NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आंकड़ों की बाज़ीगरी से बिगड़ती बेरोज़गारी को छुपाना ग़लत 
मोदी सरकार जिस डेटा का बखान कर रही है, वह सालाना आधार पर देश में रोजगार परिदृश्यों की सामान्य स्थिति का डेटा है।
ज्ञान पाठक
31 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
आंकड़ों की बाज़ीगरी से बिगड़ती बेरोज़गारी को छुपाना ग़लत 

डॉ॰ ज्ञान पाठक लिखते हैं कि हमें पीएलएफएस डेटा द्वारा दर्शाए गई 'सामान्य स्थिति' पर भरोसा नहीं करना चाहिए। बल्कि बेरोजगारों के दुखों और तकलीफ़ों को कम करने के लिए धरातल पर मौजूद 'वर्तमान स्थिति' पर विचार करना चाहिए, जो बहुत संकटग्रस्त है और इस संकट के चलते कई बेरोज़गार आत्महत्या भी कर रहे हैं। 

हाल ही में जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) देश को यह बताने की कोशिश कर रहा है कि श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) और बेरोजगारी दर दोनों में पिछले तीन वर्षों से सुधार हो रहा था। ऐसा नतीजा सरकार ने स्पष्ट रूप से जमीन पर बिगड़ती वास्तविकता पर विचार किए बिना राजनीतिक पैंतरेबाजी का सहारा लेकर निकाला है, जबकि उन आंकड़ों को समझे बिना जो छुपाते कम और दिखाते ज्यादा हैं। 

देश जिस बेरोजगारी के संकट से जूझ रहा है, उसे छिपाने के लेई इस तरह के डेटा के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

हमें अपनी प्राथमिकताओं को रास्ते पर लाने के लिए किसी भी योग्य निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आलोचकों और सरकार दोनों को समझना होगा। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 में देश में श्रम भागीदारी 36.9 फीसदी और बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी थी। यह याद रखना चाहिए कि उस वर्ष की रिपोर्ट ने देश में बहुत बड़ा विवाद पैदा कर दिया था क्योंकि सरकार ने इसे  दबाने की कोशिश की थी,और पैनल के सदस्यों में से एक ने विरोध में इस्तीफा भी दे दिया था। लीक हुई रिपोर्ट में दावा किया गया था कि देश में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है, जिसे सरकार ने नकार दिया क्योंकि रिपोर्ट लोकसभा चुनाव-2019 से ठीक पहले आई थी। हालांकि, चुनाव खत्म होने के बाद, सरकार ने इन आंकड़ों को स्वीकार कर लिया था। इसलिए, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बेरोजगारी दर तभी से बिगड़ती जा रही थी।

आकलन की एक नई प्रणाली अपनाने के बाद यह पहली रिपोर्ट आई थी। सरकार ने तब एनएसएसओ में कुछ ढांचागत बदलाव किए थे। तब से एनएसओ सर्वे कर रहा है। 2018-19 के सर्वेक्षण में एलएफपीआर में 37.5 प्रतिशत का सुधार दिखाया गया है, जो 2019-20 में बढ़कर 40.1 प्रतिशत हो गया था। इस अवधि के दौरान रिपोर्ट बेरोजगारी की दर में भी सुधार दिखाती है जो 2018-19 में 6.1 प्रतिशत से गिरकर 5.8 प्रतिशत और 2019-20 में 4.8 प्रतिशत हो गई थी।

आलोचक हमें कुछ अलग ही बात बताते रहे हैं। उनका कहना है कि देश में महामारी के आने के पहले से ही बेरोजगारी बढ़ रही थी, जिसने एलएफपीआर और बेरोजगारी दर को और खराब कर दिया। वे सवाल उठाते हैं कि जब देश की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक गिरावट के दौर से गुजर रही थी, तब बेरोजगारी दर में सुधार कैसे हो सकता है, जबकि 2019-20 में विकास दर भी घटकर केवल 4.2 प्रतिशत रह गई थी?

इस प्रकार आलोचकों के भीतर डेटा, इसके संग्रह के तरीके और वार्षिक आधार पर विश्लेषण को लेकर संदेह हो गया है।

मोदी सरकार जो डेटा उद्धृत कर रही है, वह सालाना आधार पर देश में रोजगार परिदृश्यों की सामान्य स्थिति है। अब तस्वीर को स्पष्ट करने के लिए पीएलएफएस डेटा में गहराई से उतरना होगा। वर्तमान स्थिति काफी अलग है जिसके लिए आंकड़े साप्ताहिक आधार पर इकट्ठे किए जाते हैं और उनका विश्लेषण किया जाता है। जुलाई-सितंबर 2019 के दौरान, एलएफपीआर 36.8 प्रतिशत था, जो अगली दो तिमाहियों में थोड़ा सुधरकर 37.2 और 37.5 हो गया था, लेकिन अप्रैल-जून 2020 की अंतिम तिमाही में तेजी से गिरकर 35.9 प्रतिशत पर आ गया था, जो पहली तिमाही से भी कम 0.9 प्रतिशत था। इन तिमाहियों के दौरान बेरोजगारी दर क्रमशः 8.4, 7.9, 9.1 और 20.9 प्रतिशत हो गई थी, जो बेरोजगारी की स्थिति में गिरावट को दर्शाता है। सर्वेक्षण के तहत पाया गया कि वर्ष की सभी चार तिमाहियों में, 15-19 वर्ष की बीच के युवाओं के भीतर बेरोजगारी की दर कहीं अधिक खराब थी जो क्रमशः 20.6, 19.2, 21.1 और 34.7 प्रतिशत थी। जब देश में महामारी फैली थी या फैल रही थी, तब जमीन पर यही वास्तविक स्थिति थी। यही 'वर्तमान स्थिति' थी जिसे 'सामान्य स्थिति' बता कर सरकार उद्धृत कर रही है और सच्चाई को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही है।

यहाँ तक कि पीएलएफएस सर्वेक्षण में भी बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति और श्रम बल की भागीदारी दर अचानक खराब हो गई नज़र आती है। 24 मार्च, 2020 को देश में लॉककडाउन किया गया था, और तब जनवरी-मार्च 2020 के दौरान, एलएफपीआर दर 37.5 थी और  बेरोजगारी दर 9.1 थी, और युवा के भीतर बेरोजगारी दर 21.1 प्रतिशत थी। जब हम केवल 'सामान्य स्थिति' के आंकड़ों को देखते हैं तो यह जमीनी हकीकत की 'वर्तमान स्थिति' को छुपा देती है।

'वर्तमान स्थिति' के आंकड़ों से पता चलता है कि मई 2020 में भारत की बेरोजगारी दर 23.5 प्रतिशत थी। इसके बाद, जनवरी 2021 तक महीने के आधार पर इसमें उतार-चढ़ाव होता रहा। इसका मतलब है कि एक महीने में लोगों को रोजगार मिल रहा था और अगले महीने वे रोजगार से हाथ धो रहे थे। 2021 की शुरुआत से ही यह स्थिति और खराब हो गई थी। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी में बेरोजगारी दर 6.52 फीसदी थी जो अप्रैल में बढ़कर 7.97 फीसद और 9 मई को 8.2 फीसदी हो गई थी। मई 2021 में बेरोजगारी दर 11.9 फीसदी, जून में 9.17 फीसदी और 23 जुलाई में 7.26 फीसदी थी। 23 जुलाई को ग्रामीण बेरोजगारी 6.74 प्रतिशत के मुकाबले शहरी बेरोजगारी 8.39 प्रतिशत अधिक थी।

श्रम बल भागीदारी दर के अनुसार और सीएमआईई द्वारा मूल्यांकन की गई वर्तमान स्थिति के अनुसार, अक्टूबर 2019 में यह दर 42.9 प्रतिशत थी, जिसमें अप्रैल 2020 में 7.08 प्रतिशत की गिरावट आई थी। अक्टूबर 2020 में यह 40.66 प्रतिशत थी, और अप्रैल 2021 में 36.79 प्रतिशत थी, जो जनवरी 2021 से चार महीने कम पर थी। हमने अप्रैल में 7.35 मिलियन नौकरियां खो दी थीं और नौकरियों में केवल 390 मिलियन लोग रह गए थे यानी जरूरत का केवल एक तिहाई। अप्रैल-मई 2021 में नौकरियों का कुल नुकसान 22.7 मिलियन था। 27 जून, 2021 को समाप्त हुए सप्ताह में एलएफपीआर दर 39.6 प्रतिशत थी, जो सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार 2019-20 के 42.7 प्रतिशत के औसत एलएफपीआर से काफी कम थी। 

निश्चित तौर पर यह चिंताजनक मसला है कि जुलाई 2020 और मार्च 2021 के बीच रोजगार दर 38 प्रतिशत के करीब थी, जो अप्रैल में गिरकर 36.8 प्रतिशत और मई 2021 में 35.3 प्रतिशत रह गई थी। 

जून 2021 में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और यह बढ़कर 36 प्रतिशत हो गई थी। इस प्रकार जमीनी हक़ीक़त को नज़रअंदाज करना बहुत चिंताजनक मसला है। हमें पीएलएफएस डेटा की 'सामान्य स्थिति' पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि बेरोजगारों के दुखों को कम करने के लिए जमीन पर मौजूद 'वर्तमान स्थिति' पर विचार करना चाहिए, जो बहुत संकटग्रस्त हैं और जिसके चलते कई बेरोज़गार आत्महत्याएं भी कर रहे हैं। (आईपीए सेवा)

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Statistical Jugglery Should not Conceal Worsening Unemployment Scenario

COVID-19
Economy
labour law
labour rights
Policy
poverty

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • Banaras
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : बनारस में कौन हैं मोदी को चुनौती देने वाले महंत?
    28 Feb 2022
    बनारस के संकटमोचन मंदिर के महंत पंडित विश्वम्भर नाथ मिश्र बीएचयू IIT के सीनियर प्रोफेसर और गंगा निर्मलीकरण के सबसे पुराने योद्धा हैं। प्रो. मिश्र उस मंदिर के महंत हैं जिसकी स्थापना खुद तुलसीदास ने…
  • Abhisar sharma
    न्यूज़क्लिक टीम
    दबंग राजा भैया के खिलाफ FIR ! सपा कार्यकर्ताओं के तेवर सख्त !
    28 Feb 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma Ukraine में फसे '15,000 भारतीय मेडिकल छात्रों को वापस लाने की सियासत में जुटे प्रधानमंत्री' के विषय पर चर्चा कर रहे है। उसके साथ ही वह…
  • रवि शंकर दुबे
    यूपी वोटिंग पैटर्न: ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा और शहरों में कम वोटिंग के क्या हैं मायने?
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में अब तक के वोटिंग प्रतिशत ने राजनीतिक विश्लेषकों को उलझा कर रख दिया है, शहरों में कम तो ग्रामीण इलाकों में अधिक वोटिंग ने पेच फंसा दिया है, जबकि पिछले दो चुनावों का वोटिंग ट्रेंड एक…
  • banaras
    सतीश भारतीय
    यूपी चुनाव: कैसा है बनारस का माहौल?
    28 Feb 2022
    बनारस का रुझान कमल खिलाने की तरफ है या साइकिल की रफ्तार तेज करने की तरफ?
  • एस एन साहू 
    उत्तरप्रदेश में चुनाव पूरब की ओर बढ़ने के साथ भाजपा की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं 
    28 Feb 2022
    क्या भाजपा को देर से इस बात का अहसास हो रहा है कि उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहीं अधिक पिछड़े वर्ग के समर्थन की जरूरत है, जिन्होंने अपनी जातिगत पहचान का दांव खेला था?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License