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क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) से क्यों है डर?
आइए समझते हैं कि RCEP क्या है? और RCEP के अंतर्गत ऐसा क्या होने की संभावना है कि घरेलू उत्पादक डर रहे हैं और अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।
अजय कुमार
11 Oct 2019
RCEP
Image courtesy: asean

भारत इस हफ्ते के अंत तक चीन की अगुआई वाले रीजनल कांप्रिहेंसिव इकॉनोमिक पार्टनरशिप यानी क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) के तहत बने देशों के समूह का हिस्सा बनने जा रहा है। भारत के इस कदम पर कई घरेलू उत्पादक बहुत पहले से अपने डर को जाहिर करते हुए अपना विरोध दर्ज करते आये हैं। घरेलू उत्पादकों के डर और विरोध को समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि RCEP क्या है? और RCEP के अंतर्गत ऐसा क्या होने की संभावना है कि घरेलू उत्पादक डर रहे हैं और अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

RCEP सोलह देशों के बीच एक प्रस्तावित मेगा मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement-FTA) है। जिसे आसियान के दस सदस्य देशों तथा छह अन्य देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूज़ीलैंड) के बीच किया जाना है।  आसियान यानी एसोसिएशन ऑफ़ सॉउथ इस्ट एशियन नेशंस ( ASEAN ) में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्याँमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम देश शामिल हैं।

इसकी समझौते की प्रस्तावना की नींव साल 2012 के आसियान शिखर सम्मेलन के समय पड़ चुकी थी। तब से इस प्रस्तावित समझौते पर काम किया जा रहा है। और अब तक इस पर कई बार बैठकें हो चुकी हैं।  

सैद्धांतिक तौर पर समझा जाए तो भूमण्डलीकरण के दौर में देश की अर्थव्यवस्थाओं के लिए देश की सीमायें उतनी बड़ी बाधा नहीं है, जितना भूमण्डलीकरण से पहले हुआ करती थी। फिर भी अपनी अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए देश कई तरह के कर लगाकर बाहरी वस्तुओं और सेवाओं से मिलने वाली अनुचित प्रतियोगिता से अपनी अर्थव्यवस्था को बचने की कोशिश भी करते हैं। अपनी अर्थव्यवस्था को अनुचित प्रतियोगिता से बचाए रखने के लिए देशों द्वारा उठाये गए यह कदम जायज होते है।

लेकिन इनका नुकसान भी होता है। हर देश के लिए दूसरा देश किसी बाजार की तरह होता है। और अपने बाजार को बचाए रखने के लिए करों यानी इस संदर्भ में टैरिफ की प्रतियोगिता छिड़ जाती है। जैसे कि चीन और अमेरिका के बीच चल रहा ट्रेड वार, जहां ऊंची दरों पर टैरिफ का निर्धारण कर वस्तुओं और सेवाओं को रोकने की भरपूर कोशिश की जा रही है। अमेरिका अपने देश से बाहरी मजदूरों को निकालने में लगा हुआ है ताकि उसके देश की नौकरियां दूसरे देश के लोगों को न मिले।

इसलिए देशों ने ऐसी संकल्पना पर भी विचार करना शुरू कर दिया कि एक-दूसरे के साथ मिलकर वह मुक्त व्यापार का करार करे। यानी ऐसा करार , जिसके तहत वस्तुओं और सेवाओं का स्वतंत्र आवागमन हो। टैरिफ जैसी कोई रोक टोक न हो। अगर हो भी तो बहुत कम हो। इसी विचार के तहत दक्षिण एशिया के देश भी चीन की अगुआई में RCEP का समूह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जहां वस्तुओं और सेवाओं का स्वतंत्र आवागमन हो। और इसी को लेकर इस हफ्ते के अंत में भारत इस समझौते में शामिल होने जा रहा है।

सैद्धांतिक तौर पर अर्थव्यवस्था के आवागमन का यह विचार जितना सुंदर दिखता है उतना ही व्यवहारिक तौर पर इसमें खामियां मौजूद है। इसलिए इन खामियों के बीच संतुलन बिठाते-बिठाते अभी तक RCEP की कई बार बैठकें हो चुकी हैं। खामियों को इस तरह से समझा जा सकता है हर देश की अर्थव्यवस्था की जमीनी हकीकत दूसरे देश की अर्थव्यवस्था से बहुत अलग है।

इसलिए जब दो या दो से अधिक अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से मुक्त व्यापार का समझौता करेंगी तो फायदा उनको होगा जो अपने वस्तुओं और सेवाओं को किफायती दाम में बेचने में कामयाब होंगे। ऐसे में केवल कुछ ही देश उत्पादक के तौर पर काम करेंगे और बाकि देश उस पर उपभोक्ता के तौर पर। जैसे कि पिछले वित्त वर्ष में चीन ने भारत को 70 बिलियन डॉलर का निर्यात किया, जबकि भारत द्वारा चीन को किया जाने वाला निर्यात 16 बिलियन डॉलर का था।

भारत इस बात से आशंकित है कि टैरिफ उदारीकरण के बाद दोनों देशों के निर्यात में तो वृद्धि होगी, लेकिन चीन की वृद्धि भारत की तुलना में अनुपातिक रूप से बहुत अधिक होगी जिससे भारत का व्यापार घाटा बहुत बढ़ जाएगा।

फोकस ऑन द ग्लोबल साउथ के मेंबर जोसेफ़ पुरुगुनान वैश्विक मामलों की डिजिटल मीडिया पोर्टल पीपुल्स डिस्पैच पर बात करते हुए कहते हैं कि अगर हम पूरे विश्व की भूराजनीतिक व्यवस्था पर निगाह डालें तो हम पाते हैं कि अमेरिका प्रशांत महासागर के आस-पास जुड़े देशों के साथ ट्रांस पैसिफिक एग्रीमेंट कर अपनी अगुआई में एक इकोनॉमिक ब्लॉक बनाना चाहता है। यूरोपियन यूनियन यह काम पहले से ही करते आ रहा है। और अब चीन की अगुआई में RCEP बनने की तैयारी हो रही है।

इन सबका मतलब है विश्व की मजबूत ताकतें अपना आर्थिक ब्लॉक भी बना रही हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि RCEP के अंतर्गत शामिल होने वाले 16 देश आर्थिक तौर पर उभरते हुए देश हैं , इनके पास संसाधन है, जिनका कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह आपस में दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बनाते हैं। इसलिए अगर ये RCEP में शामिल हो जाते हैं तो इनके लिए सबसे जरूरी बात यह होगी कि चीन के साथ कैसे संतुलन बिठाते हैं।

इसी मुद्दे पर पब्लिक सर्विस इंटरनेशनल की सुसना बारिया कहती हैं इसकी सबसे अधिक मार मजदूरों को झेलनी पड़ेगी। प्रतियोगिता का दबाव बहुत अधिक होगा। मजदूरी कम होगी। लोगों की आय कम होगी। अपनी वस्तुओं और सेवाओं को सस्ते दर में बेचने की होड़ की प्रवृत्ति का जन्म होगा। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि स्थानीय मजदूरों का किस तरह शोषण किया जाएगा। एक देश से दूसरे देश में इन्वेस्टमेंट का प्रवाह मुक्त करने की कोशिश की जायेगी। इस पर रेगुलेशन कम होगा। जिसका मतलब सारी चीजें इस बात पर निर्भर होंगी कि बाजार का झुकाव किस तरफ है और मुनाफा और नुकसान का पलड़ा किस तरफ झुकेगा।

तब यह सवाल उठता है कि इस समझौते को बढ़ावा कौन दे रहा है तो इस पर पब्लिक सर्विस इंटरनेशनल की सुसना बारिया कहती हैं कि अभी तक इस समझौते के पत्र सार्वजनिक यानी जगजाहिर नहीं किये गए है। इसका मतलब है कि इस समझौते को करने से पहले उन अर्थव्यवस्था के हितधारकों से बात नहीं की गयी है। ट्रेड यूनियनों, किसान, दवाई उत्पादक, लघु और कुटीर उद्योग से जुड़े लोग इन सबको पता नहीं है कि उनके लिए बनने वाली आर्थिक नीतियां का आधार कहीं दूसरी जगह से तय होकर आएगा।

सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं और जनता के प्रति उत्तरदायी भी होती हैं। इसलिए उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उन हितधारकों से भी बात करें जिनके हितों को प्रभावित करने के कदम उठाये जा रहे हैं। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो इसका मतलब है कि सरकारों पर किसी दूसरे का दबाव है। और यहां पर सरकारों पर बड़े कॉरपोरेट का दबाव दिखता है।

RCEP में भारत के लिए भी यही सारी चिंताएं है। उसके स्थानीय उत्पादकों की भी यही चिंता है कि उसके लिए नीतियां उसका देश नहीं तय करेगा, बल्कि देशों का समूह तय करेगा। उसमें भी उस देश की भूमिका सबसे अधिक होगा जो आर्थिक तौर पर सबसे अधिक मजबूत होगा। जैसा कि RCEP में अभी चीन की स्थिति है।

भारत के संदर्भ में डेयरी उत्पादकों की RCEP से जुड़ी चिंताओं को उदाहरण के तौर पर समझा जाना चाहिए। गुजरात के तकरीबन 75 हजार डेयरी फार्म में काम करने वाली औरतों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिठ्ठी लिखकर दूध और अन्य दुग्ध उत्पादों को RCEP समझौते से बाहर रखने की गुहार लगाई है।

भारत दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर है यानी दूध उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने में भारत खुद सक्षम है। अभी कुछ दिन पहले ही आईएनएस एजेंसी में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष दिलीप रथ का लंबा बयान छपा है। रथ का कहना है कि डेयरी उत्पादों को रीजनल कांप्रिहेंसिव इकॉनोमिक पार्टनरशिप (RCEP) के दायरे में लाने से देश के 6.5 करोड़ दुग्ध उत्पादन करने वाले किसान प्रभावित होंगे।भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक होने के साथ-साथ सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।

दिलीप रथ ने बताया कि पिछले साल 2018-19 में भारत में दूध का उत्पादन 18.77 करोड़ टन हुआ था जो कि कुल वैश्विक उत्पादन में 21 फीसदी है और देश में दूध का उत्पादन सालाना आठ फीसदी की दर से बढ़ रहा है। किसानों को धान और गेहूं के उत्पादन का जितना दाम मिलता है उससे ज्यादा दाम दूध के उत्पादन से मिलता है। साल में दूध के कुल उत्पादन का मूल्य 3,14,387 करोड़ रुपये है जो कि धान और गेहूं के कुल उत्पाद के मूल्यों के योग से ज्यादा है। दूध और दूध से बनने वाले उत्पाद किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक प्रमुख जरिया है।

रथ ने कहा कि इस समय देश में दूध की खपत प्रति व्यक्ति 374 ग्राम है, शहरी क्षेत्र में दूध की बढ़ती खपत को देखते हुए उम्मीद की जाती है कि यह आंकड़ा आने वाले पांच साल में 550 ग्राम प्रति व्यक्ति हो जाएगा।इस प्रकार, उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ खपत भी बढ़ेगी, लेकिन रथ का कहना है कि अगर डेयरी उत्पादों को RCEP के दायरे में लाया गया तो न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया से शून्य आयात कर पर सस्ते दुग्ध उत्पाद देश में आएंगे जिससे दूध उत्पादकों पर असर पड़ेगा।

इस तरह से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 25 प्रतिशत, वैश्विक व्यापार में 30 प्रतिशत, वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 26 प्रतिशत तथा कुल वैश्विक जनसंख्या का 45 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करने वाले इस मेगा ट्रेड फ्री समझौते से भारत से यही अपेक्षित है कि अपने घरेलू आर्थिक हितधारकों के हितों को ध्यान में रखते हुए और इसमें शामिल होने वाले सभी दशों से जुड़े सभी तरह के पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कोई भी फैसला ले।

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