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छात्रों की हुंकार, डिजिटल आंदोलन की तैयारी!
एसएससी सीजीएल-2018 की परीक्षा का नोटिफिकेशन 5 मई, 2018 को जारी किया गया था और फाइनल प्रोसेस आज 2021 की वर्तमान तारीख तक पूरा नहीं हो पाया है।
अभिषेक पाठक
22 Feb 2021
छात्रों की हुंकार, डिजिटल आंदोलन की तैयारी!

भर्ती परीक्षाओं में अपनी 'कछुआ चाल' की वजह से 'सबसे स्लो कमीशन' के नाम से प्रसिद्ध एसएससी अर्थात स्टाफ सेलेक्शन कमीशन एक बार फिर विवादों में है। लाखों छात्र और अध्यापक एक बड़े 'डिजिटल आंदोलन' की तैयारी में हैं।

क्या है पूरा मामला?

स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (SSC) केंद्र सरकार के अधीन एक विशेष चयन आयोग है, जो स्नातक, 12 वी तथा मेट्रिक स्तर पर सीजीएल, सीएचएसएल, स्टेनोग्राफर और जीडी जैसी विभिन्न परीक्षाओं के माध्यम से भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों में रिक्त पदों के लिए कर्मचारियों की भर्ती करता है।

एसएससी की पिछले 4-5 साल की कार्यप्रणाली पर नज़र डालें तो पता चलता है की इसका विवादों से बेहद पुराना और घनिष्ट नाता है। परीक्षा और परिणामों में अत्यधिक विलंब को लेकर विख्यात एसएससी इस बार नए विवादों में हैं। नया विवाद एसएससी द्वारा परीक्षा में अपनाई गई 'नॉर्मलाईज़ेशन नीति' को लेकर है, जिसपर छात्रों का आरोप है कि नॉर्मलाईज़ेशन के चलते परीक्षा, परीक्षा न रह कर भाग्य का खेल बन चुकी है।

क्या है नॉर्मलाईज़ेशन?

दरअसल, एसएससी द्वारा विभिन्न परीक्षाओं को ऑनलाईन माध्यम से कई-कई दिनों व पालियों में कराया जाता है। कई-कई दिनों में परीक्षा कराए जाने के कारण परीक्षा का स्तर एक समान नहीं रह पाता। मसलन, किसी एक दिन कराई गयी परीक्षा के प्रश्नपत्र का स्तर किसी दूसरे दिन कराई गई परीक्षा से भिन्न हो सकता है। आसान भाषा मे कहें तो किसी दिन प्रश्नपत्र का स्तर कठिन, तो किसी दिन अपेक्षाकृत सरल होगा। इसी चीज़ के निर्धारण के लिए एसएससी के द्वारा 'नॉर्मलाईज़ेशन' को अपनाया गया ताकि मूल्यांकन के दौरान सभी छात्रों के बीच न्याय बरकरार रखा जा सके। इस फॉर्मूले के माध्यम से छात्रों द्वारा अलग-अलग दिनों में प्राप्त किए गए औसतन अंकों के आधार पर ये मूल्यांकन किया जाता है कि कौन सा दिन कठिन था व कौन सा सरल। जिसके बाद परीक्षा के परिणाम में वक़्त किसी छात्र को उसके द्वारा प्राप्तांक से कुछ मार्क्स एक्स्ट्रा तो किसी को प्राप्तांक से कुछ मार्क्स घटा कर दिए जाते हैं। मार्क्स का घटना या बढ़ना छात्रों के परीक्षा के दिन व शिफ्ट पर निर्भर करता है। कठिन दिन व शिफ्ट वाले छात्रों को प्राप्तांक से कुछ एक्स्ट्रा मार्क्स दिए जाते हैं जबकि अपेक्षाकृत सरल दिन व शिफ्ट वाले छात्रों को उनके प्राप्तांक से कुछ मार्क्स घटाए भी जा सकते हैं। कुछ इसी इसी तर्ज और फॉर्मूले पर न्यायपूर्ण मूल्यांकन की बात की जाती है।

परंतु न्यायपूर्ण मूल्यांकन को आधार बनाकर सराहा गया ये 'नॉर्मलाईज़ेशन-फॉर्मूला' आज छात्रों को एक टीस की तरह चुभ रहा है। छात्रों का कहना है कि इस फॉर्मूले के चलते एसएससी अब प्रतियोगी परीक्षा न रह कर भाग्य और किस्मत का खेल बन चुकी है। दरअसल एसएससी के द्वारा 19 फरवरी को सीजीएल-2019 परीक्षा के दूसरे चरण का रिज़ल्ट घोषित किया गया जिसके बाद से एसएससी और इसके द्वारा अपनायी गयी नॉर्मलाईज़ेशन पॉलिसी पर बेहद गम्भीर आरोप लगाए गए। पूरा मामला इस प्रकार है कि एसएससी के द्वारा सीजीएल-2019 की टियर-2 परीक्षा तीन दिनों में कराई गईं। दूसरे चरण की ये परीक्षाएं क्रमशः 15 नवंबर, 16 नवंबर और 18 नवंबर, 2020 को कराई गई। छात्रों और अध्यापकों का आरोप है एसएससी इन तीन दिनों में कराई गई मेन्स परीक्षा का स्तर सामान्य रखने में नाकाम साबित हुई है और प्रश्नपत्र के स्तर में बेहद भारी अंतर पाया गया। छात्रों का कहना है 18 नवंबर की परीक्षा का स्तर 15 व 16 नवंबर की अपेक्षाकृत काफी सरल रहा जिसके कारण 18 नवंबर वाले छात्र परीक्षा में अधिक अच्छा परफॉर्म कर पाए और बाद में नॉर्मलाईज़ेशन नीति की मार इन्ही 18 नवंबर वाले छात्रों को झेलनी पड़ी।

छात्रों की इस आवाज़ को अभिनय शर्मा, जो इन्हीं परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले गणित के एक अध्यापक हैं, ने आधार दिया। छात्रों की पीड़ा जो धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन का रुख अख्तियार कर रही है उसकी शुरुआत भी अभिनय शर्मा के एक वीडियो से हुई, जो उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर 20 फरवरी को अपलोड की थी जिसमें उन्होंने "युवाओं की हुँकार, लेकर रहेंगें रोज़गार" का नारा दिया और 25 फरवरी को #modi_rojgar_do के हैशटैग से एक विशाल ट्विटर कैंपेन का आह्वान व ऐलान किया।

अपने विडियो के माध्यम से छात्रों की पीड़ा बयां करते हुए एसएससी की कार्यप्रणाली की खामियों पर उनका गुबार फूट पड़ा और उन्होंने आरोप लगाया कि अलग-अलग दिनों में ली जाने वाली परीक्षाओं के स्तर में भारी अंतर के कारण हज़ारों इमानदार और योग्य छात्रों पर नॉर्मलाईज़ेशन की मार पड़ी है और उनके अरमान टूट चुके हैं। चूँकि नॉर्मलाईज़ेशन के फॉर्मूले के तहत सरल व कठिन दिनों को आधार मानकर छात्रों के प्राप्तांक में कुछ अंकों की वृद्धि या कटौती की जाती है, इस पर अभिनय का अपनी वीडियो में कहना है कि 18 नवंबर वाले छात्रों पर इस पॉलिसी की मार इस कदर पड़ी की 200 में से 190 स्कोर (आंसर की के अनुसार) करने के बाद भी छात्र कट ऑफ से बाहर हैं। उन्होंने बताया उनके पास छात्रों के मैसेज आ रहे हैं कि वे अवसाद और आत्महत्यात्मक विचारों से जूझ रहे हैं?

छात्रों का कहना है उन्हें किस दिन या किस शिफ्ट में परीक्षा देनी है ये उनकी च्वॉइस नही होती बल्कि किस्मत होती है। वे कठिन से कठिन प्रश्नपत्र के लिए खुद को तैयार रखते हैं और अगर उनकी परीक्षा किसी ऐसे दिन हो गई जिस दिन परीक्षा का स्तर बाकी दिनों के अपेक्षा सरल हो इसमें उनका क्या दोष कि नॉर्मलाईज़ेशन की मार उनपर इस कदर पड़े की वे रेस से ही बाहर हो जाएं।

एसएससी की ही तैयारी करवाने वाले गणित के अध्यापक रवि मोहन मिश्रा का कहना हैं कि छात्र इतना हताश और निराश हो चुका है कि इतनी तैयारी करने के बाद भी अगर फाइनल रिजल्ट इस बात पर तय होगा कि उसकी परीक्षा किस दिन और किस शिफ्ट में होगी तो ऐसी तैयारी का फायदा क्या? ऐसी परीक्षाओं के मायने क्या? उनके अनुसार एक फेयर एग्जाम छात्रों का हक़ है।

नॉर्मलाईज़ेशन के मुद्दे से शुरू हुआ छात्रों का ये रोष केवल इसी मुद्दे तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका दायरा और बढ़ चुका है। फिर चाहे बढ़ती बेरोज़गारी हो या घटती वेकैंसी और घटती वेकैंसी में भी चयन आयोगों के गैरज़िम्मेदाराना रवैये के कारण परीक्षा-प्रणाली में सालों साल का विलंब, इन सभी मुद्दों पर छात्रों का गुस्सा एक साथ फूटा है। अभिनय शर्मा ने 25 फरवरी को modi_rojgar_do के हैशटैग के साथ विशाल ट्विटर कैंपेंन का ऐलान किया जिसमें उन्होनें सभी अन्य अध्यापकों, छात्रों और तमाम लोगों से अपील करी कि वे सभी 25 फरवरी को इस 'डिजिटल आंदोलन' में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें ताकि सरकार के कानों तक ये गूंज जाएं और वे समझे कि देश का छात्र और युवा किस वेदना से गुज़र रहा है। ट्विटर कैंपेन की तारीख 25 फरवरी तय की गई थी। 25 की सूरत-ऐ-हाल तो 25 को पता चलेगी परंतु इस तय तारीख से पहले ही 21 तारीख को ही ट्विटर पर modi_rojgar_do नम्बर-1 ट्रेंडिंग में रहा जिससे छात्रों के आक्रोश का अंदाजा लगाया जा सकता है।

आप को हैरानी होगी इस तथ्य को जानकर कि एसएससी सीजीएल-2018 की परीक्षा का नोटिफिकेशन 5 मई, 2018 को जारी किया गया था और फाइनल प्रोसेस आज 2021 की वर्तमान तारीख तक पूरा नहीं हो पाया है। सीजीएल 2019 के 2 ही चरण हो पाए हैं। क्या इसी डिजिटल इंडिया की बात हमारे देश के महानुभाव करते हैं जहाँ एक प्रतियोगी परीक्षा को 3 साल का अंडर ग्रेजुएट कोर्स बना दिया जाता है? एसएससी सीजीएल की वेकैंसी 2012 में 16119 थी, जो 2020 में घटकर 6,506 रह जाती हैं लगभग 60 प्रतिशत की गिरावट।

इन्ही लचर व्यवस्थाओं की त्रासदी झेल रहे छात्र और अध्यापकों ने आंदोलन का ऐलान किया हैं और उनकी मुख्य मांगें निम्न प्रकार से हैं-

1) पांच दिनों के भीतर सीजीएल टियर-2 की परीक्षा के मार्क्स जारी किए जाएं।

2) कई-कई दिनों में होने वाली परीक्षाओं का लेवल एक-समान हो।

3) परीक्षाएं लकी ड्रॉ बनकर न रह जाएं इसलिए एसएससी सीजीएल की आगामी परीक्षाओं में टियर-2 की परीक्षा एक ही दिन में कराई जाए।

4) वेटिंग लिस्ट का प्रावधान हो।

5) ऐज रेकनिंग समस्या।

सरकार को ये सोचने की ज़रूरत है कि सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले छात्रों में एक बड़ा वर्ग निम्न व मध्यम परिवार के छात्रों का होता है। जिनके पास विरासत में सिवाय कठिन परिश्रम के कुछ और नहीं होता है और अपने व अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य की आस लिए छात्र खुद को इन तैयारियों में झोंक देते हैं। छोटे-छोटे गावों से बड़े शहरों में रूखी-सूखी खाकर पढ़ना और पढ़ाई के बाद रिजल्ट के लिए झूझना, लचर व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करना और न जाने क्या-क्या इन छात्रों को करना पड़ता है। इन्हीं परीक्षाओं के माध्यम से चयन होने के बाद ये छात्र भारत सरकार के विभिन्न विभागों में सेवाएं देकर देश के तंत्र को संभालते हैं। एक निराश और हतोत्साहित छात्र देश की प्रगति और उन्नति में किस प्रकार अपना योगदान देगा इस बात को समझने की आवश्यकता है। जिस सोशल मीडिया को सत्ता प्राप्ति के लिए एक ताकतवर टूल की तरह इस सरकार ने इस्तेमाल किया था, उसी सोशल मीडिया पर अब 25 फरवरी के दिन लाखों आक्रोशित छात्रों और युवाओं की पीड़ा और तकलीफ की बाढ़ आएगी। अब देखना यह होगा कि विरोध की हर बुलन्द आवाज़ को किसी न किसी लेबल से नवाज़ने वाले दरबारी पत्रकार और सरकार के नुमाइंदे छात्रों के आंदोलन और आक्रोश पर कौनसी लेबलबाज़ी करेंगे!

(अभिषेक पाठक स्वतंत्र लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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