NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क़ानून में डूबने के बजाए उसके साथ ऊपर उठिये
भारत में "लेटर्स पेटेंट, 1726" के तहत पहली ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रेसिडेंसी के शासन वाले शहरों में मेयर्स कोर्ट स्थापित किए थे।
यतींद्र सिंह
03 Mar 2021
क़ानून

कई मौकों पर क़ानून का पहिया अपने नीचे न्याय और इसकी गुहार लगाने वालों को कुचल सकता है। लेकिन अपनी मूल भावनाओं से अलग जाने वाले क़ानूनों की पहचान करने में कुछ न्यायाधीश सक्षम होते हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यतींद्र सिंह लिखते हैं, इस तरह की क्षमता वाले कुछ ही न्यायाधीश होते हैं, हालांकि इनकी संख्या ज़्यादा होनी चाहिए।

जब कोई क़ानून न्याय के रास्ते में आता है, तो जज के लिए बेहतर होता है कि वह उन्हें तोड़ दे। लॉर्ड अट्किन से माफ़ी के साथ, यहां कहना पड़ेगा कि क़ानून और न्याय हमेशा एक ही पक्ष में नहीं होते। अगर ऐसा होता तो इंग्लैंड में 'कोर्ट ऑफ़ चांसरी' का विकास नहीं हुआ होता। इन न्यायालयों में 'सामान्य विधि (कॉमन लॉ)' प्रणाली की कमियों और कठिनाइयों से बचने के लिए समतापूर्ण व्यवहार होता है। यह न्यायालय तब काम करते हैं जब बेहद कठोर हो चुकी सामान्य विधि प्रणाली समतापूर्वक कार्य करना बंद कर देती है।

"लेटर्स पेटेंट, 1726" के तहत भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रेसिडेंसी के शासन वाले शहरों में पहली बार मेयर कोर्ट स्थापित कीं। इन अदालतों के पास 'न्याय और सच्चाई के मुताबिक़ फ़ैसले और सजा सुनाने' का क्षेत्राधिकार था। बाद में 1872 के दूसरे नियमों द्वारा घोषणा करते हुए कहा गया कि जहां कोई विशेष दिशानिर्देश ना दिए गए हों, वहां जज 'न्याय, समता और सही मंशा के साथ' कार्रवाई आगे बढ़ा सकते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत संविधान निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट को "किसी भी मामले में पूर्ण न्याय के लिए जरूरी आदेशों" को दिए जाने की शक्ति प्रदान की है। उन्होंने हाईकोर्ट को भी अनुच्छेद 226 के तहत "किसी उद्देश्य के लिए दिशा-निर्देश, आदेश या प्रादेश जारी करने का अधिकार दिया है।" 

वह जानते थे कि अकेले क़ानून के ज़रिए हर मामले में न्याय नहीं पाया जा सकता। खैर, कुछ लोग न्याय और क़ानून के बीच का अंतर नहीं समझते। शायद यह लोग क़ानून के महात्मय के प्रभाव में हैं, या यह क़ानून के कैदी हैं या फिर यह लोग उलझन में हैं। नतीज़ा यह होता है कि ऐसे लोग क़ानून से नाराज़ रहते हैं या उनमें डूब जाते हैं। लेकिन कुछ लोग बहुत स्पष्टता रखते हैं। यह लोग क़ानून के साथ उड़ान भरते हैं और नए आयामों की खोज का प्रयास करते हैं।

जस्टिस ब्रज नारायण सप्रू ऐसे ही एक व्यक्ति थे। यहां उनका कुछ परिचय बताना जरूरी होगा; उनका जन्म 25 अगस्त, 1926 को हुआ था। सप्रू ने लखनऊ के कोल्विन तालुकार कॉलेज से पढ़ाई की थी। अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के लिए सप्रू ने लखनऊ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र और क़ानून की पढ़ाई की। उनके पिता आनंद नारायण सप्रू एक आईसीएस अधिकारी थे, जिन्हें रेबीज़ के इंजेक्शन की वज़ह से कमर के नीचे लकवा मार गया था। इसके बाद उन्हें इलाहाबाद में राजस्व बोर्ड में बतौर सदस्य नियुक्ति दे दी गई। इसलिए जस्टिस सप्रू ने अपनी वकालत इलाहाबाद से शुरू की थी।  

जनवरी, 1976 में जस्टिस सप्रू को पदोन्नति देकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का जज बना दिया गया। वह कोर्ट के सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे न्यायधीशों में से एक थे। उनका पसंदीदा शौक पढ़ना ही था। सप्रू 1988 में सेवानिवृत्त हुए। उनकी अगस्त, 1995 में कैंसर से मृत्यु हो गई। जस्टिस सप्रू आपातकाल में भी नहीं झुके। वे उस पीठ के सदस्य थे, जिसने उस वक़्त कई तेजतर्रार आदेश दिए, इन आदेशों के बिना कई परिवार भूखे मर जाते।

अब हम वापस लौटते हैं..... 1982 में आंध्रप्रदेश के एक युवा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। आपातकाल के दौरान वह महाराष्ट्र में कॉलेज का एक छात्र था। उसने आपातकाल में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। प्रदर्शन में छात्र ने एक तख़्ती उठा रखी थी, जिस पर 'इंदिरा गांधी मुर्दाबाद' लिखा हुआ था। उसे गिरफ़्तार कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां छात्र ने मान लिया कि उसने तख़्ती उठाई हुई थी। छात्र को 'भारत की रक्षा से संबंधित नियमों' के तहत दोषी ठहराया गया और तुरंत छोड़ भी दिया गया, क्योंकि वह पहले ही उतने दिन जेल में बिता चुका था।

यहां उसकी रिहाई के आदेश से छात्र को लगा कि उसे बरी किया गया है। लेकिन ONGC ने राजद्रोह और एक चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने के आरोप में हुई इस सजा के आधार पर बाद में उसकी नौकरी और सेवाएं खत्म कर दीं।

उस युवा को कोर्ट में चल रही कार्रवाई के बारे में पता ही नहीं था। उसका मानना था कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के बाद जैसे ही छोड़ा गया था, तो उसे बरी कर दिया गया था। चूंकि युवा को कार्रवाई के बारे में पता ही नहीं था, इसलिए उसने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ़ कोई अपील दायर नहीं की। वह एक शानदार छात्र था और उसने इंजीनयरिंग की पढ़ाई अच्छे अंकों से पास की थी। उसका चयन भारतीय भूवैज्ञानिक सेवा और ONGC के लिए हुआ। उसने ONGC में नौकरी शुरू कर दी। छात्र को परीवीक्षा अवधि में रखा गया था। उसने एक सामान्य फॉर्म भी भरा था, जिसमें छात्र ने बताया था कि उसे गिरफ़्तार करने के बाद छोड़ दिया गया था। अगर उसने इस मामले के बारे में फॉर्म में नहीं बताया होता, तो किसी को इस घटना के बारे में पता ही नहीं चलता। क्योंकि यह घटना महाराष्ट्र में हुई थी और उसके चरित्र को आंध्रप्रदेश स्थित उसके गृह जिले से प्रमाणित किया गया था। 

इसके बाद कलेक्टर ने लड़के के चरित्र की पुष्टि करते हुए रिपोर्ट भेजी। लेकिन रिपोर्ट में यह जिक्र था कि उसे भारत की रक्षा के नियमों के तहत दोषी ठहराया जा चुका है। यह उस वक़्त की बात है जब जनता पार्टी चुनाव हार चुकी थी और इंदिरा गांधी वापस प्रधानमंत्री बन चुकी थीं। रिपोर्ट के बाद ONGC ने इस दोषसिद्धि के आधार पर लड़के की सेवाएं समाप्त कर दीं।

मैंने उस लड़के की सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए याचिका लगाई। यह याचिका जस्टिस सप्रू की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने पहुंची। शुरुआत में पीठ ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए सेवा समाप्ति के आदेश को रोक दिया। मैंने वह आदेश दोपहर के खाने के वक़्त पढ़ा। इलाहाबाद में फ़ैसलों पर खुले कोर्ट में दोपहर के खाने के बाद हस्ताक्षर किए जाते हैं, उस वक़्त कुछ 'अतिरिक्त जोड़ (मेंशन)' की अपील भी की जा सकती है। मैंने कार्रवाई शुरू होने के बाद कहा कि लड़के की सेवा समाप्ति पर कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के आदेश का पालन नहीं होगा, क्योंकि लड़के का सेवा निलंबन पहले ही प्रभावी हो चुका है। 

मेरी इस बात पर जस्टिस सप्रू ने मुझसे फाइल ली और अपनी लिखावट में लिखा, "अगर आदेश (निलंबन का) पहले ही प्रभावी हो चुका हो, तो याचिकाकर्ता को तुरंत सेवा में वापस लिया जाए।" लेकिन ONGC ने इस आदेश को नहीं माना। बदले में कंपनी ने इस आदेश को रोकने के लिए एक आवेदन (स्टे वेकेशन एप्लीकेशन) और एक काउंटर-एफीडेविट लगा दिया। साथ ही एक वरिष्ठ वकील को ज़िरह करने के लिए तैनात कर दिया। स्टे वेकेशन एप्लीकेशन पर जमकर तर्क-वितर्क हुए, सभी तरह के तर्क पेश किए गए, लेकिन जस्टिस SD अग्रवाल ने कोर्ट के पुराने अंतरिम-आदेश को बरकरार रखा।

अंतरिम आदेश पर दोबारा पुष्टि होने के बाद भी ONGC ने याचिकाकर्ता की सेवाएं बहाल नहीं की। तब केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। लेकिन वहां भी सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सेवा में वापस लेने की सलाह दी। अगर जस्टिस सप्रू ने उस लड़के को सेवा में वापस लेने का आदेश नहीं दिया होता, तो वह बहुत निराश होता। उस आदेश ने लड़के का जीवन बचा दिया। वह युवा लड़का परिवीक्षा अवधि में था। एक सामान्य से आदेश से बिना आरोप के उस लड़के की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। बस राजद्रोह के मामले में दोषसिद्धि को आधार बता दिया गया। समाप्ति के लिए कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। अगर कोर्ट वहां सेवाशास्त्र की तकनीकियों में उलझ जाता, तो अंतरिम आदेश तो छोड़ ही दीजिए, उस लड़के की याचिका पर सुनवाई करना तक मुश्किल हो जाता।

मुझे अच्छे से याद है, तब जस्टिस सप्रू ने मुझसे पूछा था, "क्या सेवा समाप्त करने के लिए सिर्फ़ यही ('इंदिरा गांधी मुर्दाबाद' वाली तख़्ती को उठाना और उस पर दोषसिद्ध होना) आधार है?" जब मैंने हां में उत्तर दिया, तो पीठ ने मेरी याचिका पर सुनवाई की और अंतरिम आदेश दिया। कई जज उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए राजी हो जाते, लेकिन बहुत कम जज ही सेवा समाप्ति पर रोक लगाने वाला अंतरिम आदेश देते। पर मुझे शक है कि शायद ही कोई जज सकारात्मक आदेश देने के साथ-साथ, संबंधित शख़्स को सेवा में वापस लेने का आदेश देता।

केवल ऐसा जज, जो जानता है कि क़ानून अच्छा होता है, लेकिन न्याय उससे ज़्यादा बेहतर है, वही इस तरह का आदेश दे सकता था। किसी को क़ानून का कैदी नहीं होना चाहिए: बल्कि क़ानून में डूबने और निराश रहने के बजाए उसके साथ ऊपर उठकर उड़ान भरना चाहिए।

यह लेख मूलत: द लीफ़लेट में प्रकाशित किया गया था। 

(यतींद्र सिंह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं। वह सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं। यह उनके निजी विचार हैं।) 

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें। 

Soar Rather than Sulk with Law

Judiciary in India
Allahabad High Court
Andhra pradesh
Emergency 1975

Related Stories

वर्ष 1991 फ़र्ज़ी मुठभेड़ : उच्च न्यायालय का पीएसी के 34 पूर्व सिपाहियों को ज़मानत देने से इंकार

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे पर लगी रोक की मियाद बढ़ाई

BHU : बनारस का शिवकुमार अब नहीं लौट पाएगा, लंका पुलिस ने कबूला कि वह तलाब में डूबकर मर गया

मुद्दा: हमारी न्यायपालिका की सख़्ती और उदारता की कसौटी क्या है?

तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं को भी है गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार 

लखीमपुर मामला : आशीष मिश्रा को ज़मानत देने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को उच्चतम न्यायालय ने किया खारिज

लखीमपुर कांड: मुख्य आरोपी और केंद्रीय मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा को मिली ज़मानत

यूपी चुनाव: ख़ुशी दुबे और ब्राह्मण, ओबीसी मतों को भुनाने की कोशिश

कोविड-19 की तीसरी लहर के मद्देनजर चुनावी रैलियों पर रोक लगाए सरकार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय


बाकी खबरें

  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License