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भारत
राजनीति
भारत की उज्ज्वल आकांक्षा
विशेष: गांधी जी की 151वीं जयंती के मौके पर भारत की "उज्ज्वल आकांक्षा" के बारे में लेखक गीता हरिहरन और नयनतारा सहगल के बीच हुई ख़ास बातचीत।
गीता हरिहरन, नयनतारा सहगल
07 Oct 2020
गीता हरिहरन, नयनतारा सहगल

गीता हरिहरन: मैंने सोचा कि हम भारत के उस विचार को याद करते हुए शुरूआत करें जिसके बारे में आप अपने परिवार-अपने माता-पिता, और विशेष रूप से अपने मामा नेहरू और गांधी की गवाह थीं। वास्तव में आप इसे 'भारत की उज्ज्वल आकांक्षा' (glittering aspiration called India) के रूप में वर्णित करती हैं। क्या आप इसके साथ शुरुआत करना चाहेंगी ताकि हमें आज अपनी बातचीत के लिए एक प्रसंग हो सके?

नयनतारा सहगल: हां, मैं जो समझती हूं कि यह महात्मा गांधी के नेतृत्व में आज़ादी के लिए संघर्ष था जिसमें मेरे माता-पिता शामिल थे। वास्तव में, मेरे पिता की मृत्यु ब्रिटिश शासन में उनके चौथे कारावास में हुई थी। यह भारतीय इतिहास का एक अद्भुत दौर था - यह पहली बार हुआ था जब वर्ग (class) और जनसमुदाय (mass) एक ही बैनर के अधीन एक साथ लड़े थे। ऐसा पहले कभी किसी देश में नहीं हुआ था। गांधी ने लोगों को इस तरह एक साथ लाया जो धर्म, क्षेत्र, वर्ग, लिंग अर्थात सभी श्रेणियों को प्रभावित करे। इस तरह जो उन्होंने निर्माण किया वह स्वतंत्र भारत की नींव बनी। इस समृद्ध विविधता को एक मज़बूत राजनीतिक एकता के सूत्र में लाना जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंका वह एक असाधारण उपलब्धि थी।

गीता हरिहरन: आप विषम आदर्शवाद के रूप में एकजुटता का वर्णन करती हैं; आपने अपने उपन्यास ‘व्हेन द मून शाइन्स बाई डे’ में अपनी मां की जेल डायरी के अंश का उपयोग किया है। चूंकि हम यह भी बात करना चाहते हैं कि आज हमें किस प्रकार की एकजुटता की आवश्यकता है, तो हम उस एकजुटता को याद करेंगे, उस समावेश की भावना कैसी थी जो उस समय हुई थी?

नयनतारा सहगल: स्वतंत्रता का सितारा बुलंदी पर था और इन सभी लोगों को इस मार्च में शामिल होने के लिए बुलाया गया था। यह पच्चीस या छब्बीस वर्षों का एक लंबा मार्च था जिसमें सभी वर्गों के लोग शामिल हुए थे। मुझे इस बात पर ज़ोर देना होगा कि यह पहला वर्ग-विहीन कार्य था जो किसी भी देश में हुआ था। यह एक ऐसी उपलब्धि थी जो अद्वितीय थी। यह इसलिए हुआ क्योंकि यह गांधी के माध्यम से हुआ था कि हम जैसे लोग, जिनका ग्रामीण भारत से कभी कोई संवाद नहीं था, वे एक साथ चीजों को व्यवस्थित करने में शामिल हो गए। मेरे पिता और मां ने अपना अधिकांश समय ग्रामीण क्षेत्रों में बिताया और मेरे मामा जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी की तरह ग्रामीण जनता को संबोधित करने के लिए संपूर्ण भारत की यात्रा की। यह पहली बार था जब अंग्रेज़ी भाषी वर्ग ने उन क्षेत्रीय भाषाओं को बोलने वालों से हाथ मिलाया था। उस दौरान उठे नारों में मेल-जोल स्पष्ट था-'हिंदू-मुस्लिम एक हो! 'या' भारत माता की जय! 'लेकिन नेहरू ने हमेशा इसे खुद परिभाषित करने के बजाय आम लोगों से 'भारत माता' की परिभाषा मांग की। एक और नारा था 'इंक़लाब ज़िंदाबाद!’ इस तरह के नारे उस समय में लोकतंत्र संबंधी और भावनात्मक थे; ये वैसे नारे थे जिसने युवा और वृद्ध को एकजुट किया था।

गीता हरिहरन: 'भारत माता' के रूप में भारत का उनका विचार धर्मनिरपेक्ष था, एक ऐसा विचार जो विभिन्नताओं को ध्यान में रखता था और इसलिए लोगों को एकजुट रखा था। क्या आप उस विचार के बारे में बता सकती हैं जिसने मंच के सभी स्वतंत्रता सेनानियों को एक साथ रखा?

नयनतारा सहगल: यह स्वतंत्रता का आह्वान था जो एकजुट करने वाला कारक था; और गांधीजी ने दिखाया था कि यह अहिंसक तरीक़े से किया जा सकता है। यदि यह अहिंसक संघर्ष नहीं होता, तो यह एक लोकप्रिय संघर्ष नहीं होता, जिसमें हज़ारों लोगों विशेषकर महिलाओं ने भाग लिया। गांधीजी ने महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया और वर्ष 1932 में लगभग तीस हज़ार महिलाएं जो संघर्ष का हिस्सा थीं वह जेल में थीं। इस आंदोलन में सभी वर्गों और धर्मों की महिलाओं ने भाग लिया। उनके प्रमुख अनुयायियों में से एक राजकुमारी अमृत कौर थीं जो ईसाई थीं; इस संघर्ष में उनके कई साथी मुस्लिम थे जैसे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या बदरुद्दीन तैयबजी; कुछ पारसी थे। सभी धर्मों और वर्गों के लोग गांधी के साथ मार्च करने आए। भारत का स्वतंत्रता संग्राम धर्मनिरपेक्षता का एक बहुत बड़ा उदाहरण था, क्योंकि इसमें विभिन्न वर्गों, विभिन्न धर्मों, विभिन्न भाषाओं के लोगों को एक साथ लाया गया था। यह इस तथ्य से भी परिलक्षित होता है कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में देशभक्ति के गीत हैं। गांधीजी का प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो’ गुजराती में था और इसके माध्यम से उन्होंने अपने लिए स्वतंत्रता का अर्थ बताया।

उन्होंने कहा कि वैष्णव वह व्यक्ति है जो दूसरे के दर्द को महसूस कर सकता है। गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में मुस्लिम, ईसाई और हिंदू प्रार्थनाएं होती थीं। कोई भी व्यक्ति उनकी प्रसिद्ध प्रार्थना 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ को शायद ही भूल सकता है जिसने एक पारलौकिक ईश्वर तक पहुंचने के लिए सभी धर्मों के इकट्ठा करने का उपदेश दिया। एक बच्चे के रूप में मुझे एक दुर्बल और दुबले-पतले गांधीजी भी याद है जिनकी आवाज़ बहुत दूर तक नहीं जाती थी। लेकिन इस आवाज़ ने एक साम्राज्य को हिला दिया। इसकी तुलना आज के चुनावों से करते हैं- पिछले चुनाव में [2014 में], हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री [नरेंद्र मोदी] ने हर जगह खुद की आदमकद प्रतिमाएं लगाना तय किया था।

गीता हरिहरन: दुर्भाग्यवश चलिए आकांक्षा के उस बिंदु से जहां हम आज हैं उससे आगे बढ़ते हैं और आपके उपन्यास का रुख करते हैं। जब मैंने इसे पढ़ना शुरू किया, तो मुझे लगा कि यह भविष्य में एक डायस्टोपिया (dystopia) होने वाला है। लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि ये उपन्यास वर्तमान में स्पष्ट कर रहा था। इस उपन्यास में 'सांस्कृतिक परिवर्तन निदेशालय' विशेष रूप से गुंजायमान था, जो इस समय में हम करते हैं। तब मैं आपसे पूछती हूं: 'उज्ज्वल आकांक्षा' (glittering aspiration) का क्या होता है, जो भारत था, जो न केवल आपके उपन्यास में था, बल्कि आज की वास्तविकता में भी है?

नयनतारा सहगल: हमें यह महसूस करना चाहिए कि भारत के समावेशी विचार में विश्वास करने वाले देश से हमें एक ऐसे एकल संस्कृति तक संकुचित किया जा रहा है जिसे हिंदू कहा जाता है। लेकिन आज जिसे हिंदू धर्म के रूप में पेश किया जाता है, वह हिंदू धर्म का एक उपहास का विषय बनाना है। हिंदुत्व एक सच्चे हिंदू के लिए हिंदू धर्म की विकृति है - न केवल जन्म से हिंदू, बल्कि मेरे जैसा आस्तिक। मेरा धर्म मेरे लिए मायने रखता है। हिंदुत्व के नाम पर हिंदू धर्म को बदला और विकृत किया जा रहा है। चर्चा और असंतोष को कुचल दिया गया है और ख़ारिज कर दिया गया है। हम जानते हैं कि असंतुष्टों के लिए क्या हो रहा है। लेखकों और पत्रकारों की गोली मारकर हत्याएं हुई हैं। आम लोगों की मॉब लिंचिंग हुई है - एक ग़रीब लोहार और एक डेयरी किसान जो अपना काम कर रहे थे उनका पुलिस के सामने सार्वजनिक रूप से भीड़ द्वारा लिंचिंग किया गया है और हिंदुत्व इस बारे में चुप है। हत्यारों को सजा नहीं मिली है। इसके बजाय, पीड़ितों के परिवारों को अक्सर दोषी पक्ष बनाया जाता है। यह हमारे वर्तमान समय की काफी हद तक वास्तविकता है। यह हमारी आंखों के सामने हो रहा है। हम सभी न्याय के इन बेसुध प्रहसन के गवाह हैं।

सौजन्य: इंडियन कल्चरल फॉरम

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित बातचीत पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

The Glittering Aspiration that was India

British empire Mahatma Gandhi
British Rule
Indian History
FREEDOM
Jawaharlal Nehru
FREEDOM STRUGGLE
Hindutva
hinduism

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