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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा
सेक्स वर्कर्स को ज़्यादातर अपराधियों के रूप में देखा जाता है। समाज और पुलिस उनके साथ असंवेदशील व्यवहार करती है, उन्हें तिरस्कार तक का सामना करना पड़ता है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लाखों सेक्स वर्कर्स की ज़िंदगी बदलने की उम्मीद है।
सोनिया यादव
27 May 2022
Supreme Court

“सेक्स वर्कर्स को कानून से बराबर संरक्षण का अधिकार है।...इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि प्रोफेशन कोई भी हो, संविधान के आर्टिकल 21 के तहत भारत के हर नागरिक को एक सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।”

ये जरूरी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्कर्स को लेकर दिए अपने एक ऐतिहासिक आदेश के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि सेक्स वर्कर्स के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव न करके उनके साथ सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार सेक्स वर्क यानी की वेश्यावृत्ति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के अनुसार सम्मान और समान सुरक्षा की हकदार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा कि अपनी सहमति से सेक्स वर्कर के तौर पर काम करने वालों के खिलाफ न तो उन्हें दखल देना चाहिए और न ही कोई आपराधिक कार्रवाई शुरू करनी चाहिए।

बता दें कि भले ही वेश्यावृत्ति भारत में वैध है लेकिन इससे जुड़ी ज्यादातर गतिविधियां मसलन कोठे चलाना, सेक्स के लिए उकसाना और बिचौलिये का काम करना आदि अपराध है। इसका नतीजा यह होता है कि यौनकर्मियों को पुलिस के साथ आए दिन उलझना पड़ता है। अक्सर देखा गया है कि सेक्स वर्कर्स को ज्यादातर अपराधियों के रूप में देखा जाता है। समाज और पुलिस उनके साथ असंवेदशील व्यवहार करती है, उन्हें तिरस्कार तक का सामना करना पड़ता है।

मालूम हो कि साल 2011 में कोलकाता में एक सेक्स वर्कर के संबंध में आपराधिक शिकायत दर्ज हुई थी। इस शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 19 जुलाई 2011 को अपना एक आदेश जारी कर सेक्स वर्कर्स से जुड़े मुद्दों के लिए एक पैनल का गठन किया था। पैनल को ट्रैफिकिंग रोकने, सेक्स वर्क छोड़ने की इच्छा रखने वाली सेक्स वर्कर्स का पुनर्वास यानी रिहैबिटेशन और अपनी मर्जी से सम्मान के साथ सेक्स वर्कर्स के रूप में काम करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण जैसे पहलुओं पर ध्यान देना था।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सिफारिशें

इस पैनल ने साल 2016 में सभी स्टेकहोल्डर्स से बातचीत और परामर्श करने के बाद एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके बाद जब मामला सुनवाई के बाद सूचीबद्ध किया गया था, तो केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि पैनल की सिफारिशें विचाराधीन थीं और उनको शामिल करते हुए एक मसौदा कानून सरकार ने पब्लिश किया था। लेकिन 2016 से आज 2022 हो गया और इन सिफारिशों के आधार पर सरकार ने कोई कानून नहीं बनाया।

अब इसी तथ्य के मद्देनजर जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच जिसमें जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ए एस बोपन्ना शामिल थे, ने गाइडलाइन्स जारी करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत मिली शक्ति का प्रयोग किया है। कोर्ट ने राज्यों और केंद्र सरकार को पैनल द्वारा की गई इन सिफारिशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है।

* संविधान के अंतर्गत दिया गया सम्मान के साथ जीने का मौलिक अधिकार सेक्स वर्कर्स को भी समान रूप से मिला है, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पुलिस को सेक्स वर्कर्स के साथ सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिए और मौखिक या शारीरिक रूप से उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं होना चाहिए।

* बेंच ने आदेश दिया कि जब भी किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाए तो सेक्स वर्कर्स को "गिरफ्तार या दंडित या परेशान" नहीं किया जाना चाहिए, "क्योंकि स्वेच्छा से सेक्स वर्क अवैध नहीं है, केवल वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है।"

* कोर्ट ने कहा कि सेक्स वर्कर्स के बच्चे को सिर्फ इस आधार पर मां से अलग नहीं किया जाना चाहिए कि वह देह व्यापार में है। कोर्ट ने कहा "मानव गरिमा का मौलिक अधिकार सेक्स वर्कर्स और उनके बच्चों को भी है।"

* यदि कोई नाबालिग वेश्यालय में या सेक्स वर्कर के साथ रहता पाया/पायी जाता है, तो यह नहीं माना लिया जाना चाहिए कि बच्चे की ट्रैफिकिंग की गई है। "यदि सेक्स वर्कर का दावा है कि वह उसका बेटा/बेटी है, तो यह निर्धारित करने के लिए टेस्ट किया जा सकता है कि क्या वह दावा सही है। यदि यह दावा सही है तो नाबालिग को जबरन मां से अलग नहीं किया जाना चाहिए।"

* यौन उत्पीड़न की शिकार सेक्स वर्कर्स को तुरंत चिकित्सा और कानूनी देखभाल सहित हर सुविधा दी जानी चाहिए। अदालत ने पुलिस को आदेश दिया कि अगर सेक्स वर्कर खासकर किसी ऐसे अपराध को लेकर शिकायत दर्ज करवाए जो यौन उत्पीड़न से जुड़ा हो तो उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

* कोर्ट ने कहा कि मीडिया को इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिए कि गिरफ्तारी, छापेमारी और रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान कोई सेक्स वर्कर की पहचान उजागर न करें, चाहे वह सर्वाइवर हों या आरोपी. ऐसी कोई भी तस्वीर पब्लिश या प्रसारित न करें जिससे ऐसी पहचान का खुलासा हो।

* सेक्स वर्कर्स द्वारा प्रोटेक्शन के लिए किए गए उपाय, जैसे कॉन्डम का उपयोग, पुलिस द्वारा उनके "अपराध" के खिलाफ सबूत के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

* अदालत ने पुलिस को संवेदनशील होने की अपील करते हुए कहा कि ये देखा गया है कि सेक्स वर्कर्स के प्रति पुलिस का रवैया अक्सर क्रूर और हिंसक होता है। ऐसा लगता है कि वे एक ऐसा वर्ग हैं जिनके अधिकारों को मान्यता नहीं है।

कोर्ट में ये भी बात रखी कि सेक्स वर्कर्स के आधार कार्ड नहीं बनाए जा रहे हैं क्योंकि वे अपना निवास पते का प्रमाण पेश नहीं कर पा रही हैं। इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया। सुप्रीम कोर्ट ने यूआईडीएआई को नोटिस जारी कर इस संबंध में घर का पता ना होने की स्थिति में उसे खत्म करने के संबंध में उनके सुझाव मांगे थे ताकि सेक्स वर्कर्स को आसानी से आधार कार्ड जारी किए जा सकें।

यूआईडीएआई ने अपने हलफनामे में ये प्रस्तावित किया था कि जो सेक्स वर्कर राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की सूची में हैं और वे आधार कार्ड के लिए आवेदन करती हैं लेकिन उनके पास निवास प्रमाण नहीं है तो उन्हें आधार कार्ड जारी किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सेक्स वर्कर का आधार कार्ड बनाया जा रहा है तो उनके आधार कार्ड पर किसी भी तरह से ऐसे चिह्नित नहीं किया जा सकता जिससे पता लगे कि वे सेक्स वर्कर हैं।

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी मदद का दिया था आदेश

गौरतलब है कि कोविड-19 महामारी के कारण सेक्स वर्कर्स को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। इसे लेकर भी अदालत में याचिका दायर है, मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को होनी है, तब तक इन गाइडलाइन्स पर केंद्र सरकार को जवाब भी देना है। कई अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 10 लाख यौनकर्मी हैं। इनमें से ज्यादातर ना तो वोट दे सकती हैं, ना बैंक खाते खोल सकती हैं और ना ही इन्हें राज्यों से गरीब लोगों को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ मिलता है। इनके पास जरूरी दस्तावेजों का नहीं होना इसकी वजह है और अक्सर ये कर्ज के जाल में फंस जाती हैं जहां साहूकार इनसे मनमाना ब्याज वसूलने के साथ ही परेशान भी करते हैं।

बहरहाल, बीते साल ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि पंजीकृत यौनकर्मियों को राशन कार्ड और वोटर आईडी कार्ट जारी किए जाएं और उनका आधार पंजीकरण भी किया जाए। अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक ऐतिहासिक आदेश सामने आया है जिसका दूरगामी परिणाम होने के साथ ही सेक्स वर्कर्स की जिंदगी और सम्मान पर प्रभाव देखने को मिलेगा।

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