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महामारी और लॉकडाउन के बीच तेल की क़ीमतें बढ़ाना मूर्खता है
टैक्स के सभी विकल्पों में तेल पर टैक्स बढ़ाना सबसे ख़राब और मूर्खता भरा क़दम है ख़ासकर तब जब आय के सभी स्रोत सूख गए हों। इस बढ़ोतरी का उत्पादन और रोज़गार के स्तर पर सबसे अधिक हानिकारक प्रभाव पड़ेगा।
प्रभात पटनायक
27 Jun 2020
Translated by महेश कुमार
तेल की क़ीमतें

25 दिसंबर, 2019 और 23 जून, 2020 के बीच, विश्व में कच्चे तेल (ब्रेंट) की क़ीमतों में लगभग 37 प्रतिशत की गिरावट आई है। दिसंबर के अंत और मध्य अप्रैल के बीच इसमें करीब 60 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है, लेकिन उसके बाद मूल्य में कुछ सुधार हुआ है। फिर भी, 23 जून तक दुनिया भर में तेल की क़ीमतों में गिरावट काफी नाटकीय रही है।

हालांकि, भारत में, इस अवधि के दौरान, पेट्रोल और डीजल की क़ीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और अब वे पहले से भी कहीं अधिक हैं; वास्तव में, पेट्रोल की क़ीमतों की तुलना में डीजल की क़ीमतें अधिक तेजी से बढ़ी हैं और दोनों के बीच का अंतर काफी हद तक गायब हो गया है।

भारत में तेल की क़ीमतों में ये वृद्धि पूरी तरह से केंद्र सरकार की वजह से हुई जिसने राजस्व बढ़ाने के लिए इन उत्पादों पर टैक्स की दर बढ़ा दी है। तेल को उस वस्तु के रूप में चुनना, जिस पर टैक्स की दरें बढ़ाई गई हैं, न केवल अमानवीय है, बल्कि संवेदनहीन भी है, खासकर जब एक विश्वव्यापी महामारी के बीच मेहनतकश लोगों के आय के स्रोत पूरी तरह सुख रहे हैं। यह संसाधनों की कमी के लगभग हर दूसरे साधन की तुलना में कुल मांग में कमी समस्या को बढ़ाता है, और इसलिए रोज़गार के अवसरों को कम करने का साधन बन जाता है।

सरकार के प्रवक्ताओं ने इसके पक्ष में जो तर्क दिया, वह यह कि पेट्रोल और डीजल ऐसी वस्तुएँ हैं जिन्हे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता हैं; इसलिए उनकी क़ीमतें बढ़ाना गरीबों को नुकसान पहुंचाए बिना संसाधनों को बढ़ाने का एक सुविधाजनक तरीका है। लेकिन यह पूरी तरह से गलत तर्क है। 

गरेब लोग सार्वजनिक परिवहन के व्यक्तिगत उपयोग के माध्यम से पेट्रो-उत्पादों के भारी अप्रत्यक्ष उपभोक्ता हैं; इसके अलावा, वे इस तथ्य से बहुत प्रभावित होते हैं कि तेल की ऊंची क़ीमतों की वजह से माल भाड़े की लागत भी बढ़ जाती है और वह सभी आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों को भी बढ़ा देती हैं, जिसमें सबसे जरूरी सामान भी शामिल होता है। इधर, डीजल की क़ीमतों में भी तेज वृद्धि देखी गई है, जिसका पेट्रोल की क़ीमतों की तुलना में माल भाड़े पर बड़ा असर पड़ता है, और लोगों के ऊपर विशेष रूप से बोझ बढ़ता है।

कामकाजी लोगों के जीवन स्तर पर माल ढुलाई की लागत का महत्व और असर अप्रत्यक्ष कराधान जांच समिति के किए गए एक अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि अकेले पेट्रो-उत्पादों के चलते, यहां तक कि "टायर और ट्यूब" की क़ीमतों पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है और  जीवन यापन की लागत को बढ़ाता है।

तेल, वास्तव में, जिसे एक सार्वभौमिक घटक माना जाता है, वह वर्तमान सामग्री की ऐसी लागत है जो खाद्यान्न जैसे कृषि सामानों सहित हर दूसरे उत्पादन में प्रवेश करता है। और राजस्व बढ़ाने के सभी विभिन्न साधनों के साथ, एक सार्वभौमिक घटक पर टैक्स लगाना, स्पष्ट रूप से सबसे प्रतिविरोधी कदम है।

एक बार आप प्रत्यक्ष करों को छोड़ दें, तो सामान्य अर्थों में यह किसी भी अन्य प्रकार के वस्तु टैक्स से भी अधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए, सरकार कुछ वस्तुओं पर एक अप्रत्यक्ष कर लगाती है जो एक सार्वभौमिक घटक नहीं है। फिर या तो इसका अन्य वस्तुओं की क़ीमतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा (यदि इसकी लागत किसी अन्य चीज के उत्पादन में नहीं लगती है), या केवल अन्य वस्तुओं की क़ीमतों पर केवल असर ही होगा (जिनके लिए यह लागत का काम करता है)। लेकिन, अगर यह एक सार्वभौमिक घटक है, तो यह हर उस वस्तु की क़ीमत को बढ़ाएगा, जिसे गरीब से गरीब लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि खाद्यान्न इत्यादि।

कोयला, तेल और (गैर-कोयला और गैर-तेल-आधारित) बिजली तीन सबसे महत्वपूर्ण सार्वभौमिक घटक हैं, जो अर्थव्यवस्था के भीतर हर वस्तु के उत्पादन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर डालते हैं। कोई भी सरकार जो लोगों पर महंगाई की मार के कष्ट को नहीं डालना चाहती है, वह इन सार्वभौमिक घटकों में से किसी की भी क़ीमत बढ़ाने से बचेगी; लेकिन अफसोस की बात है कि, भारतीय जनता पार्टी या भाजपा सरकार ऐसा नहीं कर रही है।

यह एक ऐसी सरकार है जो अपनी बेदिली और नासमझी के लिए जानी जाती है। संविधान कहता है कि जब किसी की संपत्ति को सरकार "सार्वजनिक उद्देश्य" की पूर्ति के लिए किसी व्यक्ति से छीन लेती है, तो उस व्यक्ति को संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह परिसंपत्ति उसकी आय का एक स्रोत है।

लेकिन भाजपा सरकार ने कामकाजी लोगों को मुआवजा देने के अपने संवैधानिक दायित्व का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है, और उन्हे कुछ भी नहीं दिया जिनके आय के स्रोत लॉकडाउन की अचानक घोषणा से सुख गए थे। आज तक, दुनिया के लगभग हर दूसरे देश के मुक़ाबले हमारे देश में लॉकडाउन के कारण श्रमिकों को हुई आय की हानि के मुवावजे के लिए कोई नकद भुगतान नहीं किया गया है। लेकिन, हालत को ओर बदतर बनाने के मामले में, इस अवधि के दौरान, इसने एक सार्वभौमिक घटकों के संसाधनों का उपयोग करने के लिए कराधान का उपयोग किया है, जिसे मोटे तौर पर कामकाज़ी लोगों की क़ीमत पर किया गया है।

यह उपाय, न केवल लोगों के हितों के खिलाफ है; बल्कि यह पूरी तरह से संवेदनहीन फैंसला भी है। सरकार, काफी समय से, अपने राजस्व से अधिक खर्च कर रही है, जिससे इसका वित्तीय घाटा बढ़ गया है। वह इस घाटे को कम करना चाहती है, यही वजह है कि अब वह तेल पर टैक्स लगा रही है। अब, घाटे को कम करने के लिए 100 रुपये कमाने के दो तरीकों की तुलना करें: एक आयकर दरों में समान अनुपात में वृद्धि कर के, और दूसरा तेल की तरह एक सार्वभौमिक घटक पर टैक्स लगा कर अर्जित करना। 

चूंकि गरीब लोग किसी भी आयकर का भुगतान नहीं करते हैं, इसलिए आयकर दरों में वृद्धि का पूरा बोझ जनसंख्या के अपेक्षाकृत संपन्न तबके पर पड़ेगा। चूंकि यह तबका अपनी आय का कुछ हिस्सा बचा पाता है, इसलिए उस कर भुगतान का एक बड़ा हिस्सा इसकी बचत से निकलेगा; इसलिए इसकी खपत 100 रुपए न होकर 80 रुपए रह जाएगी। इसलिए मांग में कमी जो कि राजकोषीय घाटे में कमी के कारण पैदा होगी वह वह 80 रुपए की होगी। 

लेकिन अगर तेल पर टैक्स लगाकर 100 रुपए उठाए जाते हैं, तो बोझ का एक हिस्सा गरीबों पर पड़ता है, जिनकी बचत शून्य होती है; और इस टैक्स का केवल छोटा भाग ही आबादी के उस संपन्न तबके पर पड़ेगा जो अपने लिए बचत करता है। इसलिए, जब सरकार 100 रुपये उठाती है, तो वह 50 रुपए गरीब तबके से और 50 रुपए संपन्न तबके से उठाती है, और बदले में संपन्न तबका 50 रुपये की खपत को कम कर 40 रुपये करता है और 10 रुपये की बचत करता है(खपत और बचत पर कर भुगतान के प्रभाव को ऊपर दिए गए उदाहरण के अनुसार, अर्थात 80:20)।

इसलिए टैक्स की वजह से खपत में कुल कमी,गरीबों से  50 रुपए  होगी जबकि संपन्न तबके से 40 रुपए होगी, जो 90 रुपए की खपत तक बैठती है। इसलिए तेल पर अधिक टैक्स, दूसरे शब्दों में कहे तो, गरीबों की खपत को निचोड़ता है, और बहुत अधिक हद तक मांग को कम करता है जो आयकर के राजस्व को बढ़ाता है।

अब तक राजकोषीय घाटे को कम करने का सबसे अच्छा तरीका अमीर तबके की धनसंपदा पर टैक्स लगाना रहा है। चूंकि धनसंपदा कराधान का बोझ अमीर तबके पर पड़ता है, और इससे उनके उपभोग के स्तर पर इसका बमुश्किल से असर पड़ता है, उन पर लगाया गया टैक्स का 100 रुपए जो पूरी तरह से उनके धन (या बचत) से निकलता है, वह उनकी खपत पर नगण्य प्रभाव डालता है। इस मामले में, मांग में कमी शून्य होगी। इसलिए राजकोषीय घाटे को कम करने का यह तरीका रोज़गार में कमी का कारण भी नहीं बनेगा।

अंत में, मान लीजिए कि सरकार ने राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए कुछ नहीं करती है; बावजूद इसके कुल मांग में कमी नहीं होगी और इसलिए रोज़गार और उत्पादन में भी कोई कमी नहीं होगी। लेकिन चूंकि किसी भी राजकोषीय घाटे का वित्त पोषण उधार लेकर किया जाता है, यानी निजी क्षेत्र में बचत करने वाले सरकार के दावों को धता बताते हुए, देश में धन असमानता को बढ़ाते है। सरकार बचत के रूप में सरकारी प्रतिभूतियों को निज़ी हाथों में दे देती है जो  निजी क्षेत्र का बेहतर और संपन्न तबका होता है।

इसलिए यह माना जाता है कि धनसंपदा कराधान सबसे अच्छा विकल्प है, क्योंकि यह धन असमानताओं को नहीं बढ़ाता है और कुल मांग को भी कम नहीं करता है। राजकोषीय घाटे को जारी रखना भी धन की असमानता को बढ़ाता है लेकिन कुल मांग को कम नहीं करता है। टैक्स आय में वृद्धि असमानता को नहीं बढ़ाती है, लेकिन समग्र मांग को कुछ हद तक कम कर देती है, जबकि तेल पर टैक्स लगाना, हालांकि यह धन असमानता को भी नहीं बढ़ाता है, कुल मांग पर इसका सबसे हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

कुल मांग और धन असमानता के दृष्टिकोण से देखें तो, धनसंपदा कराधान अब तक का सबसे अच्छा विकल्प है। इसकी अनुपस्थिति में, सरकार तेल पर टैक्स लगाने के बजाय कुछ अन्य प्रत्यक्ष कराधान का सहारा लेकर बेहतर काम कर सकती है। सभी टैक्स विकल्पों में से तेल पर टैक्स लगाना सबसे खराब विकल्प है क्योंकि इसका उत्पादन और रोज़गार के स्तर पर सबसे अधिक हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

मूल आलेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

The Absurdity of Hiking Oil Prices Amid Lockdown and Pandemic

Oil price hike
indirect taxes
wealth taxation
unemployment
BJP government
job opportunities
Oil taxation

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