NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
वंचितों के साथ खड़े रहना ही स्टैन स्वामी का अपराध है!
स्टैन स्वामी का नाम 2018 से ही चर्चा में था। तब दो चरणों में जून और अगस्त के महीने में भीमा कोरेगांव केस में गिरफ़्तारियां हुई थीं।
एनी डोमिनी
28 Oct 2020
Stan Swamy

एनी डोमिनी लिखती हैं, वंचित और दबे-कुचले तबक़ों की लड़ाई लड़ने वाले ख्यात सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ राज्य की दमनकारी कार्रवाई जारी है। जो लोग इन कार्यकर्ताओं के काम का समर्थन करते हैं, उन्हें आज अपनी आवाज़ बुलंद करने की ज़रूरत है।

——

अगर आप बिना भगवा चश्मे के देश के राजनीतिक शरीर पर नज़र डालें, तो आप एक बहुत बीमार जीव को पाएंगे। एक ऐसा जीव जो खुद के हृद्य, मस्तिष्क और फेफड़ों का भक्षण कर रहा है, ताकि वह अपनी बेलगाम राज्य शक्ति की भूख को मिटा सके। यह एक ऐसा जीव है, जो सांस लेने और जीने के लिए जरूरी अंगों पर कीड़े-मकोड़े छोड़कर अपने खुद के बौद्धिक श्वसन तंत्र को चबा रहा है।

आपको दिखाई देगा ख्यात और बड़े जिगरे वाली महिलाओं और पुरुषों को जेलों में डाला जा रहा है। 33 साल के उमर खालिद से लेकर 83 साल के मसीही महंत फादर स्टैन स्वामी तक, जेल अपने भीतर असहमति की आवाज़ों को समेट रहा है।

ऐसी संस्थागत क्रूरता पर उपमाएं कम पड़ जाती हैं।

आखिर आप राज्य की उस दुष्टता को कैसे समझेंगे, जिसमें एकजुटता दिखाने को अपराध माना जाता है।

स्टैन स्वामी हमेशा आदिवासियों के बीच में रहकर, कॉरपोरेट की भूख और दमनकारी राज्य के खिलाफ़ आदिवासियों के हक़ की लड़ाई लड़ते रहे। इन आदिवासियों पर कई तरीके से दमन होता आया है। अब स्टैन स्वामी को एक अपराधी के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है।

10,000 पेज की एक चार्जशीट, स्टैन स्वामी के किरदार को उनकी असल ज़िंदगी से बिलकुल उलट और संदिग्ध तरीके से पेश करती है। जबकि स्वामी का एकमात्र उद्देश्य यह था कि जिन आदिवासियों के बीच वो रहते आए हैं, उन्हें उनकी ज़मीन, जल और वन संसाधनों से अलग ना किया जाए। इन संसाधनों को आदिवासियों ने कई शताब्दियों से संरक्षित किया है। फादर स्टैन स्वामी पर भारत के सर्वोच्च "आतंक रोधी" संगठन राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने, राजद्रोह, माओवादी होने, आतंकी गतिविधियों समेत भीमा कोरेगांव की हिंसा की योजना बनाने में शामिल होने का आरोप लगाया है।

bheema.jpg

यह एक ऐसा भंवर है, जो सुधा भारद्वाज और आनंद तेलतुंबड़े को पहले ही निगल चुका है। इस भंवर में युवा पर्यावरण अधिकार कार्यकर्ता महेश राउत भी डूब चुके हैं। महेश ने भीमा कोरेगांव से जुड़े आरोपों में गिरफ़्तार होने के एक साल पहले ही एक रिपोर्ट प्रकाशित कर बताया था कि कैसे सरकार खनन कंपनियों को मनमुताबिक़ ज़मीन और वनाधिकार दे रही है। इस भंवर में आदिवासियों के लिए खड़ी होने वाली डॉक्टर शोमा सेन और आदिवासियों के अधिकारों के लिए कोर्ट में लड़ने वाले सुरेंद्र गाडलिंग भी समा चुके हैं।

राज्य की नज़रों में दबे-कुचलों के साथ खड़े होना सबसे बड़ा अपराध है, यह राज्य अपने लोगों में समान नागरिक नहीं देखता, बल्कि उन्हें एक उपकरण के तौर पर देखता है, जो उसकी राक्षसी ताकत को दूसरों पर विस्तार देने में मदद कर सकते हैं।

स्टैन स्वामी की का नाम 2018 से ही उछाला जा रहा था, जब दो चरणों में जून और अगस्त के महीने में गिरफ़्तारियां हुई थीं। तबसे अपनी उम्र के नौवें दशक में चल रहे और अब "पार्किंसन डिसीज़" नाम के रोग के शिकार हो चुके स्वामी की गिरफ़्तारी का अंदेशा था। 

सितंबर, 2018 में स्टैन स्वामी ने एक प्रेस रिलीज़ में कहा था कि उनके खिलाफ़ दायर किया गया मुकदमा पूरी तरह मनगढंत है। उन्होंने कहा, "मैं आदिवासियों और दलितों में संविधान प्रदत्त उनके अधिकारों के लिए जागरुकता का प्रसार कर रहा हू्ं। खासकर आदिवासियों में, जिन्हें संविधान की पांचवी अनुसूची और PESA कानून में ग्राम सभा के ज़रिए स्वशासन के अधिकार मिले हैं। मैंने उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फ़ैसले के बारे में भी जागरुक करने की कोशिश की, जिसमें कहा गया कि 'ज़मीन का मालिक ही उसके नीचे दबे खनिजों का स्वामित्व रखता है।' मैंने 'भूमि बैंक (लैंड बैंक)' बनाए जाने का भी विरोध किया, जिसका उद्देश्य सड़कें, नदी, तालाब, श्मशान घाट, सामुदायिक जंगल ज़मीन समेत दूसरी चीजों पर कब्ज़ा करने का है। जबकि पारंपरिक तौर पर इनका उपयोग आदिवासी समुदाय करता आया है।"

उमर खालिद ने भविष्य में उभरने की संभावना रखने वाली "स्टेटीज़ेनशिप" किस्म की व्यवस्था के खिलाफ़ आवाज उठाई थी। "स्टेटीज़ेनशिप" ऐसी व्यवस्था होती है, जिसमें नागरिकता का एकमात्र पैमाना कार्यपालिका द्वारा किया गया दस्तावेज़ीकरण होता है। भारत के मामले में "स्टेटीज़ेनशिप" नागरिकता संशोधन अधिनियम और प्रस्तावित "नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (NRC)" का मारक मिश्रण है। वहीं सुधा भारद्वाज, फादर स्टैन स्वामी और महेश राउत जैसे लोग कॉरपोरेट और राज्य का घृणित जाल, जो आदिवासियों को अधिकारों से वंचित करने का काम करता है, उसका खुलासा करने में अहम रहे हैं।

ऐसा कहना होगा कि राज्य ने उन्हें हिरासत में ले लिया है, ताकि वे हम तक ना पहुंचें। अब हमें आवाज ज़्यादा बुलंद करने की जरूरत है, क्योंकि अब एकजुटता कमज़ोर आवाज़ में दिखाने का वक़्त नहीं है।

कितने ही आदिवासियों को यह कहने के लिए अपराधी घोषित कर दिया गया कि ज़मीन उनकी है, राज्य की नहीं, जो चंद कौड़ियों में उन्हें बेच देता है। दबे-कुचले लोगों के साथ एकजुटता दिखाना राज्य की नज़रों में सबसे बड़ा अपराध है। यह राज्य अपने लोगों में समान नागरिक नहीं देखता, बल्कि उन्हें एक उपकरण के तौर पर देखता है, जो उसकी राक्षसी ताकत को दूसरों पर विस्तार देने में मदद कर सकते हैं। 

स्टैन स्वामी, सुधा भारद्वाज, महेश राउत, शोमा सेन और दूसरे लोग, जो "विकास मॉडल" (बढ़ती असमता, गरीबी और भूख सूचकांकों की पृष्ठभूमि में यह पूछना होगा कि किसका विकास?) का राग नहीं अलापते, इन लोगों की सच्चाई और दया की तरफ प्रतिबद्धता ही उन्हें राज्य का दुश्मन बनाती है।

दिल्ली के प्रेस क्लब में हुए एक हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरुंधति रॉय ने इन लोगों को सलामी दी। जबकि यह लोग पहले इन देश की स्थिति पर होने वाली इन प्रेस कॉन्फ्रेंसों का हिस्सा होते थे। रॉय ने कहा कि अब कोई भी "ख्यात" नहीं है, क्योंकि राज्य किसी को भी उठाकर बर्बाद कर सकता है। रॉय ने इस सड़ी हुई व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा मुख्यधारा की मीडिया, खासकर टीवी एंकर्स को बताया। यह सड़ी हुई व्यवस्था लगातार ढह रही है, लेकिन इस आत्महंता व्यवस्था को नफरत और झूठ की पाइपलाइन से लगातार सींचा जा रहा है। रॉय के साथ उस दिन जेल में बंद लोगों के वो भूत शामिल हुए, जो सच्चाई और न्याय के योद्धा हैं, जो हर दिन मृत होती आत्माओं से पैदा होते अन्याय के खिलाफ़ खड़े हैं।

ऐसे लेखक जिन्हें अब भी उपनिवेश बन चुके इस देश के प्रेस के पन्नों तक पहुंच हासिल है, देश की राजनीतिक स्थिति को लेकर "आत्मविवेक का नुकसान", "बिना नैतिकता की राजनीति" जैसे उनके मुहावरों का इस्तेमाल पर्याप्त नहीं होगा। आपको स्पष्ट तौर पर लगातार इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के नाम लेने होंगे। प्रेस के बहुमूल्य पन्नों को खराब मत कीजिए, जो विमर्श को वैधता भी प्रदान करते हैं और उनका पर्दाफाश भी करते हैं।

यह मत कहिए कि स्टैन स्वामी, सुधा भारद्वाज, सुरेंद्र गाडलिंग और शोमा सेन को गलत तरीके से जेल में बंद कर रखा गया है। कहिए कि राज्य ने उन्हें इसलिए बंद कर रखा है, ताकि उसका सच हम लोगों तक ना पहुंचे। बुलंद आवाज़ का इस्तेमाल करिए, क्योंकि एकजुटता अब कमज़ोर शब्दों से नहीं दिखाई जा सकती।

यह लेख द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

(एनी डोमिनी एक पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Stan Swamy’s Crime Is His Solidarity with the Marginalised

Bhima Koreagon
NIA
Sudha Bharadwaj
gautam navlakha
Anand Teltumbde
BJP
Stan Swamy

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • बिहार में ज़हरीली हवा से बढ़ी चिंता, पटना का AQI 366 पहुंचा
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार में ज़हरीली हवा से बढ़ी चिंता, पटना का AQI 366 पहुंचा
    24 Nov 2021
    सोमवार को बिहार के कटिहार का एयर क्वालिटी इंडेक्स 386 था जबकि पूर्णिया का 384, वहीं सिवान का 381, जबकि दरभंगा का 369 दर्ज किया गया था।
  • Communalism
    बी सिवरामन
    सांप्रदायिक घटनाओं में हालिया उछाल के पीछे कौन?
    24 Nov 2021
    क्या भाजपा शासित पांच राज्यों में तीन महीने की छोटी अवधि के भीतर असंबद्ध मुद्दों पर अचानक सांप्रदायिक उछाल महज एक संयोग है या उनके पीछे कोई साजिश थी?
  • अमेय तिरोदकर
    क़रीब दिख रही किसानों को अपनी जीत, जारी है 28 नवंबर को महाराष्ट्र महापंचायत की तैयारी
    24 Nov 2021
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विवादित कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा के बावजूद, किसानों अपना प्रदर्शन जारी रखने के लिए दृढ़ निश्चय कर चुके हैं। शाहपुर के दत्तात्रेय शंकर महात्र
  •  "Ceasefire announced by the government, our struggle will continue
    ओंकार सिंह
    “संघर्ष विराम की घोषणा सरकार की, हमारा संघर्ष जारी रहेगा”
    24 Nov 2021
    किसान आंदोलन की एक ख़ासियत यह रही कि विभिन्न संगठन अपने अलग-अलग झंडों के साथ शामिल हुए। जिसको लेकर कहीं कोई ऐतराज नहीं रहा और यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती रही। लखनऊ महापंचायत में इस विविधता और उसकी…
  • cartun
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: किताबों की राजनीति, राजनीति की किताब
    24 Nov 2021
    राजनीति में समय का बहुत महत्व है। और दोनों किताब वाकई भाजपा के हिसाब से ‘समय पर’ ही आईं हैं!
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License