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खाद्य कीमतों में उछाल के बीच मुद्रास्फीति में तेज़ वृद्धि
मौजूदा मुद्रास्फीति को यह बताने के लिए हवाला नहीं देना चाहिए कि ये अर्थव्यवस्था मांग में कमी का सामना नहीं कर रही है।
प्रभात पटनायक
21 Dec 2019
What a Sharp Rise in Inflation Rate

जहां एक ओर भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट का दौर बदस्तूर जारी है और हक़ीक़त में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) अगस्त से अक्टूबर के बीच (पिछले साल के इन्हीं महीनों की तुलना में) के नकरात्मक विकास को पिछले तीन महीनों से एक के बाद एक लगातार दर्शा रहा है, वहीँ चौंकाने वाली बात यह है कि अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि देखने में नज़र आ रही है। गौरतलब है, कि महंगाई में तेज़ी इन महीनों में सबसे अधिक रही है जब औद्योगिक उत्पादन में कमी सबसे ज़्यादा हुई है।

नवंबर 2019 में (नवंबर 2018 की तुलना में) भारत के खुदरा मूल्यों में मुद्रास्फीति की दर 5.54% रही। मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि 2019 के जनवरी महीने से ही दर्ज की जा रही थी जो अगस्त में बढ़कर 3.28% तक पहुंच गई थी और खासकर इसके बाद के महीनों में तो इसने रफ़्तार पकड़ ली है, जो सितंबर में 3.99%, अक्टूबर में 4.62% और नवंबर में बढ़कर 5.54% तक पहुंच गई है।

खासतौर पर चौंकाने वाली बात यह है कि मौजूदा मुद्रास्फीति में वृद्धि की दरों की वजह खाद्य सामग्रियों के दामों में लगी आग के कारण है। खाद्य कीमतों में महंगाई की दर अक्टूबर के 7.89% की तुलना में नवंबर माह में 10.01% तक पहुंच गई है। इन खाद्य सामग्रियों में, सब्जियों के दामों में 35.99%, दाल में 13.94%, मांस और मछली में 9.38%, अंडे 6.20%, मसालों 4.33%, अनाज 3.71%, दूध 3.46% और फलों में 3.29% बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में यह वृद्धि दिसंबर 2013 के बाद से सबसे अधिक है।

इस मुद्रास्फीति का असर लोगों के जीवन पर कैसा पड़ रहा है, इसकी कल्पना इस तथ्य से की जा सकती है। 2011-12 से 2017-18 के बीच हुए नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के अनुसार, जिसके निष्कर्षों को नरेंद्र मोदी सरकार ने उजागर नहीं होने दिया, के अनुसार देश में औसत प्रति व्यक्ति उपभोग पर ख़र्च में लगभग 3.8% की गिरावट दर्ज की गई थी। खासतौर पर ग्रामीण भारत में भोजन पर ख़र्च के मामले में प्रति व्यक्ति खर्च में गिरावट काफी तेज़ी से दर्ज हुई है और वास्तविकता में यह गिरावट 10% तक हुई है। एक ऐसे समय में जब वास्तविक तौर पर भोजन की खपत में कमी देखने को मिल रही हो, उसके ऊपर यदि वर्तमान में खाद्य सामग्रियों के दामों में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही हो तो यह आम लोगों के अधिकाधिक विनाश और कुपोषण की ओर धकेलने की ओर ले जा रहा है।

कुछ लोगों ने गतिहीनता के साथ-साथ मुद्रास्फीति की इस सह-अस्तित्व वाली वर्तमान स्थिति को "मुद्रास्फीतिजनित मंदी" का नाम दिया है। हालांकि इसे मात्र विशुद्ध विवरण के रूप में समझने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इस " मुद्रास्फीतिजनित मंदी" (यदि कोई इसे कहता है) और जिस मुद्रास्फीतिजनित मंदी की वजह से 1970 के दशक के अंत में पूंजीवादी दुनिया प्रभावित हुई थी, और जिसके चलते यह शब्द आम चलन में लाया गया था, के संकट के बीच किसी भी प्रकार की विश्लेषणात्मक समानताएं नहीं हैं। 1973 में ओपेक द्वारा तेल की कीमतों को बढ़ाने के लिए बेरोज़गारी के बीच एक स्वायत्त लागत-वृद्धि मुद्रास्फीति के चलते यह संघर्ष उत्पन्न हुआ था।

बदले में ऐसी बेरोज़गारी ने विकसित पूंजीवादी देशों में सरकारों द्वारा लागत-वृद्धि ने मुद्रास्फीति की प्रतिक्रिया को जटिल बना दिया, जिसने बड़े पैमाने पर श्रम की आरक्षित सेना को बढ़ाने का काम कर दिया। इसके पीछे विचार यह था कि श्रमिकों की क़ीमत पर मूल्य-वृद्धि की समस्या को हल कर लिया जाये, जिसमें रिजर्व सेना में ऐसे इज़ाफे के जरिये ट्रेड यूनियनों की कमज़ोर स्थिति के जरिये उत्पादन में श्रमिकों की हिस्सेदारी को निचोड़ना संभव हो सके।

इसकी तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्तमान मुद्रास्फीति का कारण किसी स्वायत्त लागत को बढ़ाने की कोशिश का कारण नहीं है। असल में जब यह स्वायत्त लागत-वृद्धि तो अब आने वाले महीनों में देखने को मिलेगी क्योंकि मौजूदा समय में रुपये की विनिमय दरों में कमी के चलते आयात की लागत ऊंची होने जा रही है। इन हालातों में पहले से ही मुद्रास्फीति की मार झेल रही अर्थव्यवस्था पर महंगे आयात का बोझ लदने से चीजें सिर्फ बद से बदतर ही होने जा रही हैं।

लेकिन अभी इस चीज का और सरकार की देख-रेख में निर्धारित की जाने वाली अन्य वस्तुओं और सेवाओं जैसे दूध और दूरसंचार सेवाओं की कीमतों में जो बढ़ोत्तरी देखने को मिली हैं, उनका असर आने वाले महीनों में ही देखने को मिलेगा। वर्तमान मुद्रास्फीति की वजह न तो लागत में किसी प्रकार की वृद्धि की वजह से है और न ही अचानक से लोगों के हाथों कहीं से पैसे आ गए हैं। इसके पीछे कई वस्तुओं के उत्पादन में आई कमी है, जबकि पहले से लोगों के पास खरीदारी करने की क्षमता कम है जो और भी कम होती जा रही है।

यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जिसे हम मुद्रास्फीति के लिए कोर सेक्टर मानते हैं और जो खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि को इसके दायरे से बाहर रखती है तो हम पाते हैं कि इस कोर सेक्टर में मुद्रास्फीति की दर 2019 के पूरे महीनों में लगातार घटी है। और इसके बारे में आशंका तब होती है, जब मांग में कमी दिखने लगे।

लेकिन जहां अचानक से क्रय शक्ति में इज़ाफे की वजह से अधिक मांग के उत्पन्न होने के कारण किसी तरह की मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि न हुई हो बल्कि इसकी वजह कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अचानक आपूर्ति में हो जाने वाली कमी का परिणाम हो (आपूर्ति में उतार-चढ़ाव के कारण कीमतों में होने वाले बदलावों से प्रभावित हो), तो यह निस्संदेह बिगड़ती जा रही अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देने का काम करता है। यह यूं होता है कि चूंकि अब लोगों को अपने भोजन के प्रबंध के लिए पहले से कहीं अधिक क्रय शक्ति को झोंकना पड़ रहा है, और इस प्रकार उनके पास औद्योगिक और अन्य सामग्रियों पर ख़र्च करने के लिए कम रह जाता है, जो इन क्षेत्रों में मांग की कमी को और बढ़ाता जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो मौजूदा मुद्रास्फीति को यह बताने के लिए हवाला नहीं देना चाहिए कि ये अर्थव्यवस्था मांग में कमी का सामना नहीं कर रही है। अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह मांग में कमी के चलते है और मुद्रास्फीति के कारण यह मांग की कमी वाली स्थिति उसे और बदतर हालत में पहुंचा देगी। भारतीय अर्थव्यवस्था के इस वर्तमान संकट से निपटने के लिए जो आज बढ़ते मुद्रास्फीति की दरों और विकास दर के धीमे पड़ते जाने की वजह से पिछले 45 वर्षों में बेरोज़गारी के अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच चुकी है (उसी वर्ष से जब हमने आम तौर पर समझने के लिए “मुद्रास्फीतिजनित मंदी” शब्द का इस्तेमाल करना शुरू किया था) से निपटने के लिए नीतियों के संयोजन की आवश्यकता है: संवेदनशील वस्तुओं के मामले में उचित क्षेत्र-विशिष्ट आपूर्ति प्रबंधन की व्यवस्था के साथ सकल मांग में तेज़ी लाने की कोशिश की जाए।

उदाहरण के लिए यदि संभव हो तो आयात के माध्यम से कुछ वस्तुओं की आपूर्ति में तेजी लाई जा सकती है और इसी तरह कुछ वस्तुओं के दाम को निर्धारित करने के साथ उन्हें नियंत्रित मात्रा में उपभोक्ताओं को वितरित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। और साथ ही साथ सरकार को चाहिए कि वह अर्थव्यवस्था में विकास और रोज़गार को प्रोत्साहित करने के लिए राजकोषीय उपाय की तलाश करे। इसके लिए उसे अपने जन-कल्याणकारी ख़र्च में बढ़ोत्तरी करनी चाहिए और इसके वित्तपोषण के लिए उसे वेल्थ टैक्स या कॉर्पोरेट टैक्स लगाना चाहिए।

लेकिन इस मुद्रास्फीति और गतिहीनता के इस संयोजन वाले संकट पर सरकार और वास्तव में वित्तीय पूंजी के सभी संस्थान, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक और विभिन्न "थिंक टैंक" जो भी निष्कर्ष निकालेंगे वह इसका ठीक उल्टा होगा। वे मुद्रास्फीति से मुकाबले को "बाजार के साथ हस्तक्षेप" का नाम देकर किसी भी क्षेत्र-विशिष्ट नीतियों को लागू करने से बचाते दिखेंगे और इसके बजाय सकल घरेलू मांग को कम करने पर ही ज़ोर देंगे जो किसी भी तरह से मुद्रास्फीति को नियंत्रित किए बिना सिर्फ बेरोज़गारी और विकास को मंदी की ओर धकेलने वाला ही साबित होगा।

बेशक हो सकता है कि इस संकट पर सरकार कुछ भी न करे और बस इस बात का इंतजार करे कि यह संकट एक दिन अपने आप खत्म हो जाए। असल में यह ख़त्म तो नहीं होने जा रहा लेकिन सरकार इसी उम्मीद पर टिकी रह सकती है। और इस बीच वह अपने विभाजनकारी सांप्रदायिक एजेंडे से लोगों का ध्यान भटकाने में लगी रहेगी।

लेकिन अगर सरकार ऐसा कुछ भी करती है तो जैसा कि उसने अपना ज्ञान वित्तीय पूंजी के संस्थानों से प्राप्त की है तो वह मुद्रास्फीति से निपटने के लिए उन नीतियों को ही लागू करने का काम करेगी जो सकल मांग में और कमी लाने का काम करती हैं। यह ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी करेगा, जिससे कुल मांग में कमी दर्ज होगी और बेरोज़गारी में इजाफा होगा। (यहां एक विषमता है: जहां ब्याज दर में कमी लाने से कुल मांग में इजाफ़ा नहीं होता वहीँ ब्याज दर में वृद्धि का असर सकल मांग में कमी ला सकता है)। और यदि मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने के नाम पर सरकार खुद के ख़र्च में कटौती करती है तो यह एक और मंदी की मार को बढाने वाला और बेरोज़गारी की स्थिति को और ख़़राब करने वाला क़दम होगा।

इसके साथ ही कामगारों के हाथों में कम आय वाली स्थिति बनी रहती है तो उनके उपभोग की वस्तुओं जैसे दाल, सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थों जैसी वस्तुओं जिनकी मांग बनी रहती हैं। इसमें कमी नहीं होने जा रही जिनके चलते आज महंगाई बढ़ी है। बल्कि इसका असर पूरे तौर पर औद्योगिक वस्तुओं की मांग पर पड़ने वाला है जो वर्तमान में अपर्याप्त मांग के चलते नकारात्मक वृद्धि का सामना कर रहे हैं। इस तरह कह सकते हैं कि मुद्रास्फीति तो कायम रहने वाली है, लेकिन अर्थव्यस्था में गतिहीनता की स्थिति और बिगड़ सकती है।

महंगाई के विरुद्ध सरकारें जिन परंपरागत हथियारों का इस्तेमाल करती आई हैं वे मौजूदा संदर्भों में पूरी तरह से गैर-वाजिब हैं, क्योंकि मौजूदा मुद्रास्फीति की वजह कामगार लोगों के हाथों में अत्यधिक क्रय शक्ति का होना नहीं है। इसके उल्टे, उनके हाथों खरीदारी की ताकत काफी कम हो चुकी है।

इसलिए उद्येश्य यह होना चाहिए कि उनकी क्रय शक्ति में किस तरह इज़ाफा किया जा सके और साथ ही साथ मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने के लिए ख़़ास वस्तु बाज़ार में विशिष्ट हस्तक्षेपों के जरिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिन आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता ने हो पाने के कारण दाम अनियंत्रित होते हैं उन्हें पर्याप्त मात्रा में मुहैय्या किया जाए। लेकिन एक ऐसी सरकार जो अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की गुलाम बन चुकी हो वह शायद ही इस बात को समझ सकेगी।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

What a Sharp Rise in Inflation Rate Amid Spike in Food Prices Means

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