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विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!
सचमुच हम भारत के लोग.....हम देश की आधी आबादी आज इतिहास के किस मोड़ पर खड़े हैं? जो हो रहा है वह अप्रत्याशित है!
कुमुदिनी पति
31 Jan 2022
Hum Bharat Ke Log

आज हम बात करेंगे भारत की आधी आबादी की और उसकी हमारे गणतंत्र व संविधान से क्या अपेक्षाएं हैं। मैं बात शुरू करती हूं टीवी और फिल्मों की एक नामचीन अदाकारा, रत्नापाठक शाह की बात से। रत्ना ने कार्यक्रम ‘विमेन अगेन्स्ट हेट’ मे भारी मन से कबूल किया कि जिस दौर में वह पली-बढ़ी थीं, मन में नए आज़ाद भारत के सपने थे, ‘‘हमने वो सारे फायदे उठाए जो आज़ादी ने हमें प्रॉमिस किये थे। समानता, आज़ादी, अपनी बात कहने की स्वतंत्रता। आगे की ओर देखने का अंदाज़ था, शिक्षा सस्ती थी। जान-माल की सुरक्षा थी, किसी भी धर्म को मानने की आज़ादी थी, किसी भी पेशे को चुनने की छूट थी।’’

रत्ना मानती हैं कि मुश्किलें थीं और कमियां भीं, पर दिशा आगे बढ़ने की थी।

वह कहती हैं कि आज पीछे देखा जा रहा है और पुराने दौर की गलतियों का बदला लिया जा रहा है।

महिला विरोधी ऐप्स ने उन्हें हैरत में डाल दिया है। वह कहती हैं,‘‘युवाओं को कुछ लोग अपने निहित स्वार्थ-एक चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। एक हिंदू मां होने के नाते मैं कहूंगी कि यह हमारी संस्कृति नहीं है और इससे बहुतों को खतरा होगा, देश का नुकसान होगा। एक सभ्य समाज में यह चलने नहीं दिया जा सकता।’’

सचमुच हम भारत के लोग.....हम देश की आधी आबादी आज इतिहास के किस मोड़ पर खड़े हैं?

जो हो रहा है वह अप्रत्याशित है!

हम ढेर सारी समस्याओं से जूझ रहे थे पर पिछले लगभग 10 सालों में जो कुछ हुआ है वह अप्रत्याशित है। आज़ादी के बाद पहली बार पर्दानशीन औरतों को अपने जनानख़ानों से बाहर निकलकर 101 दिनों तक कड़कड़ाती ठंड में सीएए-एनआरसी-एनआरपी के खिलाफ जान से मारने की धमकियों और हमलों के बीच सड़क पर बैठना पड़ा। वहां 4 महीने के दुधमुंहे से लेकर 82 वर्षीय बिल्किस दादी को देखकर सर्वोच्च न्यायालय तक हैरान रह गया। क्या किसी ने इस बात का जवाब दिया कि आज़ाद हिंदुस्तान में छात्रों और आम लोगों की लड़ाई लड़ने औरतों को इस हद तक क्यों जाना पड़ा? कहां गईं संविधान की बातें? पुश्तों से भारत में रहने वालों से कागज़ मांगे जा रहे हैं, उन्हें अब क्या दूसरा विभाजन देखना होगा?

इससे भी पहले हमने आज़ाद भारत की एक और भयावह तस्वीर देखी- जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ वहशियाना पुलिस बर्बरता। लड़कियों को लाइब्रेरी से लेकर शौचालयों तक में बदसलूकी का शिकार बनाया गया। वे निहत्थी थीं और पुलिस लाठियों व बंदूकों से लैंस। उनकी गलती थी कि वे सीएए-एनआरसी-एनआरपी का शान्तिपूर्ण संवैधानिक तरीके से विरोध कर रही थीं। कौन थीं ये तथाकथित ‘देश की दुश्मन’? कोई कट्टर आतंकवादी, कोई विदेशी खुफिया या देश तोड़ने वाली ताकतें? नहीं, वे थीं 19-27 वर्षीय छात्राएं, जो बोल रही थीं क्योंकि बोलने की आज़ादी हर भारतीय को है। गर्भवती सफूरा ज़रगर को गिरफ़्तार किया गया। इतना ही नहीं नताशा नरवाल, दवांगला कलिता, गुलफिशा फातिमा जैसी जेएनयू की छात्राओं पर यूएपीए थोपा गया। लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना तो उनका संवैधानिक अधिकार है, फिर ऐसा बर्ताव क्यों? फिर भी, आज बेटियां कमर कस रही हैं जुल्म के खिलाफ!

पंचायतों और संसद में औरतों को जगह नहीं

राजनीति में हिस्सेदारी का अधिकार औरतों को संविधान से मिला। पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण भी औरतों ने लड़कर लिया। पर महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और स्वतंत्र पहचान से घबराकर उसे बलपूर्वक दबाने की कोशिश जारी है। उत्तर प्रदेश में जुलाई 2021 में ब्लॉक प्रमुख चुनाव के समय भारी हिंसा हुई। लखीमपुर खीरी की एक समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता की साड़ी तक खोलने का प्रयास हुआ। और इसी वर्ष अगस्त में राज्य सभा के सत्र के दौरान बाहर से लागों को संसद में लाकर महिला सांसदों पर हमला कराया गया। वैसे हम सांसद रेणुका चौधरी पर प्रधानमंत्री की भद्दी टिप्पणी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘‘दीदी, ओ दीदी’’ के पुकार के पीछे की सोच को भी बेहतर समझे चुके हैं। ऐसे ही नहीं है कि 25 सालों से 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की लड़ाई किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुच पाई। इसलिए प्रियंका गांधी का 40 प्रतिशत औरतों को टिकट देना तक मनुवादियों के गले नहीं उतर रहा।

उच्च शिक्षा और रोज़गार में महिलाएं हाशिये पर

जब महिलाओं की स्वतंत्रता को उच्छृंखलता माना जाएगा तो कौन लड़ेगा उनकी शिक्षा और रोज़गार के संवैधानिक अधिकार की लड़ाई? 2010 से शिक्षा का अधिकार कानूनी रूप से लागू है। सरकार ने ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ का नारा दिया-लगा कि कोई क्रान्तिकारी बदलाव आने वाला है। पर 2019-20 की एक रिपोर्ट के अनुसार माध्यमिक स्तर में भी 15 प्रतिशत छात्राएं पढ़ना छोड़ देती हैं। इसमें मध्य प्रदेश व गुजरात तथा 12 उत्तर पूर्वी व पूर्वी राज्यों का ड्रॉपआउट रेट राष्ट्रीय औसत से अधिक है। छात्राओं ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी काबिलियत बार-बार साबित की है, हर विधा को सीख रही हैं। पर माध्यमिक शिक्षा के बाद से उनका ड्रॉपआउट रेट बढ़ता जाता है। बाल अधिकार आयोग के अनुसार 15-18 उम्र की 40 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जातीं। इनमें 65 प्रतिशत घर के काम में लगी रहती हैं। आज भले ही हम डिजिटल इंडिया और स्वच्छ भारत में रहते हों, 62 प्रतिशत लड़कियां पैदल स्कूल जाती हैं और 23 प्रतिशत स्कूलों के शौचालय इस्तेमाल के लायक नहीं हैं। 11.5 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं। इसके अलावा सुरक्षा के सवाल भी हैं। अलवर, मुज़फ्फरनगर, हरियाणा.....सरकारी स्कूलों में छात्राओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटनाएं आम होती जा रही हैं। कैसे बचेंगी लड़कियां, कैसे पढ़ेंगी बेटियां? गांव-गांव में स्कूल और हर छात्रा के पास स्कूटी 21वीं सदी में भी सपना क्यों है? और, उच्च शिक्षा और प्रोफेशनल कोर्सेस के लिए बाहर जाना तो लग्ज़री सी है। महामारी और शिक्षा का निजीकरण भी उसे महंगा बना रहा तो लड़किया ही उससे बाहर हो रही हैं।

स्टार्टअप इंडिया और कौशल विकास के बावजूद महिला कार्यशक्ति क्यों घटती जा रही है?

महिलाओं को काम करने का हक भी कानूनी तौर पर पुरुषों के बराबर है। वो सबसे कठिन हालात में काम कर रही हैं, फिर क्या कारण है कि उनकी कार्यशक्ति में हिस्सेदारी 2005 में 26 प्रतिशत से गिरकर 2019 में 20.3 प्रतिशत हो गई और महामारी के बाद 16.1 प्रतिशत रह गई? ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘कौशल विकास’ जैसे नारे क्यों खोखले साबित हुए? स्वयंसहायता समूहों की महिलाओं को लॉकडाउन के बाद भी लोन वसूली के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है। एनजीओ में महिला कर्मियों की भारी संख्या थी, जो FCRA प्रतिबंधों के चलते बेरोज़गार हुई हैं।

महिला कार्यशक्ति को बढ़ाने के लिए औरतों पर घरेलू काम का बोझ घटाना होगा, पर पिछले दो साल में उल्टा ही हुआ है। 2018 की ग्लोबल मकिन्ज़े रिपोर्ट बताती है कि औरतों का 85 प्रतिशत समय घरेलू काम में खर्च होता है। बच्चों, बूढ़ों और बीमारों की देखभाल पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं दस गुना अधिक करती हैं। इसलिए उनका देश की जीडीपी में योगदान मात्र 18 प्रतिशत है। आज भी घरेलू काम को मान्यता नहीं है और उसका आर्थिक योगदान जीडीपी में नहीं जोड़ा जाता। तब हम किस बराबरी की बात कर रहे हैं? यदि लड़कियां पढ़ सकतीं और औरतें कार्यशक्ति का हिस्सा बन जातीं तो देश की जीडीपी में 770 अरब डॉलर का इज़ाफ़ा हो जाता! आधुनिक भारत क्या इसपर गौर करेगा?

ग़रीबी के कारण तीन बहनें करती हैं आत्महत्या?

उत्तर प्रदेश के अहिरौली की तीन बहनें-उम्र 16,14,11 वर्ष रेल की पटरी पर कूदकर जान दे देती हैं क्योंकि उनके घर में न एक छंटाक दाना था न अन्त्योदय कार्ड। मां विकलांग और पिता नहीं थे। ऐसा भयावह दृश्य आज़ाद भारत में हम देख रहे हैं। जहां तक अर्थव्यवस्था में महिलाओं की स्थिति व भूमिका का सवाल है, जेंडर गैप पटा नहीं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) का ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2020 कहता है कि भारत का स्थान 153 देशों में 112वां है। पिछले साल के लॉकडाउन के बाद तो 15 लाख औरतों ने रोज़गार खो दिया।

2021 ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्कोर 27.5 है और 6-23 माह के शिशुओं में 10 प्रतिशत को संपूर्ण पोषण मिलता है। पितृसत्तात्मक समाज में बेटियों की दशा का अनुमान हम लगा सकते हैं। 51.4 प्रतिशत औरतें रक्ताभाव ग्रसित हैं। इस स्थिति में औरतें कैसे कार्यशक्ति का हिस्सा बनेंगी? सरकार ने एक नीति तैयार की-जेंडर बजेटिंग होगी और महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा। 2005-06 से जेंडर रिस्पॉन्सिव बजट (GRB) की बात हुई भी पर वहां से आगे नहीं बढ़ी। केवल जेंडर बजट विवरण (GBS) वित्तीय वर्ष के अन्त में पेश कर दिया जाता है। इससे न ही महिला पक्षधर नीति निर्माण में मदद मिलती है न ही पिछली नीतियों का मूल्यांकन महिला सशक्तिकरण के दृष्टिकोण से होता है। मस्लन, 2019-20 के संपूर्ण बजट में जेंडर बजट का हिस्सा 5.29 प्रतिशत था। दूसरी बात, हाशिये पर जी रही औरतें, मस्लन अनुसूचित जाति व जनजाति तथा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधारने की बात क्या करें जब इस जेंडर बजट में आदिवासी, दलित व मुसिलम महिलाओं का हिस्सा क्रमशः 1.42, 1.34 और 3.29 है। आज हर महिला घरेलू बजट को लेकर परेशान है। दाल, ईंधन और तेल के दाम आसमान छू रहे हों तो महिलाएं ही अपने भोजन में कटौती कर रही हैं।

कोविड महामारी और महिला स्वास्थ्य की बदतर दशा

साधारण तौर पर भी महिलाओं को स्वास्थ्यसेवा नहीं मिलती। कोविड के दौर में न जाने कितनी स्वास्थ्यकर्मियों और उनके परिवार के सदस्यों की मौत हुई। आज़ाद भारत के सबसे सम्पन्न राज्य पंजाब में एक औरत ने मोगा के सिविल अस्पताल के फर्श पर बच्चे को जन्म दिया। लॉकडाउन में बिहार में एक महिला मरीज को गांव से अस्पताल तक कूड़ा गाड़ी में लाया जाता है। 8 माह की गर्भवती महिला लॉकडाउन के बाद कार्यस्थल से 200 किमी पैदल चलकर घर पहुंचती है। किस युग में जी रहे हैं हम?

भारत और हारवर्ड यूनिवर्सिटी के संयुक्त अध्ययन से पता चलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक केवल 37 प्रतिशत महिलाओं की पहुंच है। इनमें केवल 42 प्रतिशत महिलाओं को अस्पताल भर्ती की सुविधा मिल पाती है। और, जबकि पूरे विश्व में मातृत्व मृत्यु दर को 70 तक लाने की कोशिश जारी है, भारत में यह संख्या 113 है। फिर भी हम विश्वगुरू हैं और ‘‘सबके विकास’’ की बात करते हैं! जहां एक प्रधानमंत्री पब्लिसिटी के लिए 4300 करोड़ खर्च करते हों, क्या महिलाओं के लिए अलग सरकारी स्वास्थ्य बीमा और उनमें गरीब, बेवा या परित्यक्ता औरतों के लिए उच्च कोटि की निःशुल्क चिकित्सा सुविधा देना असंभव है?

‘‘गुड गवर्नेंस’’में महिलाओं की सुरक्षा कहां?

पिछले 10 सालों में समाज के भीतर औरतों के प्रति नफरत बढ़ी है। आज ‘‘मिसोजिनी”(misogyny) हर तरफ पैर पसारे बैठी है। और उसके साथ साम्प्रदायिक ज़हर भी घुल गया है। यह सचेत रूप से एक खास विचारधारा के तहत किया जा रहा है।

कार्यस्थल पर भी उत्पीड़न

तहलका हो या एशियन एज, टेरी हो या सर्वोच्च न्यायालय के सीजेआई का मामला, महिलाओं का यौन शोषण जारी है। और अधिकतर मामलों में उत्पीड़क बच जाते हैं। यही नहीं, आज तो पूरा माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि उत्पीड़ित महिला को ही गलत ठहराया जाए और उत्पीड़कों को महिमामंडित किया जा रहा है। क्राइम स्टेट के मुख्यमंत्री समाधान बताते हैं-कि लड़कियां भाई, पिता, पति के शरण में रहें, औरत स्वतंत्र न घूमे।’’ कठुआ से लेकर हाथरस तक हम एक नई प्रवृत्ति भी देखते हैं- उत्पीड़क, बलात्कारी व हत्यारे निर्लज्ज और निर्भीक बने हैं, विधायक बच्चियों को बंदी बनाकर बलात्कार कर रहे हैं, जश्न मनाते हैं। उत्पीड़क जिन्दा जलाते हैं, जीभ काटते हैं ताकि लड़की बयान न दे, फिर हिदायत देते हैं कि ‘‘संस्कारी” लड़कियों के साथ यौन हिंसा नहीं होती। पर सरकार लॉकडाउन के दौरान महिलाओं पर हिंसा की घटनाओं में कमी दिखाकर खुश है। इसका एकमात्र कारण था कि औरतें घर पर रहीं। जो हिंसा हुई वह दलित और मुस्लिम औरतों पर। और, घरेलू हिंसा के आंकड़ों में उछाल आ गया; राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसमें 94 प्रतिशत इज़ाफा दर्ज किया। निराशा और बेरोज़गारी के दौर में बहुतों ने अपनी भड़ास, अपनी निरर्थकता का गुस्सा भी सबसे कमज़ोर पर, यानी बीवी या बच्चे पर निकाला होगा। एक सभ्य समाज में ऐसा नहीं होना चाहिये। यह तभी होता है तब महिला के सम्मान को एक विशेष विचारधारा के तहत नीचे गिराया जाता है। आज बात यहां तक पहुंच गई है कि 18-20 साल के युवा मुस्लिम महिलाओं को सुल्ली डील्स और बुल्ली बाई ऐप्स के जरिये नीलाम कर रहे हैं। यह एक दिन में नहीं हुआ है। सोशल मीडिया में भाजपा का आईटी सेल लगातार महिलाओं को ट्रोल कर रहा है, महिलाओं को ही नहीं, विराट कोहली की नन्ही बेटी तक को बलात्कार की धमकी दी गई। संविधान में लिखी गई बातों की धज्जियां जब रोज़ उड़ाई जा रही हों, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं को क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता? वे संज्ञान नहीं लेते। दरअसल मीडिया, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सत्ताधरियों के इशारों पर काम कर रहे हैं, जनता के लिए नहीं। बहुत कम लोग ऐसे बचे हैं जो इनके भीतर भी संघर्ष कर रहे हैं। उनपर हमले जारी हैं।

अन्त में लड़ना तो उन्हीं को पड़ेगा जो फासिस्ट हमलों को सबसे अधिक भुगत रही हैं- महिलाएं; और दलित व मुसलमान, जो हाशिये पर हैं। सजग और एकजुट होने का समय है आज हम भारत के लोगों के लिए!

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें : महज़ मतदाता रह गए हैं हम भारत के लोग

हम भारत के लोग: झूठी आज़ादी का गणतंत्र!

आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष में हमारा गणतंत्र एक चौराहे पर खड़ा है

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Unequal society
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