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इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव
भीमा नदी के जल से सिंचित/ चाँदनी के फूल… / वे इनकार करना चाहते हैं इस्तेमाल होने से/ पैरों में बिछने से, गले का हार बनने से/ और बिस्तर पर बिछाये जाने से।
न्यूज़क्लिक डेस्क
29 May 2022
Bhima Koregaon

आज जब भीमा कोरेगाँव को देशद्रोह का प्रतीक बनाया जा रहा है। उसकी बात करने वाले मानवाधिकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया है। ऐसे में कवि, कहानीकार, समीक्षक  उषा राय बेबाक और बेख़ौफ़ अंदाज़ में पुरज़ोर आवाज़ में कहती हैं— भीमा कोरे गाँव देशद्रोह नहीं/ कोई घाव नहीं बिच्छू का कर्म नहीं/ यह मनुष्यता के सम्मान का स्वरूप है...

आइए इतवार की कविता में पढ़ते हैं उषा राय की यह कविता—

 

भीमा कोरेगाँव


जब तारों की जोत सारे गाँव को
अपने सुकून की चादर ओढ़ा देती
तब अपवित्रता की सींक में बिधे लोग
अपने लम्बे खरहर को देखते-
जिससे चोट खा-खा उनकी
पीठ और कमर में घट्ठे पड़ गए थे
वे ठंढी निगाहों से
उस हंडिया की ओर देखते
जो दिन भर उनके गले में लटकी रहती
 
वे सोचते कि आज उन्होंने धरती को
बचा लिया अपने अछूत पग धूलि से
और अपने थूक को गिरने से
आज उन्होंने बचा लिया किसी
तिलकधारी को कुपित
होने से उसके शाप से
पर ऐसा कोई दिन नहीं होता
वे सोचते और थक कर सो जाते।

भीमा नदी के जल से सिंचित
चाँदनी के फूल
सैकड़ों की संख्या में खिलते हैं
उस गाँव के लोग नहीं चाहते
कि जहाँ गेंदा गुलाब
और सुगंधित फूल भेजे जाते हैं
वहाँ पर ये चांदनी के फूल भेजे जाएं ...
वे इनकार करना चाहते हैं इस्तेमाल होने से,
पैरों में बिछने से, गले का हार बनने से
और बिस्तर पर बिछाये जाने से
उत्सवों में खाना बनाने-
परोसने में अर्धनग्न अपनी
बेटियों बहुओं के
वहाँ रहने की बाध्यता से

वे परेशान रहते कि  
आत्म सम्मान को कैसे बचाएँ
क्या करें अपने साहस का जो भीतर ही
भीतर उबलता है और उकसाता रहता है।
कोई राहगीर आता तो
पूछते कि अपने अपमान क्या करें
क्या जवाब दें
उस भोली मुस्कान के सवाल का
कि आखिर हम पैदा ही क्यों हो रहें हैं  
 उनमें से कोई बता जाता कि
इस जाति के अनेक कोटियाँ हैं
जिनका रोम-रोम अभाव, अपमान ,उपेक्षा
और झाड़ू की तीलियों से बिंधा हुआ है

चाँदनी के फूल और महारों को
जितना तोड़ा जाता वे खिलते जाते
अब उन्हें अपनी कमजोरियां
मुँह चिढ़ाने लगी थीं
और उनकी अस्मिता के
ठीक सामने खड़ा था ब्राह्मणवाद !

खंडित अस्मिताएँ सीधे- सीधे
चुनौती देती रही हैं इस देश में
और शुद्रों ने भी राज किया है !

आत्म सम्मान से लबरेज
लोगों ने लिखा अपना घोषणा पत्र

एक जनवरी अठारह सौ अठारह का दिन
जब लोगों ने वर्ण-जाति-पितृ सत्तात्मक
ब्राहमणवाद को नकार दिया था

जब मुक्ति की तीव्र आकांक्षा ने
दस्तक दी तब एक जनवरी आई
जब एक जनवरी आई तभी
अठारह सौ सत्तावन के क्रांति की राह बनी

अपने समय के सबसे बड़े सवाल का
जवाब दिया भीमा कोरे गाँव के निवासियों ने

भीमा कोरे गाँव देशद्रोह नहीं
कोई घाव नहीं बिच्छू का कर्म नहीं
यह मनुष्यता के सम्मान का स्वरूप है,
भीमा कोरे गाँव नये भारत का प्रारूप है।

 

-    उषा राय 

शिक्षक, कवि, कहानीकार, समीक्षक 

लखनऊ 

ईमेल : usharai22@gmial.com

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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License