NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
नज़रिया: मातृभाषा की पगडंडी से नहीं अंग्रेज़ी के एक्सप्रेस-वे से गुज़रता है तरक़्क़ी का क़ाफ़िला
भारत की इकनॉमी तेज़ी से सर्विस सेक्टर की ओर झुकती जा रही है और इसमें अंग्रेज़ी का रोल और बड़ा हो जाता है। अंग्रेज़ी एक वोकेशनल स्किल है और इसका सर्विस सेक्टर के वेतन पर ख़ासा फ़र्क़ पड़ता है।
दीपक के मंडल
17 Aug 2020
मातृभाषा
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : prabha sakshi

नई शिक्षा नीति में 5वीं क्लास तक मातृभाषा में पढ़ाई के विचार को जिस समर्थन की उम्मीद थी वह नहीं मिला। सरकार को लग रहा था कि वह इसे क्षेत्रीय भाषा बनाम अंग्रेजी का मुद्दा बना कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अपने एजेंडे को नई धार दे सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि ये बात अब शायद ही किसी से छिपी है कि अंग्रेजी लिखने-पढ़ने और बोलने की काबिलियत किस तरह गरीबी से मुक्ति और सामाजिक तरक्की का पासपोर्ट बन गई है।

इन्फोसिस के नॉन एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नंदन नीलेकनी ने 12 साल पहले लिखी अपनी एक किताब ‘इमेजिनिंग इंडिया’ में अंग्रेजी को बेहतर करियर बनाने वाली एक अदृश्य भाषा कहा था लेकिन अब सब कुछ साफ दिख रहा है। खास कर उन लोगों को जो भारत जैसे भारी गैर बराबरी वाले देश में आर्थिक-सामाजिक तरक्की के निचले पायदान पर मौजूद हैं।

नीलेकनी ने इस किताब में बताया है कि कैसे अंग्रेजी जानने वाले युवाओं ने भारत को रातोंरात बीपीओ सेक्टर का स्टार बना दिया। भारत की आईटी क्रांति इसी बीपीओ लहर पर सवार होकर आई और इसने देश में एक बड़े मध्य वर्ग का निर्माण किया।

भारत का रियल एस्टेट सेक्टर देश में शुरू हुई आईटी कंपनियों के पेशेवरों की बदौलत ही चमका क्योंकि पच्चीस से तीस साल के युवाओं के पास पैसा और ऐसी जॉब सिक्योरिटी थी कि वे महानगरों में लाखों का फ्लैट खरीद सकते थे। आज जब क्रैश हो चुके रियल एस्टेट सेक्टर की बात होती है तो लोग कहते हैं कि इसे बदहाली से निकालने के लिए कम से कम दस इन्फोसिस की जरूरत है। आईटी के जरिये इस देश में जो भी समृद्धि आई वह भारतीयों के तकनीकी ज्ञान के साथ अंग्रेजी में उनकी पकड़ का नतीजा थी। अंग्रेजीदां पेशेवरों की ताकत को देख कर ही दुनिया भर की कंपनियों ने सॉफ्टवेयर लिखने और आउटसोर्सिंग का काम भारतीय आईटी कंपनियों को देना शुरू किया। चीन के पास भी तकनीकी ताकत थी लेकिन इस बाजार में शुरुआती दौर में वह सिर्फ कमजोर अंग्रेजी की वजह से पिछड़ गया।

इस तरह आपकी मार्केट वैल्यू बढ़ाती है अंग्रेज़ी

अंग्रेजी किस तरह आपकी कमाने की ताकत बढ़ाती है इसका एक दिलचस्प उदाहरण कुछ साल पहले ह्यूमन रिसोर्सेज और एम्प्लॉयमेंट सर्विसेज मुहैया कराने वाली कंपनी टीमलीज के संस्थापक मनीष सभरवाल ने दिया था। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि दिल्ली के मार्केट में अंग्रेजी न जानने वाला यूपी के किसी युवा की लेबर मार्केट में पैकर या लोडर के तौर पर दस हजार से शुरुआत होती है। लेकिन नॉर्थईस्ट के अंग्रेजी जानने वाले युवक की शुरुआत किसी दफ्तर में फ्रंट ऑफिस संभालने या किसी मॉल में कस्टमर रिलेशनशिप एक्जीक्यूटिव से हो सकती है। यह प्रोफाइल उसका वेतन सीधे 18 से 20 हजार रुपये कर देता है।’ सभरवाल का कहना था कि भारत की इकनॉमी तेजी से सर्विस सेक्टर की ओर झुकती जा रही है और इसमें अंग्रेजी का रोल और बड़ा हो जाता है। इस सेक्टर में कम्यूनिकेशन स्किल, मैन टु मैन इंटरएक्शन और कंप्यूटर एप्लीकेशन का इस्तेमाल ज्यादा होता है। इसलिए अंग्रेजी का महत्व बढ़ जाता है।

अंग्रेजी एक वोकेशनल स्किल है और इसका सर्विस सेक्टर के वेतन पर खासा फर्क पड़ता है। अंग्रेजी न जानने वाले एक सेल्समैन को अंग्रेजी जानने वाले सेल्समैन से कम वेतन मिलेगा क्योंकि भारत के अंग्रेजीदां मिडिल या अपर मिडिल क्लास को ज्यादा अच्छी तरह से एंगेज करने की उसकी काबिलियत हमेशा संदिग्ध रहेगी।

दुनिया के सबसे असरदार बिजनेस स्कूल हार्वर्ड की मैग्जीन ‘हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू’ के एक ब्लॉग ने ‘इंग्लिश प्रोफेशिएंसी इंडेक्स’ के हवाले से बताया है जो देश इंग्लिश में आगे हैं वे जीडीपी, प्रति व्यक्ति और ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भी आगे हैं। इस रिपोर्ट में दुनिया भर के एच.आर. मैनेजरों से सर्वे के आधार पर बताया गया है कि अंग्रेजी में काबिलियत कर्मचारियों को 50 फीसदी तक ज्यादा सैलरी दिलाती है।

अंग्रेज़ी सीखने की धुन ने जैक मा को कहां से कहां पहुंचा दिया

अंग्रेजी आपको कहां से कहां पहुंचा सकती है कि इसका फिलहाल इस दुनिया में सबसे बड़ा उदाहरण हैं, दिग्गज चीनी ई-कॉमर्स कंपनी के संस्थापक जैक मा। जैक मा को 12 साल की उम्र में समझ आ गया था कि अंग्रेजी तरक्की का सबसे तगड़ा पासपोर्ट है। आंधी आए, बारिश हो या बर्फ गिरे, रोज सुबह 12 साल के जैक मा हांगझाऊ लेक सिटी डिस्ट्रिक्ट सिटी के नजदीक एक होटल में पहुंच जाते। अपनी अंग्रेजी अच्छी करने के लिए वह यहां लगातार आठ साल तक बाहर से आने वाले पर्यटकों को घुमाने ले जाते। उनसे उनके तौर-तरीके सीखते और अपनी अंग्रेजी को मांजते। इस अंग्रेजी की बदौलत ही वह बाद में एक कॉलेज में इस सबजेक्ट के टीचर बन गए। अंग्रेजी ने जैक मा को दुनिया को समझने में मदद की। उन्होंने विदेशियों के तौर-तरीके सीखे और अपने सोचने का तरीका सुधारा। इंटरनेट से भी उनका परिचय इसी भाषा के जरिये हुआ। फिर जैक मा ने पीछे मुड़ कर नहीं दिखा। आज अली बाबा दुनिया की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन को टक्कर दे रही है।

अंबेडकर ने कहा था, अंग्रेजी शेरनी का दूध

इस देश में दलितों के सबसे बड़े आइकन भीमराव अंबेडकर ने अंग्रेजी को शेरनी का दूध कहा था। उन्होंने दलितों से अपनाने को कहा था। इस अंग्रेजी ने खुद अंबेडकर को मजबूत किया था। और अब भी यह हर उस शख्स को मजबूत बना रही है जो आर्थिक-सामाजिक तौर पर खुद को एक कमजोर जमीन पर खड़ा पाता है।

नई शिक्षा नीति में पांचवीं क्लास के बाद ही अंग्रेजी पर जोर देने की रणनीति भारत के उन बच्चों के साथ धोखाधड़ी होगी, जिन्हें आगे जाकर भारी गला काट प्रतिस्पर्द्धा वाले मार्केट में उतरना होगा। उस वक्त वह मजबूत अंग्रेजी बगैर खुद को निहत्था महसूस करेंगे और हारने को अभिशप्त होंगे।

अंग्रेजी पर पांचवीं के बाद जोर देने का फॉर्मूला फेल चुका है। इसने भारतीय युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को हमेशा के लिए समृद्धि के दौड़ से बाहर कर दिया है। आज भी यह पीढ़ी जॉब मार्केट में गैर बराबरी का सलीब ढो रही है।

देश में एजुकेशन, लेबर मार्केट, सोशल और इकनॉमिक मोबिलिटी के बीच के सूत्र के तौर पर अंग्रेजी की भूमिका निर्विवाद तरीके से स्थापित हो चुकी है। सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़ी आबादी को यह सूत्र अब आसानी से समझ आ रहा है। इसलिए सरकार चाहे मातृभाषा पर पढ़ाई के फॉर्मूले पर जितना जोर दे यह लोगों को दिलोदिमाग में नहीं उतरेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें : अगर वे सिर्फ अंग्रेजी सीख लेते हैं तो ओबीसी आरक्षण का फायदा उठाने की स्थिति में आ सकते हैं

new education policy
NEP
Language
English Language
hindi
Mother Tongue
Role of english
Importance of English

Related Stories

हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है

अपनी भाषा में शिक्षा और नौकरी : देश को अब आगे और अनीथा का बलिदान नहीं चाहिए

अयोध्या के बाद हिंदुस्तानी मुसलमान : भविष्य और चुनौतियां

बर्बाद हो रहे भारतीय राज काज के लिए नई शिक्षा नीति सुंदर शब्दों के अलावा और कुछ नहीं

जयंती विशेष : हमारी सच्चाइयों से हमें रूबरू कराते प्रेमचंद

तिरछी नज़र : ज़रूरत है एक नई राजभाषा की!

विशेष : 21वीं सदी में हिंदी के प्रति बदलता हुआ नज़रिया

हिंदी अब धमकी की भाषा बनती जा रही है : मंगलेश डबराल


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 15 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 278 मरीज़ों की मौत
    23 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 15,102 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 67 हज़ार 31 हो गयी है।
  • cattle
    पीयूष शर्मा
    यूपी चुनाव: छुट्टा पशुओं की बड़ी समस्या, किसानों के साथ-साथ अब भाजपा भी हैरान-परेशान
    23 Feb 2022
    20वीं पशुगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पूरे प्रदेश में 11.84 लाख छुट्टा गोवंश है, जो सड़कों पर खुला घूम रहा है और यह संख्या पिछली 19वीं पशुगणना से 17.3 प्रतिशत बढ़ी है ।
  • Awadh
    लाल बहादुर सिंह
    अवध: इस बार भाजपा के लिए अच्छे नहीं संकेत
    23 Feb 2022
    दरअसल चौथे-पांचवे चरण का कुरुक्षेत्र अवध अपने विशिष्ट इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना के कारण दक्षिणपंथी ताकतों के लिए सबसे उर्वर क्षेत्र रहा है। लेकिन इसकी सामाजिक-राजनीतिक संरचना और समीकरणों में…
  • रश्मि सहगल
    लखनऊ : कौन जीतेगा यूपी का दिल?
    23 Feb 2022
    यूपी चुनाव के चौथे चरण का मतदान जारी है। इस चरण पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि इन क्षेत्रों में हर पार्टी की गहरी हिस्सेदारी है।
  • Aasha workers
    वर्षा सिंह
    आशा कार्यकर्ताओं की मानसिक सेहत का सीधा असर देश की सेहत पर!
    23 Feb 2022
    “....क्या इस सबका असर हमारी दिमागी हालत पर नहीं पड़ेगा? हमसे हमारे घरवाले भी ख़ुश नहीं रहते। हमारे बच्चे तक पूछते हैं कि तुमको मिलता क्या है जो तुम इतनी मेहनत करती हो? सर्दी हो या गर्मी, हमें एक दिन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License