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नवउदारवाद और राष्ट्रवाद के बीच में खेती-किसानी का भविष्य
पहले सरकार किसानी-खेती और उससे बाहर के पूंजीपतियों के बीच खुद को रक्षा दीवार की तरह खड़ा रखती थी, नवउदारवाद के अंतर्गत सरकार की यह बीच की दीवार की भूमिका भी खत्म हो गयी है अब बाहरी पूंजीपतियों को, किसानी खेती तक सीधी पहुंच हासिल हो गयी है।
प्रभात पटनायक
24 Aug 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
नवउदारवाद और राष्ट्रवाद के बीच में खेती-किसानी का भविष्य
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

सभी जानते हैं कि तीसरी दुनिया के देशों में मुक्ति का संघर्ष जिस साम्राज्यविरोधी राष्ट्रवाद से संचालित था, वह उस पूंजीवादी राष्ट्रवाद से बिल्कुल भिन्न प्रजाति की चीज थी, जिसका जन्म सत्रहवीं सदी में यूरोप में हुआ था। पश्चिम में इस तरह की प्रवृत्ति है, जिसमें प्रगतिशील भी शामिल हैं, जो राष्ट्रवाद को एकसार तथा प्रतिक्रियावादी श्रेणी की तरह देखती है। वे साम्राज्यविरोधी राष्ट्रवाद तक को यूरोपिय पूंजीवादी राष्ट्रवाद के जैसा ही मानते हैं, जबकि दोनों के बीच अनेक महत्वपूर्ण भिन्नताएं रही हैं।

इनमें से कम से कम तीन भिन्नताएं विशेष महत्व की हैं। पहली यह कि यूरोपीय राष्ट्रवाद शुरूआत से ही साम्राज्यवादी था। दूसरी, वह कभी भी समावेशी नहीं था बल्कि हमेशा से ‘अंदर के दुश्मन’ की पहचान करता आया था। तीसरी, उसने ‘राष्ट्र’ को पूजने वाली मूर्ति बना दिया था। वह राष्ट्र को जनता के ऊपर रखता था और उसे एक ऐसी सत्ता बना देता था, जिसके लिए जनता को तो कुर्बानी देनी होती थी, लेकिन जो बदले में जनता के लिए कुछ भी नहीं करता था। इसके विपरीत, साम्राज्य विरोधी राष्ट्रवाद, कोई साम्राज्य हासिल करने में नहीं लगा हुआ था, वह समावेशी था और वह अपनी जनता की दशा सुधारने को, राष्ट्र के अस्तित्व का मूल तर्क मानता था। चूंकि उपनिवेश विरोधी संघर्ष एक बहुवर्गीय संघर्ष था, जिसमें राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के अलावा मजदूर तथा किसान शामिल थे, इस राष्ट्रवाद पर यूरोपीय किस्म के पूंजीवादी राष्ट्रवाद की छाप कभी भी नहीं पड़ सकती थी।

चूंकि किसान सबसे बड़ी संख्या वाला वर्ग थे और उन्होंने ही औपनिवेशिक उत्पीड़न झेला था, इसलिए कुछ लेखकों ने इसे ‘किसान राष्ट्रवाद’ का ही नाम दिया है। बहरहाल, मुद्दा यह है कि अगर इस राष्ट्रवाद को आगे ले जाना है और अगर राष्ट्र को साम्राज्यवाद के हमले के खिलाफ, जो कि राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने से खत्म नहीं हो जाता है, एक सत्ता के रूप में बचे रहना है, तो इन लक्ष्यों को किसान जनता के सक्रिय समर्थन से ही हासिल किया जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि ऐसी विकास रणनीति, जो किसानों के प्रति उत्पीड़नकारी हो, राष्ट्र के निर्माण की परियोजना के ही खिलाफ जाती है। इस तरह की विकास रणनीति, साम्राज्यवाद के सामने राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े होने को ही सुगम बनाती है।

यह सबसे पहले तो साम्राज्यवाद के शिकंजे से आजाद हुए, तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों के लिए एक पूंजीवादी विकास रणनीति के लिए दरवाजा बंद कर देता है। आखिरकार, पूंजीवाद की तो पहचान ही उसकी इस नैसर्गिक प्रवत्ति से होती है कि लघु उत्पादन क्षेत्र पर, जिसमें किसानी-खेती भी आती है, अतिक्रमण करे और उसे कमजोर करे। यह ऐसा नुक्ता है जिसे उपनिवेशविरोधी मुक्ति आंदोलन बखूबी पहचानते थे। जिन मामलों में ऐसे आंदोलनों का नेतृत्व कम्युनिस्ट नहीं कर रहे थे, वहां भी इन आंदोलनों में विकास की ऐसी रणनीति ही अपनायी गयी थी, जो पूंजीपतियों को अपनी गतिविधियां चलाने की इजाजत देने के बावजूद, उन पर नियंत्रण रखने की कोशिश करती थी। यही वह रणनीति है जिसकी पहचान हम, नियंत्रणकारी रणनीति के रूप में करते हैं।

इस नियंत्रणकारी रणनीति के भीतर भी भूमि के पुनर्वितरण की प्रक्रिया कभी भी मुकम्मल नहीं रही थी। फिर भी, कृषि के क्षेत्र के बाहर से पूंजीवादी ताकतों को, कभी भी कृषि क्षेत्र पर अतिक्रमण करने की इजाजत नहीं दी गयी। किसानी खेती को, घरेलू इजारेदाराना पूंजीपति वर्ग तक से बचाकर रखा गया था, फिर विदेशी एग्री बिजनेस के अतिक्रमण का तो सवाल ही कहां उठता है।

बहरहाल, नवउदारवादी व्यवस्था के आने के साथ, बचाव की यह व्यवस्था खत्म हो जाती है। लेकिन, नवउदारवाद का तो मकसद ही यह है कि ऐसे पूंजीवाद की जगह पर, जो शासन द्वारा लगाए जाने वाले ऐसे नियंत्रणों के घेरे में हो, जो किसानी खेती को, कृषि के क्षेत्र से बाहर के पूंजीपतियों से बचाने का प्रयत्न करते हैं, पूंजीवाद के उन्मुक्त विकास को लाया जाए। इसलिए, नवउदारवाद अनिवार्यत: किसानी खेती को कमजोर करता है।

भारत में किसानी खेती पर यह हमला, कई-कई रास्तों से होता है। इनमें से पहले, कीमतों में उतार-चढ़ाव, खासतौर पर कीमतों में भारी गिरावट के जरिए हमले को, नियंत्रणकारी व्यवस्था में रोका गया था। इसे खाद्यान्नों तथा नकदी फसलों, दोनों के मामले में सरकारी एजेंसियों के माध्यम से बाजार में सरकारी हस्तक्षेप के जरिए किया गया. हालांकि, मौजूदा सरकार से पहले किसी भी सरकार ने खाद्य फसलों को हासिल इस संरक्षण को हटाया नहीं था, फिर भी नियंत्रणकारी व्यवस्था के अंतर्गत नकदी फसलों को हासिल इस संरक्षण को पहले ही हटा लिया गया था और सभी संंबंधित सरकारी एजेंसियों से मार्केटिंग की उनकी भूमिका छीन ली गयी थी। इसका कुल नतीजा यह था कि  जिन वर्षों में कीमतों में ज्यादा गिरावट होती थी, किसानों के सिर पर कर्ज चढ़ जाता था, जिसे वे कभी उतार नहीं पाते थे।

दूसरे, नवउदारवाद के दौर में खेती में लगने वाली अनेक लागत सामग्रियों की कीमतें बढ़ती रही थीं, जबकि किसानों की पैदावार के दाम, कम से कम नकदी फसलों के मामले में तो विश्व बाजार से ही तय हो रहे थे। बैंकों के निजीकरण का दायरा बढऩे के साथ, खासतौर पर किसानों के लिए ऋण मंहगा होता चला गया। नवउदारवाद के दौर में, राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ-साथ निजी बैंकों को अपनी गतिविधियां चलाने की इजाजत दी गयी थी। कहने को तो निजी बैंकों पर भी अपने ऋण का एक निश्चित हिस्सा ‘प्राथमिकता वाले क्षेत्र’ को देने (जिसमें खेती का प्रमुख स्थान था) के नियम लागू होते थे, लेकिन निजी बैंक इन नियमों का बेरोकटोक उल्लंघन करते रहे हैं। और तो और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भी, इस लिहाज से निजी क्षेत्र के बैंकों से अपने बेहतर रिकार्ड के बावजूद, ‘कृषि ऋण’ की परिभाषा को उत्तरोत्तर ढीला किए जाने का फायदा उठाया है और इस रास्ते से किसानी-खेती को, ऋण के उसके वैध हिस्से से वंचित किया है। इस तरह किसानों को निजी सूदखोरों के चंगुल में धकेला गया है, जो किसानों से अनाप-शनाप ब्याज वसूल करते हैं।

तीसरे, किसानों को अपनी पैदावार के लिए मिल रहे दाम की तुलना, खेती की लागत सामग्रियों तथा उपभोक्ता वस्तुओं के लिए, जिसमें शिक्षा व स्वास्थ्य रक्षा जैसी सेवाएं भी शामिल हैं, किसानों को देने पड़ रहे दाम से करने पर हम पाते हैं कि व्यापार की शर्तें, किसानों के विरुद्ध झुक गयी हैं। इस का एक स्वत: स्पष्ट कारण तो यही है कि शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्रों से सरकार के पांव पीछे खींचने ने तथा आवश्यक सेवाओं के निजीकरण ने, जोकि नवउदारवाद की निशानियां ही हैं, इन सब को किसानों के लिए बहुत ही महंगा बना दिया है।

चौथे, जहां पहले सरकार किसानी-खेती और उससे बाहर के पूंजीपतियों के बीच खुद को रक्षा दीवार की तरह खड़ा रखती थी, नवउदारवाद के अंतर्गत सरकार की यह बीच की दीवार की भूमिका खत्म हो गयी है और बाहरी पूंजीपतियों को, किसानी खेती तक सीधी पहुंच हासिल हो गयी है। बहुराष्ट्रीय बीज तथा कीटनाशक फर्में, अब अपने एजेंटों के जरिए गांव-गांव तक पहुंच गयी हैं और उनके ये एजेंट किसानों को ऋण भी देते हैं। एक बार जब किसान इन फर्मों के चंगुल में फंस जाता है, उसके लिए इस फंदे में से निकलना नामुमकिन हो जाता है। इस मुकाम पर ठेका खेती प्रकट होती है और तरह-तरह से किसानों को ठगा जाता है।

यह सूची कोई मुकम्मल सूची नहीं है। इस सारे घटना विकास का नतीजा यह हुआ है कि किसान, कंगाल हो गए हैं और कर्ज के भारी बोझ के नीचे दब गए हैं। जाहिर है कि 1995 के बाद से भारत में 4 लाख किसानों का आत्महत्या करना, इसी का साक्ष्य है। वर्तमान सरकार अब किसानी खेती के खिलाफ हमले को और एक बड़ा डग भरकर आगे बढ़ाने की कोशिश में लगी है। इसके लिए वह खाद्य फसलों को उपलब्ध मूल्य-समर्थन भी हटाना चाहती है, जिसके खिलाफ हजारों की संख्या में किसान, नौ महीने से ज्यादा से दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

ये कदम न तो संयोग से उठा लिए गए हैं और न सिर्फ भारत के लिए ही पेश किए गए हैं। ये कदम पूंजी की नैसर्गिक प्रवृत्तियों से संचालित हैं, जिन पर निरुपनिवेशीकरण के बाद कई वर्षों तक किसी हद तक अंकुश लगा रहा था। लेकिन, अब नवउदारवादी व्यवस्था में इन प्रवृत्तियों को पूरी तरह से खुला छोड़ दिया गया है, जिसकी कीमत किसानी खेती चुका रही है।

जब किसान ऐसी तबाही झेल रहे हों, तीसरी दुनिया के किसी देश का अपने यहां राष्ट्र निर्माण करना असंभव है। यूरोप में पूंजीवादी राष्ट्रवाद को जो भी थोड़ा-बहुत समर्थन हासिल रहा था, जिसके उथलेपन का प्रदर्शन पहले विश्व युद्ध ने कर दिया था, वह समर्थन भी इसलिए था कि यह राष्ट्रवाद अपने साथ, मेहनतकश जनता की जिंदगी में एक हद तक बेहतरी लेकर आया था। और यह कोई इसलिए नहीं हुआ था कि पूंजीवाद में ही मेहनतकशों की जिंदगी में सुधार लाने कोई नैसर्गिक प्रवृत्ति होती है, बल्कि ऐसा हुआ था क्योंकि यूरोपीय पूंजीवाद को साम्राज्यीय हैसियत हासिल थी।

इस साम्राज्यीय हैसियत ने ही यूरोपीय मजदूरों की विशाल संख्या के लिए, समशीतोष्ण इलाकों की गोरी बस्तियों के लिए पलायन संभव बनाया था। इससे यूरोपीय श्रम बाजार में एक हद तक मजबूती आयी थी और इसके चलते ट्रेड यूनियनें, मजदूरी में बढ़ोतरियां कराने के लिहाज से कारगर साबित हो रही थीं। उष्णकटिबंधीय उपनिवेशों में निरुद्योगीकरण चलाते रहने के जरिए, उनकी ओर बेरोजगारी के निर्यात ने भी, ऐसी ही भूमिका अदा की थी। और आखिरी बात यह कि इन उष्णकटिबंधीय उपनिवेशों से, अतिरिक्त उत्पाद के साम्राज्यीय केंद्रों की ओर प्रवाह ने, इसकी गुंजाइश बना दी थी कि साम्राज्यीय पूंजी केंद्रों में, वहां के मुनाफों को घटाए बिना ही, मजदूरियों में बढ़ोतरी की जा सकती थी।

इस तरह, भारत जैसे किसी देश में उपनिवेशविरोधी राष्ट्रवाद को, नवउदारवादी पूंजीवाद के निजाम में, जो कि किसानों को बुरी तरह से निचोड़ने की व्यवस्था कायम करता है, आगे ले जाना संभव ही नहीं है। इसी प्रकार, ऐसे किसी भी देश में पूंजीवादी राष्ट्रवाद की दुहाई का सहारा लेकर राष्ट्र का निर्माण करना भी असंभव है क्योंकि ऐसे देशों के लिए इसका कोई मौका ही नहीं होता है कि यूरोप ने जैसे अपना साम्राज्य कायम किया था, वैसा कोई साम्राज्य हासिल कर लें। राष्ट्र निर्माण की परियोजना के आधार के रूप में, ‘‘हिंदुत्व’’ और पूंजीवादी राष्ट्रवाद के योग का उपयोग करना भी, न सिर्फ घृणित है बल्कि निरर्थक भी है। हिंदुत्व ने जिस नवउदारवाद के साथ गठजोड़ कर रखा है, उसके तहत किसानों के जिस तरह से निचोड़े जाने की स्थिति थोपी जाती है, वह अंतत: तो हिंदुत्व के सहारे जुटाए जाने वाले असर को भी ध्वस्त ही कर देने वाली है। यह दूसरी बात है कि कुछ समय के लिए यह गठजोड़ बहुत कामयाब भी लग सकता है। याद रहे कि हिटलर तक को अपने ‘राष्ट्रवादी’ प्रभाव को सुदृढ़ करने के लिए, 1930 के दशक के महाआर्थिक संकट में जर्मन अर्थव्यवस्था जिस गड्डे में जा पड़ी थी उससे बाहर निकालने के लिए, रोजगार में नयी जान डालने के उपायों का सहारा लेना पड़ा था।

इस तरह, भारत जैसे देशों में, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के लिए भी, विकास की एक ऐसी रणनीति की जरूरत होती है, जो किसानी खेती की तब तक हिफाजत करे, जब तक वह स्वेच्छा से कलैक्टिवों तथा सहकारिताओं में रूपांतरित नहीं हो जाती है। संक्षेप में कहें तो यह रणनीति समाजवाद की ओर ले जाने वाली रणनीति होनी चाहिए। इस तरह के हालात में समाजवादी रणनीति पर चला  जाना, सिर्फ इसके वांछनीय होने का ही मामला नहीं है। यह एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में राष्ट्र के बचे रहने के लिए भी जरूरी है।

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