NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
श्रीलंका की तबाही इतनी भयंकर कि परीक्षा के लिए कागज़ का इंतज़ाम भी नहीं हो पा रहा
श्रीलंका में रसोई गैस के एक सिलेंडर की कीमत तकरीबन 4200 श्रीलंकन रुपये तक पहुंच गयी है। एक किलो दूध का पैकेट तकरीबन 600 श्रीलंकन रुपये में मिल रहा है। कागज की कमी की वजह से सरकार ने स्कूली परीक्षा कैंसिल कर दी है। लोग पट्रोल डीजल और रसोई गैस के लिए घण्टों लाइन में लग रहे हैं।
अजय कुमार
25 Mar 2022
sri lanka
Image courtesy : The Citizen

श्रीलंका भयंकर आर्थिक तबाही से जूझ रहा है। कम आमदनी पर गुजर बसर करने वाले लोगों पर जमकर मार पड़ रही है। खबरें यहाँ तक आने लगी हैं कि बेरोजगारी और भोजन की कमी से उत्तरी श्रीलंका से भागकर कुछ लोग भारत के तमिलनाडु में शरण लेने पहुंचें हैं। भारत के दक्षिण में मौजूद यह द्वीप भारत के कुल क्षेत्रफल का महज 2 प्रतिशत है। मुश्किल से ढाई से तीन करोड़ लोग यहां रहते हैं। यह देश साल 1948 में अपनी आजादी के बाद अब तक के सबसे भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। तो चलिए समझते है कि श्रीलंका तबाही के इस माहौल में कैसे पंहुचा ?

श्रीलंका में रसोई गैस के एक सिलेंडर की कीमत तकरीबन 4200 श्रीलंकन रुपये तक पहुंच गयी है। एक किलो दूध का पैकेट तकरीबन 600 श्रीलंकन रुपये में मिल रहा है। कागज की कमी की वजह से सरकार ने स्कूली परीक्षा कैंसिल कर दी है। लोग पट्रोल डीजल और रसोई गैस के लिए घण्टों लाइन में लग रहे हैं। फिर भी उन्हें सामान नहीं मिल रहा है। हिंसक झडपें हो रही हैं। बिजली अगर कट जाती है तो घंटों नहीं आती है। बेरोजगारी का आलम जिंदगी को तबाह कर रहा है। दवाई मिलनी मुश्किल हो रही है। कई लोग भूखे पेट जिंदगी के आंखड़ें में डटें हुए है।

अब आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? इन सबका दोष श्रीलंका सरकार में मौजूद भ्रष्टाचार से होते हुए श्रीलंका सरकार द्वारा अपनाई जाने वाले नीतियों तक जाता है। साल 2019 में जब सरकार चुनकर आई तब कर यानी टैक्स की दरों में जबरदस्त कटौती की गयी। सरकार का खजाना भरने की बजाए पहले से कम हुआ। इसके ऊपर कोरोना की पहली लहर के दौरान हजारों कामगारों ने अपनी नौकरी गँवा दी। हजारों कामगारों को सरकार ने भटकते हुए बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया। कपड़ा फैक्ट्री से लेकर चाय के बागान तक सब बुरी तरह से बर्बाद हो गए। पर्यटन के क्षेत्र पर बहुत गहरा धक्का पहुंचा। यह सब ऐसे क्षेत्र थे जहाँ से निर्यात भी होता था, जहां से विदेशी मुद्रा की आवक होती थी।

इन सारी परेशानियों से लड़ने में श्रीलंका की सरकार नाकामयाब रही। उल्टे पहले से चली आ रही परेशनियों के ऊपर पिछले साल जैविक खेती करने की नीति लेकर चली आयी। यह नई नीती फेल रही। उत्पादन पहले से कम रहा। इसका असर ऐसा हुआ कि जो श्रीलंका चावल का निर्यात करता था उसे चावल आयात करना पड़ा। भोजन की कमी की वजह से मारामारी हो गयी। उर्वरक वाली खेती की जैविक खेती की नीति ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की बुनियाद तोड़ दी। जो श्रीलंका कोरोना से पहले उच्च मध्यम आय वाले देशों में शुमार हो रहा था, उसके ढेर सारे लोगों कोरोना के बाद गरीबी रेखा से नीचे चले गयी। महंगाई बढ़ी, ऊपर से बेरोजगारी बढ़ी और लोग गरीबी रेखा से नीचे चलते गए।

साल 2021 के अंत में श्रीलंका के वित्तीय सम्प्रभुता का दिवाला निकल गया। यानी श्रीलंका का कर्जा श्रीलंका के जीडीपी से ज्यादा हो गया। श्रीलंका का कर्जा श्रीलंका के जीडीपी के 115 प्रतिशत से बढ़ गया है। आगे और बढ़ने की सम्भवना है। जीवन जीने की लागत यानी महंगाई दर 17.5 प्रतिशत से करीब चल रही है। विदेशी मुदा का भंडार कम हो गया है। जिसकी वजह से श्रीलंका में एक डॉलर की कीमत 287 श्रीलंकन रुपये तक पहुंच गयी है। यानी 1 डॉलर के लिए 287 श्रीलंकन रुपये देने पड़ रहे हैं।

श्रीलंका बहुत छोटा देश है। इसलिए अपने लोगों की जरूरत को पूरा करने के लिए वहां आयात अधिक होता है। वह सामान और सेवाएं जिनका श्रीलंका में आयात किया जाता है, वह सब महंगे हो चुके हैं।  

पेट्रोल से लेकर रसोई गैस और कागज़ की महंगाई की यही वजह है। श्रीलंका में जो रसोई गैस मुहैया करवाने के काम से जुड़े हैं,उनके पास रसोई गैस खरीदने के पैसे नहीं है। आर्थिक जानकारों  का कहना है कि श्रीलंका की स्थिति वैसे लोगो की तरह है जो पहले से कर्ज में दबे होते है और खुद को बचाने के दुबारा कर्ज मांगते है। ऐसे लोगों को कर्ज आसानी से नहीं मिलता। कर्ज देने वाले डरते है कि अगर पैसा लगाएंगे तो पैसा डूबेगा। यही हाल श्रीलंका के साथ हो रहा है। यानी श्रीलंका को आर्थिक संकट से बचाने के लिए किस तरह से कर्ज लिए जाए, इसे लेकर वह बहुत अधिक परेशनियों का सामना कर रहा है।  

पीपल डिस्पैच की श्रिया सिंह कहती हैं कि श्रीलंका खुद को आर्थिक संकट से बाहर निकालने  के लिए द्विपक्षीय समझौते पर भरोसा कर रहा है। देशों से मदद ले रहा है। वैश्विक संस्थाओं से मदद लेने में झिझक रहा है। जबकि 2009 के बाद से ही उदारवादी नीतियां अपना ली थी। तब से वह आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक से कर्ज लेते आ रहा है। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं से कर्ज लेने में दिक्कत यह होती है कि ये संस्थान पैसा देते समय यह शर्त भी रखते है कि पैसा लेने वाला देश किस तरह की आर्थिक नीतियां अपनाएगा? लेकिन यह तर्क श्रीलंका पर लागू नहीं होता है। विपक्षी पार्टी से लेकर नागरिक संगठन तक सब विरोध प्रदर्शन कर रहे है। खबर आ रही है कि श्रीलंका वैश्विक संस्थाओं से कर्ज पर राजी हो चुका है। लेकिन श्रीलंका की स्थिति इतनी भयवाह हो चुकी है कि अभी ढंग से नहीं कहा जा सकता कि वह कैसे और कब तक खुद को तबाही से निकाल पायेगा?

Sri Lanka
Economic crisis in Sri Lanka
Economic Recession
poverty
Sri Lankan Currency
Hunger crisis in Sri Lanka
Government of Sri Lanka
Gotabaya Rajapaksa

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

भारत में असमानता की स्थिति लोगों को अधिक संवेदनशील और ग़रीब बनाती है : रिपोर्ट

कार्टून क्लिक: पर उपदेस कुसल बहुतेरे...

ज्ञानवापी, ताज, क़ुतुब पर बहस? महंगाई-बेरोज़गारी से क्यों भटकाया जा रहा ?

श्रीलंका की मौजूदा स्थिति ख़तरे से भरी

भोजन की भारी क़िल्लत का सामना कर रहे दो करोड़ अफ़ग़ानी : आईपीसी

श्रीलंका में सत्ता बदल के बिना जनता नहीं रुकेगीः डॉ. सिवा प्रज्ञासम


बाकी खबरें

  • आगरा शिखर सम्मलेन: भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का अहम पड़ाव
    न्यूज़क्लिक टीम
    आगरा शिखर सम्मलेन: भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का अहम पड़ाव
    12 Jul 2021
    भारत और पाकिस्तान के रिश्तों ने कई उतार- चढ़ाव और कई ऐतिहासिक मोड़ देखे हैंI इन्हीं में से एक था 20 साल पहले, 2001 में हुआ 'आगरा सम्मेलन'। क्या था यह सम्मलेन और क्या रहे थे इसके परिणाम, इसी पर आज…
  • पड़ताल दुनिया की- हत्या और शोषण के बीच फंसा हैती
    न्यूज़क्लिक टीम
    पड़ताल दुनिया की- हत्या और शोषण के बीच फंसा हैती
    12 Jul 2021
    ‘पड़ताल दुनिया की’ कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने हैती के राष्ट्रपति की हत्या के बाद गहराए संकट को ऐतिहासिक महत्व के साथ समझने की कोशिश की न्यूज़क्लिक के एडिटर-इन-चीफ प्रबीर पुरकायस्थ से।…
  • इतवार की कविता : 'सिर्फ़ अपना घर न बचा शहर को बचा...'
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'सिर्फ़ अपना घर न बचा शहर को बचा...'
    11 Jul 2021
    इतवार की कविता में आज पेश है पाकिस्तान के शायर तैमूर हसन की एक ग़ज़ल जो इंसानियत के 'शहर' को बचाने की बात करती है।
  • क्या चीन एक पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश में तब्दील हो गया है?
    अनीश अंकुर
    क्या चीन एक पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश में तब्दील हो गया है?
    11 Jul 2021
    मार्क्सवाद किसी चीज को ठहरे हुए रूप में नहीं बल्कि एक प्रक्रिया के रूप में देखता है। चीन कहां था? आज वो कहां पहुंचा है, अभी उसके भीतर क्या समस्यायें हैं? यह सब सवालों के उत्तर जाने बिना हमारी चीन को…
  • विशेष: युद्धोन्माद नहीं, मनुष्य का मन तो शांति चाहता है
    शंभूनाथ शुक्ल
    विशेष: युद्धोन्माद नहीं, मनुष्य का मन तो शांति चाहता है
    11 Jul 2021
    यह भय ही दरअसल हथियारों की होड़ में फंसाता है और गरीब मुल्क इस होड़ में अपनी आय का बड़ा हिस्सा हथियारों की ख़रीद पर खर्च कर देते हैं। जबकि एक लोक कल्याणकारी सरकार के लिए अपनी सकल आय का बड़ा हिस्सा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License