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साहित्य-संस्कृति
भारत
इतवार की कविता: नकली दुखी आदमी की आवाज़ में टीन का पत्तर बजता है
कविता ऐसी ही होती है समय के पार। कवि ऐसा ही होता है जैसे वीरेन डंगवाल, जो समय के आर-पार देख सकता है। तभी तो उनकी सन् 1976 की कविता 2021 में हूबहू हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है। और हम एकटक उसे देखते रहते हैं और समझ जाते हैं अपने समय का सच। ‘इतवार की कविता’ में पढ़ते हैं उनकी यही दस लाइन की छोटी सी कविता ‘दुख’।
न्यूज़क्लिक डेस्क
23 May 2021
दुख
प्रतीकात्मक तस्वीर। 

दुख

 

वह भी शरीर का ही कोई हिस्सा है

जहां से भाप की तरह

तैरता आता है दुख

आवाज़ में घुल जाने के लिए

अंधेरे में भी पहचानी जा सकती है

दुखी आदमी की आवाज़

 

नकली दुखी आदमी की आवाज़ में

टीन का पत्तर बजता है

मसलन मारे गए लोगों पर

राजपुरुष का रुंधा हुआ गला

-    वीरेन डंगवाल

(1976)

Sunday Poem
poem
Hindi poem
Viren Dangwal
कविता
हिन्दी कविता

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