NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कांग्रेस में हो रहा सांगठनिक बदलाव क्या उसकी डूबती नैया को पार लगा पाएगा?
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संगठन में व्यापक बदलाव करते हुए शुक्रवार को अपनी सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई (सीडब्ल्यूसी) का पुनर्गठन किया है। जानकारों का कहना है कि इस पुनर्गठन में पत्र लिखने वाले कई नेताओं का कद घटा दिया गया है।
अमित सिंह
12 Sep 2020
सोनिया गांधी

कांग्रेस में लंबे समय से चल रही उठापठक और सागर मंथन का परिणाम अब आना शुरू हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संगठन में व्यापक बदलाव करते हुए शुक्रवार को अपनी सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई (सीडब्ल्यूसी) का पुनर्गठन किया जिसमें पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं को जगह मिली है।

पार्टी में हो रहे सांगठनिक बदलाव से यह साफ जाहिर है कि कांग्रेस में आमूलचूल परिवर्तन की मांग के लिए पार्टी के 23 नेताओं ने जो पत्र लिखा था उसके बाद से सबकुछ बेहतर स्थिति में नहीं रह गया है। आपको याद दिला दूं कि पिछले महीने सात अगस्त को कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर मृतप्राय कांग्रेस को संजीवनी देने के लिए संगठन, उसकी कार्यप्रणाली और नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन की मांग की। 24 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के पूर्व किसी ने यह पत्र लीक कर दिया। पत्र में अनेक सुझाव भी दिए गए थे, जिससे पार्टी अपना खोया हुआ वैभव पुन: प्राप्त कर सके।

इसे भी पढ़ें : विश्लेषणः कांग्रेस का असल संकट विचारहीनता और स्वप्नहीनता है!

वास्तव में कांग्रेस में यह अप्रत्याशित था कि गुलाम नबी आजाद, वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल, मुकुल वासनिक, मनीष तिवारी, शशि थरूर जैसे वरिष्ठ पार्टी नेता ऐसा कदम उठाएंगे। लेकिन ऐसा लग रहा है कि इसके जवाब में पार्टी ने बहुत ही घिसा-पिटा रवैया अपनाया है। लेटर सामने आने के बाद से ही गांधी परिवार के ख़ुशामदी तमाम नेताओं ने चिट्ठी लिखने वाले इन नेताओं के खिलाफ अभियान चलाया। कई राज्यों में इन नेताओं के खिलाफ प्रस्ताव पेश किए गए। और अब पार्टी में इनके पर कतरे जा रहे हैं।

संगठन में व्यापक बदलाव करने के साथ कई ऐसे नेताओं का कद कम कर दिया गया है जिन्होंने हाल ही में सोनिया गांधी को पत्र लिखा था। इनमें सबसे प्रमुख नाम गुलाम नबी आजाद का है जिन्हें महासचिव पद से मुक्त कर दिया गया है, हालांकि उन्हें सीडब्ल्यूसी में स्थान दिया गया है। पत्र लिखने वाले वरिष्ठ नेताओं में शामिल मुकुल वासनिक के पास पहले कई राज्यों का प्रभार था, लेकिन अब उनके पास सिर्फ मध्य प्रदेश का प्रभार होगा, हालांकि उन्हें सोनिया गांधी के सहयोग के लिए बनी विशेष समिति में जगह दी गई है।

राजस्थान में पिछले दिनों बागी रुख अख्तियार करने वाले सचिन पायलट को इस फेरबदल में फिलहाल कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई है। पत्र लिखने वाले नेता मनीष तिवारी को भी फिलहाल कोई जिम्मा नहीं दिया गया है, हालांकि जितिन प्रसाद को पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाया गया है। वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बतौर स्थायी आमंत्रित सदस्य सीडब्ल्यूसी में वापसी की है।

जयराम रमेश, सलमान खुर्शीद, अविनाश पांडे और प्रमोद तिवारी को भी सीडब्ल्यूसी का स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मधुसूदन मिस्त्री की अध्यक्षता में केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण का पुनर्गठन किया गया है। इसमें मिस्त्री के अलावा राजेश मिश्रा, कृष्णा गौड़ा, ज्योतिमणि और अरविंदर सिंह लवली को बतौर सदस्य शामिल किया गया है।

पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से जारी बयान के मुताबिक, नयी कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) में 22 सदस्य, 26 स्थायी आमंत्रित सदस्य और नौ विशेष आमंत्रित सदस्य हैं।

इससे पहले भी संसद के मानसून सत्र में पार्टी ने अपने संसदीय दल में कुछ फेरबदल किए थे। इसमें भी पार्टी ने चिट्ठी लिखने वाले नेताओं की अनदेखी की है। वरिष्ठ नेताओं में गिने जाने वाले मनीष तिवारी और शशि थरूर को दरकिनार करके गौरव गोगोई को लोकसभा के उपनेता का पद मिला। साथ ही आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद जैसे नेताओं पर नकेल कसी गई।

इसी तरह यूपी में विधानसभा चुनाव 2022 को ध्यान में रखते हुए हाल ही में कांग्रेस ने सात कोर कमेटियों की घोषणा की। इसमें पूर्व सांसद जितिन प्रसाद और यूपी कांग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष राज बब्बर और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह को शामिल नहीं किया गया है। ये नेता उन 23 वरिष्ठ कांग्रेसियों में शामिल थे जिन्होंने नेतृत्व के मुद्दे पर पिछले दिनों पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा था।

ऐसे में अब कई सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस में हो रहा सांगठनिक बदलाव क्या उसकी डूबती नैया को पार लगा पाएगा? क्या ये बदलाव उस दिशा में हो रहे हैं जिसकी मांग चिट्ठी लिखने वाले नेताओं ने की थी? चिट्ठी लिखकर अपनी बात कहने वाले नेताओं का कांग्रेस में भविष्य क्या है? और क्या कांग्रेस में विचारधारा, संगठन और शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर बदलाव मुमकिन है? और क्या वाकई में कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होने जा रहा है?

इसे पढ़ें : क्या कांग्रेस ने वह मौका गवां दिया जो सालों बाद उसे मिला था?

इन सवालों के जवाब तलाशने से पहले चिट्ठी लिखने वाले नेताओं पर लगने वाले आरोपों की चर्चा कर लेते हैं। बागी नेताओं पर आरोप है कि इसमें से ज्यादातर बेहद कम जनाधार वाले नेता हैं और पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर डरे हुए हैं। उन्हें डर है कि शीर्ष नेतृत्व द्वारा उन्हें दरकिनार किया जा सकता है। कुछ नेताओं पर सत्ताधारी बीजेपी से सांठ गांठ रखने के भी आरोप लगे, हालांकि बाद में दोनों ही पक्षों द्वारा सख्ती से इस बात का नकार दिया गया।

अब चर्चा संगठन में हुए हालिया फेरबदल की करते हैं। जानकारों का कहना है कि यह बदलाव राहुल गांधी के मनमुताबिक किया गया है। उनके गुडबुक में शामिल लोगों को साफ तौर पर तरजीह दी गई है। कुछ लोग इसे राहुल की दोबारा ताजपोशी की कवायद से भी जोड़कर देख रहे हैं। इसके अलावा यह भी चर्चा है कि शीर्ष नेतृत्व ने इस बदलाव के जरिये यह संदेश देने की कोशिश की है कि आप आंख दिखाकर अपने मनमुताबिक फैसले नहीं करवा सकते हैं। साथ ही अगर बहुत पॉजिटिव होकर देखें तो एक मैसेज देने की कोशिश की गई है कि आप या तो गांधी परिवार के वफादार हैं या फिर आपके पास जनाधार है तभी आपकी बात सुनी जाएगी।

ऐसे में फिलहाल अभी यह कहना बहुत मुश्किल है कि ताजातरीन सांगठनिक बदलाव से कांग्रेस की डूबती नैया पार लग पाएगी, क्योंकि यह बदलाव परंपरागत ढर्रे पर ही हो रहे हैं इसमें कुछ भी नया नहीं है। दूसरी बात यह बदलाव उस दिशा में भी नहीं हैं जिसकी मांग चिठ्ठी लिखने वाले नेताओं ने की थी। क्योंकि इस बदलाव ने पार्टी में उन नेताओं को ही असुरक्षित बना दिया है जिन्होंने इसका झंडा बुलंद किया था।

इसके अलावा पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस न केवल कमजोर हुई है, वरन उसमें अनेक विसंगितयां भी घर कर गई हैं। उसका लगातार संगठनात्मक, विचारधारात्मक और नेतृत्वमूलक क्षरण होता गया है। ऐसे में पार्टी की दिक्कत यह है कि विचारधारा, संगठन और शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर बदलाव की ऐसी कोई कवायद फिलहाल नजर नहीं आ रही है जो इन कमियों से निजात दिलाए। और जहां तक बात कांग्रेस में चुनाव की है तो पहले भी दिखावे के लिए चुनाव होते रहे हैं इस बार भी हो सकते हैं लेकिन उसकी संभावना कम ही दिख रही है।

फिलहाल कांग्रेस का पुनरुत्थान ‘एक राष्ट्रीय अनिवार्यता है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है’ का तर्क देने वाले पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से पार्टी में बदलाव की बयार बह रही है। आने वाले थोड़े दिनों में ही इस नई टीम की भी परीक्षा हो जाएगी।

sonia gandhi
Congress party
Congress crisis
cwc
Monsoon Session of Parliament

Related Stories

ED के निशाने पर सोनिया-राहुल, राज्यसभा चुनावों से ऐन पहले क्यों!

ईडी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को धन शोधन के मामले में तलब किया

कांग्रेस के चिंतन शिविर का क्या असर रहा? 3 मुख्य नेताओं ने छोड़ा पार्टी का साथ

कपिल सिब्बल ने छोड़ी कांग्रेस, सपा के समर्थन से दाखिल किया राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन

कांग्रेस का संकट लोगों से जुड़ाव का नुक़सान भर नहीं, संगठनात्मक भी है

पीएम मोदी को नेहरू से इतनी दिक़्क़त क्यों है?

भाजपा से मुकाबला कर पाएगी कांग्रेस ?

विश्लेषण: कांग्रेस के ‘चिंतन शिविर’ से क्या निकला?

कांग्रेस का उदयपुर चिंतन शिविर: क्या सुधरेगी कांग्रेस?

इतिहास कहता है- ‘’चिंतन शिविर’’ भी नहीं बदल सका कांग्रेस की किस्मत


बाकी खबरें

  • punjab
    भाषा सिंह
    पंजाब चुनावः परदे के पीछे के खेल पर चर्चा
    19 Feb 2022
    पंजाब में जिस तरह से चुनावी लड़ाई फंसी है वह अपने-आप में कई ज़ाहिर और गुप्त समझौतों की आशंका को बलवती कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनावों में इतने दांव चले जाएंगे, इसका अंदाजा—कॉरपोरेट मीडिया घरानों…
  • Biden and Boris
    जॉन पिलगर
    युद्ध के प्रचारक क्यों बनते रहे हैं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश?
    19 Feb 2022
    हाल के हफ्तों और महीनों में युद्ध उन्माद का ज्वार जिस तरह से उठा है वह इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है
  • youth
    असद रिज़वी
    भाजपा से क्यों नाराज़ हैं छात्र-नौजवान? क्या चाहते हैं उत्तर प्रदेश के युवा
    19 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के नौजवान संगठनों का कहना है कि भाजपा ने उनसे नौकरियों के वादे पर वोट लिया और सरकार बनने के बाद, उनको रोज़गार का सवाल करने पर लाठियों से मारा गया। 
  • Bahubali in UP politics
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
    19 Feb 2022
    चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और…
  • Lingering Colonial Legacies
    क्लेयर रॉथ
    साम्राज्यवादी विरासत अब भी मौजूद: त्वचा के अध्ययन का श्वेतवादी चरित्र बरकरार
    19 Feb 2022
    त्वचा रोग विज्ञान की किताबों में नस्लीय प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी ना केवल श्वेत बहुल देशों में है, बल्कि यह पूरी दुनिया में मौजूद है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License