NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
पूंजी और इसके मुनाफ़े में डूबे भारतीय समाज के लिए बहुत मुश्किल है कोरोना की लड़ाई!
पिछले तीन दशक से जिस तरह से हमने मुक्त अर्थव्यवस्था को गले लगाया है उसकी वजह से हमारी बुनायादी संरचनाएँ ऐसी बनी हैं जिनसे यह तय हुआ कि हम कोरोना का सामना करने में पूरी तरह से कमज़ोर हैं।
अजय कुमार
30 Apr 2021
पूंजी और इसके मुनाफ़े में डूबे भारतीय समाज के लिए बहुत मुश्किल है कोरोना की लड़ाई!
'प्रतीकात्मक फ़ोटो' साभार: सोशल मीडिया

इधर कोरोना से होने वाली मौतों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं और उधर लोगों का एक धड़ा मन ही मन यह सोच रहा है कि अगर लॉकडाउन लग जाए तो इसमें कुछ कमी आए। इस तरह से सोचने वाले धड़े के अधिकतर लोग अमीर वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। वह देख रहे हैं कि भारत की बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं तहस-नहस के कगार पर पहुंच चुकी हैं। उनके लिए फ़ायदेमंद यही है कि लॉकडाउन लगे और उन्हें कुछ राहत मिले। यह केवल इनकी ही बात नहीं है बल्कि कुछ राज्य सरकारें भी कहीं ना कहीं लॉकडाउन की प्लानिंग अपने दिमाग़ में लेकर चलती हैं। तो आइए भारत में कोरोना से बचने के उपाय के तौर पर लॉकडाउन को थोड़ा वैचारिक तौर पर समझते हैं।

प्रकृति और इंसानों के बीच का रिश्ता बहुत गहरा है। दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। प्रकृति हमें किस तरह से प्रभावित कर रही है, यह तो हम महसूस कर लेते हैं लेकिन हम किस तरह से प्रकृति को प्रभावित करते हैं, यह महसूस करना कठिन होता है।वायरोलॉजी की दुनिया में काम करने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे और प्रकृति के बीच का रिश्ता एक दूसरे के सहयोग और टकराव दोनों का होता है। लेकिन जब टकराव अधिक बढ़ जाता है तब जाकर ऐसे वायरस का जन्म होता है, जिनका हमारे शरीर के साथ सहयोग का नाता नहीं बन पाता। हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को भेदकर हम पर हावी हो जाते हैं। कोरोना भी एक ऐसा ही वायरस है।

इसका नाता किसी एक व्यक्ति,किसी एक समूह, किसी एक देश से नहीं बल्कि पूरी मानव जाति से है। इसलिए कोरोना से बचने के उपाय उतने ही मज़बूत होंगे जितने मज़बूत मानवों के अपने समाज को संभालने के लिए बने आपसी सामाजिक संबंध होंगे। वह सामाजिक संबंध और सामाजिक रिश्ते जिनकी इंसानों को रचने और गढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका होती है। अगर इंसानों के आपसी सामाजिक संबंध और अनुबंध मज़बूत हैं, तब वह इस वायरस से कम से कम नुकसान झेलेंगे लेकिन अगर सामाजिक रिश्ता कमज़ोर है, तब वायरस इंसानों पर बहुत बड़ा घाव छोड़ते चलेंगे।

हमारे आपसी समाजिक संबंध हमारे स्वभाव को निर्धारित करते हैं। इसमें कैद होना नहीं लिखा है। घर के अंदर कहीं चुपचाप बैठना नहीं लिखा है। यहां विज्ञान से ज्यादा सामाजिक विश्वास को तवज्जो दी जाती है। सामाजिक विश्वास है कि धार्मिक आयोजन होंगे। हिंदुओं के भी होंगे, मुस्लिमों के बीच होंगे। लाखों की भीड़ आएगी। एक सरकार बनानी है। इसलिए केंद्र, राज्य, पंचायत के चुनाव होंगे। 

इसके भीतर भले ही बहुत ज्यादा अनैतिक काम होते हैं लेकिन ऊपरी तौर पर यह एक तरह से स्थापित मान्यता बन चुकी है की वोट देना हमारा कर्तव्य है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि अगर इन्हें सरकार चाहती तो रोक सकती थी लेकिन सरकार नहीं चाहती तो जनता इन्हें नहीं रोक सकती थी। कुंभ का आयोजन होता ही होता। शादी ब्याह में लोग जाएंगे ही जाएंगे। भले कम आयोजन होंगे वहां कम लोग आएंगे लेकिन इन्हें पूरी तरह से रोकना बहुत मुश्किल है। इस तरह से कोरोना की दूसरी लहर पूरे देश भर में फैलना निश्चित था। इसे रोकना बहुत मुश्किल था। अब भी हो रहा है। यानी हमारा सामाजिक ताना-बाना ऐसा है जिसमें वायरस को फैलने से रोकना हमारे बस की बात नहीं थी।

आर्थिक तौर पर हमारा आपसी सामाजिक रिश्ता समानता वाला नहीं है। आर्थिक तौर पर गैर बराबरी नहीं बल्कि बराबरी होगी, यह बात महज किताब और संविधान के प्रावधानों में कैद होकर रह गई है। इसे लागू करने की कोशिश ही नहीं हुई। इसलिए व्यक्ति का जीवन मूल्य उपभोग की प्रकृति को अपनाता है और अधिक से अधिक धन संचय करने की चाहत रखता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में 80 फ़ीसदी से अधिक लोग ऐसे हैं जिनकी अगर महीने की आमदनी ना आए तो उनके घर की दीवार गिर जाएगी। ऐसे में वह कैसे किसी भी तरह के लॉकडाउन का बोझ सहन कर सकते हैं। लॉकडाउन की वकालत करना भी इस बड़ी आबादी के मन के अंदर डर के बीज बोने की तरह बन चुका है। बची खुची सूखी रोटी वह जो भी खा रहे है, उसे भी गंवा देने की तरह है। 

एक ऐसे देश में जहां अधिकतर लोग सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते हैं, वहां पर कोरोना से लड़ने के लिए लॉकडाउन लगाया जा सकता है। इस देश के कामगार बहुत दिनों तक काम पर ना आएंतब भी उन्हें मेहनताना मिलता रहेगा। उनकी सैलरी उनके खाते में जाती रहेगी। लेकिन अगर देश ऐसा है जहां पर महज़ एक फ़ीसदी लोग ही सरकारी कर्मचारी हैं और अधिकतर लोग प्राइवेट क्षेत्र और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं तो वहां पर लॉकडाउन लगाना तो लोगों को मौत के मुंह में धकेलने की तरह है। मुक्त बाजार व्यवस्था से चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतर्गत केवल मालिक के पास यह हैसियत है कि वह घर के अंदर रहकर निश्चिंत होकर रह सके। लेकिन मजदूरों की हैसियत नहीं होती। मालिक के पास पड़ा मुनाफा कभी मजदूरों में नहीं बंटता। लेकिन सरकारी कर्मचारी को आसानी से हर महीने की सैलरी मिलती रहती है। यहां मुनाफे के ऊपर मुनाफा और केवल मुनाफा कमाने जैसी कोई बात ही नहीं है। ऐसे में सोच कर देखिए कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए कौन सी व्यवस्था बढ़िया होगी? वह व्यवस्था जिसमें घर से बाहर निकल कर ही जिंदा रह जा सकता है या वह व्यवस्था जिसमें अगर घर के अंदर भी रहा जाए तो भूखे मरने की नौबत ना आए? अफसोस हिंदुस्तान एक ऐसा मुल्क है कि जहां पर दो वक्त की रोटी जुगाड़ आने के लिए बहुत बड़ी की आबादी को घर से बाहर निकलना पड़ता है।

बड़े-बड़े शहरों में बड़ी-बड़ी स्लम बस्तियां भी होती हैं। इन बस्तियों के टीम के एक छत के नीचे 4 से 5 लोग रहते हैं। कई कई बार यह संख्या इससे भी अधिक होती है। हवा कभी साफ नहीं मिलती है। पानी दिन में एक बार मुश्किल से मिल पाता है। इनके लिए मास्क, साबुन से दिन में कई बार हाथ धोना, सोशल डिस्टेंसिंग अपनाना जैसी सारी बातें बेईमानी है। लॉकडाउन का इनके लिए तो कोई मतलब ही नहीं बनता। 

इसके अलावा भारत में तकरीबन 13 करोड़ ऐसे लोग हैं जो दिन भर चाय की दुकान, छोटा सा खोमचा, रेहड़ी पटरी, कंस्ट्रक्शन मजदूर जैसे कई छोटे-मोटे काम करके अपनी जिंदगी चलाते हैं। इनकी जिंदगी अपने हुनर पर आधारित है। इन्हें किसी भी तरह की सुरक्षा नहीं मिली है। सड़क पर लोगों की आवाजाही बंद और इनकी जिंदगी की आमदनी बंद। इनकी जिंदगी की यह कहानी है। कोरोना की लड़ाई में अगर इन्हें घर के अंदर कैद करके रखा जाएगा तब तो इनके ऊपर मार पड़ेगा ही पड़ेगा लेकिन अगर दूसरे भी घर के अंदर रहेंगे तब भी इन्हें नुकसान झेलना ही पड़ेगा।

इन सबके साथ भारत की बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं। अगर कार्य बल में शामिल 85 फ़ीसदी से अधिक लोग ₹10000 से कम की आमदनी पर जीते हैं। तो इसका साफ मतलब है की प्राइवेट अस्पताल बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर भारत के दूसरे इलाकों में नहीं पहुंचेंगे। अगर पहुंचेंगे भी तो इतनी अधिक वसूली करेंगे कि लोगों की जिंदगी भर की कमाई टूट जाए। और यह सब होते चला रहा है। डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों के देशभर में मौजूदगी के आंकड़े तो यही बताते हैं कि भारत का बुनियादी स्वास्थ्य ढांचा पहले से ही मरा हुआ है। लेकिन इस पर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया। परिणाम यह हुआ की महामारी में लोग बिस्तर और अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से मर रहे हैं। दवाई की कीमत 5 गुना से लेकर 10 गुना अधिक बढ़ गई है। कालाबाजारी अपने चरम पर है। 

कहने का मतलब यह है कि इस महामारी से मार तो पड़ती ही पड़ती लेकिन अगर फ्री मार्केट यानी मुक्त बाजार वाली व्यवस्था की जगह सरकारी व्यवस्था होती तो यह मार कम पड़ती। काम देने वाले लोगों में सरकार मौजूद होती तो जनकल्याणकारी स्वरूप होता। लोग इस महामारी में घर बैठते तो इस चिंता से मुक्त होकर बैठते कि उन्हें पेट भर खाना नहीं मिलेगा। जिन देशों ने खुले तौर पर मुक्त बाजार व्यवस्था को अपनाया है और जिनकी सरकारों ने अपनी जनता को अनाथ बच्चों की तरह छोड़ दिया है उन्हें अधिक मार झेलनी पड़ रही है। इस संदर्भ में भारत भी एक ऐसा ही मुल्क है।

ध्यान से पांच मिनट बैठकर अपने देश के बारे में सोचा जाए तो यह सारे हालात सबको दिख जाते हैं। सरकार को भी दिखे होंगे। लेकिन सरकार ईमानदार कहां होती है? अगर इमानदार होती तो मरते हुए लोगों का दर्द समझ पाती। दर्द समझती तो उनका भी दर्द समझती जिनका देश के कई इलाकों में लोग धाम की वजह से सुबह शाम का चूल्हा नहीं जल रहा है। जो मानसिक तनाव में जी रहे हैं। अगर यह सब भी भारी था तो कम से कम इतना करती कि पूरे भारत के लिए मुफ्त में वैक्सीन पहुंचा देती। लेकिन सरकार ने कुछ भी नहीं किया।

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार औनिंद्यो चक्रवर्ती लिखते हैं कि पिछले तीन दशक से जिस तरह से हमने मुक्त अर्थव्यवस्था को गले लगाया है उसकी वजह से हमारी बुनायादी संरचनाएं ऐसी बनी हैं जिनसे यह तय हुआ कि हम कोरोना का सामना किस तरह से कर पाएंगे। इसलिए जो हो रहा है वह लगभग हमारी ही नीतियों का परिणाम है। इस महामारी से यही सीखना है कि हमें बदलना चाहिए। लेकिन पूंजी और इससे जुड़ा फ़ायदा हमारे समाज में इतने गहरे तक धंस चुका है कि बदलाव की कोई भी दिशा नहीं दिखती।

Coronavirus
COVID-19
economic crises
poverty
Hunger Crisis
unemployment

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License