NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
नज़रिया
समाज
भारत
लॉकडाउन में बच्चों पर बढ़े अत्याचार के मामले हमारे सामाजिक पतन की कहानी बयां कर रहे हैं
द चाइल्डलाइन इंडिया हेल्पलाइन नंबर पर 20 से 31 मार्च के बीच 92,000 कॉल आईं, जिनमें बच्चों को हिंसा तथा उत्पीड़न से बचाने की गुहार लगाई गई है। लॉकडाउन के बाद इस तरह की शिकायतों में 50% का इजाफा हुआ है।
अमित सिंह
10 Apr 2020
अत्याचार
प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली: किसी भी समाज के चरित्र को पता लगाने का सबसे बेहतर तरीका ये हो सकता है कि वो समाज अपने बच्चों के साथ कैसा बर्ताव कर रहा है। हमारे समाज का बर्ताव बता रहा है कि वह बर्बर व्यवहार के साथ संवेदनहीनता के नए मुकाम की तरफ बढ़ रहा है। हमारा न्यू इंडिया और उसका वातावरण बच्चों के अनुकूल बिल्कुल भी नहीं है।

कोरोना वायरस को हराने के लिए लॉकडाउन बहुत जरूरी है, लेकिन इसने हमारे समाज की सड़न को भी बाहर निकालने का काम भी बखूबी किया है। इस दौरान धार्मिक भेदभाव, सामाजिक भेदभाव, लैगिंक भेदभाव जैसी तमाम बुराईयां खुलकर सामने आ रही हैं। एक समाज के रूप में हमारा कितना पतन हो चुका है, वह अब साफ साफ दिखने लगा है।

अभी हम बात बच्चों की कर रहे हैं। दरअसल यह लॉकडाउन देश के लाखों बच्चों पर बहुत भारी पड़ रहा है। ये वैसे बच्चे हैं जो अपने घरों में ही प्रताड़ना के शिकार हैं। अब जब उन्हें प्रताड़ित करने वाले भी चौबीसों घंटे साथ रह रहे हैं, ऐसे में उनकी तकलीफ बढ़ गई है।

महिलाओं के साथ इस दौरान बढ़ी घरेलू हिंसा की रिपोर्ट के बाद अब बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की बात सामने आई है। द चाइल्डलाइन इंडिया हेल्पलाइन नंबर पर पिछले 11 दिनों में 92,000 कॉल आईं, जिनमें बच्चों के साथ गाली-गलौज, प्रताड़ना और हिंसा की शिकायतें दर्ज करवाई गईं।

चाइल्डलाइन इंडिया की उपनिदेशक हरलीन वालिया ने बताया कि देश के विभिन्न क्षेत्रों से 20-31 मार्च के बीच ‘चाइल्डलाइन 1098’ पर 3.07 लाख फोन कॉल आए हैं। इनमें से 30 फीसदी कॉल बच्चों से जुड़ी थीं जिनमें हिंसा और उत्पीड़न से बचाव की मांग की गई थी। 30 फीसदी कॉल की यह संख्या 92,105 है।

यह निराशाजनक स्थिति इशारा करती है कि लॉकडाउन के कारण कई महिलाओं के लिए एक तरह से बंधक जैसे हालात बन गए हैं और कई बच्चे भी घर में असुरक्षा की स्थिति में फंस गए हैं।

वालिया के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 24 मार्च को दिए गए भाषण के बाद 25 मार्च से लॉकडाउन शुरू हुआ जिसके बाद फोन कॉल 50 फीसदी तक बढ़ गए हैं। मंगलवार को यह आंकड़े जिले में स्थित बाल बचाव इकाइयों के साथ कार्यशाला में साझा किए गए। इस कार्यशाला में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया था।

कार्यशाला में चर्चा मुख्य रूप से कोरोना वायरस से जुड़े मुद्दों और बंद के दौरान बच्चों में तनाव को कम करने के रास्ते तलाशने पर केंद्रित थी। वालिया ने बैठक में बताया कि चाइल्डलाइन को बंद के दौरान शारीरिक स्वास्थ्य के संबंध में 11 फीसदी कॉल आईं, बाल श्रम के संबंध में आठ फीसदी, लापता और घर से भागे बच्चों के संबंध में आठ फीसदी और बेघर बच्चों के बारे में पांच फीसदी कॉल आईं।

हालांकि ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ लॉकडाउन के दिनों में हुआ है। इससे पहले की भी हमारी दुनिया बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं थी। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ही अध्ययन ‘चाइल्ड एब्यूज इन इंडिया’ के मुताबिक भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों के साथ एक या एक से ज्यादा तरह का यौन दुर्व्यवहार और उत्पीडन हुआ है। यानी लगभग हर दूसरे बच्चे के साथ ऐसी घटनाएं घटी हैं। ऐसे में हम यह नहीं कह सकते हैं कि हमारे परिवार के बच्चों के साथ यौन अपराध नहीं हुए हैं लेकिन हम फिर भी चुप हैं।

यही नहीं पिछले साल जुलाई में बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट इस कदर चिंतित हुआ कि उसने स्वत: संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दायर की थी। अदालत ने कहा कि पिछले छह माह में बच्चों से रेप के 24 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं जो झकझोर देने वाले हैं।

बच्चों के साथ उत्पीड़न की सबसे दुखद कहानी यह है कि इससे जानने वाले लोग ही शामिल होते हैं। ऐसे में बच्चों का भोलापन ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।

कई मामलों में यह भी देखा गया है कि बच्चें समझ ही नहीं पाते हैं कि उनका उत्पीड़न हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारारिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, दुर्व्यवहार, लैंगिक असामानता इत्यादि बाल उत्पीड़न के अंतर्गत आते हैं। फिर भी बच्चों के उत्पीड़न के कई प्रकार अस्पष्ट हैं और उन्हें परिभाषित करने की संभावनाएं अभी तक बनी हुई हैं।

एक बात और हमें पूरे देश के लिहाज से यह संख्या कम लग सकती हैं लेकिन यह याद रखना होगा कि ये बच्चों उत्पीड़न से जुड़े केवल वही मामले हैं जिन पर शिकायत दर्ज की गई है जबकि सर्वविदित है कि प्रकाश में आए मामलों के मुकाबले अंधेरे में रहने वाले मामलों की संख्या हमेशा से ही कई गुना तक अधिक रहती है। ऐसे में यह आंकड़ा भी डराने वाला है।

वो भी तब, जब मामला घरेलू हिंसा का हो तो इसकी संभावना और भी ज्यादा हो जाती है। गौरतलब है कि इससे पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरपर्सन रेखा शर्मा ने बताया था कि 24 मार्च से 1 अप्रैल के बीच लॉकडाउन के पहले हफ्ते में महिलाओं से दुर्व्यवहार की 1,257 शिकायतें मिलीं। उन्होंने आशंका जताई की ऐसे मामले बहुत ज्यादा हुए होंगे, लेकिन प्रताड़ित करने वाले भी चौबीसों घंटे साथ होने के कारण महिलाएं डर से शिकायत दर्ज नहीं करवा पा रही होंगी।

इसे पढ़ें : लॉकडाउन के चलते घरेलू हिंसा के मामले बढ़े, महिला उत्पीड़न में यूपी सबसे आगे

इसके अलावा पूरे दुनिया में कोरोना वायरस से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई थी। बाल अधिकार इकाईयों ने हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर 1098 को टोल फ्री नंबर बनाने और कोविड-19 के संकट के मद्देनजर इस नंबर को बच्चों, अभिभावकों या देखभाल करने वालों के लिए आपात नंबर बनाने को कहा था।

इसे पढ़ें : कोरोना संकट के बीच दुनियाभर में बढ़े घरेलू हिंसा के मामले

कई लोग कहेंगे, हमने बहुत नकारात्मक बातें की है, मैं कहना चाहता हूं सकारात्मक होने का एक कारण बताईये! फिलहाल हम कोरोना से लड़ाई जीत लेंगे, अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर ले आएंगे लेकिन एक समाज के रूप में भी हम तेजी से पतन की तरफ बढ़ रहे हैं। इस पर भी बात किए जाने की जरूरत है। अगर हम इस पर चर्चा नहीं करेंगे तो इसका हल कैसे खोजेंगे। आज इस हीनता से बचने के लिए भले ही हम अपनी समृद्ध परंपरा की दुहाई देते हुए तमाम बातें करें लेकिन सच्चाई यही है कि ये तस्वीर हमारी सामाजिक पतन की कहानी बयां कर रही है।

Coronavirus
Lockdown
Coronavirus lockdown
violence against Children
Atrocities on children
violence against women
Social Discrimination
Narendra modi
Domestic Violence

Related Stories

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

यूपी : महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा के विरोध में एकजुट हुए महिला संगठन

बिहार: आख़िर कब बंद होगा औरतों की अस्मिता की क़ीमत लगाने का सिलसिला?

बिहार: 8 साल की मासूम के साथ बलात्कार और हत्या, फिर उठे ‘सुशासन’ पर सवाल

मध्य प्रदेश : मर्दों के झुंड ने खुलेआम आदिवासी लड़कियों के साथ की बदतमीज़ी, क़ानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

बिहार: मुज़फ़्फ़रपुर कांड से लेकर गायघाट शेल्टर होम तक दिखती सिस्टम की 'लापरवाही'

यूपी: बुलंदशहर मामले में फिर पुलिस पर उठे सवाल, मामला दबाने का लगा आरोप!

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर

असम: बलात्कार आरोपी पद्म पुरस्कार विजेता की प्रतिष्ठा किसी के सम्मान से ऊपर नहीं

यूपी: मुज़फ़्फ़रनगर में स्कूली छात्राओं के यौन शोषण के लिए कौन ज़िम्मेदार है?


बाकी खबरें

  • International
    न्यूज़क्लिक टीम
    2021: अफ़ग़ानिस्तान का अमेरिका को सबक़, ईरान और युद्ध की आशंका
    30 Dec 2021
    'पड़ताल दुनिया भर' की के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने न्यूज़क्लिक के मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से बात की कि 2021 में अफ़ग़ानिस्तान ने किस तरह एक ध्रुवी अमेरिकी परस्त कूटनीति को…
  • Deen Dayal Upadhyaya Gorakhpur University
    सत्येन्द्र सार्थक
    दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पर गंभीर आरोप, शिक्षक और छात्र कर रहे प्रदर्शन
    30 Dec 2021
    गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पर कुछ प्रोफेसर और छात्रों ने आरोप लगाया है कि “कुलपति तानाशाही स्वभाव के हैं और मनमाने ढंग से फ़ैसले लेते हैं। आर्थिक अनियमितताओं के संदर्भ में भी उनकी जाँच होनी…
  • MGNREGA
    सुचारिता सेन
    उत्तर प्रदेश में ग्रामीण तनाव और कोविड संकट में सरकार से छूटा मौका, कमज़ोर रही मनरेगा की प्रतिक्रिया
    30 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश में देश की तुलना में ग्रामीण आबादी की हिस्सेदारी थोड़ी ज़्यादा है। सबसे अहम, यहां गरीब़ी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या देश की तुलना में कहीं ज़्यादा है। इस स्थिति में कोविड…
  • delhi
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना पाबंदियों के कारण मेट्रो में लंबी लाइन बसों में नहीं मिल रही जगह, लोगों ने बसों पर फेंके पत्थर
    30 Dec 2021
    दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों के बाहर गुरुवार सुबह लगातार दूसरे दिन यात्रियों की लंबी-लंबी कतारें देखी गईं।
  • AFSHPA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    नगा संगठनों ने अफस्पा की अवधि बढ़ाये जाने की निंदा की
    30 Dec 2021
    केंद्र ने बृहस्पतिवार को नगालैंड की स्थिति को ‘‘अशांत और खतरनाक’’ करार दिया तथा अफस्पा के तहत 30 दिसंबर से छह और महीने के लिए पूरे राज्य को ‘‘अशांत क्षेत्र’’ घोषित कर दिया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License