NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
प्रोग्रेसिव टैक्स से दूर जाती केंद्र सरकार के कारण बढ़ी अमीर-ग़रीब के बीच असमानता
वेल्थ टैक्स के उन्मूलन जैसे प्रतिगामी बदलावों ने अप्रत्यक्ष करों पर निर्भरता बढ़ा दी है।
भरत डोगरा
07 Feb 2022
Translated by महेश कुमार
economic crisis
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

ऐसे समय में जब गरीबों की आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए और उसके लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने के लिए अमीरों पर अधिक कर लगाने के मामले में नए सिरे से वैश्विक दबाव बनाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ भारत प्रोग्रेसिव टैक्स प्रणाली से मुह मोड रहा है - विशेष रूप से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने पिछले आठ वर्षों में ऐसा ही कुछ किया है। 

2020-21 के बजट अनुमान (बीई) में सकल कर संग्रह 24.23 लाख करोड़ रुपये आंका गया था, जो मार्च और मई 2020 में पेट्रोल और डीजल शुल्क में भारी वृद्धि के बावजूद संशोधित अनुमानों में घटकर 19 लाख करोड़ रुपये रह गया था। 

सरकार ने 2020 में टैक्स संग्रह अनुमान में आई कमी का दोष कोविद-19 के सर पर मढ़  दिया था। हालांकि, पिछले वित्तीय वर्ष से ही टैक्स संग्रह में गिरावट शुरू हो गई थी। 2018-19 में 20.80 लाख करोड़ रुपये से घटकर वर्ष 2019-20 में 20.10 लाख करोड़ रुपये हो गया था।  

उल्लेखनीय रूप से, केंद्र ने 2021-22 के लिए सकल टैक्स संग्रह को बजट अनुमान 2020-21 में 24.23 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 22.17 लाख रुपये कर दिया था। स्पष्ट रूप से, सरकार गरीबों की मदद करने के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी से कतरा रही थी,  जो महामारी के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। 

एनडीए सरकार, संसाधन जुटाने के अपने अधिकतर विकल्पों का त्याग रही है। 2015 के बजट में वेल्थ टैक्स को समाप्त कर दिया गया था। सितंबर 2019 में, लोकसभा ने कॉरपोरेट टैक्स को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतसीहत करने के लिए कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित किया था, एक ऐसा निर्णय जिससे संसाधनों की उपलब्धता के मामले में आधिकारिक अनुमानों के अनुसार भी  एक वर्ष में लगभग 150,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता था। सवाल तो यह उठता है कि आखिर साल के मध्य में कॉरपोरेट टैक्स को कम करने की क्या जल्दी थी, जिसने गरीबों की मदद के लिए तत्काल आवश्यक संसाधनों को और कम कर दिया या उनकी पहुंच से बाहर कर दिया था, यह कभी स्पष्ट नहीं हुआ। 2020 के बजट ने लाभांश वितरण टैक्स को भी समाप्त कर दिया था।

इस तरह के प्रतिगामी बदलावों ने अप्रत्यक्ष करों पर निर्भरता बढ़ा दी है, जिसे प्रत्यक्ष करों के मुक़ाबले सभी लोगों द्वारा समान रूप से साझा किया जाता है, जो प्रत्यक्ष कर विशेष रूप से अमीर और सुपररिच को निशाना बनाते हैं। हालांकि, अप्रत्यक्ष करों के मामले में भी, सीमित सीमा तक ही अमीरों को अधिक लक्षित करना संभव है।

सरकार ईंधन पर उत्पाद शुल्क बढ़ा रही है, जिसका बोझ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दैनिक उपयोग की वस्तुओं की एक विस्तृत श्रृंखला की बढ़ती कीमतों के रूप में आम लोगों पर पड़ रहा है, जिनकी परिवहन लागत बढ़ जाती है।

सरकार ने कुछ अन्य ऐसे उपाय भी किए हैं जो कॉर्पोरेट संस्थाओं को काफी लाभान्वित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कम टैक्स संग्रह होता है। उदाहरण के लिए, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSCs) प्राधिकरण विधेयक, 2019 मुख्य रूप से घरेलू अर्थव्यवस्था के अधिकार क्षेत्र से बाहर के ग्राहकों से संबंधित है। यह एक प्राधिकरण के निर्माण का प्रावधान करता है जो आईएफएससी के तहत वित्तीय सेवा बाजार का विकास और विनियमन करता है। भारत ने अपना पहला आईएफएससी गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक सिटी (GIFT City) में गांधीनगर, गुजरात में स्थापित किया था। उसे गिफ्ट सिटी को ग्लोबल फाइनेंशियल सेंटर्स इंडेक्स में दसवां स्थान मिला है।

आईएफएससी की समीक्षा में 'डिकोडिंग द प्रायोरिटीज: एन एनालिसिस ऑफ यूनियन बजट 2020-21' शीर्षक से, सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस एकाउंटेबिलिटी (सीबीजीए), दिल्ली ने कहा है कि: "आईएफएससी को कई टैक्स रियायतें मिलती हैं जैसे फर्मों को टैक्स हॉलिडे मिलना, उन्हे लेनदेन के करों और स्टांप शुल्क पर आईएफएससी को छूट मिली है। पूंजीगत लाभ टैक्स  आईएफएससी में स्थापित स्टॉक एक्सचेंज में नॉन-रेजीडेंट द्वारा डेरिवेटिव और कुछ प्रतिभूतियों के हस्तांतरण पर लागू नहीं होता है, जिसमें विदेशी मुद्रा में स्थानान्तरण भी शामिल हैं।

सट्टा निवेश से उत्पन्न जोखिमों की व्याख्या करते हुए, सीबीजीए ने कहा है कि; “आईएफएससी सट्टा निवेश से संबंधित इन्स्ट्रुमेंट और गतिविधियों को प्रोत्साहित करता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत चिंता का विषय है क्योंकि यह संभावित रूप से जीडीपी विकास दर और रोजगार वृद्धि दर जैसे देश के व्यापक आर्थिक संकेतकों को बाधित कर सकता है। इसके अलावा, इसका सरकार के राजस्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है क्योंकि आईएफएससी वास्तविक कर छूट और टैक्स हॉलिडे प्रदान करता है जिसका उपयोग टैक्स दुरुपयोग के लिए किया जा सकता है।”

2022 में एक अन्य समीक्षा में, सीबीजीए ने अंतरराष्ट्रीय कराधान नीति में सरकार की निरंतर बदलाव को नोट किया है। "आईएफएससी में पूंजीगत लाभ, स्टांप शुल्क, लेनदेन कर और अन्य लेवी पर पहले से ही प्रोत्साहन मौजूद हैं - सभी का उद्देश्य अल्पकालिक और सट्टा के रूपों सहित निवेश को प्रोत्साहित करना है।"

सीबीजीए ने यह भी नोट किया है कि बढ़े हुए प्रोत्साहनों में "किसी विदेशी बैंक के किसी भी निवेश विभाग को कराधान से छूट, विदेशी धन को स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहन के साथ-साथ आईएफएससी में पंजीकृत विमान संचालन से निपटने वाली कंपनियों के लिए पूर्ण टैक्स  में कटौती शामिल है"।

"यह कम कॉर्पोरेट टैक्स दर के साथ, डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स की समाप्ति, स्टार्ट-अप्स से टैक्स हॉलिडे और कैपिटल गेन डिडक्शन, और फॉरेन सॉवरेन वेल्थ फंड्स और पेंशन फंड्स के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के लिए प्रोत्साहन करते हुए अंतरराष्ट्रीय कराधान नीति में निरंतर बदलाव को बढ़ाता है।”

हाल के दिनों में हुए विभिन्न अध्ययनों ने अभूतपूर्व संख्या में भारतीयों को गरीबी में धकेले जाने की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जिसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों से भी होती है। साथ ही, अरबपतियों की संख्या में अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि और उनके हाथों में धन की एकाग्रता या उसके इकट्ठा होने से बढ़ती असमानता को भी नोट किया है। 

महामारी ने गरीबों की मदद करने के लिए अमीरों पर अधिक टैक्स लगाने की जरूरत को पैदा किया था। हालांकि, सरकार ने अमीर और सुपररिच को अधिक राजकोषीय रियायत प्रदान की है।

लेखक, कैंपेन टू सेव अर्थ नाउ के ऑनरेरी कन्वेनर हैं। उनकी हाल की किताबों में 'प्लेनेट इन पेरिल' और 'मैन ओवर मशीन' शामिल हैं।

मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है।

Rich-Poor Divide Widens as Centre Shies Away From Progressive Taxation

Narendra modi
BJP
Budget Estimates
Revised estimates
direct taxes
indirect taxes
wealth tax
dividend distribution tax
corporate tax
IFSC
superrich
Rich
Poor
Pandemic
COVID
Nirmala Sitharaman
Billionaires
poverty

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License