर तत्काल कुछ पूंजी चाहिए। सरकार अगर सर्वे करवा कर इस दिशा में कुछ कर सके, तो उनके लिए मददगार होगा।

इसके अलावा गांव और शहर दोनों जगह गरिमापूर्ण पीडीएस सिस्टम लागू कराने की जरूरत है। ताकि इन लोगों को सिर्फ चावल नहीं, दूसरे अनाज भी उपलब्ध हो। यह सही वक्त है, शहरी रोज़गार गारंटी कानून को बनाकर लागू करने का। नहीं तो ये छोटे कामगार एक ऐसे ट्रैप में फंस जायेंगे, जिससे वे कभी उबर नहीं पायेंगे। हो सकता है, हर कोई ख़ुदकुशी न करे। मगर मानसिक तनाव तो उनके जीवन का हिस्सा बन ही जायेगा। रूपेश राज्य की ग़रीब आबादी के लिए अलग से साइकोलॉजिकल काउंसिलिगं की भी बात करते हैं। हालांकि वे कहते हैं कि सबसे जरूरी है सरकार की तरफ कोई ऐसा फ़ैसला किया जाना, जिससे हाल के दिनों में राज्य में ग़रीबों के लिए जो नाउम्मीदी का माहौल बना है, वह ठीक हो सके। उनमें फिर से जीना का हौसला और उम्मीद जाग सके। जो अभी दिखायी नहीं दे रहा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Lockdown
unemployment
Bihar
suicide
poverty

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया


बाकी खबरें

  • न्यूजक्लिक रिपोर्ट
    संतूर के शहंशाह पंडित शिवकुमार शर्मा का मुंबई में निधन
    10 May 2022
    पंडित शिवकुमार शर्मा 13 वर्ष की उम्र में ही संतूर बजाना शुरू कर दिया था। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम बंबई में 1955 में किया था। शिवकुमार शर्मा की माता जी श्रीमती उमा दत्त शर्मा स्वयं एक शास्त्रीय…
  • न्यूजक्लिक रिपोर्ट
    ग़ाज़ीपुर के ज़हूराबाद में सुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर पर हमला!, शोक संतप्त परिवार से गए थे मिलने
    10 May 2022
    ओमप्रकाश राजभर ने तत्काल एडीजी लॉ एंड ऑर्डर के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम, गाजीपुर के एसपी, एसओ को इस घटना की जानकारी दी है। हमले संबंध में उन्होंने एक वीडियो भी जारी किया। उन्होंने कहा है कि भाजपा के…
  • कामरान यूसुफ़, सुहैल भट्ट
    जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती
    10 May 2022
    आम आदमी पार्टी ने भगवा पार्टी के निराश समर्थकों तक अपनी पहुँच बनाने के लिए जम्मू में भाजपा की शासन संबंधी विफलताओं का इस्तेमाल किया है।
  • संदीप चक्रवर्ती
    मछली पालन करने वालों के सामने पश्चिम बंगाल में आजीविका छिनने का डर - AIFFWF
    10 May 2022
    AIFFWF ने अपनी संगठनात्मक रिपोर्ट में छोटे स्तर पर मछली आखेटन करने वाले 2250 परिवारों के 10,187 एकड़ की झील से विस्थापित होने की घटना का जिक्र भी किया है।
  • राज कुमार
    जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप
    10 May 2022
    सम्मेलन में वक्ताओं ने उन तबकों की आज़ादी का दावा रखा जिन्हें इंसान तक नहीं माना जाता और जिन्हें बिल्कुल अनदेखा करके आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। उन तबकों की स्थिति सामने रखी जिन तक आज़ादी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License