NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
अंतरराष्ट्रीय
एशिया के बाकी
पंजशीर घाटी पर तालिबान की जीत के मायने क्या हैं?
सबसे पहले तो तालिबान की पंजशीर पर 'विजय' का महत्व यह है कि अब युद्ध करीब-करीब समाप्त हो गया है। देश के अन्य हिस्सों में विद्रोह भड़कने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। मज़ार-ए-शरीफ़ भी चुपचाप देखता रहा, जहां ताजिक आबादी बहुतायत में है।
एम.के. भद्रकुमार
08 Sep 2021
Translated by महेश कुमार
taliban
6 सितंबर, 2021 को पंजशीर घाटी पर कब्जा करने के बाद गश्त लागते हुए तालिबानी

पंजशीर रिरियाते हुए एक धमाके के साथ तालिबान के सामने गिर गई। धमाका इसलिए क्योंकि 40 साल पुरानी एक किंवदंती चकनाचूर हो गई है, जो पंजशीर घाटी की अजेयता की कथा हुआ करती थी। और रिरियाना इसलिए है क्योंकि एक छोटे से समय के ‘प्रतिरोध' के बाद उसका अंत बड़ी शांति के साथ हो गया।

बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विद्रोह के दो शीर्ष नेता अहमद मसूद और अमरुल्ला सालेह, पिछले 4 दिनों के दौरान पंजशीर में थे ही नहीं, बल्कि वे ताजिकिस्तान के लिए रवाना हो चुके थे और ज़ाहिर तौर पर ट्विटर के माध्यम से तथाकथित 'प्रतिरोध' का नेतृत्व कर रहे थे। यह हास्यास्पद लग सकता है लेकिन इसके परिणाम घातक होंगे।

सबसे पहले तो तालिबान की पंजशीर पर 'विजय' का महत्व यह है कि अब युद्ध करीब-करीब समाप्त हो गया है। देश के अन्य हिस्सों में विद्रोह भड़कने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। मज़ार-ए-शरीफ़ भी चुपचाप देखता रहा, जहां ताजिक आबादी बहुतायत में है। इस दौरान अट्टा मोहम्मद नूर और राशिद दोस्तम आश्चर्यजनक रूप से शांत रहे हैं और दोनों शायद देश से बाहर हैं। इस्माइल खान को पकड़ने के बाद तालिबान ने उसे ईरान जाने दिया। नूर, जोकि सबसे प्रमुख सरदार हैं, ने सैन्य कार्रवाई की बजाय राजनीति को प्राथमिकता देने की इच्छा जताई है।

इन सरदारों का कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है। यह बात अभी भी पचानी बाकी है कि तालिबान के कब्ज़े के साथ, अफ़गानिस्तान में सरादरों के नेतृत्व में लड़े जाने वाले युद्धों का युग समाप्त हो रहा है। दोस्तम पर युद्ध अपराध के आरोप हैं, क्योंकि उन्होने सैकड़ों तालिबान लड़ाकों को कैद में रखा था। सालेह के खिलाफ भी कई आपत्तिजनक सबूत होंगे। नूर को अफ़गानिस्तान में सबसे धनी व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनकी छवी एक बहुत ही भ्रष्ट व्यक्ति की है जिसके कारण हाल के वर्षों में उनकी प्रतिष्ठा पर दाग लगा है। इस्माइल खान बहुत बूढ़ा है, और जीवन के अंतिम छोर पर है। उनमें से किसी के पास भी तालिबान की बराबरी करने की अखिल-अफ़गान अपील नहीं है।

ऐसा लगता है कि ताजिकिस्तान, अफ़गान सरदारों की सरपरस्ती का गढ़ बन गया है। लेकिन क्या यह तालिबान के प्रति प्रतिरोध को बढ़ाने का आधार बनेगा? इसकी संभावना नहीं के बराबर है। इसमें रूस का रुख अहम होने वाला है। बेशक, मास्को ने पंजशीर विद्रोह को हवा देने में एक संदिग्ध भूमिका निभाई है। लेकिन तालिबान और पाकिस्तान माफ़ करने के मूड में हैं, और अच्छी बात यह है कि रूस हमेशा से जानता है कि ब्रेड के किस ओर मक्खन लगाया जाता है।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव पहले से ही जाता चुके हैं कि वे सरकार की घोषणा के बारे में तालिबान के विशेष आमंत्रण को स्वीकार करने पर विचार कर रहे हैं। एक सुखद समाधान यह होगा कि मास्को इन बेहद अमीर अफ़गान सरदारों को निर्वासन के दौरान एक शानदार जीवन की राह प्रदान करे, और इस तरह तालिबान के प्रति कुछ समानता पैदा करे। यह मध्य एशियाई मैदानों में एक परिचित रूसी रणनीति है।

हालाँकि, रूस की मुख्य दुविधा यही बनी हुई है, यदि तालिबान उत्तरी अफ़गानिस्तान में स्थिति को स्थिर कर देता है और सीमा सुरक्षा को मजबूत करता है, तो मध्य एशिया में खतरे की धारणा, जो वर्तमान में विदेशी लोगों को न पसन्द करने की धारणा है फिलहाल नियंत्रण में है, वह कम हो जाएगी। अब, मध्य एशियाई राष्ट्रों में रूस की पकड़ सीधे तौर पर उन्हे सुरक्षा प्रदान की भूमिका से जुड़ी हुई है। वे देश जितना सुरक्षित महसूस करेंगे, मास्को पर उनकी निर्भरता उतनी ही कम होगी।

ज़ाहिर है, तालिबान इस सब को समझने के मामले में काफी सूझ-बूझ रखता हैं। इसलिए, उत्तरी अफ़गानिस्तान पर तालिबान की पकड़ मजबूत होने की उम्मीद है। तालिबान जानता है कि यही चिंता चीन की भी है।

रूस की तरह, संयुक्त राज्य अमेरिका भी अफ़गानिस्तान में गृहयुद्ध के खतरे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहा है। दोनों एक तरह से गृहयुद्ध में हितधारक हैं, क्योंकि अफ़गानिस्तान में उनका हस्तक्षेप अस्थिर परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हालांकि, रूस और अमेरिका के विपरीत, पंजशीर पर तालिबान के हमले से ईरान की नाखुशी काफी प्रामाणिक है, यह नाखुशी अफ़गान सुन्नी ताजिकों के साथ उसके जातीय और सांस्कृतिक संबंधों के आधार पर है, जिनकी आबादी लगभग 25-30 प्रतिशत के बीच है।

हालांकि, ईरान का मुख्य निर्वाचन क्षेत्र हजारा शिया है और तालिबान इसकी चिंताओं को दूर जरूर करेगा। ऐसी कोई भी उम्मीद पालना कि ईरान तालिबान विरोधी प्रतिरोध को बढ़ावा देने के लिए, रूस के साथ मिलकर काम कर सकता है, यह खयाली पुलाव जैसा है। अफ़गानिस्तान की स्थिरता में ईरान का बड़ा दांव लगा है। उसके लिए सीमा की सुरक्षा एक प्रमुख चिंता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि तालिबान अब तेहरान का विरोधी नहीं है, जो पहले से ही अफ़गानिस्तान में आर्थिक अवसरों की तलाश में है। उज़्बेकिस्तान और मध्य एशिया के लिए उत्तरी अफ़गानिस्तान के माध्यम से कनेक्टिविटी एक रणनीतिक परियोजना है, क्योंकि चीन के साथ इसकी साझेदारी अगले 25 साल में 400 अरब डॉलर के आर्थिक समझौते के सक्रिय होने के बाद छलांग लगाने की तो है ही, साथ ही सीमा का विस्तार करने की ओर अग्रसर भी है। इन सबके ऊपर, तेहरान चीन की भू-राजनीतिक चिंताओं को साझा करता है, खासकर अमेरिकियों को अफ़गानिस्तान से बाहर रखने के लिए ऐसा जरूरी है। ईरान शंघाई सहयोग संगठन तंत्र का सदस्य बनता जा रहा है और अब उसने तालिबान सरकार के साथ लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए वह इसका लाभ उठाना चाहता है।

वास्तव में, अमेरिका इस बात से घबराया हुआ है कि अन्य देश (ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे पिछलग्गु उसे छोड़कर) अंततः तालिबान सरकार के साथ मिलकर काम करना शुरू कर सकते हैं। वाशिंगटन चाहता है कि तालिबान सरकार को बदनाम करने के लिए डराने-धमकाने और झूठे आख्यानों को लिपिबद्ध करके ऐसा होने से रोका जा सकता है। वह एक बिंदु तक, यह काम कर सकता है, लेकिन नकारात्मकता पर आधारित रणनीति स्वाभाविक रूप से त्रुटिपूर्ण होती है।

अफ़गान मामलों में अमेरिका की भविष्य की संभावनाएं काफी हद तक आईएसआईएस के भविष्य पर निर्भर करेंगी। अमेरिका ने हाल ही में आईएसआईएस के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है, क्योंकि यह भविष्य में उसे अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप का बहाना प्रदान करता है। हक़ीक़त में, आईएसआईएस केवल अमेरिकी कब्जे के उदार माहौल और अशरफ गनी सरकार की मौन स्वीकृति में ही बढ़ सकता था।

गनी के काबुल में आईएसआईएस से जुड़े लोगों का पाकिस्तान में खून बहाने के उनके एजेंडे में चुनिंदा इस्तेमाल था। निश्चित रूप से पाकिस्तानी तालिबान की भी मिलीभगत थी। हालांकि, पाकिस्तान यह सुनिश्चित करेगा कि तालिबान सरकार अफ़गानिस्तान से संचालित होने वाले इन आतंकवादी समूहों पर शिकंजा कसे। यह इस्लामाबाद के लिए एक गहरा राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी है। तालिबान नेतृत्व के साथ उच्च स्तरीय परामर्श पहले ही शुरू हो चुका है। दोनों के आपस में मिलकर काम करने से, जितनी जल्दी कोई सोच भी नहीं सकता, उससे पहले परिणाम दिखाना शुरू कर देंगे।

निःसंदेह तालिबान के सामने आईएसआईएस है। लेकिन, यकीनन, अगर आईएसआईएस को जिस हद तक राज्य का संरक्षण प्राप्त था, वह अब उपलब्ध नहीं होगा, इसलिए यह कट्टरपंथी अफ़गान तत्वों के लिए चुंबक का काम नहीं कर पाएगा। और फिर, विदेशी कब्जे के अंत के साथ, अफ़गानिस्तान का 'जिहाद' सामाप्त हो गया है। तालिबान ने चरमपंथी तत्वों को आत्मसात करने का कौशल दिखाया है, यदि वे मेल-मिलाप करते हैं और साथ ही विद्रोही समूहों को खत्म करने में निर्ममता दिखाते हैं तो बेहतर होगा।

तालिबान नेतृत्व के सामने विदेशी हस्तक्षेप के लिए सभी संभावित बहाने को हटाना सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। लेकिन तालिबान कोई विद्रोही आंदोलन नहीं है। तालिबान लोककथाओं में, मातृभूमि को उपनिवेशवाद से मुक्त करने का एक राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष हुआ करता था। महत्वपूर्ण रूप से, चीन के साथ तालिबान के संबंधों की सफलता आतंकवादी समूहों पर अंकुश लगाने से जुड़ी है। और तालिबान चीन की सद्भावना और चौतरफा समर्थन को सबसे अधिक महत्व देता है।

इसलिए, पेंटागन के जनरलों को अंततः अपने शब्दों को एक बार फिर से वापस चबाना पड़ेगा, यदि वे गृहयुद्ध की स्थिति के सर्वनाश परिदृश्य को आगे बढ़ाते रहे। कुछ अमेरिकी थिंक टैंकरों का कहना है कि तालिबान अपने उग्रवादी सहयोगियों को जगह देने से इनकार नहीं करेगा। लेकिन ये स्वयंभू विशेषज्ञ इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि प्रतिरोध के दौर के सामरिक विचार आज मौजूद नहीं हैं और तालिबान की रुचि अफ़गान स्थिति को स्थिर करने और बेहतर शासन के साथ आगे बढ़ने में है।

यह निश्चित है कि आगे के हालात चुनौतीपूर्ण हैं। बड़े पैमाने पर 'ब्रेन ड्रेन' या पेशावर लोगों का देश छोडना नई सरकार की कुशलता से प्रदर्शन करने की क्षमता को कमजोर करता है। गनी और उसके गुट ने खज़ाना लूट लिया है। और इसी क्रम में, अमेरिका ने तालिबान सरकार की देश के भंडार (लगभग 9 बिलियन डॉलर से अधिक) की राशि पर तुरंत रोक लगा दी है। इसके ऊपर उन्होने अमानवीय प्रतिबंध भी लगा दिए हैं।

संक्षेप में कहा जाए तो, अमेरिका काफी प्रतिशोधी है और तालिबान सरकार के जीवन को यथासंभव कठिन बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित है। इस तरह की रणनीति तब तक जारी रह सकती है, जब तक तालिबान अमेरिकी दबाव को टालता रहेगा। लेकिन अच्छी बात यह है कि अमेरिका के यूरोपीय सहयोगी शायद उसके कदमों का अनुसरण न करें। जर्मनी पहले ही उसका साथ छोड़ चुका है। इटली भी इसका अनुसरण कर सकता है। फ्रांस चिंतित है। क़तर, तालिबान के प्रति स्पष्ट रूप से सहानुभूति रखता है। चीन ने ज़ाहिर तौर पर मदद के लिए अपनी तत्परता ज़ाहिर की है।

यहीं से पंजशीर के पतन का क्षण निर्णायक बन जाता है। तालिबान की प्राथमिकता बातचीत के जरिए समझौता करने की थी। लेकिन एक बार जब तालिबान ने महसूस कर लिया कि मसूद और सालेह चांद से नीचे कुछ नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे सभी कैबिनेट पदों में 1/3 हिस्सा आदि चाहते थे, इसलिए उन्होंने कार्रवाई करने का फैसला किया था।

राजधानी से महज 50 किलोमीटर दूर एक लंबे विद्रोह ने तालिबान की साख को ठेस पहुंचाई थी और बड़े पैमाने पर विदेशी हस्तक्षेप का रास्ता खोल दिया था। निश्चित रूप से, पंजशीर में तालिबान की जीत उसकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाती है। अंतत, तालिबान ने उस किले को जीत लिया जिसे सोवियत सेना 9 प्रयासों के बाद भी जीतने में विफल रही थी।

एम.के.भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। उपरोक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

तालिबान
पंजशीर
अफगानिस्तान
भारत
आतंकवाद

Related Stories


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    चिंता: कोरोना ने फिर रफ़्तार पकड़ी, देश में 24 घंटों में 2 लाख के क़रीब नए मामले
    12 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,94,443 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 60 लाख 70 हज़ार 233 हो गयी है।
  • Maurya
    मुकुल सरल
    स्वामी प्रसाद मौर्य का जाना: ...फ़र्क़ साफ़ है
    12 Jan 2022
    यह केवल दल-बदल या अवसरवाद का मामला नहीं है, यह एक मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया है, वो भी श्रम मंत्री ने। यह योगी सरकार की विफलता ही दिखाता है। इसका जवाब योगी जी से लिया ही जाना चाहिए।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    तीसरी लहर को रोकने की कैसी तैयारी? डॉक्टर, आइसोलेशन और ऑक्सीजन बेड तो कम हुए हैं : माकपा
    12 Jan 2022
    मध्यप्रदेश में माकपा नेता के अनुसार दूसरी लहर की तुलना में डॉक्टरों की संख्या 1132 से घट कर 705 हो गई है। इसी तरह आइसोलेशन बेड की संख्या 29247 से घटकर 16527 रह गई है। इसी प्रकार ऑक्सीजन बैड भी 28,152…
  • Protest in Afghanistan
    पीपल्स डिस्पैच
    अफ़ग़ानिस्तान में सिविल सोसाइटी और अधिकार समूहों ने प्रोफ़ेसर फ़ैज़ुल्ला जलाल की रिहाई की मांग की
    12 Jan 2022
    काबुल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान और क़ानून पढ़ाने वाले डॉ. जलाल तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के पिछले प्रशासन के आलोचक रहे हैं। उन्होंने महज़ सुरक्षा पर ध्यान दिये जाने की तालिबान सरकार की चिंता की…
  • bjp-rss
    कांचा इलैया शेफर्ड
    उत्तर प्रदेश चुनाव : हौसला बढ़ाते नए संकेत!
    12 Jan 2022
    ज़्यादातर शूद्र, ओबीसी, दलित और आदिवासी जनता ने आरएसएस-भाजपा के हिंदुओं को एकजुट करने के झूठे दावों को संदिग्ध नज़र से देखा है। सपा के अखिलेश यादव जैसे नेताओं को इस असहमति को वोट में बदलने की ज़रूरत है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License