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हक़ीक़त तो यही है कि सरकारी कंपनियां प्राइवेट में तब्दील होने पर आरक्षण नहीं देतीं
वही हो रहा है जिसकी आशंका बहुतेरे लोगों ने जताई थी। सरकारी कंपनियां निजी कंपनियों में बदलेंगे तो सबसे पहले आरक्षण पर ही हमला होगा। उसे ही किनारे लगाया जाएगा।
अजय कुमार
04 Apr 2021
हक़ीक़त तो यही है कि सरकारी कंपनियां प्राइवेट में तब्दील होने पर आरक्षण नहीं देतीं
Image courtesy : DailyO

अपना नाम ना बताने की शर्त पर तीन वरिष्ठ अधिकारियों ने मीडिया में यह बयान दिया है कि सरकार ने सरकारी कंपनियों के खरीदार निजी निवेशकों को भरोसा दिलाया है कि सरकारी कंपनी के निजीकृत हो जाने के बाद केवल मौजूदा समय में आरक्षण की वजह से नौकरी कर रहे कर्मचारियों के अलावा दूसरी कोई भी नई नियुक्ति करने के दौरान जातिगत आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण को अपनाने की जरूरत नहीं है।

अगर यह खबर सही है तो वही हो रहा है जिसकी आशंका बहुतेरे लोगों ने जताई थी। सरकारी कंपनियां निजी कंपनियों में बदलेंगे तो सबसे पहले आरक्षण पर ही हमला होगा। उसे ही किनारे लगाया जाएगा।

जानकारों का कहना है कि सरकार की तरफ से शेयर बेचते समय यह अनुबंध किया जा सकता है कि शेयर खरीदने वालों की तरफ से कंपनी को चलाने की गवर्निंग बॉडी कुछ शर्तों को जरूर मानेगी। जैसे कि वह कंपनी में कर्मचारियों की नियुक्ति करते समय जातिगत आधार पर आरक्षण देने का नियम जारी रखें। सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सरकारी योजनाओं को अपने कंपनी में लागू करे। किसी भी कर्मचारी को न्यूनतम मजदूरी और वेतन से कम मेहनताना नहीं दे।

निजी कंपनियों से अनुबंध करते समय सरकार की तरफ से इन नियमों को शर्त के तौर पर प्रस्तुत करना कोई बड़ी बात नहीं है। सरकार को महज इच्छाशक्ति चाहिए कि वह निजी कंपनियों को कुछ जरूरी शर्त मानने का आदेश दे।

लेकिन सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही? इसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है कि सरकार की पूरी नीति ही प्राइवेटाइजेशन कॉरपोरेटाइजेशन कर आम लोगों के विकास के लिए ट्रिकल डाउन इफेक्ट के लिए छोड़ देना है। अब रिसते रिसते उन तक विकास पहुंचे तो अच्छी बात नहीं तो सरकार को आम लोगों से कोई लेना देना नहीं।

कुछ मुट्ठी भर अमीरों को फायदा पहुंचाना है। वह मुट्ठी भर अमीर अपने फायदे के बदले सरकार को पैसा देंगे। सरकार इस पैसे से मीडिया को नियंत्रित कर, चुनाव में पैसा झोंक, हिंदुत्व सांप्रदायिकता का तड़का लगा कर देश की गद्दी पर बैठ राज करेगी।

इसलिए ऐसी स्थिति में यहां कहीं भी दूर दूर से सामाजिक न्याय की भावना से गहरे तौर पर जुड़ी हुई सरकारों का मिलना नामुमकिन होता है। नहीं तो अब तक महज 3 फ़ीसदी से भी कम सरकारी नौकरी होने की वजह से बहुत बड़ा निजी क्षेत्र सामाजिक न्याय की संकल्पना से बहुत दूर है। सरकार अगर जातिगत भेदभाव को दूर कर भारत के संसाधन में पूरे समुदाय के प्रतिनिधित्व के विचार से संकल्पित होती तो निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू हो चुका होता।

अर्थव्यवस्था का मतलब केवल जीडीपी ग्रोथ बनकर रह गया है। चलती भाषा में कहें तो अर्थव्यवस्था का मतलब केवल पैसा बनाने और बढ़ाने से है। लोक कल्याण हो रहा है या नहीं पूरे समाज के विभिन्न समुदायों के साथ न्याय हो रहा है कि नहीं। सरकार ने इन सब विषयों पर सोचना बंद कर दिया है। उसकी और मीडिया की तरफ से विकास का सारा पैमाना जीडीपी ग्रोथ पर जाकर खत्म हो जाता है।

इस साल 23 कंपनियों को बेचने की मंजूरी दी जा चुकी है। 2019 के पब्लिक इंटरप्राइजेस सर्वे के मुताबिक भारत में 348 सरकारी कंपनियां हैं। इस बार के बजट में तो खुलकर कहा गया कि सरकार तो सरकारी कंपनियां बेचेगी। बैंक, इंश्योरेंस कंपनी सब बेचेगी। जानकारों का मानना है कि अगले कुछ सालों में सरकारी कंपनियों की संख्या सिमटकर महज दो दर्जन बचेगी।

सरकार जब बेच रही है तो सबसे बड़ी चुनौती किसके सामने है। सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों के सामने है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं। जो आरक्षण की वजह से वहां पहुंच पाए जहां उन्हें बिना आरक्षण के जगह नहीं मिलती।

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के नौजवानों को सरकारी नौकरी में 49.5% तक आरक्षण मिलता है।

बिहार में सिविल इंजीनियर रघुनाथ यादव कहते हैं, “मैं आरक्षण की वजह से इंजीनियर बन पाया। अगर आरक्षण ना मिलता तो अपने गांव में कुछ दूसरा ही धंधा कर रहा होता। मेरा अपना अनुभव कहता है कि बहुत तकनीकी किस्म की कुछ नौकरियों के अलावा दुनिया की सारी नौकरियों के लिए ऐसी काबिलियत की जरूरत नहीं होती जो 90 नंबर लाने वाले बच्चे में हो और 70 नंबर लाने वाले बच्चे में ना हो। ठीक ढंग से पढ़ने लिखने के बाद औसत किस्म की काबिलियत सब में आ जाती है। भले ही 3 घंटे के परीक्षा में किसी को 90 नंबर मिला हो और किसी को 70 नंबर।”

शुरुआत करने के लिए जिस काबिलियत की जरूरत होती है वह तकरीबन सब में होती है। सबसे बड़ी दिक्कत काबिलियत कि नहीं अवसरों की होती है। मैं मानता हूं कि मुझे अवसर आरक्षण की वजह से मिला है। तब जाकर में सरकारी नौकरी कर पाया हूं। अपने अनुभव से कहूं तो शुरुआती एक दो साल सीखने की दौर में हम सब नौ सीखिए होते हैं। लेकिन उसके बाद धीरे धीरे हम सब की काबिलियत एक ही तरह की हो जाती है। ऐसा नहीं होता कि 90 नंबर लाने वाला मुझसे आगे ही हो। काबिलियत के मामले में हममें से अधिकतर बराबर रहते हैं। इसलिए लड़ाई बेसिक समझ और सब के लिए अवसर बनाने के रास्ते से जुड़ी है। प्राइवेट कंपनियां जिस तरह से मुनाफे के हाथी पर सवार होकर पूरी दुनिया को देखते हैं वह आरक्षण नहीं देने वाली।

आरक्षण पर BJP सरकार ने अपने कार्यकाल में कई बड़े हमले किए है। नौकरशाही में लैटरल एंट्री से भर्ती होने लगी है। लैटरल एंट्री की जो भर्ती निकली तो इनमें आरक्षण लागू नहीं था। आर्थिक तौर पर गरीब ऊंची जातियों को 10% आरक्षण दिया जा रहा है लेकिन वहीं पर सरकारी कंपनी बेचकर बनी प्राइवेट कंपनी आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं कर रही। सबसे बड़ी बात रेलवे से लेकर विश्वविद्यालय कहीं भी चले जाइए आपको कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हुए लोग दिख जाएंगे। ऐसा क्यों है? यह लोग सस्ते में काम करते हैं और सबसे बड़ी बात कॉन्ट्रैक्ट में भर्ती करते समय आरक्षण का प्रावधान नहीं रखा जाता।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित क्रिस्टोफर जैफरलॉट के लेख के मुताबिक प्राइवेटाइजेशन की वजह से आरक्षण पर बहुत बड़ी मार पड़ने वाली है। साल 2001 से लेकर 2004 के बीच बहुत बड़ा प्राइवेटाइजेशन हुआ। तकरीबन 14 बड़ी सरकारी कंपनियों का निजीकरण कर दिया गया। साल 2003 में केंद्र सरकार के SC कर्मचारी 5.40 लाख थे जो 2012 तक 16% घटकर 4.55 लाख हो गए। जबकि साल 1992 में OBC आरक्षण की शुरुआत हुई। तब 2004 तक केंद्र की सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी 16.6% थी, 2014 आते-आते 28.5% हो गई। देश में OBC जनसंख्या करीब 41% है। आरक्षण के चलते सरकारी नौकरियों में वे बराबरी की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन प्राइवेटाइजेशन के बाद इसकी भी गारंटी नहीं रह जाएगी।

आबादी के हिसाब से देश में 09 फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति (एसटी), 19 फ़ीसदी अनुसूचित जाति (एससी) और 44 फ़ीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोग हैं। सनद रहे, जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी नहीं किए जा रहे हैं। अगर वे जारी हो जाएं तो ये आंकड़े बढ़ सकते हैं। कई अध्ययनों  की मानें तो एससी में 43 फ़ीसदी, एसटी में 29 फ़ीसदी और ओबीसी में 21 फ़ीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। उच्च जातियों में यह आंकड़ा 13 फ़ीसदी है।

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे से इन जातियों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है लेकिन सरकार ने राष्ट्रीय सैंपल सर्वे को छुपा कर रख दिया है। उसकी भद्द पिट सकती है इसलिए उसे जारी नहीं कर रही है। फिर भी साल 2011-12 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक देखे तो माध्यमिक और उससे आगे की शिक्षा के हिसाब से एसटी में 21 फ़ीसदी, एससी में 17 फ़ीसदी और ओबीसी में 30 फ़ीसदी लोग शिक्षित हैं। उच्च जातियों में यह आंकड़ा 46 फ़ीसदी है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हालत बेहद ख़राब है। एसटी के 03 फ़ीसदी, एससी के 04 फ़ीसदी, ओबीसी के 06 फ़ीसदी और उच्च जाति के 15 फ़ीसदी लोग उच्च शिक्षा प्राप्त हैं।

यह ढेर सारे आंकड़े इसलिए रख दिए गए ताकि आरक्षण से जुड़ी बहस पर मनमाने तरीके से तर्क रखने से परहेज किया जाए। क्योंकि आरक्षण को खारिज करने वाले अधिकतर लोगों का तर्क यही होता है कि उनके मोहल्ले का निचली जाति का इंसान बहुत धनिक है। उसके घर में एक सरकारी नौकरी भी है। इन लोगों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। लोग अपने आसपास के अनुभव बता कर आरक्षण ना दिए जाने की वकालत करते हैं। जबकि आंकड़े बिल्कुल अलग हकीकत बयान करते हैं। इन सबके साथ एक चौंकाने वाला आंकड़ा तो यह भी है कि अनुसूचित जाति की तकरीबन 60 फ़ीसदी नौकरियां सफाई कर्मचारी के पद से जुड़ी हुई हैं।

आंकड़ों के साथ भारत के संसाधनों के बीच बंटवारे को लेकर अगर जातिगत प्रतिनिधित्व की दशा देखी जाए तो निचली जातियों की दशा बहुत अधिक दयनीय ही दिखेगी।

आरक्षण कैसे दिया जाए। देने के क्या तरीके हों? इस पर बहुत सारी बहस की जानी चाहिए। यह जरूरी भी है लेकिन भारतीय समाज में सामाजिक न्याय स्थापित करने के लिए सैद्धांतिक तौर पर आरक्षण को बनाए रखना बहुत जरूरी है। यह बहस नहीं होनी चाहिए कि आरक्षण खत्म हो रहा है। सरकार इसे लागू करे। यह बहस उठने का मतलब है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है।

निजी कृत होते भारतीय रोजगार आरक्षण जैसी नीति से बहुत दूर चलते जाने की तरफ बढ़ रहे हैं। उन सब का एक ही तर्क होता है कि उन्हें अपनी कंपनी का फायदा देखना है और अपनी कंपनी के फायदे के लिए वह काबिल व्यक्ति का ही चुनाव करेंगे। ऐसी कोई बाधा स्वीकार नहीं करेंगे जो काबिल लोगों को चुनने से रोके।

जबकि हकीकत यह है कि कुछ तकनीकी किस्म की नौकरियों को छोड़कर बाकी सभी नौकरियों के लिए काबिल उम्मीदवारों की बाहर फौज खड़ी रहती है। लेकिन प्राइवेट कंपनियों में होने वाली नियुक्तियां या तो आपसी जान पहचान से होती हैं या ऐसे जांच परीक्षा से होती हैं जिनके परिणामों में किसी भी तरह की सामाजिक न्याय स्थापित करने की छलनी नहीं लगाई जाती है।

यह सब बहुत लंबे समय से होते चले जा रहा है। बहुत लंबे समय से आरक्षण का मतलब केवल सरकारी नौकरी में हिस्सेदारी रही है। केवल 3 फ़ीसदी नौकरियों के लिए आरक्षण की लाठी पकड़ा कर सामाजिक अन्याय दूर नहीं किया जा सकता। समय की मांग है कि गरीबी दूर करने के लिए सरकार जमीनी स्तर पर ढेर सारे बुनियादी सुविधाएं आम लोगों तक पहुंचाएं और साथ में सामाजिक अन्याय की दीवार ढहाने के लिए नीतियां भी हर जगह लागू करें जो भारत के बहुत बड़े हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए जरूरी है।

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