NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विज्ञान
अंतरराष्ट्रीय
नासा का प्रिज़रवेंस रोवर मंगल पर पहुंच चुका है, इसका स्वागत कीजिये
यूएई और चीन द्वारा मंगल ग्रह के लिए भेजे अंतरिक्ष अभियान और नासा के प्रिज़रवेंस रोवर का मंगल की सतह पर सफल उतार इस स्याह दौर में उम्मीद की किरण पेश करता है।
डी. रघुनन्दन
26 Feb 2021
स्वागत कीजिए, नासा का प्रिज़रवेंस रोवर मंगल पर पहुंच चुका है

इन दिनों अवसाद में जीने की कई वज़ह हैं। साल भर से जारी कोविड-19 अब भी भारत और दुनिया के लोगों में फैल रहा है, किसान अपने अस्तित्व से जुड़े जिन मुद्दों को उठा रहे हैं उन पर सरकार बात करने को ही तैयार नहीं है, ऊपर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहमति ना रखने विचारों पर हमले हो रहे हैं।

इन काले बादलों के बीच यूएई और चीन के हालिया मंगल मिशन और नासा के प्रिजरवेंस रोवर द्वारा 24 फरवरी, 2021 को मंगल की सतह पर नाटकीय उतार (जिसका 2:30AM बजे सीधा प्रसारण भी हुआ था) हमारे जीवन में उम्मीद की कुछ किरण लेकर आया है। इन लोगों ने बताया है कि इंसान की कोशिशें क्या रंग ला सकती हैं और यह कोशिशें क्यों जरूरी हैं। बता दें 11 साल की एक भारतीय-अमेरिकी छात्रा ने नासा रोवर के नामकरण से संबंधित प्रतिस्पर्धा जीती थी। अमेरिका के मार्स, 2020 मिशन के केंद्र में प्रिजर्वेंस रोवर ही है।

नासा का अंतरिक्ष अभियान 30 जुलाई, 2020 को भेजा गया था। लेकिन यह मंगल पर भेजा गया इस साल अकेला अभियान नहीं था। सापेक्ष स्थिति और गृहों की गति के चलते, 2020 में जुलाई अंत से अगस्त मध्य तक तुलनात्मक तौर एक छोटी समयावधि थी, जिसमें यह अंतरिक्ष अभियान भेजे जा सकते थे। अगर यह समय छूट जाता तो अगला मौका 2022 के मध्य में आता।

यूएई के 'अमीरात मार्स मिशन' का 'अल अमाल आर्बिटर' मंगल के घूर्णन पथ पर 9 फरवरी को पहुंचा। यह मंगल के वायुमंडल के अध्ययन करने दो साल के लिए वहां पहुंचा है। यह किसी भी पश्चिम एशियाई या अरब देश द्वारा भेजा गया पहला अंतरिक्ष मिशन है।

अगले दिन ही चीन का तिएवेन-1 ("स्वर्ग के लिए सवाल") स्पेसक्रॉफ्ट मंगल के आसपास चक्कर लगाने लगा। यह एक भूविज्ञानिक मिशन पर है, जिसे एक लैंडर और एक रोवर अंजाम देगा। इसके ज़रिए चीन की कोशिश, अमेरिका के बाद मंगल पर रोवर पहुंचाने वाला दूसरा देश बनने और मंगल पर सफलता के साथ उतरने वाला तीसरा देश बनने की होगी। उससे पहले सोवियन संघ और अमेरिका ऐसा कर चुके हैं। इस तरह चीन अंतरिक्ष में सक्रिय देशों की सूची में अपनी मजबूत आमद दर्ज कराएगा।

हालांकि यह लेख नासा के मिशन और इसके उन्नत, नवीन और कौतूहल से भरपूर भविष्य से संबंधित आयामों पर नज़र डालेगा।

मिशन

नासा का मार्स, 2020 मिशन मुख्यत: मंगल के अतीत में संभावित माइक्रो-बॉयोलॉजिकल जीवन से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढ़ने और भविष्य में रोबोट-इंसान युक्त मंगल अभियानों के लिए नई तकनीकों के प्रयोग करने पर केंद्रित होगा। इस अभियान की अवधि एक मंगल वर्ष है, जो पृथ्वी को 686 दिनों के बराबर होता है।

इससे पहले नासा ने 2002 में मंगल मिशन भेजा था। इसमें "क्यूरियोसिटी रोवर" शामिल था, जो आज भी मंगल पर ही एक दूसरी जगह पर काम कर रहा है। क्यूरियोसिटी ने हाल ही में मंगल की सतह के पास मौजूद चट्टानों में जैविक अणुओं और वहां के वायुमंडल में मीथेन के स्तर में मौसमी बदलाव होने के बारे में खोज की थी।

यह दोनों खोजें हीं मंगल पर संभावित जीवन से जुड़ी दिलचस्प चीजों की ओर इशारा करती हैं, हालांकि यह अभी प्राथमिक और बेनतीज़ा हैं। लेकिन जैविक अणुओं का निर्माण गैर-जैविक प्रक्रियाओं द्वारा भी हो सकता है, जबकि यह सामान्यत: जिंदा चीजों के साथ संबंधित होते हैं। इसी तरह वायुमंडल में मीथेन के स्तर में उतार-चढ़ाव जरूरी तौर पर जैविक प्रक्रियाओं से संबंधित नहीं होता। पर्यावरण से जुड़ी प्रक्रियाओं के चलते भी ऐसा हो सकता है। नासा के एक वैज्ञानिक ने इन शुरुआती खोजों पर कहा है, "मंगल हमसे आगे जीवन के सबूतों की खोज जारी रखने के लिए कह रहा है।"

मार्स, 2020 रोवर मिशन मंगल पर जीवन के ज़्यादा पुख्ता सबूतों की खोज इन तरीकों से कर रहा है: 1) अतीत में अतिसूक्ष्म जीवन को संभव बनाने वाले पर्यावरणों की खोज कर 2) जैविक हस्ताक्षर की खोज के ज़रिए 3) जैविक हस्ताक्षरों से युक्त मिट्टी और पत्थर इकट्ठे करना, उसके बाद भविष्य में उनको पृथ्वी पर भेजने से पहले एक निश्चित स्थान पर उनका भंडारण करना।

मौजूदा मिशन का चौथा लक्ष्य मंगल के पर्यावरण से ऑक्सीजन पैदा करने की तकनीक का परीक्षण है। बता दें मंगल के पर्यावरण में 95.32 फ़ीसदी कार्बन डॉइऑक्साइड है। भविष्य के रोबोट और इंसानों वाले अभियानों के लिए कुछ दूसरी तरह की जानकारी इकट्ठा करना और जांच करना भी मिशन का लक्ष्य है। 

मंगल ग्रह पर उतरने की 60 संभावित जगहों में से 'जेज़ेरो गड्ढे' के पास की जगह बहुत सावधनीपूर्वक चुनी गई है। संभावित तौर पर यह खड्ढा 3.5 अरब वर्ष पहले करीब 250 मीटर गहरी झील रहा होगा, जिसके पास एक बड़ा नदी डेल्टा रहा होगा, जहां नदियां बहती रही होंगी। इन नदियों ने कार्बोनेट्स और सिलिका के अवसादी कण छोड़े होंगे। कार्बोनेट और सिलिका को पृथ्वी पर जैविक हस्ताक्षरों और अतिसूक्ष्म जीवश्मों को अरबों साल तक सुरक्षित रखने के लिए जाना जाता है। 

रोवर, दूसरे यान और उपकरण

प्रिजरवेंस रोवर फिलहाल अंतरिक्ष में काम करने वाला सबसे उन्नत रोवर है, यह मौजूदा अभियान का मुख्य संचालक है, इसके लिए रोवर पहली बार विकसित की गईं और बेहद उन्नत तकनीक और उपकरणों का सहारा लेगा।

प्रिजरवेंस रोवर को अंतरिक्ष तक ले जाने वाले यान को 2002 के क्यूरियोसिटी रोवर की डिज़ाइन पर बनाया गया है। इससे नई डिजाइन को विकसित करने में लगने वाले समय और पैसे की बचत हुई। मंगल की सतह पर सफलता के साथ उतरने के लिए इस्तेमाल की गई यह तकनीक और डिज़ाइन अपने-आप में अनोखी है, क्योंकि इसके ज़रिए पहले से ज़्यादा भारी माल उतारा गया है। इससे भविष्य के लिए ज़्यादा भारी या इंसानों से युक्त यान को उतरने का रास्ता प्रशस्त होता दिखाई पड़ता है।

जैसा संलग्न तस्वीर से पता चलता है, इस अंतरिक्ष यान के कई हिस्से हैं। सबसे ऊपर प्रणोदकों (थ्रस्टर्स) के साथ "बैकशेल डीसेंट स्टेज' है, जो निर्देशित उतार के वक़्त वाहन को नियंत्रित करता है। इसमें एक डिब्बा भी लगा हुआ है, जिसमें पैराशूट मौजूद होता है। सतह पर यान के उतरने के दौरान यह पैराशूट सक्रिय होता है। फिर इसमें गर्मी से सुरक्षा के लिए रोधक आवरण (हीट शील्ड) होता है, जो यान के माल और शेल की सतह पर सुरक्षा करता है।

इस आवरण के नीचे "डिस्टिंक्ट डीसेंट स्टेज" मौजूद होती है, जिसमें अंतिम उतार को नियंत्रित व धीमा करने के लिए 8 प्रणोदकों वाला 'जेट पैक' और राडार लगा होता है। सतह पर उतरने के ठीक पहले डीसेंट स्टेज हौले से रोवर को दो केबिल और एक संचार तार (कम्यूनिकेशन कॉर्ड) के ज़रिए नीचे कर देती है। इस प्रक्रिया को आजकल "स्काई क्रेन" के नाम से जाना जाता है।

रोवर अपने आप में ही SUV गाड़ी के आकार (लंबाई- 10 फीट, चौड़ाई- 9 फीट और ऊंचाई 7 फीट) का 6 पहियों वाला वाहन है, इसमें नमूने इकट्ठा करने वाले हाथों को नहीं जोड़ा गया है। क्यूरियोसिटी रोवर में जो चेसिस (गाड़ी के ढांचे का मूल आधार) इस्तेमाल किया गया था, वहीं मौजूदा रोवर में उपयोग किया गया है। इससे मौजूदा रोवर का वज़न 1025 किलोग्राम हो जाता है। रोवर में मल्टी मिशन रेडियो-आइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर (MMRTG) भी लगा हुआ है, जो 4 किलोग्राम के प्लूटोनियम डॉइऑक्साइड से निष्पादित ऊर्जा से बिजली बनाता है। इसके ज़रिए पूरे मिशन के दौरान 100 वॉट की बिजली की आपूर्ति की जाएगी। वहीं उच्च मांग को पूरा करने के लिए दो लीथियम ऑयन बैटरियां भी लगाई गई हैं। इससे प्रिजरवेंस और इसके उपकरण सौर ऊर्जा की बाध्यता को मात देते हैं और रात में मंगल की बेहद तीव्र ठंड या मंगल के कुख्यात धूल के तूफानों में भी ठीक से काम कर पाएंगे।

प्रिजरवेंस रोवर के ज़रिए मिट्टी और खोदी गई चट्टानों के नमूनों को खास ढंग से बनाए गए बंद डिब्बों में इकट्ठा किया जाएगा। इसके बाद इन्हें मंगल की सतह पर कुछ खास जगहों पर छोड़ा जाएगा और भविष्य के अभियानों में इन्हें वापस लाया जाएगा। संभावना है कि ऐसा मंगल पर जाने वाले एक रोवर के ज़रिए किया जाएगा, जो इन डिब्बों को उठाएगा। इस रोवर के साथ डिब्बों को वापस लाने के लिए ऑर्बिटर भी लगा होगा, जिसके ज़रिए इन्हें वापस लाया जाएगा। 

प्रिजरवेंस के ज़रिए पहली बार मंगल ग्रह पर मौजूद कार्बन के ज़रिए ऑक्सीजन बनाने की तकनीक का परीक्षण किया जाएगा। मंगल ग्रह से होने वाले किसी भी लॉन्च के लिए बड़े स्तर पर ऑक्सीजन की जरूरत होगी, जो मंगल के वायुमंडल में उपलब्ध नहीं होगी। दूसरी तरफ पृथ्वी से इस ऑक्सीजन को ले जाना बहुत महंगा होगा। इस तकनीक को MOXIE (मार्स ऑक्सीजन इन-सिटु रिसोर्स यूटिलाइजेशन एक्सपेरीमेंट) कहा जाएगा। यह तकनीक कार्बन डाइऑक्साइड में घुलकर उसे साफ़ करती है, फिर उच्च तापमान वाली इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के ज़रिए इससे ऑक्सीजन का उत्पादन करती है।

यान की डिज़ाइन ने -130 डिग्री सेल्सियस ठंड, धूल के तूफान और ऊर्जा बचाने के लिए तेजी से चालू-बंद होने की क्षमता विकसित करने की कठिन चुनौती का समाधान किया है। यहां बहुत कम मात्रा में ऑक्सीजन का निर्माण होगा, जिसका भंडारण नहीं किया जाएगा, बल्कि इस पर सेंसर्स और उपकरणों के ज़रिए निगरानी रखकर परीक्षण किया जाएगा।

प्रिजरवेंस पर एक और नवोन्मेषी उपकरण है, जिसका नाम दिलचस्प ढंग से SHERLOC (स्कैनिंग हैबिटेबल एनवॉयरनमेंट विथ रमन एंड ल्यूमिनिसेंस फॉर ऑर्गेनिक्स एंड केमिकल्स) है। यह उपकरण मंगल ग्रह पर पहली बार पराबैंगनी किरणों और रमन स्पैक्ट्रोमीटर (इसका खोज नोबेल पुरस्कार प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक सी वी रमन ने की थी, उसी के ऊपर इस स्पैक्ट्रोमीटर का नाम रखा गया है) का उपयोग कर रहा है। इसके ज़रिए दूर से ही मंगल की सतह के जैविक तत्वों के साथ-साथ खनिजों का विश्लेषण से किया जाएगा।

इंजेन्यूटी 'हेलिकॉप्टर'

इंजेन्यूटी, हेलिकॉप्टर की तरह का एक अग्रणी रोबोटिक रोटरक्रॉफ्ट है। एक स्वतंत्र प्रयोग या तकनीक प्रदर्शक के तौर पर रोवर के भीतरी हिस्से में मौजूद होता है। 1.8 किलोग्राम के इस क्रॉफ्ट के ज़रिए पृथ्वी के बाहर की पहली यात्रा

सतह पर मिशन के उतरने के 60-90 दिनों (मंगल के दिन) के बाद रोटोक्रॉफ्ट की तैनाती की जाएगी। यह खुद से उड़ानें भरेगा और रोवर के लिए स्कॉउट के तौर पर काम करेगा और उस तक वापस जानकारी पहुंचाएगा। अगर यह सफल हो जात है तो इंजेन्यूटी भविष्य के लिए रास्ता खोलेगा और आगे आने वाले मिशनों में बड़े ड्रोन का इस्तेमाल ज़्यादा पेचीदा काम करने के लिए किया जा सकेगा।  

यहां भारतीय पाठकों को यह जानना दिलचस्प लगेगा कि इंजेन्यूटी का नाम 14 साल के भारतीय-अमेरिकी छात्रा वनीजा रूपानी ने रोवर के लिए सुझाया था। लेकिन नासा को लगा कि यह नाम रोटोक्रॉफ्ट के लिए सही रहेगा। 

यहां दूसरा भारतीय संबंध वैज्ञानिक स्वाति मोहन का है, जिनकी मास्क के ऊपर झांकती बिंदी की दुनिया भर में खूब चर्चा हुई थी। मोहन नासा-जेपीएल की उद्घोषक और स्पेसक्रॉफ्ट के नियंत्रण, उतार और पथ प्रदर्शन की मुख्य वैज्ञानिक हैं। इसके अलावा यूएई की अंतरिक्ष एजेंसी के मंगल अभियान में इसरो एक अहम साझेदार है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Take a Bow, NASA’s Perseverance Rover on Mars

NASA Rover
UAE Mars Mission
China Spacecraft
Life on Mars
Perseverance Rover
Ingenuity Helicopter
Mars 2020 Mission

Related Stories

नासा रोवर ने मार्स पर ढूंढा कार्बन, जीवन होने के सवाल पर बढ़ी जिज्ञासा

जीवन की तलाश में मंगल पर उतरा नासा का रोवर


बाकी खबरें

  • sc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पीएम सुरक्षा चूक मामले में पूर्व न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में समिति गठित
    12 Jan 2022
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘‘सवालों को एकतरफा जांच पर नहीं छोड़ा जा सकता’’ और न्यायिक क्षेत्र के व्यक्ति द्वारा जांच की निगरानी करने की आवश्यकता है।
  • dharm sansad
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
    12 Jan 2022
    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को भविष्य में 'धर्म संसद' के आयोजन के खिलाफ स्थानीय प्राधिकरण को अभिवेदन देने की अनुमति दी।
  • राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    विजय विनीत
    राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    12 Jan 2022
    "आरएसएस को असली तकलीफ़ यही है कि अशोक की परिकल्पना हिन्दू राष्ट्रवाद के खांचे में फिट नहीं बैठती है। अशोक का बौद्ध होना और बौद्ध धर्म धर्मावलंबियों का भारतीय महाद्वीप में और उससे बाहर भी प्रचार-…
  • Germany
    ओलिवर पाइपर
    जर्मनी की कोयला मुक्त होने की जद्दोजहद और एक आख़िरी किसान की लड़ाई
    12 Jan 2022
    पश्चिमी जर्मनी में एक गांव लुत्ज़ेराथ भूरे रंग के कोयला खनन के चलते गायब होने वाला है। इसलिए यहां रहने वाले सभी 90 लोगों को दूसरी जगह पर भेज दिया गया है। उनमें से केवल एक व्यक्ति एकार्ड्ट ह्यूकैम्प…
  • Hospital
    सरोजिनी बिष्ट
    लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़
    12 Jan 2022
    लखनऊ के साढ़ामऊ में स्थित सरकारी अस्पताल को पूरी तरह कोविड डेडिकेटेड कर दिया गया है। इसके चलते आसपास के सामान्य मरीज़ों, ख़ासकर गरीब ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। साथ ही इसी अस्पताल के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License