NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विशेष: किसिम-किसिम के आतंकवाद
विविधता से भरे भारत में आतंकवाद के भी विविध रूप हैं! राजकीय आतंकवाद से लेकर कॉरपोरेट आतंकवाद तक।
अनिल जैन
24 Oct 2021
lakheempur

आतंकवाद को लेकर हमारे देश में यह धारणा बना दी गई है कि आतंकवादी सिर्फ एक ही धार्मिक समुदाय के होते हैं। इस धारणा को स्थापित करने में एक खास विचारधारा वाली राजनीतिक जमात के साथ ही कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया की भी अहम भूमिका रही है। हालांकि देश-दुनिया में जब भी कोई बड़ी आतंकवादी वारदात होती है या कहीं आतंकवाद के मुद्दे पर चर्चा होती है तो कई लोग तटस्थ या निरपेक्ष भाव से यह कहते मिल जाएंगे कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। ऐसा कहने वालों में शासन-प्रशासन और राजनीति के लोग भी होते हैं और मीडिया के भी। यह जुमला सार्वजनिक तौर पर तो वे लोग ज्यादा जोर-शोर से गुनगुनाते हैं जिनके जेहन में यह स्थायी तौर पर यह जमा हुआ है कि आतंकवादी सिर्फ एक ही धार्मिक समुदाय के लोग होते हैं, लेकिन निजी बातचीत में उनके मन की बात बाहर आ जाती है।

यह कथन सुनने में तो बहुत ही मासूम लगता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी ही होता है। लेकिन ऐसा कहने के साथ ही जब कोई यह कहता है कि कोई भी हिंदू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता तो उसका यह कथन न सिर्फ उसके पूर्व कथन का खोखलापन जाहिर करता है बल्कि उसके अपराध बोध और वास्तविक इरादों का परिचय भी कराता है। उसके इस कथन का निहितार्थ होता है कि कोई हिंदू तो आतंकवादी नहीं हो सकता, लेकिन कोई गैर हिंदू जरूर आतंकवादी हो सकता है। इस बात को मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बहुत ही साफ तौर पर कह चुके हैं।

गौरतलब है कि अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी एक चुनावी सभा कहा था कि देश का पहला आतंकवादी नाथूराम गोडसे हिंदू था, जिसने महात्मा गांधी की हत्या की थी। उनके इस बयान पर तमाम भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेता बुरी तरह उबल पड़े थे। उसी दौरान प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कुछ टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कमल हासन के बयान पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा था कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन इसी के साथ अगली ही सांस में वे यह कहना भी नहीं भूले थे कि हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता और जो आतंकवादी होता है, वह कभी हिंदू नहीं हो सकता।

यह बात किसी और व्यक्ति ने कही होती तो उसे नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश का प्रधानमंत्री ऐसा कैसे कह सकता है? यह पहला मौका था जब देश के किसी प्रधानमंत्री के मुंह से इस तरह की बात निकली हो। हो सकता है कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले भी इस तरह की बात कही हो, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने यह बात पहली बार कही थी और चुनाव अभियान के दौरान कही थी, जिसके राजनीतिक निहितार्थ समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं था। प्रधानमंत्री अपनी चुनावी रैलियों में लगातार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले भाषण दे रहे थे। गोडसे के बारे में भी उनके कथन से साफ था कि वे न सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे का बचाव कर रहे हैं, बल्कि वे परोक्ष रूप से हिंदुओं के अलावा देश के अन्य सभी गैर हिंदू समुदायों में आतंकवाद पनपने की गुंजाईश भी देख रहे हैं।

बहरहाल आतंकवाद का कोई धर्म या जाति होती है या नहीं, इस सवाल पर व्यापक बहस की जा सकती है, लेकिन यह हकीकत है कि धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति, खानपान, वेशभूषा आदि के मामले में विविधता से भरे हमारे देश में आतंकवाद के भी विविध रूप या किस्में हैं, जो देश के लगभग हर हिस्से में गांवों से लेकर शहरों तक अक्सर देखने में आती हैं।

इस समय कश्मीर की हालिया आतंकवादी वारदात चर्चा में हैं। बताया जा रहा है कि वहां आतंकवादी समूह लोगों के नाम पूछ कर और उनकी आईडी देख कर उनकी हत्या कर रहे हैं। वहां अगर सचमुच ऐसा हो रहा है तो इसमें आश्चर्य कैसा? उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों में भी यही हो रहा है। फल, सब्जी और चूड़ी बेचने वालों को उनका नाम पूछ कर और उनकी आईडी देख कर मारा-पीटा जा रहा है और उनके साथ लूटपाट की जा रही है।

सड़कों पर और बसों-ट्रेनों में लोगों के नाम पूछ कर या उनकी पोशाक और दाढ़ी से उनके संप्रदाय और जाति की शिनाख्त कर पीटे जाने की घटनाओं का सिलसिला भी पिछले कुछ सालों से बना हुआ है। लोगों को डरा-धमका कर और मार-पीट कर जय श्रीराम, वंदे मातरम् और भारतमाता की जय बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। गोरक्षा के नाम अल्पसंख्यक या दलित समुदाय लोगों को शारीरिक रूप से प्रताडित करने या जान से मार देने की घटनाएं भी पिछले कुछ वर्षों से खूब हो रही है। इसी आतंकवाद के तहत पिछले छह-सात वर्षों के दौरान नरेंद्र दाभोलकार, एमएम कलबुर्गी, गोविंद पानसरे, गौरी लंकेश जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों, लेखकों और पत्रकारों की हत्या कर दी जाती है और सत्ता का संरक्षण होने के चलते हत्यारों का कुछ नहीं बिगड़ता। सवाल है कि ऐसा करने वालों में और कश्मीर में खून-खराबा करने वाले आतंकवादियों में कैसे कोई फर्क किया जा सकता है?

देश के विभिन्न इलाकों में राजकीय आतंकवाद और न्यायिक आतंकवाद भी इसी पेटर्न पर काम कर रहा है। कथित तौर पांच या दस ग्राम हेरोइन रखने वाले लड़के को जेल भेज दिया जाता है और उसे जमानत नहीं मिलती, लेकिन किसानों पर गाड़ी चढ़ा कर उन्हें मार देने वाले मंत्री-पुत्र को पुलिस समन भेजकर पूछताछ के लिए बुलाती है और वह बड़ी मुश्किल से पुलिस के समक्ष पेश होता है। कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में जिस चूड़ी वाले की नाम पूछ कर पिटाई हुई थी, वह अभी भी जेल में सड़ रहा है और उसे पीटने वाले जमानत पर जेल से बाहर आ गए हैं।

इसी आतंकवाद के तहत दो दशक पहले गुजरात की सांप्रदायिक हिंसा के मामले में सरकार की मंशा के मुताबिक अदालत में बयान न देने पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी संजीव भट्ट को झूठों मामलों में फंसा दिया जाता है और अदालत उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना देती है। इस फैसले के खिलाफ उनकी अपील नीचे से ऊपर तक सभी अदालतों में खारिज हो जाती है। दूसरी ओर गुजरात की उसी सांप्रदायिक हिंसा में सैकडों लोगों की मौत के जिम्मेदार करार दिए जाने के बाद उम्र कैद की सजा प्राप्त भाजपा नेता बाबू बजरंगी और गुजरात सरकार में मंत्री रही माया कोडनानी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल जाती है। इसी आतंकवाद के चलते सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुम्बडे, वरवर राव जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लेखकों फर्जी मुकदमों में फंसा कर जेल में डाल दिया जाता है, जहां तारीख पर तारीख लगती रहती है और उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत न मिलने के बावजूद अदालत से उन्हें जमानत नहीं मिलती। इसी आतंकवाद के चलते न्यायिक हिरासत में आदिवासियों के 83 वर्षीय खिदमतगार फादर स्टेन स्वामी की मौत हो जाती है।

एक होता कॉरपोरेट आतंकवाद, जिसके तहत अरबों रुपये की हेरोइन एक उद्योगपति के निजी बंदरगाह पर पकड़ी जाती है और उसका कुछ नहीं होता। सरकार भी इस मामले में चुप रहती है और कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया में भी इतने बड़े मामले की खबर तक नहीं बनती। इसी आतंकवाद के तहत ही कई सफेदपोश आतंकवादी बैंकों से अरबों रुपए लूट कर विदेश भाग जाते हैं और सरकार की एजेंसियां हाथ मलती रहती हैं। कॉरपोरेट आतंकवाद के तहत बड़े उद्योगपति राजकीय आतंकवाद की मदद से जहां चाहे वहां आदिवासियों और गरीबों को उनकी जमीन से बेदखल करवा कर विकास के नाम पर अपना कारखाना स्थापित कर देते हैं। विस्थापित हुए लोग अगर इसका विरोध करते हैं तो राजकीय आतंकवाद उन पर लाठी और गोली बरसाता है। कॉरपोरेट क्षेत्र के आतंकवादियों का इसलिए कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि वे सरकार में बैठे लोगों के वित्त-पोषक होते हैं और बड़े मीडिया संस्थानों का संचालन भी उन्हीं के पैसे से होता है।

राजकीय आतंकवाद के तहत तो कुछ ऐसे समूहों को भी पाल कर रखा जाता है, जिनसे विशेष अवसर पर विशेष प्रयोजनों से आतंकवादी वारदात करवाई जाती हैं। ऐसा कश्मीर में भी होता है और देश के बाकी हिस्सों में भी। इसी आतंकवाद के तहत पुलिस किसी भी व्यक्ति को खूंखार अपराधी या संदिग्ध आतंकवादी करार देकर मार देती है और फिर मीडिया के जरिए बताया जाता कि अमुक व्यक्ति पुलिस से मुठभेड़ में मारा गया। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह नगर गोरखपुर में तो पुलिस ने रात के समय एक होटल में घुस कर जांच-पड़ताल के नाम पर वहां सो रहे एक व्यापारी को नींद से जगा कर इतना मारा कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।

पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में आतंकवाद का एक नया मॉडल सामने आया है, वह है धार्मिक आतंकवाद। यह आतंकवाद साधु-संतों और महंतों के मठों और आश्रमों पनपता है, जहां कभी गुरू अपने चेले को मरवा देता है तो कभी चेला गुरू को। इस सिलसिले में पिछले दिनों इलाहाबाद में एक मठ के नामचीन महंत की मौत के मामले को याद किया जा सकता है, जिसमें अभी भी यह साफ नहीं हुआ है कि उन्होंने आत्महत्या की या उनकी हत्या हुई। इन बाबाओं और महंतों के लिए किसी भी कमजोर व्यक्ति की या सरकारी जमीन पर कब्जा कर लेना भी साधारण बात है। लोग कुछ बाबाओं द्वारा अपने आश्रमों में 'श्रद्धालु’ महिलाओं का यौन शोषण भी किया जाता है और कभी-कभी मामला उजागर होने के डर से उन महिलाओं और मामले के राजदार अपने सेवकों की हत्या भी करवा दी जाती है। गुजरात का ऐसा ही एक बाबा पिछले कुछ सालों से राजस्थान के जोधपुर में आजन्म कारावास की सजा काट रहा है और हरियाणा के एक बाबा को हाल ही आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई है। चूंकि ऐसे बाबाओं और संतों-महंतों के आश्रमों में बड़े-बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे राजनेताओं, जजों और अफसरों का भी जाना होता रहता रहता है, लिहाजा उन आश्रमों की गतिविधियों की जानकारी होने के होने के बावजूद पुलिस उन पर हाथ डालने में हिचकती है।

इन किसिम-किसिम के आतंकवादियों के स्लीपर सेल मीडिया में भी घुसे हुए हैं, जो अव्वल तो इन आतंकवादियों की कारगुजारियों नजरअंदाज कर जाते हैं और जब किसी और माध्यम से उनकी कारगुजारियां सार्वजनिक हो जाती हैं तो उस पर लीपापोती करने के काम करते हैं।

कुल मिलाकर हमारा देश आतंकवाद प्रधान देश है, जिसमें किसिम-किसिम के आतंकवाद की फसल हर तरफ, हर समय लहलहाती दिखाई देती है। इसलिए यह कहने का कोई मतलब नहीं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Lakhimpur massacre
kisan andolan
Terrorism
Religion and Politics
State Terrorism
Corporate Terrorism

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

धर्म के नाम पर काशी-मथुरा का शुद्ध सियासी-प्रपंच और कानून का कोण

ज्ञानवापी अपडेटः मस्जिद परिसर में शिवलिंग मिलने का दावा, मुस्लिम पक्ष ने कहा- फव्वारे का पत्थर

केवल विरोध करना ही काफ़ी नहीं, हमें निर्माण भी करना होगा: कोर्बिन

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाः ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे सांप्रदायिक शांति-सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश और उपासना स्थल कानून का उल्लंघन है

लखीमपुर खीरी हत्याकांड: आशीष मिश्रा के साथियों की ज़मानत ख़ारिज, मंत्री टेनी के आचरण पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती


बाकी खबरें

  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License