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भारत
राजनीति
शिरीष खरे को तीसरी बार मिला लाडली मीडिया अवार्ड
न्यूज़क्लिक हिंदी से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार शिरीष खरे को प्रतिष्ठित 'लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवार्ड, 2020' से सम्मानित किया गया है। शिरीष को यह पुरस्कार वेब हिंदी श्रेणी में उनकी उत्कृष्ट फीचर लेखन के लिए मिला है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
21 Nov 2020
शिरीष खरे

न्यूज़क्लिक हिंदी से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार शिरीष खरे को प्रतिष्ठित 'लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवार्ड, 2020' से सम्मानित किया गया है। शिरीष को यह पुरस्कार वेब हिंदी श्रेणी में उनकी उत्कृष्ट फीचर लेखन के लिए मिला है। यह पुरस्कार लैंगिक समानता के लिए कार्य करने वाली संस्था 'पॉपुलेशन फर्स्ट' की ओर से हर वर्ष दिया जाता है।

इससे पहले उन्हें वर्ष 2009 और 2013 में भी लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए लाडली पुरस्कार दिया जा चुका है। संस्था द्वारा यह सम्मान समारोह गत 20 नवंबर, शुक्रवार शाम को वर्चुअल माध्यम से आयोजित किया गया। शिरीष को यह पुरस्कार साहित्यिक पत्रिका 'पहल' की वेबसाइट पर अप्रैल 2019 को प्रकाशित स्टोरी 'सुबह होने में अभी देर है' के लिए दिया गया।

इस स्टोरी को यहां पुन: प्रकाशित किया जा रहा है:

सुबह होने में अभी देर है

शिरीष खरे

सुदूर थार में

राजौ से मीरा और गीता की दूरी और दर्द

राजौ और मीरा, एक ही दुनिया के दो किस्से हैं, दो किरदार हैं। इधर हैं, अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के लाख विरोध के बावजूद अपनी खातिर अदालत में जा खड़ी हुई, लेकिन घर लौटी तो गांव छूट गया। उधर है, आदिवासी होने का दर्द झेलनी वाली मीरा, जिसने गांव वालों से डरकर अदालत से मुंह फेर लिया, और पहले की तरह गांव में रहने में अपनी भलाई समझी। दोनों यह मानते हैं कि गांव के रास्ते थाने और अदालत आना-जाना और न्याय की लड़ाई लडऩा तो फिर भी आसान है, पर समाज के बगैर रह पाना बहुत मुश्किल है।

एक ने अदालत में लड़ना मंजूर किया, दूसरे ने गांव में रहना। अब मैं खुद आपके सामने अपनी यात्रा का अनुभव साझा कर रहा हूं, जिसे जानते-समझते आप ही तय करें कि कौन अधिक अंधेरे में है, किसके नजदीक कुछ उजाला पहुंचा, गांव... थाने... अदालत... समाज के बीच मौजूद उनकी दूरी और अपार दर्द से गुजरते हुए।

लेकिन इसके पहले बता दूं कि यह वर्ष दो हजार बारह अगस्त के आखिरी दिनों की बात है, जब मैं राजस्थान के पुष्कर पहुंचने के बाद थार मरुस्थल को पहली बार अपनी आंखों से देखने के लिए के छोटे-छोटे गांव घूम रहा था। इसी दौरान एक दिन जोधपुर में एक दुकानदार ने पुराने अखबार के जिस पर पन्ने पर मुझे समोसा परोसा उस पर भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में 'बंदूक की नोंक पर पांच लोगों द्वारा एक दलित औरत से बलात्कार’ की खबर छपी देखी। मुझे पता था कि भरतपुर जोधपुर से दूसरे छोर पर है, लेकिन इन्हीं दिनों इस इलाके में मानवीय हवस और अत्याचार की कई खबरें किन्हीं चीजों की तरह मेरे साथ-साथ बंधी चल रही थीं। और इनकी गांठों को खोलने के लिए मैंने किसी जगह थोड़े दिन रुक जाना तय किया था। मैं जिस जगह रुका उसका जगह का नाम था- बायतु। बायतु जयपुर से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर, और पाकिस्तान की सीमा से करीब सौ किलोमीटर पहले आने वाला एक कस्बा है। यहीं सामाजिक कार्यकर्ता भंवरलाल चौधरी के लोक-कल्याण संस्थान कार्यालय के एक कमरे में मुझे कुछ दिन ठहरने को जगह मिल गई थी।

यदि आप देश के उत्तर-पश्चिम तरफ पाकिस्तान से कंधा मिलाने वाले राजस्थान के थार में बाड़मेर का मानचित्र देखें तो एक ब्लॉक के रुप में बायतु अच्छी-खासी जगह घेरता दिखेगा। बायतु से लगा अधिकतर भाग हरे रंग से रंगा है, जो थार का खाली स्थान दर्शाता है। खाली स्थान मतलब मीलों दूर तक कोई बसाहट नहीं। यात्रा के दौरान ऐसी वीरान जगहों पर मेरी नजरें ज्यादा ही लंबी-लंबी होती जाती हैं और वहां जाकर ठहरना चाहती हैं जहां जीवन के चिन्ह हों। फिर वे चाहे भेड़-बकरियों के झुंड हों, या किसी चरवाहे की मुस्कुराहटें, जिसके एक बार मुस्कुरा देने भर से वह रेगिस्तान में अजनबी नहीं रह जाता।    

सोचता हूं कि यदि मैंने बहुत सारी यात्राएं अकेले न की होतीं तो अकेलेपन से पैदा होने वाली अनिश्चिता का डर इतना कम न रह जाता। लेकिन, भले ही अकेले घूमना मुझे आत्मविश्वास से भर देता हो और अक्सर यात्रा पर अपने साथ किसी और का न होना मुझे भला लगता हो, फिर भी मैं ऐसी कोई जगह नहीं पहुंचना चाहूंगा जहां मेरे अलावा मुझे किसी दूसरे आदमी की आवाज सुनाई न दें, फिर चाहे वह समंदर हो या रेगिस्तान का किनारा, जिसके नजदीक बैठ मैं अकेले उसे घंटों यूं ही नहीं निहारना चाहूंगा, और मैं ऐसे किसी दृश्य की भी कल्पना नहीं करना चाहूंगा जिसका समय पलक झपकते ही गुजर जाए। इस मनोदृष्टि से सोचता हूं तो भारत में करीब सात लाख गांव हैं, मेरे हिस्से अधिक नहीं तो देशभर के ऐसे सात सौ गांव तो आए हीं हैं, जहां से मैं गुजरा हूं, रुका हूं और जिनके बारे में मैंने कुछ-न-कुछ लिखा भी है। इन्हीं में थार मरुस्थल के इन गांवों का एक छोटा वृत्तांत भी है, जिसमें आखिरी पायदान पर खड़ीं राजौ, मीरा और गीता नाम की तीन महिलाओं ने जाति-व्यवस्था के कटु अनुभवों से गुजरने में मेरी और अधिक मदद की :

राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से बारह किलोमीटर दूर बताया गया। भंवरलाल की जीप से मुझे मुरली चौधरी और हनुमान के साथ एक पक्की सड़क से सावऊ तक पहुंचने में एक घंटे भी नहीं लगे, लेकिन राजौ के भीतर की झिझक ने उसे डेढ़ घंटे तक बाहर आने से रोके रखा। आखिर राजौ की मां ने हमें झोपड़ी के अंदर बुलाया तो हम जूते-चप्पल उतारकर अंदर एक दरी पर बैठ गए। मैंने राजौ की मां और फिर उन्होंने मुझे, मुरली और हनुमान को बारी-बारी से देखा। इनमें मैं अकेला अजनबी हूं। राजौ की मां ने मुरली को एक कागज पकड़ाया।

राजौ के साथ जो हुआ वह नौ जून, दो हजार आठ की इसी कागज मतलब एफआईआर की कॉपी में दर्ज है, 'श्रीमान थाणेदार जी, एक अर्ज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, आयु 15 साल, जब गोड़ा से आने वाली बस से शहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर... और उसने जबरन मेरे साथ खोटा काम किया। इसके बाद वह वहां से गांव भाग गया। मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई। मेरे पिता सौ कोस दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही अगली सुबह लौटे। जब गांव वालों से इंसाफ नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर सिंह के साथ रिपोर्ट लिखाने आई हूं। साबजी से अर्ज है कि जल्द से जल्द कड़ी कार्यवाही करें।’

'ये उन्नीस की हो गई है।’ - राजौ की मां ने हमें राजौ की उम्र बताई। मां से ही मालूम हुआ कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी थी। लेकिन, वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाने का नाम लेता है, न ही राजौ की कहीं दूसरी जगह शादी करने की ही बात करता है। और गांव वालों से तो मदद की जरा भी आस पहले भी नहीं थी। कहने को दो कोस दूर पुनियों के तला गांव में ताऊ है, साठ कोस दूर बनियाना गांव में चाचा है, अस्सी कोस दूर सोनवा गांव में ननिहाल है, लेकिन खैर-खबर लेने कोई नहीं आता। यह झोपड़ा भी दो साल पहले गांव में था, वहां से उठाकर दो कोस दूर यहां लाया गया है, गृहस्थी का हाल तो खस्ता था ही, अब और खस्ता हो गया है। पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिडिय़ा के पूरा खेत चुग जाने के बाद पछताने से क्या फायदा!

लेकिन खेत चुग जाने में राजौ का कसूर क्या था? झोपड़ी से घूमकर मेरी नजर गांव की तरफ गई। पर, दूर-दूर तक मुझे बसाहट का कोई चिह्न दिखाई नहीं दिया। राजौ के मां के कहने पर राजौ ने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ी। इसके बाद राजौ ने बताना शुरु किया कि कैसे उसके पिता देदाराम उस खोटी खबर को लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे! उन्होंने इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बताया, फिर उन्हें देदाराम से बगैर पूछे आरोपी टीकूराम के यहां यह संदेश भी भिजवा दिया कि पंद्रह-बीस हजार देकर मामला निपटाने में ही भलाई है। लेकिन, टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि भई वह न तो किसी को एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है! फिर अदालत की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने आरोपी सहित पूरा परिवार और गांव के सारे पंच प्रधान जमा हो गए। अदालत के बाहर हर आदमी जज बना हुआ था और फैसले सुना रहा था कि अस्मत गंवा चुकी महिला को आखिर किस तरह पेश आना चाहिए। सबकी जुबान पर सिर्फ यही बात थी कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे। पर, टीकूराम को सामने देखकर राजौ बिफर पड़ी, उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए पचास हजार पर थूककर जमीन पर दे मारे और वहीं सबको ऐसी खरी-खोटी सुनानी शुरु कर दीं कि एक न ठहरा।

इसके बाद, जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने तरह-तरह की बातें पहुंचानी शुरु कर दीं। जैसे, 'राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें’... 'छोटे भाई की शादी भी करा दें’... 'नहीं तो छोटे का भी सब धरा रह जाएगा’... 'कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पडऩे से अच्छा है आपस में हिल-मिलकर रहना’... 'फिर वो तो लड़का है’... 'उसका क्या है’... 'जितना तुझे पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा’... 'तू लड़की हो’... 'फिर उम्र ही क्या है तेरी’... 'बाद में कोई साथ न देता बेटा’... 'फिर बदनामी बढ़ाने में अपना ही तो नुकसान है’... 'तुझे अच्छे-बुरे का भेद पता न है... और फिर पूरे गांव की बदनामी’। जब राजौ और उसके परिवार पर इन बातों का भी असर न हुआ तो कभी राजौ की जान की चिंता की गई, कभी उसके छोटे भाई की जान की चिंता की गई। लेकिन, इस अब तक तो किसी की नहीं गई। शायद वे भी चाहते होंगे कि ये सब भी जिएं, लेकिन उस तरह जिस तरह वे चाहें कि इन्हें जीना कैसे चाहिए!

फिलहाल आरोपी टीकूराम जमानत पर रिहा है, और उसकी शादी भी हो चुकी है। जाहिर है आरोपी के रिश्तेदार आरोपी के साथ जिस मजबूती से खड़े रहें, पीड़िता को उसके रिश्तेदारों से वैसा समर्थन नहीं मिला।

दूसरी तरफ तमाम डर, शर्मिंदगी, पाबंदियो से जूझने के बावजूद राजौ कोर्ट में केस लड़ रही है। उसे उसके इस फैसले पर आज तक मलाल नहीं है, उसे एक ही चीज की आस है और वह है न्याय। इस आस में मां-बेटी के गहने कुर्बान हो गए हैं। 'गांव आओ-जाओ तो अब सीधे कोई न टोकता, पर पीठ पीछे बातें होती ही हैं, तरह-तरह की।’ मेरे पूछने पर राजौ बोली और उसने बताया कि आरोपी के परिजन और पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके संबंध समय के साथ धीरे-धीरे सुधर रहे हैं।

राजौ के यहां से उठते ही बातचीत का सिलसिला खत्म ही हुआ था कि मैने राजौ से कहा कि चिंता मत करना, जब मैं आपकी खबर लिखूंगा तो उसमें आपका नाम बदलकर लिखूंगा और आपकी फोटो भी नहीं छपेगी। पर, वह जिद पर अड़ गई कि मेरा फोटो खींचो और उसे खबर के साथ बढ़ा करके छापना। और वह मुझसे यह भी पूछने लगी कि उसकी खबर में उसका नाम क्यों नहीं छपेगा?

झोपड़ी के बाहर उसने खड़े होकर अपनी एक फोटो खिंचवाई। फिर उससे पूछा कि वह अपना नाम छिपाना क्यों नहीं चाहती? उसने बेझिझक कहा, 'मेरा असली नाम और फोटो ही देना भाई! नहीं तो कुछ मत छापना। गांव के जिन ताऊ लोगों के सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही घाघरा उतर गया तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर!’

मैं हैरान था कि शुरुआत में जो लड़की इस मुद्दे पर बात करने के लिए घर से बाहर निकलने में झिझक रही थी, ये उसी के शब्द हैं। मुझसे थोड़ी देर बात करने भर से राजौ के जो मनोभाव बाहर निकले वहीं तो एक सामंती और पुरूष-प्रधान समाज के खांचे में नहीं बैठते। देश के बाकी भागों में भी देखा गया है कि समाज की सोच के उलट जब महिलाएं प्रतिकार और संघर्ष करती हैं तो उन्हें मुख्यधारा से अलग-थलग कर दिया जाता है। कई बार उन पर यौन हमले भी होते हैं। दरअसल, महिलाओं के यौनांग को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी के रुप में देखा जाता है। इसलिए, उसी पर सबसे अधिक चोट पहुंचाने के बारे में सोचा जाता है।

*****

इसके बाद, मुरली और हनुमान मुझे यहां से मीरा के गांव बांडी धारा की ओर ले गए। सावऊ से बांडी धारा तक पहुंचने और कच्चे, टेढ़े-मेढ़े लेकिन चौड़े रास्ते से होकर जीप में हिचकोले खाते हुए हमने मिनटों का समय घंटों में बिताया।

रास्ते में थार की तासीर पर बातें हुईं। यह तो मैंने पढ़ रखा है कि अरावली पहाड़ी के पश्चिम तरफ थार भारत का सबसे बड़ा मरुस्थल है जो उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश की ओर पैर पसार रहा है। गर्मियों में बालू रेत के टीले आसानी से देखे जा सकते हैं और तेज हवाओं के चलते ये टीले एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं। हालांकि, इन दिनों इलाके का तापमान तीस से पैंतीस डिग्री सेल्सियस रहता है। ऐसे में इस समय इस तथ्य से राहत है कि अभी वैसी प्रचंड गर्मी नहीं है कि बालू रेत के कारण थार में पारा पचास के पार हो जाए और न ही उतनी कड़कड़ाती ठंड ही है कि पारा शून्य के नीचे तक चला जाए। बरसात यहां अनिश्चित रहती है। इसलिए, सौ साल में अस्सी सूखे-अकाल के नाम रहे। लेकिन, ये सारी स्थितियां यहां के लोगों के लिए प्रत्याशित हैं। सामान्य-ज्ञान की बहुत सारी बातों से अलग इन दिनों में मैंने कुछ बारीक बातों पर भी ध्यान दिया तो पाया कि यहां मीठे पानी की फसल उगाने से लेकर उसे बचाने के कई तौर-तरीके भी आम हैं। जैसे, गिलास को ओठों से लगाए बगैर पानी पीना। जैसे, लोहे के बड़े कुंड में बैठकर नहाना और खारे पानी से नहाकर बचे हुए कुंड के पानी से कुंड में ही कपड़े धोना। जैसे, नहाने में डिटरजेंट की बजाय चिकनी माटी का उपयोग करना, ताकि माटी की परत जब कुंड के नीचे बैठ जाए तो ऊपर का पानी ऊंट आदि जानवरों के पीने के काम आए।

जब हम मीरा के घर पहुंचे तो वहां मीरा नहीं मिली। पति पूसाराम ने पूछने पर बताया कि घर के बाकी सब अंदर गांव में हैं और थोड़ी देर में आ जाएंगे। पूसाराम ने अपनी झोपड़ी के आंगन में हमारे बैठने के लिए खटिया बिछा दी। बदन पर काली बंडी पहने और आंखों पर चश्मा चढ़ाए बुजुर्ग पूसाराम ने हाथ जोड़कर हमारा अभिवादन किया। उन्होंने बैठने को कहा तो मैं भी उन्हीं के साथ खटिया पर बैठ गया। फिर मुरली के साथ बातों ही बातों में दो साल पहले मीरा और उन पर बीती बातों पर चर्चा शुरु हुई। उन्होंने बताया कि तब कैसे इसी आंगन में रामसिंह राजपूत नाम का आदमी आपने सात दोस्तों के साथ नशे में धुत उन्हें बुरी-बुरी गालियां बक रहा था! उस दिन भी पूसाराम घर में अकेला ही था। पहले तो उन्हें यही समझ नहीं आया कि रामसिंह उसे गालियां बक रहा है। फिर जब वह आंगन में बंधा पूसाराम का बकरा उधार खरीदने की बात पर अड़ गया तब पूसाराम को समझ आया कि रामसिंह किसी तरह उसे डरा-धमकाकर उससे उसका बकरा हथियाना चाहता है। पूसाराम के मना करने पर उसने बुजुर्ग पूसाराम के साथ जमकर मारपीट की। नजदीक खेत में काम कर रहीं उनकी पत्नी मीरा को जब अपने पति की चीखें सुनाई दीं तो वे दौड़ी-दौड़ी आईं। देखा कि रामसिंह उनके बकरे को जबरन ले जा रहा है तो मीरा ने भी बकरे को छुड़ाने की कोशिश की। तब रामसिंह ने मीरा को भी खूब मारापीटा।

वह छब्बीस जनवरी यानी गणतंत्र-दिवस की सुबह थी, इसलिए सारे गांव वाले स्कूल में झंडा फहराने के लिए जमा थे। इसलिए, मीरा पूसाराम को लेकर तुरंत स्कूल की तरफ भागीं और अपना बकरा बचाने के लिए गुहार करने लगीं।... 'फिर गांव वालों ने रामसिंह को बुलवाया, पर वह नहीं आया। और उसी रोज वह इनका बकरा काटकर खा गया। अगली सुबह इनके (मीरा) साथ हमने थाने में शिकायत कराई’ -मुरली ने बताया।

उसके बाद कोर्ट केस चला, लेकिन इधर गांव वालों के समझौते के लिए बढ़ते जोर के आगे भील समुदाय का यह बुजुर्ग दंपति दो महीने में ही समाज से हार गया। एक रोज ये दोनों ऐसे टूटे कि इन्हें राजीनामा के लिए हां बोलना पड़ा। मीरा को अपनी और अपने पति की मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूल जाना पड़ा। उनके बकरे की मौत और उसकी कीमत भी हमेशा के लिए भूल जानी पड़ी। गांव वालों ने सिर्फ अस्पताल में लगा खर्चा दिलाने की गांरटी दी थी। हालांकि, उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया गया था कि अब आगे से वह ऐसा न करेगा। फिर रामसिंह राजपूत ने माफी भी मांगी थी, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों से। पूसाराम से माफी मांगने का सवाल ही नहीं था, यह बात आती तो गांव में बहुतों के भीतर जाति का अहम आड़े न आ जाता!

'...तो राजीनामा से खुश हैं?’ मैंने पूछा तो पूसाराम ने सिर हिलाकर मना कर दिया। कहा, 'राजीनामा कौन मेरी खुशी से हुआ था’ और कुछ देर में उनका दर्द आंसू बनकर बहने लगा। इस बीच, गांव से लौटी मीरा ने घड़े से लोटा भरकर पानी पिया और पूरा समय पूसाराम को ध्यान से सुनती रहीं। पूसाराम ने कहा, 'राजीनामा गांव वालों की खुशी से हुआ था, जिसकी बड़ी लड़की की ही तीन लड़कियां हों, उसे तो हर चौखट पर नाक रगडऩे की लत पड़ चुकी होती है न!...’ जब पूसाराम चुप हुए तो मीरा बोलीं, 'इस बूढ़े आदमी को पटक-पटककर क्यों मारा?’ इसलिए कि उसे पता था कि हमारे बाप-दादा की तरह हम भी कमजोर हैं, उसने गांव के किसी बड़े आदमी से कुछ क्यों नहीं मांगा, हमसे ही हमारा बकरा क्यों मांगा, इसलिए कि वह जानता था कि हम जैसों से ही वह बकरा छीन सकता है!’

मीरा की पसलियों से उठने वाले कराह ने महीनों तक उन्हें तकलीफ दी थी। 'फिर आपने समझौता किया ही क्यों?’... 'समझौता किससे किया?’ मेरी और मीरा की बात का जवाब पूसाराम ने दिया। बोले, 'कुछ लोग बोले थे देख पूसा, कितने बड़े आदमी तेरे सामने हाथ जोडऩे को राजी हैं, तू उनकी बात न रखेगा, हम सब को रहना तो गांव में ही है न!’ फिर मीरा और पूसाराम ने सोचा कि बात तो सही ही है। खेत के पानी से लेकर आंगन के लिए गोबर, चूल्हे के लिए लकडिय़ां, ब्याज पर लिए पैसे, आटा पिसाने के लिए चक्की और मजूरी ये सब तो बड़े आदमियों के भरोसे ही है।

'यदि ये सब नहीं होता तो?’... 'तो मैं तो आगे भी लड़ती, पर कुछ रोज में यह जगह छोडऩी पड़ती। यहां हमारी झोपड़ी है, ये आंगन है, खेत जमीन है, दानापानी है। फिर बच्चे, बकरियों को लेकर कहां भटकते घूमते?’ - मीरा ने जवाब दिया।

शाम ढलती देख मैंने सोचना शुरू किया कि और देर की तो लौटते समय सड़क और अधिक सुनसान हो जाएगी! इसलिए, हम बायतु लौटने के लिए आंगन से उठ गए। इन दोनों को सारी बातें खुलकर कहने का मौका मिला और यही कारण है कि दो-ढाई घंटे की बातचीत में उनका दर्द भी राजौ की तरह कसमसाते हुए मुखर होने लगा। फिर चलती जीप से मैंने पीछे छूट रही उनकी झोपड़ी को एक बार फिर देखा। लेकिन, मेरे मन में एक की बजाय दो झोपडिय़ों का दर्द रेगिस्तान में चीटियों की तरह रेंगने लगा। और मुझे राजौ की कही वह बात याद आने लगी, 'मेरा असल नाम और फोटो ही देना भाई! नहीं तो कुछ मत छापना।’ उसके ये शब्द पीढिय़ों की पीड़ा से उपजे प्रतिरोध का स्वाभाविक मनोभाव ही तो है जो परंपरागत प्रवृति के विरुद्ध परिवर्तन के वाहक भी हो सकते हैं लेकिन अशिक्षा, आर्थिक तंगी और सभी तरह की कानूनी अड़चनों से जूझने के बावजूद समाज की सोच और समाज पर निर्भरता ही उसके न्याय के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं।

कहते हैं 'पांच पंच मिल कीजै काज, हारे जीते होय न लाज’ किंतु, जहां के पंच अपनी ताकत से जीत को अपने खाते में रखते हों, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है। ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से थाने और कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई राजौ और पूसाराम के साथ लौटती हुई मीरा मिलती है। तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले और किसके साथ लौटे?

*****

और इधर, अजमेर स्टेशन उतरते ही मैंने भंवरीबाई को मोबाइल लगाया। वे लडख़ड़ाती बोलीं, 'तुम तो औरतों की आवाज लिखने के लिए आ रहे हो न, सीधे अजमेरी-गेट थाने चले आना!’ नए शहर में थाने की बात सुन मैं अपने भीतर की लडख़ड़ाहट को साधते बोला, 'पर हुआ क्या है?..’ 'ये तुम थाने में ही समझ लेना। हम तो पचास साल की बूढ़ी औरते हैं, तुम लड़के ही हो, दो-चार थप्पड़ खा सको तो ही आना!’

वापस लौटने से अच्छा है अजमेर के अजमेरी-गेट थाने चलना। ऑटो से थाने पहुंचा। देखा, थानाधिकारी जी टेबल पर रखे 'सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर टंगी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच अपने बदन से सीधी रेखा बनाते हुए तने हैं।

इन दिनों कइयों के लिए यह बात समझ से परे है कि सिर्फ रसूलपुरा गांव से दलित महिलाएं कोई-न-कोई प्रकरण लेकर थाने क्यों पहुंच रही हैं? एक हफ्ते में दलित-महिला अत्याचार की तीन-तीन शिकायतों के बाद तो पुलिस वाले भी इन शिकायतों से तंग आ गए हैं। दूसरी तरफ, महिलाओं का आरोप है कि पुलिस दलित के संरक्षण और सम्मान के लिए बने कानून के विशेष प्रावधानों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज कराने वाले को ही हवालात की हवा खिला रही है। रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उनकी पत्नी गीतादेवी और बेटी रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जबरन गाय हथियाने और मारपीट का मामला थाने में दर्ज कराना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए थाने में बैठा लिया गया कि अब तो जांच के बाद ही पता करेंगे कि कसूरवार कौन?

रसूलपुरा गांव अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर करीब दस किलोमीटर दूर है। यहां पहले दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था। किंतु, दस साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा था। और पंद्रह साल पहले भील समुदाय की छग्गीबाई सामान्य-सीट से जीतकर सरपंच बन गई थीं। तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक होना पड़ा था और अविश्वास-प्रस्ताव लाकर छग्गीबाई को छह महीने में ही हटा दिया गया था। छग्गीबाई का सामान्य-सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था। मैंने छग्गीबाई से उनके नंबर पर संपर्क साधा। उनसे चर्चा हुई शुरु हुई तो वे बोलीं, 'तब मैं दलितों के वोटों से जीती थीं। नतीजा सुनकर ऊंची जात वालों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया था। मैं स्कूल के भीतर फंस गई थी। फिर पीछे कमजोर दीवार पर लगी खिड़की तोड़कर मुझे निकाला गया था। फिर पुलिस की गाड़ी से भगाया गया।’

एक गांव के ये दो उदाहरणों से मुझे आपसी तनाव और टकराहटों की पूरी तस्वीर समझ आ गई। असल तो परिवर्तन की इस प्रक्रिया को सबल वर्ग सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा है और उसे अपने विषेशाधिकारों के छिनने के रूप में देख रहा है। गणतंत्र की स्थापना के दशकों बाद भी इस वर्ग में यह चेतना नहीं आ रही है कि सभी नागरिक एक समान हैं। इसलिए यह हिंसा, अन्याय और घृणा के बूते अपना राज कायम रखना चाहता है।

इन सबका सबसे अधिक दबाव दलित महिलाओं पर पड़ता जा रहा था, इसीलिए कुछ साल पहले इलाके की कुछ महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनाई, नाम रखा- 'महिला जन अधिकार समिति’। इस बारे में भंवरीबाई बताती हैं कि पिछले पांच साल में जब हम बाल-विवाह, मृत्यु-भोज और जाति-प्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा विरोध बढऩे लगा। दलित महिलाएं जब जाति-सूचक शब्द और गालियों पर आपत्ति जताने लगीं तो उनसे पूछा जाने लगा कि तुमसे तो हमेशा से ही इसी तरह बात करते आ रहे हैं, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाया जाता रहा है, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है?’ जाहिर है कि इस तरह की टीका-टिप्पणियों और बहसों से आपसी संघर्ष बढ़ा।

दूसरी तरफ, दलितों को गांव की सार्वजनिक जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना पड़ता है। शिकायत में तेजा गूजर पर आरोप है कि कुछ दिन पहले उसी रास्ते पर गड्डा खोद दिया और कांटे की बाड़ लगाकर रास्ता बंद कर दिया। इसलिए, उसकी दलित महिलाओं से लड़ाई हो गई। ये महिलाएं जब यह शिकायत लेकर थाने पहुंचीं तो थानेदारों को इन महिलाओं पर 'आए दिन आ रही आफतें’ समझ नहीं आ रही हैं। इन हिंसक प्रतिक्रियाओं के पीछे वे परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं देख पा रहे हैं जिससे ऊंची जाति वालों को समस्या है। इन्हें समस्या है समाज के उस एकाधिकार को चुनौती देने से, जिसमें यह निर्धारित है कि दलित और महिलाओं को किस प्रकार का व्यवहार शोभा देता है।

इस तनावपूर्ण स्थिति में सुआलाल भाम्बी की गाय देर शाम तक जब घर नहीं लौटी तो उनकी पत्नी गीता और बेटी रेणु गाय का पता लगाने गांव में घूमने लगीं। गीता बताती है कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी थी। गाय मांगने पर पहुंचे तो मां और बेटी के साथ गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट। उस वक्त तक गांव का एक आदमी भी बीच-बचाव में न आया। ऐसे में जब गीता अपने पति सुआलाल और बेटी रेणु के साथ थाने में रिपोर्ट लिखाने आए तो तंग आकर थानेदार ने सुआलाल को ही बंद कर दिया। लेकिन, जब अजमेर के कुछ दलित-कार्यकर्ता थाने पहुंचे तो पुलिस कहने लगी कि सुआलाल को लेकर गांव चलते हैं, यदि गांव का एक भी आदमी यह कह दे कि वह गाय सुआलाल की है तो वह गाय सुआलाल की हुई।

लेकिन सुआलाल का कहना है कि गांव में तो कई गवाह मिल जाएंगे, पर मामला केवल गाय का ही नहीं है, गाय तो मेरी है ही, असल बात तो मेरी पत्नी और बेटी के साथ बेवजह मारपीट और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए। पुलिस वालों के हिसाब से ऐसे तो मामला सुलझने से रहा। इसलिए, अगली सुबह गीता और रेणु को जिला व सत्र न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकडऩा पड़ेगा। रात उन्हें अजमेर में ही कहीं बीतानी होगी, सुबह होने तक हो सकता है उनके पास गांव के पंच प्रधान पहुंच जाएं, हो सकता है तब वे अदालत के बाहर मारपीट और इज्जत का हर्जाना देने की भी बात करें और उनमें से ही कोई गीता और रेणु के मार्गदर्शक बन जाएं! लेकिन, गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ताजे हैं, दोनों इस बार किसी तरह का कोई समझौता न करने के बारे में बात कर रही हैं। उन्होंने गांव से थाने, थाने से अदालत तक का रास्ता तो तय कर लिया है। लेकिन, आगे क्या वे अदालत के रास्ते से चलकर गांव के रास्ते चल सकेंगी? रात हो चुकी है, और यह सुबह की तय होगा कि ये किस रास्ते पर चलेगी, लेकिन सुबह होने में अभी देर है...

(आभार: इस स्टोरी को लेखक शिरीष खरे ने पुनर्प्रकाशन के लिए उपलब्ध कराया।)

Shirish Khare
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Gender Equality

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