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कृषि क़ानूनों के समर्थन में डेयरी सेक्टर का उदाहरण बिल्कुल अतार्किक उदाहरण है!
अनाज और दूध की प्रकृति बिल्कुल अलग है। इनके बाजार की प्रकृति अलग-अलग है। कीमत तय करने से जुड़ी परिस्थितियां अलग- अलग हैं। इसलिए अनाज और दूध की तुलना दिन और रात की तुलना करने की तरह है।
अजय कुमार
25 Feb 2021
कृषि क़ानूनों के समर्थन में डेयरी सेक्टर का उदाहरण बिल्कुल अतार्किक उदाहरण है!
Image courtesy: Bilaterals

कृषि क़ानूनों पर सरकार के समर्थकों की तरफ से डेयरी सेक्टर का खूब उदाहरण दिया जाता है। तर्क दिया जाता है कि डेयरी सेक्टर यानी दूध क्षेत्र में न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य है और न ही खरीद बिक्री पर किसी तरह की रोक टोक है। और देखिए कितने शानदार तरीके से भारत का डेयरी सेक्टर चल रहा है। लोगों को अपने दूध की वाजिब कीमत मिल रही हैं। अगर डेयरी बिना न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडियों के फल- फूल सकता है तो कृषि क्षेत्र क्यों नहीं? अगर भारत के दूध का अधिकतर हिस्सा प्राइवेट सेक्टर खरीद कर दूध क्षेत्र को कृषि क्षेत्र के मुकाबले अधिक विकसित कर रहे हैं तो कृषि क्षेत्र में मौजूद अनाजों के साथ ऐसे क्यों नहीं हो सकता?

तो आइए थोड़ा यह समझते हैं कि क्या आनजों और डेयरी क्षेत्र के बीच तुलना करना जायज है या नाजायज?

दूध और अनाज बिल्कुल अलग प्रकृति के कृषि उत्पाद हैं। इनका उत्पादन चक्र अलग होता है। इसलिए इन से जुड़ा बाजार एक दूसरे से अलग है। इनसे जुड़ी प्रसंस्करण उद्योग एक- दूसरे से अलग हैं। वह सारी प्रक्रियाएं एक- दूसरे से अलग हैं, जो दूध और अनाज से जुड़ती हैं।

जब भैंस या गाय दूध देती है तो दिन में दो बार दूध देती है। लेकिन अनाज साल में अधिक से अधिक दो बार होते हैं या तीन बार होते हैं। एक मौसम में एक बार अनाज उगता है। दूध बहुत जल्दी खराब हो जाने वाला सामान है। इसलिए इसका इस्तेमाल करने के लिए  इसे जल्दी से प्रोसेस करना पड़ता है। दूध से मिला प्रसंस्कृत उत्पाद बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता। आप खुद अंदाजा लगा कर देखिए कि अमूल के दूध, दही और नेशले के उत्पाद कितने दिन तक चल सकते हैं।

ठीक यही हाल अनाजों का नहीं है। अनाज बहुत जल्दी बर्बाद नहीं होते हैं। थोड़े से प्रसंस्करण के बाद और अच्छी स्टोरेज फैसिलिटी होने पर इन्हें बहुत लंबे समय तक रखा जा सकता है। जिस तरह का इनपुट अनाजों के पैदावार में लगता है, वैसा दूध के उत्पादन में नहीं। अनुकूल मौसम, उपजाऊ जमीन, सही बीज, सही समय पर सिंचाई और खाद  के साथ और भी कई तरह के कारक एक-दूसरे के साथ मिलकर अनाज के उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं लेकिन दूध उत्पादन के लिए इतने कारकों की जरूरत नहीं होती. इसलिए अनाज क्षेत्र में मेहनत, रिस्क और अनिश्चितता भी बहुत अधिक होती है.

 कोई भी परिवार सबसे पहली प्राथमिकता अनाज को देता है और उसके बाद दूध को। बिना दूध के जीवन चल भी सकता है लेकिन बिना अनाज के नहीं। इसलिए भारत के तकरीबन 85 फ़ीसदी लोग, जो मुश्किल से महीने में ₹10000 की आमदनी कर पाते हैं, वे दूध का उपयोग बहुत कम करते हैं। ज्यादातर अनाज पर ही निर्भर रहते हैं।

इन अर्थों में देखा जाए तो अनाज और दूध की की आपसी तुलना सेब और संतरे की तुलना की तरह लगती है। पूरी तरह से अतार्किक और जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने वाली।

हां यह बात सही है कि अमूल जैसे कोऑपरेटिव सोसाइटी में दूध क्षेत्र में मिसाल देने लायक काम किया है। अनुमान है कि तकरीबन 30 लाख से अधिक दूध उत्पाद करने वाले किसान अमूल जैसे कोऑपरेटिव सोसाइटी से जुड़े हैं, जिनके दूध से जुड़े उत्पाद पूरी दुनिया में बिकते हैं। दूध क्षेत्र में ऐसे उदाहरण होने के बावजूद भी बहुत बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है। उत्तर प्रदेश जैसा राज्य जहां भारत में सबसे अधिक दूध का उत्पादन होता है, वहां  दूध के कोऑपरेटिव सोसाइटी ना के बराबर हैं। यही हाल बिहार का है। इसलिए यहां के दूध उत्पादन से जुड़े किसानों को ज्यादा परेशानी सहनी पड़ती है। कई बार ऐसा हुआ है कि दूध उत्पादन करने वाले किसानों ने भी दूध के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग की है।

तकरीबन भारत में 10 करोड़ लोग दूध उत्पादन से जुड़े हुए हैं, इनमें से अधिकतर छोटी जोत और बिना जोत वाले किसान हैं। भारत में दूध का सबसे अधिक उत्पादन होता है। अंतिम उपभोक्ता तक अगर दूध से जुड़े सामान ₹100 में बिकते हैं तो तकरीबन 70 से ₹80 दूध उत्पादन करने वाले को भी मिल जाते हैं। लेकिन अनाज के उत्पादन में यह बिल्कुल अलग है। यहां अगर किसी मॉल में ₹300 का एक कप पॉपकॉर्न बिकता है तो मक्का उत्पादन करने वाले किसान को इसमें से मुश्किल से ₹10 भी नहीं मिलता। यानी अनाज उत्पादन करने वाले किसानों को अपने उत्पादन में किए गए वैल्यू एडिशन में से बहुत कम हिस्सा मिलता है।

दूध और अनाज के बीच इन सारे अलगाव के बाद सोचते चले जाइए। क्या उन 18 राज्यों में जहां सरकारी मंडियो की व्यवस्था नहीं है और किसी भी खरीददार को अनाज बेचा जा सकता है, वहां के हालात कैसे हैं? क्या उनकी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक कीमत मिल रही है? अगर यह अब तक नहीं हो पाया तो आगे होने की क्या गारंटी है? क्या दूध क्षेत्र से तुलना कर अनाज के कीमतों के साथ नाइंसाफी नहीं की जा रही? क्या आपको नहीं लगता कि सरकार के समर्थकों के जरिए दूध को जरिया बनाकर दिए जा रहे तर्क सफेद झूठ के सिवाय कुछ नहीं है? जिस दूध को उसी दिन उपभोग करना पड़ता है जिस दिन उसका उत्पादन हुआ या अधिक से अधिक जिस दूध का जीवन अपने उत्पादन के दिन से दो-तीन दिनों से अधिक का नहीं होता, उस दूध को आधार बनाकर अनाज जैसी सामानों की तुलना कैसे की जा सकती है, जिसका जीवन अगर सही स्टोरेज फैसिलिटी मिले तो सालों साल हो सकता है। अगर सारा अनाज किसी एक ही व्यापारी के पास जाए तो उस व्यापारी की क्षमता इतनी अधिक बढ़ सकती है कि वह पूरे कृषि क्षेत्र की कीमत को नियंत्रित करने लगे। जैसे मान लीजिए कि जैसे ही अनाज की कीमत बढ़े, व्यापारी अपने जमा किए हुए अनाज को बाजार में उतार दे, अनाज की कीमत कम हो जाए और व्यापारी खरीद ले. इस तरह से जमाखोरी की इजाजत देने वाला कानून पूरे अनाज की कीमत को बिगाड़ सकता है.

 क्योंकि दूध क्षेत्र की प्रकृति ही अलग है इसलिए यह कहा जाना कि अनाजों को बिना सरकारी हस्तक्षेप के वाजिब कीमत मिल जाएगी। यह भी बिल्कुल कोई कुतार्किक राय है। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे यह कहा जाए कि दिन में अगर रोशनी मिलती है तो रात में भी रोशनी मिलेगी। कहने का मतलब है कि जिस तरह से दिन और रात अलग अलग है, उसी तरह से अनाज और दूध का क्षेत्र अलग अलग है। इसलिए कोई तुलना हो ही नहीं सकती।

इसके बाद अगर केवल डेयरी सेक्टर की बात की जाए तो कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा इसकी हकीकत लिखते हैं कि कई दशकों से अमेरिका के डेयरी फार्म कम कीमत मिलने की वजह से जूझ रहे हैं। कॉरपोरेट फार्मिंग अपनाने की वजह से दूध का बहुत अधिक उत्पादन हुआ। कीमतें घट गईं। और बहुत सारे दूध उत्पादन करने वाले लोगों ने दूध उत्पादन का पेशा छोड़ दिया। कॉरपोरेट फार्मिंग की यही प्रवृत्ति है। सब कुछ कॉर्पोरेट का हो जाता है। छोटे और मझोले किसान धीरे-धीरे दम तोड़ने लगते हैं।  कृषि क्षेत्र से बाहर निकल जाते हैं।

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