NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
भारतीय कला के उन्नयन में महिलाओं का योगदान
एक मां होने के कारण प्रागैतिहासिक काल में नारी को अपने बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी के फलस्वरूप नैसर्गिक रूप से रचनात्मक एवं सृजनात्मक भूमिका में उतरना पड़ा।
डॉ. मंजु प्रसाद
02 Aug 2020
भारतीय कला
पेटिंग : मंजु प्रसाद

नारी अर्थात कोमल, ममत्व वाली भावनाओं के साथ -साथ दृढ़ता, साहस की प्रतिमूर्ति। अनुमान लगाया जाता है कि जब मनुष्य वनकौस (वन में निवास करने वाला था तब संभवतः अपनी शारीरिक संरचना के कारण उन्हें विश्रामस्थल की जरूरत पड़ी। एक मां होने के कारण प्रागैतिहासिक काल में नारी को अपने बच्चों की  देखभाल की जिम्मेदारी के फलस्वरूप नैसर्गिक रूप से रचनात्मक एवं सृजनात्मक भूमिका में उतरना पड़ा।

पुरुषों का उतरदायित्व भोजन के लिये आखेट, प्रतिद्वंद्वी कबीलों के बर्बर हमलों से, हिंसक जानवरों से परिवार की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका थी।

महिलाओं ने बच्चों के मनबहलाव के लिए गृह कार्यों में प्रयुक्त होने वाले बरतनों पर आसपास के वातावरण को, पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों आदि की आकृतियाँ अलंकरणात्मक ढंग से चित्रण किया।

शुरुआत में तो गुफाओं के भित्तियों पर कोयले, खड़िया और रंगीन पत्थरों से या खुरच कर चित्र बने।

मानव सभ्यता का विकास हुआ। कबीले गांवों में तब्दील हुए। बच्चों के लिए, परिवार बचाने के लिए महिलाओं ने शांति और मेल-जोल की प्रक्रिया शुरू की। महिलाओं से बलात संबंध बनाने और अपहरण की प्रवृत्तियों पर रोक लगी। स्त्री-पुरुष की आपसी सहमति और परिवार के सहयोग से विवाह संबंध शुरू हुए। महिलायें विवाह उत्सवों में, विवाह वेदी व विवाह मंडप का अलंकरणयुक्त चित्रण, जन्मोत्सव के अवसर पर तथा अन्य उत्सवों आदि में मिट्टी से  लिपे भित्ति पर सुरुचिपूर्ण अलंकरण बनाने लगीं । इस तरह ग्रामीण परिवेश में पली बढ़ी स्व प्रशिक्षित कला, आम जनजीवन का अंग बनी। और अति लोकप्रिय हुई, उसे लोककला का नाम मिला।

भारत के सभी प्रांतों में ग्रामीण महिलाओं ने अपने अनोखे ढंग से सहज सुलभ माध्यमों से लोक कला को निरंतर गतिमय बनाये रखा। यद्यपि इसमें कई बार पुरुषों की भी भागीदारी बनी रही।

भारत के भोजपुरी भाषाई क्षेत्रों में लोक कला कई रूपों में प्रचलित रही है---जैसे चित्रकला, मिट्टी की मूर्ति (टेराकोटा) बनाने की कला, अल्पना, थापे, गोदना, मेहंदी, महावर आदि।

भोजपुरी क्षेत्र में चित्र कला दो रूपों में मुख्य तौर से बनती आई है। भित्तिचित्र और पट चित्र। चित्रांकन  के लिए 'उरेहना' शब्द का प्रयोग भोजपुरी में किया जाता है।'1

यहाँ के गांवों में भित्तिचित्रों की बहुत प्राचीन परम्परा रही है। जो घर के अंदर के या बाहरी दिवाल पर बनाया जाता है। विवाहोत्सवों में 'कोहबर चित्र' बनाये जाते हैं। कोहबर वह कमरा होता है जहाँ शादी के तुरंत बाद घर की महिलाएं मंगल गान और हंसी-मजाक के साथ दूल्हा और दुल्हन को ले जाते हैं। कोहबर के भित्तिचित्र में चार चिड़ियां, सूर्य, चंद्रमा, कमल पुष्प, कमल पत्र ,पालकी, घोड़ा, गोपीचंद्र, तारिकाएं तथा पान का पत्ता चित्रित किये जाते हैं। ये सब जीवन से जुड़ी प्रतीकात्मक आकृतियाँ हैं। जैसे सूर्य और चंद्रमा दीर्घ जीवन का, गोपीचंद्र और पुतरी, वर-वधू का, घोड़ा, हाथी और पालकी वैभव का, हंस और मोर, पान और कमल शुभ का प्रतीक आज भी माने जाते हैं। आज भी भोजपुरी भाषी परिवार में विवाह उत्सव के दौरान कोहबर चित्र गाँव में बनाया जाता है। हालांकि शहरों में सिनेमाई और टेलीविजन के हिंदी महिला प्रधान सीरियलों के प्रभाव ने 'नव दंपति' के नये और सुखी जीवन की कामना से जुड़ी इस सुन्दर कला को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।

कोहबर कला के अंतर्गत भित्तिचित्रों के सृजन में इस्तेमाल किये जाने वाली सामग्रियां घरेलू और दैनदिनचर्या में इस्तेमाल किये जानी वाली ही होती हैं। जो महिलाओं को सहज प्राप्य होती हैं। ये सामग्रियां मूख्यतः चूना, सिन्दूर, हल्दी ,काजल और चौरठ (चावल का आटा) आदी हैं। इस चित्रण प्रक्रिया में सबसे पहले दिवाल पर चूने की एक परत चढ़ा कर उजली भित्ति तैयार की जाती है। चूना उपलब्ध नहीं रहने पर पीली मिट्टी से ही दिवाल को लीप दिया जाता है। ग्रामीण औरतें  चौरठ में पानी और पीसी हल्दी मिला कर पीला रंग तैयार करती हैं। बाँस की पतली टहनी( कोहिनि) को काटकर उसके अगले भाग को कूचकर (कूटकर) तूलिका (ब्रश) तैयार की जाती है। इसी प्रकार की तैयार तूलिका से महिलाएं चौरठ, हल्दी के मिश्रण से तैयार घोल से चित्रांकन करती हैं। चित्रों में आकृति अनुसार काजल, गेरू तथा सिंदूर का भी प्रयोग किया जाता है। जहाँ तूलिका का अभाव होता है वहाँ तर्जनी अंगुली से ही चित्रण प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है।

भोजपुरी महिलाओं में भाइयों के दीर्घायु होने की कामना के लिए 'भैया दूज' बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। इस त्योहार में बहनें हाथ की उंगलियों का इस्तेमाल करते हुए चौरठ या गोबर से 'थापकर' , हल्दी, रोली के द्वारा लिपे हुई जमीन पर यम-यमी आदि प्रतीकात्मक आकृतियाँ बनाकर उनकी पूजा करती हैं। ये आकृतियाँ ज्यामितिक  आकार लिए होती हैं। सदियों से चलते आ रही मानव आकृति जो प्रागैतिहासिक काल के गुफा चित्रों में पाये जाते हैं  यहाँ भी बनाये  जाते हैं।  'भैया दूज' या 'पिड़िया 'जो कि भाई के लंबी और सुखी उम्र की कामना के लिए आज भी बिहार में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। यह त्योहार दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता है ।

दिवाली के अवसर पर महिलाएं खनिज रंग जैसे गेरू ,रामरज , चूना  आदि और वानस्पतिक रंग जैसे हल्दी,पीसे हुए चावल, हरी पत्तियों,आदि से अल्पना आदि बनाती हैं। जिसमें सुन्दर फूलों वाले और सुख की कामना वाले अलंकरण बनते हैं। इसे भोजपुरी में 'चौकपुरना 'भी कहते हैं ।

काठ के छोटे से तख्ते जिसे पीढ़ा या पीढ़िया कहते हैं पर भी महिलाएं सुन्दर डिजाइन से सुसज्जित कर देती हैं।

'गोदना' गोदाना भोजपुरी क्षेत्रों में शादीशुदा महिलाओं के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता था। नट जाति की औरतें ही गोदना गोदती रही हैं।

इसके लिए जो रंग तैयार किया था वह काला रंग, धतूरे के दूध में काजल मिला कर होता था। जो सुईयों से लगाया जाता था और कष्टदायी था। लेकिन ग्रामीण महिलायें सुहाग और श्रृंगार के लिए इस कष्ट को बर्दाश्त कर लेती थीं। गोदना गोदने वाली, महिलाओं के दर्द को दूर करने के लिए गाना भी गाती जाती थी। आजकल गोदना के लिए कई तरह के यंत्र आ गये हैं जिसमें उतना कष्ट नहीं होता। ' टैटू' गोदना का ही एक आधुनिक रूप है जिसके पीछे भारतीय युवा पागल हैं।

गोदना में अंकित आकृतियां वर्गाकार,गोलाकार या त्रिभुजाकार होती रहे हैं। प्रवीण गोदना गोदने वाली फूल-पत्तियों, विभिन्न प्रकार के पक्षियों, जीवों आदि के साथ पति का नाम बहुत सुन्दर ढंग से उकेरती हैं। जिसका जिक्र लोक गीतों में भी होता आया है।

भारत के अन्य प्रांतों के समान भोजपुरी महिलाओं भी सावन में या शादी-ब्याह के सुअवसर पर मेहंदी  लगाना का प्रचलन बहुत पुराना है। गाँव की लड़कियां, महिलायें मेहंदी की हरी पत्तियों को सिल पर महीन बारीक पीस कर सींक से अपने हाथों में मेंहदी लगाती हैं। घर में उल्लास और उत्सवी माहौल बन जाता है ,बच्चियाँ,बड़ी ,बूढ़ी तक उत्साह के रंग में रंग जातीं हैं।

हथेलियों पर पतली, घुमावदार रेखाओं में त्रिकोण, चतुर्भुज और पंचकोणात्मक आकारों में फूल पत्तियां गझीन ढंग से उकेरा जाता है। खुशबूदार मेंहदी की छोटी बड़ी बूंदियां हाथों में दमक उठतीं हैं।

भोजपुरी सुहागन महिलाओं में मांगलिक अवसरों पर महावर लगाना जरूरी होता है। लाल या गाढ़ा गुलाबी रंग का आलता ही महावर होता है। भारतीय लोक जीवन में महावर लगाने की परंपरा अति प्राचीन है। यहाँ तक कि भारतीय लघु चित्रों (मिनियेचर) जैसे पहाड़ी शैली के कई चित्रों में कृष्ण, राधा के पैरों में महावर लगा रहे हैं।

कपड़े  पर रंग बिरंगे धागे में सुन्दर   कसीदाकारी करने में ग्रामीण महिलायें पारंगत रहती हैं ।

बहुधा पहनने वाले वस्त्र, घरों में रोजाना इस्तेमाल किये जाने वाले तकिये के गिलाफ, कढ़ाई वाले परदे, बिस्तर के चादर आदि महिलायें घर में ही तैयार कर लेती हैं। कपडों के कतरन, मोती-मनकों से और धान की भूसी से भरे हुए   खिलौने जैसे गुड्डे-गुड़िया, हाथी-घोड़ा, चिड़िया आदि सुन्दर और प्यारे  खिलौने महिलाएं घर में ही बना लेती हैं। जिन्हें पा के बच्चे भी प्रमुदित होते हैं। ऐसे खिलौने बड़े मॉल में भी  नहीं मिलते हैं।

20200729_170836_2.jpg

घर में काम आने वाली जरूरत की सामग्रियां जैसे 'मूंज घास' से बनी कई आकारों में सुन्दर और कलात्मक डलिया, सिन्होरा, मंजूषा यहाँ तक की बच्चों के खिलौने भी बनते हैं। गाँव में घर की बुजुर्ग महिलायें भी निरर्थक जीवन नहीं जीती हैं। वो धान के पैरा (पुआल) और खजूर की पत्तियों से खुबसूरत चटाईयां, बीड़ा बना लेती हैं। उनकी ये प्रवीणता और हुनर अद्भुत है। और तो और घर के ओसारे में  चिड़िया के लिए लटकाये जाने वाले 'धान के डांठों' को भी कलात्मक ढंग बुनकर लटकाया जाता है। भोजपुर की ये कला वास्तव में 'उपयोगी कला' (यूस -फूल आर्ट) है।

इस प्रकार 'लोक कला' ऐसी अनुकरणात्मक कला विधा है जिसमें पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को प्रशिक्षित करती है। अपनी कला शैली, शिल्प और हुनर उन्हें सौंपती है। भारत के कई समकालीन कलाकारों ने लोक कला से प्रेरणा पाई है ।

(डॉ. मंजु प्रसाद एक चित्रकार हैं। आपने पटना विश्वविद्यालय से बीएफए और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एमएफए करने के बाद हिन्दी कला लेखन पर शोध कार्य किया। आपने पटना विश्वविद्यालय में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। इसके अलावा भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ में भी कुछ समय तक अतिथि विशेषज्ञ के तौर पर कला पर व्याख्यान दिए। आप इन दिनों लखनऊ में रहकर पेटिंग के अलावा ‘हिन्दी में कला लेखन’ क्षेत्र में सक्रिय हैं।)  

Indian art
Women's contribution
Prehistoric period
Indian Women
Women
women empowerment
Folk Art
Folk Artist

Related Stories

मदर्स डे: प्यार का इज़हार भी ज़रूरी है

विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!

उत्तर प्रदेश जनसंख्या नियंत्रण विधेयक महिलाओं की जिंदगी पर सबसे ज्यादा असर डालेगा!

चमन बहार रिव्यु: मर्दों के नज़रिये से बनी फ़िल्म में सेक्सिज़्म के अलावा कुछ नहीं है

अटेंशन प्लीज़!, वह सिर्फ़ देखा जाना नहीं, सुना जाना चाहती है

बंगाल : क्या है उस महिला की कहानी, जिसे दुर्गापूजा की थीम बनाया गया है?

‘करुणामय संघर्ष’ : बौद्ध काल की स्वतंत्रचेत्ता महिलाओं की कहानी

वॉइस ऑफ़ आज़मगढ़ : लड़कियों का सशक्तिकरण

मदर्स डे : कोरी भावुकता नहीं, ठोस प्रयास हैं आवश्यक


बाकी खबरें

  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में न Modi magic न Yogi magic
    06 Mar 2022
    Point of View के इस एपिसोड में पत्रकार Neelu Vyas ने experts से यूपी में छठे चरण के मतदान के बाद की चुनावी स्थिति का जायज़ा लिया। जनता किसके साथ है? प्रदेश में जनता ने किन मुद्दों को ध्यान में रखते…
  • poetry
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'टीवी में भी हम जीते हैं, दुश्मन हारा...'
    06 Mar 2022
    पाकिस्तान के पेशावर में मस्जिद पर हमला, यूक्रेन में भारतीय छात्र की मौत को ध्यान में रखते हुए पढ़िये अजमल सिद्दीक़ी की यह नज़्म...
  • yogi-akhilesh
    प्रेम कुमार
    कम मतदान बीजेपी को नुक़सान : छत्तीसगढ़, झारखण्ड या राजस्थान- कैसे होंगे यूपी के नतीजे?
    06 Mar 2022
    बीते कई चुनावों में बीजेपी को इस प्रवृत्ति का सामना करना पड़ा है कि मतदान प्रतिशत घटते ही वह सत्ता से बाहर हो जाती है या फिर उसके लिए सत्ता से बाहर होने का खतरा पैदा हो जाता है।
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: धन भाग हमारे जो हमें ऐसे सरकार-जी मिले
    06 Mar 2022
    हालांकि सरकार-जी का देश को मिलना देश का सौभाग्य है पर सरकार-जी का दुर्भाग्य है कि उन्हें यह कैसा देश मिला है। देश है कि सरकार-जी के सामने मुसीबत पर मुसीबत पैदा करता रहता है।
  • 7th phase
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव आख़िरी चरण : ग़ायब हुईं सड़क, बिजली-पानी की बातें, अब डमरू बजाकर मांगे जा रहे वोट
    06 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में अब सिर्फ़ आख़िरी दौर के चुनाव होने हैं, जिसमें 9 ज़िलों की 54 सीटों पर मतदान होगा। इसमें नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी समेत अखिलेश का गढ़ आज़मगढ़ भी शामिल है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License