NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
घटना-दुर्घटना
नज़रिया
फिल्में
साहित्य-संस्कृति
भारत
हर आत्महत्या का मतलब है कि हम एक समाज के तौर पर फ़ेल हो गए हैं
सुशांत को किसी ने समय नहीं दिया। न उस इंडस्ट्री ने, जिसके लिए उस इंसान ने एक सफल कैरियर छोड़ दिया, न उस मीडिया ने जो समाज का ध्वजवाहक बना फिरता है और न ही उस समाज ने, जिसने इस आत्महत्या को 'ज़िन्दगी जीने के 100 नायाब तरीक़े' सिखाने का एक ज़रिया बना दिया।
सत्यम् तिवारी
19 Jun 2020
सुशांत
image courtesy : The Hindu

भारत में हर साल क़रीब 1 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। इस आंकड़े की तस्दीक़ करना मेरे लिये शायद मुमकिन नहीं है, लेकिन कहीं सुना था इसलिये भूमिका के तौर  पर लिख दिया है। आत्महत्या करने की वजह कुछ और नहीं हो सकती, सिर्फ़ मानसिक ही हो सकती है। तो क्या सिर्फ़ वही 1 लाख लोग मानसिक तौर पर ज़िन्दगी से जूझ रहे हैं? क्या उन लोगों के अलावा किसी की ज़िंदगी में मानसिक तौर पर कोई परेशानी नहीं है? नहीं, लेकिन जब कोई आत्महत्या कर लेता है, तब हम ये सोच कर ज़्यादा दुखी होते हैं, कि यह इंसान लड़ नहीं पाया। साथ ही, हम ख़ुद को और बाक़ी बचे लोगों को बहादुर तसव्वुर करने लगते हैं, क्योंकि हम मरे नहीं। मुझे नहीं पता कि यह बात भी कितनी सही है, लेकिन हम ऐसा करते हैं।

हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या कर ली। और समाज ने यह कहने में कोई देरी नहीं की कि सुशांत कमज़ोर थे, वह लड़ नहीं पाए और उन्होंने 'सरेंडर' कर दिया। एक ख़याल पर बात होने लगी जिसमें कहा जाता है कि जो हार जाता है, वही अपनी ज़िंदगी क़ुर्बान करता है।

यहाँ मैं सबसे पहले इस बात पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि मौत के बाद का माहौल क्या होता है। मैंने मीडिया संस्थान में काम करते हुए एक साल और तीन महीने गुज़ार दिए हैं। इस समय में मैंने गिरीश करनाड, इरफ़ान ख़ान की मौत पर स्मृति शेष लिखा है। मुझे अभी भी समझ नहीं आया है कि मरने के बाद इंसान कितने वक़्त बाद मरता है। लेकिन मैं अब भी ये बात मानता हूँ कि मरने वाले को समय देना चाहिये ताकि उसे ख़ुद समझ में आए कि वो मर गया है। और जब सुशांत की तरह कोई ख़ुदकुशी कर ले, तब तो शायद थोड़ा ज़्यादा समय देना चाहिये। यही समय समाज ने सुशांत को नहीं दिया। सुशांत को किसी ने समय नहीं दिया। न उस इंडस्ट्री ने, जिसके लिए उस इंसान ने एक सफल कैरियर छोड़ दिया, न उस मीडिया ने जो समाज का ध्वजवाहक बना फिरता है और न ही उस समाज ने, जिसने इस आत्महत्या को 'ज़िन्दगी जीने के 100 नायाब तरीक़े' सिखाने का एक ज़रिया बना दिया।

आत्महत्या इंसान बेचारगी के लम्हों में करता है, करता होगा। आत्महत्या इंसान कमज़ोरी के वक़्त में करता है, करता होगा। लेकिन उसे बेचारा और कमज़ोर किसने बनाया है? क्या यह समाज और बॉलीवुड इंडस्ट्री सुशांत की इस हालत के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं?

देश में जब भी कोई ख़ुदकुशी करता है, उसका मतलब ये है कि एक समाज के तौर पर हमने उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया, कि यह दुनिया जीने लायक नहीं है। किसानों, मज़दूरों, बच्चों, बीवियों, बेटियों, युवाओं, सबकी ख़ुदकुशी का मतलब है कि हम एक समाज के तौर पर असफल हो गए हैं।

सुशांत सिंह राजपूत का मुख़्तसर सा करियर था, लेकिन उसकी ज़िंदगी लंबी थी, और बड़ी भी। कभी सुर्खियों में न रहने वाला बॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फ़िल्मों का अभिनेता, जिससे मौक़े छीन लिए गए। बताया जा रहा है कि पिछले 6 महीने में सुशांत से 7 पिक्चरें छीन ली गई थीं। कई बड़ी फ़िल्मों के लिए पहले सुशांत का नाम सुझाया गया था, कुछ में बात भी हो गई थी, लेकिन उन्हें फ़िल्मों से निकाल दिया गया। एक फ़िल्म पानी, जिसके लिए सुशांत ने 2 साल मेहनत की, वो कभी बनी ही नहीं। आज इंडस्ट्री के सब लोग बारहा वीडिओज़ बना रहे हैं, सुशांत की मौत पर रो रहे हैं, क्या उन्होंने तब कुछ कहा होगा जब उनसे पिक्चरें छीन ली गई थीं? क्या उनकी ख़ुदकुशी की वजहों में से एक वजह यह इंडस्ट्री नहीं है?

सुशांत को अवार्ड्स नहीं दिए गए, बड़े नाम वालों को दिए गए। यहाँ मैं यह भी बता दूं, कि जिस तरह की यह इंडस्ट्री है उसके लिए अवार्ड्स, नाम, पैसा सब ज़रूरी है।

क्या हमने, दर्शकों ने सुशांत की फ़िल्में देखीं? फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, paparaazi के ज़माने में रहने वाले हम लोगों को कभी नेपोटिज़्म का पता नहीं चला? हमने उसका क्या किया? हमने छिछोरे के वक़्त में स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2 देखी। चंकी पांडे की बेटी अनन्या पांडे को सुपरहिट बना दिया। हमने ब्योमकेश बक्शी, सोनचिरैया नहीं देखा। जिस इंसान के मरने पर हम दुख भरे पोस्ट्स लिख रहे हैं, उसके जीते जी हमने उसके काम की क़द्र नहीं की। क्या यह बॉयकॉट का नाटक हमने तब किया, जब कथित तौर पर सलमान ख़ान ने केसू फ़िरंगी उर्फ़ विवेक ओबेरॉय का करियर समाप्त कर दिया? नहीं, हमने हर ईद पर सलमान की फ़िल्में देखीं, उसे 300 करोड़ दिलवाए। आज हम जो सुशांत की मौत का दुख मना रहे हैं, क्या हम उसके लायक भी हैं? क्या हमने, इस समाज ने उसकी अनदेखी कर के, उसे ग़ैर ज़रूरी मान कर उसे आत्महत्या के लिए नहीं उकसाया?

हम चाहे किसी की भी खुदकुशी पर कितना ही रो लें, लेकिन उसकी वजह कहीं न कहीं हम ही लोग हैं जो बचे रह गए हैं।

सुशांत सिंह को याद कीजिये तो इसलिए मत याद कीजिये कि वो एक अच्छा एक्टर था, या उसने स्ट्रगल बहुत किया था; बल्कि इसलिए याद कीजिये कि वो एक हाड़-मांस से बना इंसान था जिसने इस समाज के रवैये और नाकामी की वजह से ख़ुदकुशी कर ली।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

Sushant Singh
Sushant commits suicide
Society on suicides
Social Media
bollywood
nepotizm

Related Stories

राहत सुनो- वबा फैली हुई है हर तरफ़…अभी माहौल मर जाने का नईं

‘...अनदर अनटोल्ड स्टोरी’ : और सुशांत सिंह की कहानी भी अनकही रह गई

सीएम योगी पर टिप्पणी को लेकर पत्रकार प्रशांत कनौजिया गिरफ़्तार

अपराध/बलात्कार के बाद वीडियो वायरल : ये कहां आ गए हम...!

दुराचार कर सोशल मीडिया पर वायरल किया वीडियो : मुकदमा दर्ज


बाकी खबरें

  • Chhattisgarh
    रूबी सरकार
    छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय
    16 Feb 2022
    ‘अपना हक़ लेके रहेंगे, अभी नहीं तो कभी नहीं’ नारे के साथ अन्नदाताओं का डेढ़ महीने से सत्याग्रह’ जारी है।
  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License